Friday, October 30, 2015

दाल की बढ़ती क़ीमतें, और ग़रीब की समस्याएँ

देश में दाल के भाव आसमान पर चढ़े हुए हैं, और बाबा रामदेव कम दाल खाने की वैज्ञानिक सलाह दे रहे हैं। ऐसा भी नहीं है क़ि सरकार ने कुछ नहीं किया, सरकार ने बहुत देर में कुछ कोशिशें की, जो नाकाफ़ी हैं। मैनें दाल के ऊपर रवीश कुमार के 5-6 प्राइमटाइम के एपीसोड देखे। वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला जी के कई लेख फेसबुक और एक अख़बार में पढ़ा। जिसके बाद इस मुद्दे पर लिखने के लिए खुद को तैयार कर पाया।
भारतीय आहार में दालों का एक विशिष्ट महत्व है। उत्तर भारत में तो दोनों समय दाल अमूमन खाई ही जाती है। इसकी एक वजह तो प्रोटीन है। अंडा या मांस खाने वालों के लिए तो प्रोटीन इनके जरिए मिल जाता है पर शाकाहारियों के लिए दाल के अलावा प्रोटीन पाने का और कोई स्रोत नहीं है। चूंकि भारत के एक बड़े इलाके का मुख्य भोजन चावल है इसलिए प्रोटीन के लिए या तो मछली खाई जाए अथवा दालें। इसी तरह जिन इलाकों का मुख्य भोजन रोटी है वहां पर भी। मांसाहारी यहां पर मटन अथवा चिकेन खाकर प्रोटीन का अपना कोटा पूरा कर लेते हैं मगर शाकाहारी क्या करें। यही कारण है कि दाल यहां के भोजन का मुख्य आहार है। हालांकि पनीर और दूध भी प्रोटीन की भरपाई करते हैं मगर एक तो पनीर शहरी इलाकों में ही मिल पाता है और मौसम के गरम होते ही उसके खराब हो जाने का खतरा पैदा हो जाता है। एक मोटे अनुमान के अनुसार पूरे भारत में दालों की खपत लगभग 2.20 करोड़ टन प्रति वर्ष है। इसमें से 1.85 करोड़ टन तो घरेलू उत्पादन है और 35 लाख टन दालों को आयात करना पड़ता है। कानपुर के दलहन अनुसंधान संस्थान के विजन डाक्यूमेंट की रिपोर्ट बताती है कि आने वाले डेढ़ दशक में यह खपत करीब एक करोड़ टन और बढ़ जाएगी। हालांकि ऐसा नहीं है कि दलहन की खपत और उसका रकबा नहीं बढ़ा है। हालिया रिसर्च बताती हैं कि दलहन का रकबा भी बढ़ा है और उसकी उपज भी पिछले तीस वर्ष में लगभग दो गुनी हुई है दाल की खपत का ग्राफ रुक नहीं रहा है।
दालों में प्रोटीन की मात्रा इतनी ज्यादा होती है कि चावल या गेहूं उस मात्रा में प्रोटीन मुहैया नहीं करा पाते। प्रति सौ ग्राम पकी दाल में प्रोटीन 6.8 प्रतिशत होता है जबकि चावल में महज 2.7 प्रतिशत। दालों में भी सोयाबीन में यह मात्रा 16.6 प्रतिशत होती है और अंडे में 12.6 जबकि पके हुए चिकेन में 26.6 प्रतिशत। जाहिर है दालें प्रोटीन से भरपूर होती हैं। ऐसे में शाकाहारियों के लिए दाल का भला विकल्प और क्या हो सकता है। पिछले दिनों बाबा रामदेव ने कहा कि दाल से वायुरोग हो जाता है इसलिए पतली दाल खानी चाहिए। यह एक हद तक सच है और यह विज्ञानसम्मत तथ्य है कि अत्यधिक प्रोटीन शरीर में वायु अथवा गैस को बढ़ाता है इसीलिए रात के वक्त दाल खाने की मनाही है। मगर पतली दाल में प्रोटीन की मात्रा भी कम ही होगी जबकि एक शाकाहारी व्यक्ति को स्वस्थ रहने के लिए दिन भर में कम से कम बीस ग्राम प्रोटीन तो लेना ही चाहिए। जब सौ ग्राम दाल में यह सिर्फ 6.8 प्रतिशत है और सौ ग्राम दाल दिन भर में कोई खाता नहीं है तब यह मात्रा कैसे पूरी होगी। जाहिर है कुछ अन्य स्रोतों से भी। मसलन फलों से, सब्जियों में बीन्स से, गेहूं चने से। इसीलिए गेहूं के आटे में चने का आटा मिलाने की परंपरा है।
