Saturday, April 26, 2014

मैच अभी पूरा नहीं हुआ है

पिछले कई महीनों से मीडिया और एक सिविल सोसाईटी में बहस चल रही है कि मोदी सरकार बन रही है। एक दो बार मैने दिल्ली भाजपा के नेता हर्षवर्धन को बोलते सुना कि मोदी को भगवान भी नहीं हरा सकते। कई भाजपा नेता कहते हैं कि जनता ने मोदी को पी. एम. तो बना दिया है, केवल 16 मई को फैसला आना बाकी है। मोदी भी कई रैलियों में अपने को भविष्य का प्रधान मंत्री घोषित कर चुके हैं। उन्हें लगने लगा है कि दिल्ली की कुर्सी तो पक्की है। लेकिन आजकल क्रिकेट के माहोंल में यह अनुमान लगाना भी मुस्किल होता है कि मैच जीतेगा कौन? कल साम के मैच में ही कोलकाता नाईट राइडर्स की जीत पक्की लग रही थी, लेकिन हैदराबाद के एक ओवर ने मैच पलट के रख दिया। वह मैच मुझे कई ऐसे मैचों की याद दिलाता है जब इस तरह के करिश्में हुए। क्रिकेट में एक कहावत है क़ि मैच की आखिरी गेंद के पहले भविष्यवाणी करना बहुत गलत होता है। यही बात हम कुछ हदतक राजनीति में भी मान सकते हैं। इसी भाजपा को 1998-99 की बाजपेई जी  की 11 दिन वाली सरकार भी याद होगी। जब केवल एक वोटसे सरकार गिर गई थी। तब से गंगा जमुना में बहुत पानी बह चुका है। लेकिन एक बार फिर से हमें यह लगने लगा है क़ि यह चुनाव विकास के मुद्दे पर कम धर्म और जाति के मुद्दे पर ज्यादा हो रहा है। भाजपा टीवी पर होने वाले सभी ओपिनियन पोल्स के नतीजों को लेकर बहुत क्या अति-उत्साहित है। उसे लग रहा है कि एन. डी. टी. वी. और हंसा रिसर्च सर्वे के अनुसार हमें तो वैसे भी 275 सीटें मिल रही हैं। अब यह ओपिनियन पोल कितने सही साबित होंगे यह तो आप इस 10 वर्ष पहले की मैंगजीन के कवर फोटो से समझ सकते हैं। मैं यह भी कह रहा हूँ कि कांग्रेस हार रही है, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि मोदी जी जीत रहे हैं। हाँ यह है कि भाजपा या एनडीए कुछ बढत जरूर हासिल किए हुए है। अब यह बढत कितनी होगी यह अनुमान लगाना बहुत मुस्किल है। हो सकता है यह जनादेश 180-200 सीटों तक पहुंच जाए, या 210 से सवा दो सौ भी पार कर ले, तब तो सभी तथा कथित सेकुलर दल भी मोदी को रामविलास की तरह सेकुलर बताने में जुट जाएंगे। लेकिन क्या भाजपा मिशन 272+ तक जाएगी?

