Friday, April 4, 2014

नेताजी की "गंदी बात"

लोकतंत्र की सबसे बड़ी खासियत है कि इसमें सबको बोलने का अधिकार प्राप्त है। लेकिन हमारे देश में जैसे-जैसे चुनाव पास आते जा रहे हैं, वैसे-वैसे नेताओं के बोलने का अधिकार कुछ ज्यादा ही बढ़ता जा रहा है। नेताओं को लगता है कि वो कुछ भी बोल सकते हैं। भारत में चुनाव आयोग को जिस तरह काम करना चाहिए उस तरह हो नहीं पाता है। अगर हम देश के राजनैतिक इतिहास में जाएँ तो सत्तर के दशक तक यह मर्यादा पूरी तरह से कायम थी। 60 के दशक में एक बार के चुनाव में जवाहर लाल नेहरू ने अम्बेडकर साहब की लोक सभा में कहा था कि अगर आपको लगता है कि कांग्रेस पार्टी की नीतियाँ अच्छी हैं, तो हमे वोट करें लेकिन मैं यह नहीं कह सकता कि आप अम्बेडकर साहब को वोट ना करें। डा. राम मनोहर लोहिया जी हमेशा ही कांग्रेस की नीतियों के विरोधी रहे लेकिन कभी भी उसके नेताओं पर पर्सनल टिप्पणी नहीं की। एक बार इंदिरा गाँधीजी ने समाजवादी नेता मोहन सिंह के खिलाफ प्रचार करने से मना कर दिया था। इसी तरह से जयप्रकाश नारायण हमेशा ही व्यक्तिगत तौर पर इंदिरा गाँधी की बहुत इज्जत करते थे। अटल बिहारी बाजपाई ने भी कभी इंदिरा को दुर्गा का रूप बताया था.अगर अब देखा जाए तो हर नेता एक-दूसरे पर व्यक्तिगत टिप्पणी करने में लगा है। इसकी शुरुआत सबसे पहले मोदीजी ने की की थी. उन्होंने राहुल गाँधी को सहजादा कहना शुरु किया, मनमोहन को मौनमोहन, और सोसल मीडिया पर कांग्रेसी नेताओं खासकर गाँधी परिवार पर व्यक्तिगत आपत्तिजनक और गैरलोकतांन्त्रिक भाषा का प्रयोग करते या समर्थकों से करवाते रहे हैं। अगर कांग्रेस के बड़े नेताओं की तरफ देखें तो किसी ने भी व्यक्तिगत तौर पर कोई टिप्पणी ना करके अपने छोटे नेताओं को इस युद्ध में कूदने दिया। राहुल गाँधी ने स्वयं को गाँधी और मोदी को हिटलर की तरह पेश करते हुए बचना ही अच्छा समझा। मोदी इस युद्ध में आगे निकलते जा रहे थे कि अचानक एक दिन बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नें उन्हें जवाब देते हुए रोका ही नहीं बल्कि इतिहास ज्ञान भी करा दिया। कांग्रेस के दिग्विजय सिंह ने लगातार उनपर हमले किए, इसी लिस्ट में सबसे आगे खड़े थे बेनी प्रसाद वर्मा जिन्होंने मोदी, केजरीवाल और अपने पुराने मित्र मुलायम सिंह पर भी बहुत हमले किए। क्षेत्रीय दलों में मुलायम सिंह ने अगुवाई करते हुए पहले लालू की मिमिक्री की फिर उनके नेताओं ने मोदी और मायावती पर अभद्र गालीदार भाषा शुरु कर दी जो अब तक चालू है। आपको याद दिला दूं कि मोदी की बोटी-बोटी काटने की बात करने वाले कांग्रेस उम्मीदवार राशिद तब सपा में ही थे। मायावती की निजी जिंदगी और चरित्र पर भी सपा के विधायक स्तर के नेताबहुत पहले से करते रहे हैं। इसमें बसपा के भी नेता किसी से पीछे ना रहते हुए सामिल हो गए। हाँ बसपा सुप्रीमो ने इससे परहेज किया है। नई नवेली आम आदमी पार्टी ने भी कई बार इस तरह के बयान दिए हैं। चाहें कुमार विश्वाश का बार-बार राहुल और सोनिया गाँधी पर की गई टिप्पणी और उनके समर्थकों के द्वारा ही क्यों न