पर इधर पिछले कुछ वर्षों में दाल खाने के मामले में हिंदुस्तानी काफी चूजी हो गए हैं। सिर्फ एक ही दाल अब खाई जाने लगी है और वह है अरहर की दाल। जहां अभी कुल बीस वर्ष पहले में उत्तर प्रदेश के मध्यवर्ती क्षेत्र को छोड़कर बाकी इलाकों के लोग अरहर नहीं खाते थे वे भी अब अरहर की दाल को पसंद करने लगे हैं। इसका नतीजा यह हुआ कि दालों में अरहर की बाजार कीमतें आसमान पर चढ़ गई हैं। पिछले वर्ष जो अरहर बाजार में 85 से 90 रुपये प्रति किलो के बीच आसानी से मिल जाती थी वह अब दो सौ को पार कर रही है। दाल की कीमतों में यह इजाफा बस अरहर के मामले में ही दिखाई देता है। अन्य दालें इतनी मंहगी नहीं हुईं। आज भी मसूर सौ रुपये किलो के आसपास है तो उड़द सवा सौ रुपये किलो और मूंग डेढ़ सौ रुपये। चना तो 70-75 में आसानी से मिल जाती है। अन्य दालें मसलन- लोबिया, काबुली चना और सोयाबीन भी अपने पूर्ववर्ती कीमतों पर ही मिल जाती हैं। अगर दालों पर यह एकाधिकार समाप्त हो जाए तो शायद अरहर की भागती कीमतों पर अंकुश पाया जा सकता है। यूं आयुर्वेद में अरहर की दाल अस्थि रोगियों को मना की जाती है और इसकी वजह है उसमें वायु तत्त्व की प्रचुरता। मसूर और उड़द में तो यह तत्त्व बहुत ज्यादा होता है। यही कारण है कि धीरे-धीरे इन दालों को रोजाना के भोजन से हटाया जाने लगा। इसके अलावा अरहर गलती जल्दी है और स्वाद में बेहतर होती है इसलिए भी यह दाल अन्य दालों की तुलना में ज्यादा इस्तेमाल की जाने लगी। चने की दाल को गलाना कठिन होता है और सोयाबीन में लिसलिसापन अधिक होता है। इसलिए प्रोटीन अधिक होने के बावजूद ये दालें रोज की थाली से गायब होने लगीं और अरहर दोनों समय खाई जाने लगी।
मूंग की दाल को हल्का माना गया है यानी यह अकेली दाल है जिसमें वायु तत्व कम होता है इसीलिए यह दाल शाम को खाई जाने लायक बताई गई है और जिन्हें पेट के रोग होते हैं उनके लिए तो यह दाल मुफीद है। मगर स्वाद होने तथा किसानों द्वारा इसे बोने में दिलचस्पी नहीं लेने के कारण बाजार में इस दाल की बिक्री में कोई उछाल कभी नहीं आया। इसकी एक वजह तो इस दाल की उपज साल में एक बार ही ली जा सकती है इसलिए किसान को भी यह मूंग बोना फायदे का सौदा कभी नहीं रहा। जबकि अरहर की अब साल में दो फसलें आसानी से ली जा सकती हैं। इसके अलावा अरहर की फसल पानी कम मांगती है और भारत के किसानों के लिए वह फसल बोना कभी असुविधाजनक नहीं रहा जो कम पानी मांगती हो। मगर पिछले दो वर्ष से जो सूखा पड़ा है और मार्च अप्रैल की बरसात ने फसल जिस तरह से नष्ट की है उससे दलहन की फसल सबसे ज्यादा खराब हुईं। अकेले अरहर पर ही बीस लाख टन का टोटा आया है। ऐसे में दाल आसानी से मिलने वाली नहीं। यह अलग बात है कि सरकारें जमाखोरों पर जोर डालकर और दालें आयात कर इस कमी को कुछ हद तक पूरा कर लें।

लेकिन यह आपूर्ति कितने दिन तक क़ीमतों में लगाम लगा पाएगी? यह एक देखने वाली बात होगी। मुझे नहीं लगता क़ि इसमें ज़्यादा दिनों की संभावना है, अगले वर्ष भी यह सिलसिला जारी रह सकता है। वैसे प्याज की क़ीमतों पर भी सरकार का लगाम ना लगा पाना एक असफलता है। इसके पहले दाम बढ़ते थे, तो 1-2 महीनें में कम हो जाते थे, लेकिन इसबार 4-5 महीने से अधिक हो गए लेकिन कुछ आसार नहीं दिखाई दे रहे हैं। जो ग़रीबों के लिए बड़े ही कष्ट की बात है। जबकि उनकी आय में तो कुछ भी बृद्धि नहीं हो रही है।

बुद्धिजीवियों के निशाने पर क्यों मोदी?