फिलहाल अगर हम मीडिया की मोदी लहर से बाहर निकलकर जमीनी हकीकत पर नजर डालें तो स्थिति थोड़ी सी अलग नजर आती है। पूरे देश में लहर तो है लेकिन मोदी के नाम की कम कांग्रेस के कुसासन के खिलाफ ज्यादा। ऐसे में भाजपा फायदे में तो है लेकिन उतनी मजबूती से चुनाव नहीं लड पा रही है। अगर हम राज्यवार सीटों पर भाजपा की स्थिति को समझने की कोशिस करें, तो तस्वीर इस प्रकार है। राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात में भाजपा बहुत मजबूत है और इन 74 सीटों में 60 से अधिक जितने की स्थिति में है। महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबंधन 30 सीटें जितने की स्थिति में है। उपर से राज ठाकरे की मनसे ने मोदी के समर्थन का एलान कर दिया है। झारखण्ड में लड़ाई बहुत कांटे की है लेकिन भाजपा की लहर जैसी चीज नहीं है। हाँ इस राज्य में आधी सीटों पर भाजपा की स्थिति ठीक-ठाक है। पूर्वोत्तर में किसी भी राज्य में भाजपा किसी लड़ाई में नहीं है। वहाँ लेफ्ट और कांग्रेस के बीच टक्कर है। प.बंगाल में ममता बनाम लेफ्ट और कांग्रेस की लड़ाई है। उड़ीसा में भी भी भाजपा की कोई मजबूत जमीन नहीं है। पूर्वोत्तर में भाजपा ने कुछ स्थानीय फिल्मी सितारों को मैदान में उतारा तो है लेकिन इसी से उसकी स्थिति भी समझ में आती है। अगर बात दक्षिण भारत की करें तो एक आध राज्य को छोड़ कर भाजपा की हालत पतली है। तमिलनाडु से जय ललिता का समर्थन एन. डी. ए. को मिल सकता है (अगर एन. डी. ए. 220 से अधिक सीटें जीते तो) अन्यथा रजनीकांत जैसे सुपरस्टार के साथ के बाद भी यहाँ से मोदी को मायूसी ही मिलेगी। आंध्र प्रदेश में भाजपा का गठबंधन अच्छा है, लेकिन उसकी बहुत दिक्कते भी हैं। विधानसभा चुनाव को देखते हुए टी. डी. पी. यह गठबन्धन खत्म करना चाहती है। क्योकि तेलंगाना में तो उसकी जमीन कमजोर है। वहां कांग्रेस और टी. आर. एस. का जोर है। सीमान्ध्र में जगन मोहन रेड्डी भाजपा पर राज्य के बंटवारे के समर्थन का मुद्दा लेकर नायडू को भी घेर रहे हैं।
अब मैं देश के तीन और राज्यों का जिक्र करना चाहूंगा, कर्नाटक, पंजाब और छत्तीसगढ़। यहाँ पहले तो भाजपा मजबूत थी, लेकिन वर्तमान समय में कांग्रेस की स्थानीय टीमों ने पूरा जोश और जोर लगा दिया है। अगर यही जोश राहुल एंड कंपनी ने लगाया होता तो मोदी की यह तथाकथित लहर नहीं होती. इन राज्यों में कांग्रेस ने भी जातीय समीकरणो के हिसाब से अपने पत्ते सेट किए हैं। कहीं-कहीं उसे दिक्कते हैं, जैसे कर्नाटक में मुस्लिम वोट अगर जेडीएस को ना बंटे, और छत्तीसगढ़ में सतनामी दलित वोट स्थानीय नई-नवेली पार्टी को ना जाएँ, तो कांग्रेस भाजपा से बीस साबित होगी। उत्तराखंड, दिल्ली और हिमांचल प्रदेश में भाजपा की स्थिति कुछ ठीक है। यहाँ कांग्रेस बहुत कमजोर है. दिल्ली में हो सकता है कि आम आदमी पार्टी कुछ सीटें भाजपा से छीन ले जाए। उत्तराखंड में भाजपा की टक्कर कांटे की है। कांग्रेस यहाँ भीतरघाट का शिकार हो रही है आब हम बात करते हैं देश के दो सबसे बड़े राज्यों यूपी और बिहार। राजनीति के दिल माने जाते हैं। पूरे मीडिया और नेताओं का पूरा ध्यान यहीं पर लगा रहता है। इन राज्यों में भाजपा विकास कम सॉफ्ट-हिन्दुत्व के मुद्दे पर चुनाव लड रही है। यहाँ जातीय समीकरणों की भी बहुत अहमियत होती है। बिहार में नीतीश और यूपी में मायावती नें अपनी बेजोड़ सोसलइंजीनियरिंग के दम पर अपने पत्ते फेके हैं। अगर इन दोनों के दांव सही चल गए तो हो सकता है कि मोदी का सपना भी चूर-चूर हो जाए। फिलहाल इन राज्यों में कुछ और बढत रामविलास पासवान, कुशवाहा और अनुप्रिया पटेल के दम पर हासिल की है। लेकिन एक और फैक्टर यहाँ पर काम करने वाला है इस बार मुस्लिम किसी एक पार्टी को वोट ना देकर उसे वोट करसकते हैं जो मोदी को हराने में सक्षम होगा। इस बात को कई बातों से महसूस भी किया जा सकता है। जिन जगहों पर बसपा और जेडीयू की स्थिति कमजोर थी वहां पर इन दलों ने अपने कमजोर प्रत्याशी खड़े किए, नीतीश के तो कुछ प्रत्याशियों ने मुस्लिम वोट बांटने के डर से अपनी उम्मीदवारी भी वापस ले ली। कई जगह नीतीश और मुलायम सिंह की पार्टियाँ कांग्रेस या राजद के लिए प्रचार भी नाम मात्र कर रहे हैं। अगर ऐसा हुआ तो मोदी को बनारस से हार का मुंह देखना पड सकता है। अब तक एक बात और गौर करने वाली है कि जब आधे से अधिक सीटों पर चुनाव हो चुके हैं तो कांग्रेस ने अपनी रणनीति बदलकर आक्रामक कर दी है। अब राहुल मोदी पर नाम लेकर हमला करने लगे हैं। उधर सोनिया, और प्रियंका भी मोदी पर निशाना साध रही हैं। जब कुछ मुस्लिम बहुल सीटों पर वोटिंग होनी बाकी है, तब कांग्रेस ने 4.5 % मुस्लिम आरक्षण की बात करके एक बड़ा दांव चल दिया है। हो सकता है यह दांव जाट आरक्षण और  2012 के यूपी विधानसभा चुनाव की तरह फेल भी हो जाए या हो सकता है कि इसी के दम पर कांग्रेस 125 सीटों को पार करके कुछ नया पैंतरा चल जाए। अगर मोदी इसका पुरजोर विरोध कर दें तो कांग्रेस को घाटा और हिन्दू वोटों का ध्रवीकरण होकर भाजपा को फायदा हो सकता है। सूत्र यह भी बता रहे हैं कि कांग्रेस तीसरे मोर्चे का समर्थन कर सकती है। अगर भाजपा की सीटें 200 तक रहीं तो मोदी को दिक्कत हो सकती है। ममता, नवीन पटनायक और जयललिता से समर्थन की उम्मीद कर रहे मोदी को एक बड़ा झटका भी लग सकता है।
अभी चुनाव में बहुत समय बाकी है। हर नेता अपने-अपने दांव और पैंतरे के साथ फील्डिंग सजा रहा है। मोदी अभी से अपने को मैंन ऑफ द मैच और अगला कप्तान तथा भाजपा को विजेता मान चुके हैं। लेकिन मेरे हिसाब से यह सब भविष्यवाणी करना बहुत जल्दबाजी होगी। क्योंकि क्रिकेट में अंतिम गेंद फेके जाने तक कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। यहाँ तो अभी पूरे स्लॉग ओवर खेलने को बाकी हैं। 

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