देश में दाल
के भाव आसमान
पर चढ़े हुए
हैं, और बाबा
रामदेव कम दाल
खाने की वैज्ञानिक
सलाह दे रहे
हैं। ऐसा भी
नहीं है क़ि
सरकार ने कुछ
नहीं किया, सरकार
ने बहुत देर
में कुछ कोशिशें
की, जो नाकाफ़ी
हैं। मैनें दाल
के ऊपर रवीश
कुमार के 5-6 प्राइमटाइम
के एपीसोड देखे।
वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला
जी के कई
लेख फेसबुक और
एक अख़बार में
पढ़ा। जिसके बाद
इस मुद्दे पर
लिखने के लिए
खुद को तैयार
कर पाया।
भारतीय आहार में
दालों का एक
विशिष्ट महत्व है। उत्तर
भारत में तो
दोनों समय दाल
अमूमन खाई ही
जाती है। इसकी
एक वजह तो
प्रोटीन है। अंडा
या मांस खाने
वालों के लिए
तो प्रोटीन इनके
जरिए मिल जाता
है पर शाकाहारियों
के लिए दाल
के अलावा प्रोटीन
पाने का और
कोई स्रोत नहीं
है। चूंकि भारत
के एक बड़े
इलाके का मुख्य
भोजन चावल है
इसलिए प्रोटीन के
लिए या तो
मछली खाई जाए
अथवा दालें। इसी
तरह जिन इलाकों
का मुख्य भोजन
रोटी है वहां
पर भी। मांसाहारी
यहां पर मटन
अथवा चिकेन खाकर
प्रोटीन का अपना
कोटा पूरा कर
लेते हैं मगर
शाकाहारी क्या करें।
यही कारण है
कि दाल यहां
के भोजन का
मुख्य आहार है।
हालांकि पनीर और
दूध भी प्रोटीन
की भरपाई करते
हैं मगर एक
तो पनीर शहरी
इलाकों में ही
मिल पाता है
और मौसम के
गरम होते ही
उसके खराब हो
जाने का खतरा
पैदा हो जाता
है। एक मोटे
अनुमान के अनुसार
पूरे भारत में
दालों की खपत
लगभग 2.20 करोड़
टन प्रति वर्ष
है। इसमें से
1.85 करोड़ टन
तो घरेलू उत्पादन
है और 35 लाख
टन दालों को
आयात करना पड़ता
है। कानपुर के
दलहन अनुसंधान संस्थान
के विजन डाक्यूमेंट
की रिपोर्ट बताती
है कि आने
वाले डेढ़ दशक
में यह खपत
करीब एक करोड़
टन और बढ़
जाएगी। हालांकि ऐसा नहीं
है कि दलहन
की खपत और
उसका रकबा नहीं
बढ़ा है। हालिया
रिसर्च बताती हैं कि
दलहन का रकबा
भी बढ़ा है
और उसकी उपज
भी पिछले तीस
वर्ष में लगभग
दो गुनी हुई
है दाल की
खपत का ग्राफ
रुक नहीं रहा
है।
दालों में प्रोटीन
की मात्रा इतनी
ज्यादा होती है
कि चावल या
गेहूं उस मात्रा
में प्रोटीन मुहैया
नहीं करा पाते।
प्रति सौ ग्राम
पकी दाल में
प्रोटीन 6.8 प्रतिशत
होता है जबकि
चावल में महज
2.7 प्रतिशत। दालों
में भी सोयाबीन
में यह मात्रा
16.6 प्रतिशत होती
है और अंडे
में 12.6 जबकि
पके हुए चिकेन
में 26.6 प्रतिशत।
जाहिर है दालें
प्रोटीन से भरपूर
होती हैं। ऐसे
में शाकाहारियों के
लिए दाल का
भला विकल्प और
क्या हो सकता
है। पिछले दिनों
बाबा रामदेव ने
कहा कि दाल
से वायुरोग हो
जाता है इसलिए
पतली दाल खानी
चाहिए। यह एक
हद तक सच
है और यह
विज्ञानसम्मत तथ्य है
कि अत्यधिक प्रोटीन
शरीर में वायु
अथवा गैस को
बढ़ाता है इसीलिए
रात के वक्त
दाल खाने की
मनाही है। मगर
पतली दाल में
प्रोटीन की मात्रा
भी कम ही
होगी जबकि एक
शाकाहारी व्यक्ति को स्वस्थ
रहने के लिए
दिन भर में
कम से कम
बीस ग्राम प्रोटीन
तो लेना ही
चाहिए। जब सौ
ग्राम दाल में
यह सिर्फ 6.8
प्रतिशत है और
सौ ग्राम दाल
दिन भर में
कोई खाता नहीं
है तब यह
मात्रा कैसे पूरी
होगी। जाहिर है
कुछ अन्य स्रोतों
से भी। मसलन
फलों से, सब्जियों
में बीन्स से,
गेहूं व चने
से। इसीलिए गेहूं
के आटे में
चने का आटा
मिलाने की परंपरा
है।
पर इधर पिछले
कुछ वर्षों में
दाल खाने के
मामले में हिंदुस्तानी