पिछले कुछ दिनों से लगातार यह चर्चा चल रही है कि देश का माहौल खराब हो रहा है. लेखकों, साहित्याकारों, इतिहासकारों से लेकर वैज्ञानिक तक इस तरह की चिंता जता रहे हैं. लेकिन आखिर क्यों ऐसी चर्चाएं चल रही हैं. बिहार चुनाव में पिछले कुछ दिनों में जिस तरह धर्म के आधार पर आरक्षण और पाकिस्तान में पटाखे जैसे बयान दिए गये. क्या यह भी इसके लिए जिम्मेदार हैं. बिहार की रैली में पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दलितों का आरक्षण छीनने वाला बयान, उसके कुछ दिन बाद एक और रैली में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का पाकिस्तान में पटाखे वाला बयान. इन दोनो ही बयानों में एक समानता है. इनमें एक धर्म विशेष को निशाना बनाया जा रहा है. इसीलिए यह सवाल उठ रहा है कि क्या चुनाव के आखिरी दौर में बीजेपी विकास को छोड़ हिंदू-मुस्लिम का कार्ड खेल रही है. अमित शाह के पाकिस्तान वाले बयान की शिकायत के बाद चुनाव आयोग ने जिला प्रशासन से रिपोर्ट मांगी. लेकिन अमित शाह यह मानने को तैयार नहीं कि उन्होने कुछ गलत कहा. एक इंटरव्यू में इस बारे में पूछे गये सवाल पर अमित शाह ने कहा कि जो मैने कहा उसका मतलब था कि अगर मोदी और बीजेपी कमजोर होते हैं तो देशद्रोही ताकतें खुश होती हैं. इसमें सांप्रदायिक क्या है? इस पर आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव का कहना है कि उसने सारे बिहारियों को पाकिस्तानी करार दिया है. धर्म के आधार पर आरक्षण देने की साजिश वाले नरेंद्र मोदी के बयान को लेकर भी सवाल उठ रहे है. भारत के संविधान में जातिगत आरक्षण की व्यवस्था है यानी धर्म के आधार पर आरक्षण दिया ही नहीं जा सकता. तो फिर मोदी ऐसे बयान क्यों दे रहे हैं ? बीफ विवाद और दादरी की घटना के बाद से देश के बिगड़ते माहौल पर लगातार सवाल उठ रहे हैं. राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी इस बात पर जोर दिया है कि विविधता और सहनशीलता भारतीय संस्कृति की ताकत है. इन्हें खोने नहीं देना नहीं चाहिए. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर देश में ऐसा माहौल कौन बना रहा है.

Thursday, October 29, 2015

क्या अपराधी भी इसी तरह वकील बनेगे?

न्यायिक सुधारों पर बात होती है तो वह सिर्फ न्यायाधीशों और न्यायालयों की कार्यप्रणाली तक सीमित रहती है. वकील, जो न्याय व्यवस्था का सबसे बड़ा अंग हैं इस बहस से अक्सर अछूते रह जाते हैं
भारतीय राजनीति को अपराधियों से मुक्त करने के प्रयास समय-समय पर होते रहे हैं. कभी न्यायालयों ने हस्तक्षेप करके तो कभी संसद ने स्वयं ही जनप्रतिनिधित्व कानून में बदलाव करते हुए आपराधिक छवि के लोगों को राजनीति से दूर रखने की पहल की है. अब ऐसी ही पहल न्याय व्यवस्था को अपराधियों से मुक्त कराने के लिए भी होने लगी हैं. हाल ही में मद्रास उच्च न्यायालय ने इस संबंध में एक महत्वपूर्ण फैसला दिया है. न्यायालय ने माना है कि आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों का वकालत जैसे पेशे में होना एक गंभीर समस्या है और इसे जल्द से जल्द रोका जाना बेहद जरूरी है.
