हमारे
देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के सिपाही तात्या टोपे को 18 अप्रैल को
ही फांसी दी गई थी। उनका परिवार हमारे बिठूर में आज भी रहता है। उनके
परिवार की हालत बहुत खराब थी। 3-4 साल पहले सरकार ने उनके परिवार की दो
लड़कियों को नौकरी देने का ऐलान किया था। मैं भी कई साल से बिठूर ढंग से
गया नही हूँ। उनकी तो छोडो और भी कई स्वतंत्रता सेनानी बदलू जमादार सरीखों
के परिवार तो रामजानकी स्कूल के पीछे झोपड़पट्टियों
में रहेते हैं। बिठूर पर राज एक सूबेदार परिवार करता है, जो नाना साहब के
नौकर थे, और अंग्रजों के आक्रमण के समय नाना साहब के साथ गद्दारी की थी। फिर सूबेदार साहब के एक कुछ चमचे हुआ करते थे, जो अधिकतर ब्राम्हण थे, वो
हर गाँव के किसानों और खेतों पर नियंत्रण करते थे। जब सूबेदार साहब मरे
तबसे आज तक ग्रामीण क्षेत्रों की जमीनें उन्हीं लोगों के परिवार और
नज़दीकियों के पास रह गईं। आप उनके लिए पहले जमीन की कीमत का अंदाजा इसी से
लगा सकते हैं, कि मेरे गाँव के सबसे बड़े खेतिहर पहले उनके यहाँ नौकर थे,
और उन्हें इनाम में 30-40 बीघा जमीन दे दी थी। आज इतिहास को ना याद रखते
हुए वो सब जमींदार बनते हैं और अब वही जमीन बेंच-बेंच कर रंगबाजी कर रहे
हैं।
यह बिठूर के पास ध्रुव टीला है। लोक में प्रचलित है कि यहीं पर राजा उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव ने तपस्या की थी। गंगा का पाट यहां इतना विशाल है कि ओर छोर तलाशना मुश्किल है। पानी भी साल के बारहों महीने यहां रहता है। मैं जब भी कानपुर जाता हूं बिठूर के इस ध्रुव टीला पर जरूर जाता हूं। बचपन में तो यहां जंगल था पर अब भूमाफियाओं ने यहां भी कब्जा करना शुरू कर दिया है। संभव है कुछ दिनों बाद यहां गंगा गंदे नाले में तब्दील हो जाए जैसी कि जाजमऊ में है। ध्रुवटीला में एक मंदिर है जिसकी गद्दी वर्षों से मराठों के पास है। कानपुर में मराठा मंदिर देखकर एकाएक आप 18 वीं सदी में पहुुंच जाएंगे। फिलहाल मधुकर मोघे यहां के गद्दीनशीं हैं। मोघे का परिवार बड़ा है इतना बड़ा कि इंटक के नेता रामजी त्रिपाठी तो कहते रहते हैं कि यहां जिस झाड़ी में देखो मोघे का एक न एक बच्चा दिख जाएगा। खैर दो पत्नियों के साथ मधुकर मोघे यहां शान से रहते हैं। यह अलग बात है कि उनके पास धन नहीं है पर इससे उनकी शान और अतिथि सत्कार में कोई फर्क नहीं पड़ता। यह धु्रव टीला गंगा की सतह से काफी ऊँचाई पर है। गंगा में चाहे जितना पानी आ जाए इस ध्रुव टीले पर कोई आंच नहीं आती। एक बार आईआईटी के एक छात्र ने यहाँ से कूदकर गंगा में छलांग लगा ली थी तब से प्रशासन ने यहां कटीले तार लगवा दिए हैं। यहां पर भूमाफियाओं की नजर से कुछ वृक्ष जरूर बचे हुए हैं। लेकिन यहाँ की नगर पंचायत अध्यक्ष कब तक इस पर नजर टेढ़ी नहीं करेंगे कुछ कहा नहीं जा सकता। खैर अगर बिठूर जाएं तो ध्रुव टीला अवश्य जाएं।
(दूसरे पैराग्राफ की लाइने शंभुनाथ शुक्ला जी के फ़ेसबुक वाल से साभार ली गई हैं।)
यह बिठूर के पास ध्रुव टीला है। लोक में प्रचलित है कि यहीं पर राजा उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव ने तपस्या की थी। गंगा का पाट यहां इतना विशाल है कि ओर छोर तलाशना मुश्किल है। पानी भी साल के बारहों महीने यहां रहता है। मैं जब भी कानपुर जाता हूं बिठूर के इस ध्रुव टीला पर जरूर जाता हूं। बचपन में तो यहां जंगल था पर अब भूमाफियाओं ने यहां भी कब्जा करना शुरू कर दिया है। संभव है कुछ दिनों बाद यहां गंगा गंदे नाले में तब्दील हो जाए जैसी कि जाजमऊ में है। ध्रुवटीला में एक मंदिर है जिसकी गद्दी वर्षों से मराठों के पास है। कानपुर में मराठा मंदिर देखकर एकाएक आप 18 वीं सदी में पहुुंच जाएंगे। फिलहाल मधुकर मोघे यहां के गद्दीनशीं हैं। मोघे का परिवार बड़ा है इतना बड़ा कि इंटक के नेता रामजी त्रिपाठी तो कहते रहते हैं कि यहां जिस झाड़ी में देखो मोघे का एक न एक बच्चा दिख जाएगा। खैर दो पत्नियों के साथ मधुकर मोघे यहां शान से रहते हैं। यह अलग बात है कि उनके पास धन नहीं है पर इससे उनकी शान और अतिथि सत्कार में कोई फर्क नहीं पड़ता। यह धु्रव टीला गंगा की सतह से काफी ऊँचाई पर है। गंगा में चाहे जितना पानी आ जाए इस ध्रुव टीले पर कोई आंच नहीं आती। एक बार आईआईटी के एक छात्र ने यहाँ से कूदकर गंगा में छलांग लगा ली थी तब से प्रशासन ने यहां कटीले तार लगवा दिए हैं। यहां पर भूमाफियाओं की नजर से कुछ वृक्ष जरूर बचे हुए हैं। लेकिन यहाँ की नगर पंचायत अध्यक्ष कब तक इस पर नजर टेढ़ी नहीं करेंगे कुछ कहा नहीं जा सकता। खैर अगर बिठूर जाएं तो ध्रुव टीला अवश्य जाएं।
(दूसरे पैराग्राफ की लाइने शंभुनाथ शुक्ला जी के फ़ेसबुक वाल से साभार ली गई हैं।)
No comments:
Post a Comment