हों. इस बात पर मैं केजरीवाल से सहमत हूँ कि भ्रष्टाचार के मामले में किसी पर भी हमले किए जा सकते हैं। कम्युनिस्टों ने अपने इतिहास के हिसाब से अपनी गरिमाएँ कायम रखी। उनके एक नेता ने ममता बनर्जी पर कुछ बोला था तो प्रकाश करात ने स्वयं उसे माफी मांगने और आगे ऐसा ना करने की सलाह दी। दक्षिण भारत में दक्षिणपंथियों के अलावा सब इससे दूर हैं। महाराष्ट्र तो इसका उदाहरण ही रहा है। अपने को यहाँ का शेर कहने वाले बाल ठाकरे के पुत्र उद्धव और भतीजे राज ठाकरे में इस समय जुबानी जंग बहुत जोरों पर है, दोनो भाई एक दूसरे को बदनाम करने में जूटे  हैं। राज ठाकरे ने यहाँ तक कह दिया कि बाला साहब ठाकरे को अंतिम समय से उद्धव सही से खाना भी नहीं देते थे। उन्हें वड़ा पाव खकर रहना पड़ता था। मैने (राज) खुद उन्हें कई बार खाने के लिए बिरियानी और चिकन सूप भेजा है, खाने के लिए. इसी का जवाब देते हुए उद्धव दे पुत्र आदित्य ठाकरे ने राज को दिमागी बीमार बता डाला। कोई सोंच भी नहीं सकता कि हमारे देश के नेताओं की मानसिकता यहाँ तक जा सकती है। पिछली पंक्तियाँ लिखे दो दिन ही हुए थे कि फिर से राजनैतिक दलों के नेताओं ने अपनी भाषा की पहचान करानी शुरु कर दी। इसमें अमित शाह का नाम सबसे पहले आता है, उन्होंने मायावती के खिलाफ बदले की भावना वाला बयान दिया, साथ ही साथ मुल्ला मुलायम सिंह जैसा अभद्र और भड़काऊ बयान दिया। उधर राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने भी कांग्रेस के नेता को बोटी-बोटी काटने के जवाब देते हुए कहा कि चुनाव के बाद पता चलेगा कि कौन कटेगा? इसी क्रम में एक सपा नेता ने मायावती को भैंस और आजम ख़ान ने मोदी को कुत्ते के पिल्ले का बड़ा भाई कह दिया। आजम ख़ान की बात तो कहीं तक ठीक भी है। मोदी ने खुद 2002 में मरने वाले किसानों की तुलना कुत्ते के पिल्ले से की थी, अगर हिन्दू-मुस्लिम भाई हैं, तो पिल्ले का भाई तो उसका बड़ा भाई ही होगा।
इस क्रम में कुछ बड़े नेता अरविन्द केजरीवाल, राहुल गाँधी, अखिलेश यादव, नीतीश कुमार हैं, जो किसी पर भी पर्सनल टिप्पणी नहीं कर रहे हैं। इनमें केजरीवाल को छोड़कर मोदी का तो कोई नाम ही नहीं लेता है। भारत की संसदीय प्रणाली में यह एक महत्वपूर्ण कदम है कि किसी पर भी व्यक्तिगत प्रहार न किए जाएँ लेकिन मोदी इसे मानने को बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं। उन्होंने हर नेता पर पाकिस्तानी, गद्दार, भ्रष्ट और ना जाने क्या-क्या आरोप लगाए हैं। उन्होंने सोनिया गाँधी की बीमारी तक का मजाक बना डाला। जब राहुल का नाम प्रधान मंत्री पद के लिए घोषित नहीं हुआ तो मोदी ने यह तक कह दिया कि एक माँ अपने बेटे की बलि नहीं देना चाहती है। लेकिन इसके उलट मोदी पर कोई छोटा सा भी राजनैतिक हमला करे तो वो और उनके समर्थक बौखला जाते हैं। आज़मी साहब का के नया विवादास्पद बयान... हालांकि मुलायम के बयान से इनका कुछ ठीक था लेकिन मीडिया ने इसे गलत ढंग से पेश किया। अबू आज़मी ने कहा कि जो रेप करे उसके लिए इस्लाम में पत्थर से मारने की सजा है। और अगर कोई शादीशुदा