बीती जुलाई में ‘बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया’ (बीसीआई) के अध्यक्ष ने चेन्नई में आयोजित एक समारोह में बताया था कि देश भर में लगभग 30 प्रतिशत वकील या तो फर्जी हैं या वकालत की जगह अवैध धधों में संलिप्त हैं. उनका यह भी कहना था कि न्यायालयों में काला कोट पहनकर घूमने वाले 20 प्रतिशत से ज्यादा वकीलों के पास सही डिग्रियां तक नहीं हैं. दिल्ली सरकार में मंत्री रहे जितेन्द्र तोमर भी इस दावे का एक उदाहरण हो सकते हैं. कानून की फर्जी डिग्री हासिल करने के आरोप में उन्हें हाल ही में जेल जाना पड़ा जबकि इसी डिग्री के सहारे वे कानून मंत्री तक बन बैठ थे. ऐसे कई मामलों का जिक्र अपने फैसले में करते हुए मद्रास उच्च न्यायालय के जस्टिस एन किरुबकरण ने लिखा है, ‘न तो कानूनी पेशा अपराधियों को आश्रय देने का कोई अड्डा है और न ही कानून की डिग्री उनकी आपराधिक गतिविधियों की कोई ढाल.
मद्रास उच्च न्यायालय ने यह फैसला एसएम अनंत मुरुगन द्वारा लगाई गई एक याचिका की सुनवाई के दौरान दिया है. इस याचिका में प्रार्थना की गई थी कि अपराधियों को वकालत के पेशे में घुसने से रोका जाए. न्यायालय ने याचिकाकर्ता की बातों को गंभीरता से लेते हुए माना कि इसमें काफी हद तक तीन वर्षीय पाठ्यक्रम का भी दोष है. अपने फैसले में जस्टिस एन किरुबकरण ने लिखा है, ‘लॉ कॉलेजों को चाहिए कि वे किसी भी छात्र को दाखिला देने से पहले यह सुनिश्चित करें कि उसका कोई आपराधिक रिकॉर्ड तो नहीं है. यह एलएलबी के तीन वर्षीय पाठ्यक्रम में ही होता है कि अपराधी भी दाखिला पा जाते हैं. पांच वर्षीय पाठ्यक्रम में आयु सीमा तय होती है इसलिए इसमें किसी अपराधी के दाखिले की संभावनाएं नहीं होती. तीन वर्षीय पाठ्यक्रम को समाप्त किया जाना ही न्याय व्यवस्था के हित में है.’
वर्तमान व्यवस्था में वकालत की डिग्री हासिल करने के लिए दो तरह के पाठ्यक्रम मौजूद हैं. पहला पांच वर्षीय पाठ्यक्रम है. इसमें 12वीं कक्षा के बाद ही दाखिला लिया जा सकता है. जस्टिस एन किरुबकरण की ही तरह कानून के कई अन्य जानकार भी इसी पाठ्यक्रम की पैरवी करते हैं. इन लोगों का मानना है, चूंकि पांच वर्षीय पाठ्यक्रम में छात्रों को 12वीं पास करते ही दाखिला लेना होता है, इसलिए इसमें वही छात्र आते हैं जो इस पेशे के प्रति गंभीर होते हैं. यह लगभग वैसी ही व्यवस्था है जैसी मेडिकल या इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए देश में मौजूद है.
इसके अलावा दूसरी और पारंपरिक व्यवस्था है तीन वर्षीय पाठ्यक्रम की. इसमें दाखिले के लिए स्नातक होना जरूरी है. इस व्यवस्था को समाप्त करने की मांग पिछले कुछ समय से उठने लगी है. ऐसी मांग करने वालों का तर्क है कि इस व्यवस्था से मुख्यतः वे लोग वकालत के पेशे में आते हैं जिनके पास अन्य कोई विकल्प नहीं होता. इसमें कोई अधिकतम आयु सीमा न होने के चलते कई ऐसे लोग भी वकालत के पेशे में चले आते हैं जिन्हें भ्रष्टाचार या किसी अन्य आरोप में अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा हो. कुछ अपराधी प्रवृत्ति के लोग कानून से संरक्षण के लिए भी वकालत का रुख करते हैं. मद्रास उच्च न्यायालय ने भी ऐसे ही कारणों के चलते इस व्यवस्था को समाप्त करने की बात कही है.