काफी चूजी हो
गए हैं। सिर्फ
एक ही दाल
अब खाई जाने
लगी है और
वह है अरहर
की दाल। जहां
अभी कुल बीस
वर्ष पहले में
उत्तर प्रदेश के
मध्यवर्ती क्षेत्र को छोड़कर
बाकी इलाकों के
लोग अरहर नहीं
खाते थे वे
भी अब अरहर
की दाल को
पसंद करने लगे
हैं। इसका नतीजा
यह हुआ कि
दालों में अरहर
की बाजार कीमतें
आसमान पर चढ़
गई हैं। पिछले
वर्ष जो अरहर
बाजार में 85 से
90 रुपये प्रति किलो के
बीच आसानी से
मिल जाती थी
वह अब दो
सौ को पार
कर रही है।
दाल की कीमतों
में यह इजाफा
बस अरहर के
मामले में ही
दिखाई देता है।
अन्य दालें इतनी
मंहगी नहीं हुईं।
आज भी मसूर
सौ रुपये किलो
के आसपास है
तो उड़द सवा
सौ रुपये किलो
और मूंग डेढ़
सौ रुपये। चना
तो 70-75 में आसानी
से मिल जाती
है। अन्य दालें
मसलन- लोबिया, काबुली
चना और सोयाबीन
भी अपने पूर्ववर्ती
कीमतों पर ही
मिल जाती हैं।
अगर दालों पर
यह एकाधिकार समाप्त
हो जाए तो
शायद अरहर की
भागती कीमतों पर
अंकुश पाया जा
सकता है। यूं
आयुर्वेद में अरहर
की दाल अस्थि
रोगियों को मना
की जाती है
और इसकी वजह
है उसमें वायु
तत्त्व की प्रचुरता।
मसूर और उड़द
में तो यह
तत्त्व बहुत ज्यादा
होता है। यही
कारण है कि
धीरे-धीरे इन
दालों को रोजाना
के भोजन से
हटाया जाने लगा।
इसके अलावा अरहर
गलती जल्दी है
और स्वाद में
बेहतर होती है
इसलिए भी यह
दाल अन्य दालों
की तुलना में
ज्यादा इस्तेमाल की जाने
लगी। चने की
दाल को गलाना
कठिन होता है
और सोयाबीन में
लिसलिसापन अधिक होता
है। इसलिए प्रोटीन
अधिक होने के
बावजूद ये दालें
रोज की थाली
से गायब होने
लगीं और अरहर
दोनों समय खाई
जाने लगी।
मूंग की दाल
को हल्का माना
गया है यानी
यह अकेली दाल
है जिसमें वायु
तत्व कम होता
है इसीलिए यह
दाल शाम को
खाई जाने लायक
बताई गई है
और जिन्हें पेट
के रोग होते
हैं उनके लिए
तो यह दाल
मुफीद है। मगर
स्वाद न होने
तथा किसानों द्वारा
इसे बोने में
दिलचस्पी नहीं लेने
के कारण बाजार
में इस दाल
की बिक्री में
कोई उछाल कभी
नहीं आया। इसकी
एक वजह तो
इस दाल की
उपज साल में
एक बार ही
ली जा सकती
है इसलिए किसान
को भी यह
मूंग बोना फायदे
का सौदा कभी
नहीं रहा। जबकि
अरहर की अब
साल में दो
फसलें आसानी से
ली जा सकती
हैं। इसके अलावा
अरहर की फसल
पानी कम मांगती
है और भारत
के किसानों के
लिए वह फसल
बोना कभी असुविधाजनक
नहीं रहा जो
कम पानी मांगती
हो। मगर पिछले
दो वर्ष से
जो सूखा पड़ा
है और मार्च
व अप्रैल की
बरसात ने फसल
जिस तरह से
नष्ट की है
उससे दलहन की
फसल सबसे ज्यादा
खराब हुईं। अकेले
अरहर पर ही
बीस लाख टन
का टोटा आया
है। ऐसे में
दाल आसानी से
मिलने वाली नहीं।
यह अलग बात
है कि सरकारें
जमाखोरों पर जोर
डालकर और दालें
आयात कर इस
कमी को कुछ
हद तक पूरा
कर लें।
लेकिन यह आपूर्ति
कितने दिन तक
क़ीमतों में लगाम
लगा पाएगी? यह
एक देखने वाली
बात होगी। मुझे
नहीं लगता क़ि
इसमें ज़्यादा दिनों
की संभावना है,
अगले वर्ष भी
यह सिलसिला जारी
रह सकता है।
वैसे प्याज की
क़ीमतों पर भी
सरकार का लगाम
ना लगा पाना
एक असफलता है।
इसके पहले दाम
बढ़ते थे, तो
1-2 महीनें में कम
हो जाते थे,
लेकिन इसबार 4-5 महीने
से अधिक हो
गए लेकिन कुछ
आसार नहीं दिखाई
दे रहे हैं।
जो ग़रीबों के
लिए बड़े ही
कष्ट की बात
है। जबकि उनकी
आय में तो
कुछ भी बृद्धि
नहीं हो रही
है।