औरत अपने पति के अलावा किसी के साथ सेक्स करे तो उसे भी फांसी की सजा है। फिर भी आज के जमाने में जहाँ लोकतंत्र और समाज के खुलेपन को लेकर एक बहस चल रही है, वैसे में यह बयान उनकी तालिबानी विचारधारा को दर्शाता है। चुनाव खत्म होने को है लेकिन नेताओं की भाषा लगातार गिरती ही जा रही है कुछ नेताओं को छोड़ दिया जाए तो बेनिप्रसाद, दिग्विजय, गिरिराज सिंह, आजम ख़ान और अमित शाह अपना काम चालू किए हुए हैं इनको देश की जनता और चुनाव आयोग से कुछ भी मतलब नहीं हैअगर इस क्रम में गिरिराज सिंह के बयान की निन्दा ना की जाए तो शायद नाइंसाफी होगी बिहार भाजपा के बड़े नेता गिरिराज सिंह ने अपने एक बयान में कहा कि जो लोग मोदी को पी.एम. बनाने से रोकना चाहते हैं, आने वाले दिनों में उनकी जगह हिन्दुस्तान में नहीं पाकिस्तान में होगी हालांकि भाजपा ने अपनी राय इसपर स्पष्ट की और कहा कि यह भाजपा की लाइन नहीं है एक और मोदी समर्थक प्रवीण तोगडिया ने गुजरात में बयान दिया कि चुनाव के बाद हम मुसलमानों के घरों पर कब्जा कर लेंगे और उन्हें देश से निकाल देंगे।  शिवसेना के नेता कदम का बयान मुम्बई की एक जनसभा में मोदी की मौजूदगी में हुआ जब उन्होंने कहा क़ि अगर हमारी सरकार बनी तो 6 महीने में पाकिस्तान खत्म कर देंगे इन सभी बयानों पर भाजपा ने अपनी सहमति नहीं जताई लेकिन यह भाजपा के ही लोग हैंविश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, संघ और भाजपा के रिस्ते कौन नहीं जानता है? ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भाजपा यह हार्ड हिन्दुत्व का एजेंडा स्वयं ना उठाकर दूसरों से उठवा रही है?
कल से सभी टीवी चैनल और राजनैतिक दल शाजिया इल्मी के बयान के पीछे पड़े हैं उन्होने कहा क्या केवल यही कहा क़ि मुसलमानों को अपने लोगों को वोट देना चाहिए आजतक कांग्रेस ने आपको क्या दिया है अरविन्द केजरीवाल आपके अपने है। अब अर्नब गोस्वामी ही यह बता दें कि इसमें क्या गलत था?
इसी लिस्ट में शामिल हुए बाबा रामदेव भी बहुत बचकाना बयान दे गए उन्होंने कहा कि राहुल गाँधी दलितों के घर पर हनीमून मनाने जाते हैं इतने गलत बयान पर सारे देश में बाबा की बहुत निन्दा हुई लेकिन भाजपा के प्रवक्ता हनीमून शब्द का अर्थ बताने में जूते रहे अबू आसिम आज़मी ने एक और गंदा बयान देते हुए कहा कि जो मुस्लिम सपा को वोट ना दे, उसका डी. एन. ए. चेक कराना चाहिए यह बहुत गंदा बयान था, लेकिन अगर हम यूपी में देखें, तो सपा को सबसे ज्यादा हानि तो सेकुलरिज्म के चक्कर में ही हुई है फिर भी सपा अभी तक पूरी तरह से अपनी विचारधारा पर टिकी हुई है मुजफ़्फ़र नगर के दंगे अलग बात हैं, यहाँ पर सरकार से कुछ गलतियाँ हुईं, लेकिन उसके बाद सरकार से जो हो सकता था किया जिसका दंगो में हाथ था वो तो सबसे फायदे में दिख रहे हैं चलो अपनी बात को आगे बढ़ाते हैं, गिरिराज के बयान के जवाब में फारूख अब्दुल्ला ने कहा कि जो मोदी को वोट देंगे, उन्हें समंदर में डूब जाना चाहिए यह बयान भी बहुत खराब और निन्दनीय था

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