तीन वर्षीय पाठ्यक्रम में कोई अधिकतम आयु सीमा न होने से ऐसे लोग भी वकालत में आ आते हैं जिन्हें भ्रष्टाचार के आरोप में अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा हो. कुछ अपराधी प्रवृत्ति के लोग भी कानून से संरक्षण के लिए वकालत का रुख करते हैं
न्याय व्यवस्था में बढ़ते अपराधीकरण का उदाहरण देते हुए न्यायालय ने कई मामलों का जिक्र किया है जिनमें कोर्ट परिसर में हुई हत्याएं, वकीलों का हत्या जैसे अपराधों में दोषी होना, कई वकीलों पर गुंडा अधिनियम लगाया जाना और कई वकीलों द्वारा सरकारी कर्मचारियों से मारपीट करने जैसी घटनाएं शामिल है. इन तमाम कमियों को दूर करने और न्याय व्यवस्था में सुधार के लिए जस्टिस एन किरुबकरण ने अपने फैसले में केंद्र सरकार और बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया को 14 निर्देश जारी किये हैं. इनमें पचास साल पुराने अधिवक्ता अधिनियम में संशोधन करने, बीसीआई की व्यवस्था में भारी बदलाव करने, आपराधिक मामलों में दोषी लोगों के पंजीकरण पर रोक लगाने, कानून के छात्रों का पुलिस से सत्यापन कराने, आपराधिक मामलों में आरोपित छात्रों के दाखिले पर रोक लगाने, कानून की पढ़ाई पूरी करने वाले हर छात्र को पंजीकरण से पहले आवश्यक प्रशिक्षण प्राप्त करने, लॉ कॉलेजों की संख्या कम करने और तीन वर्षीय पाठ्यक्रम समाप्त करने जैसे निर्देश शामिल हैं.
कानून के जानकारों की मानें तो इन सभी निर्देशों को लागू करना आसान नहीं है क्योंकि कई मौजूदा वकील इसका विरोध करेंगे और इस फैसले को निश्चित ही सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देंगे. लेकिन इन्हें यह भी लगता है कि यदि इनमें से कुछ महत्वपूर्ण निर्देश भी लागू हो पाए तो न्याय व्यवस्था में क्रांतिकारी सुधार हो सकते हैं.
अमूमन जब भी न्यायिक सुधारों पर चर्चा होती है तो वह सिर्फ न्यायाधीशों और न्यायालयों की कार्यप्रणाली को बेहतर बनाने तक ही सीमित रह जाती है. लेकिन जो वकील इस व्यवस्था का सबसे बड़ा और सबसे अहम अंग हैं, उनके सुधार पर चर्चा कम ही होती है. जितने विश्वास से एक व्यक्ति अपना स्वास्थ्य किसी डॉक्टर के हवाले करता है, उतने ही विश्वास से कोई अपने कानूनी अधिकार भी एक वकील के हवाले करता है. इसलिए एक वकील का अपने क्षेत्र में पारंगत होना भी उतना ही जरूरी है जितना एक डॉक्टर का. लेकिन वकालत में हर जगह के चुके हुए भी आसानी से दाखिल हो सकते हैं.
अक्सर हडतालों का कारण किसी वकील की अन्य व्यक्ति से हुई झड़प या मारपीट होती है. इसके चलते लोगों को तरह-तरह की असुविधाओं का सामना तो करना ही पड़ता है उन्हें न्याय मिलने का रास्ता और भी लंबा हो जाता है
साल 2011 में पंजाब के तेजिंदर सिंह तब चर्चा में आए थे जब जज बनने की प्रारंभिक परीक्षा में उन्होंने शून्य से भी कम (नेगेटिव) अंक हासिल किए और फिर भी उनका चयन हो गया. आरक्षण के चलते प्रारंभिक परीक्षा पास करने वाले तेजिंदर अंततः जज बनने से तो चूक गए थे लेकिन एक वकील तो वे थे ही. अब कानून की शून्य जानकारी वाले तेजिंदर लोगों को कैसी कानूनी सलाह देते होंगे इसका अंदाजा लगाया जा सकता है. जस्टिस एन किरुबकरण का यह फैसला न्याय व्यवस्था के इसी पक्ष को सुधारने की बात करता है.
जिला न्यायालयों में आए दिन होने वाली हड़ताल न्याय व्यवस्था की एक बड़ी समस्या है. अक्सर ऐसी हडतालों का कारण किसी वकील की किसी अन्य व्यक्ति से हुई झड़प या मारपीट होती है. इसके चलते तमाम लोगों को तरह-तरह की असुविधाओं का सामना तो करना ही पड़ता है उन्हें न्याय मिलने का पहले से ही लंबा रास्ता और भी लंबा हो जाता है. क्योोंकि जिन मामलों की सुनवाई का नंबर कई महीनों बाद हड़ताल के दौरान आया था, वे कई और महीने आगे बढ़ जाते हैं. हड़ताल कराने वाले क्रियाकलापों में ज्यादातर वकीलों की वही खेप शामिल होती है जिस पर रोक लगाने की बात जस्टिस एन किरुबकरण ने अपने फैसले में की है.
हड़ताल के अलावा किसी वकील की मृत्यु होने पर भी जिला न्यायालयों में एक दिन का अवकाश घोषित कर दिया जाता है. कई बार ऐसे लोगों की मृत्यु पर भी न्यायालय बंद कर दिया जाता है जिनका नाम बतौर वकील कभी बार एसोसिएशन में दर्ज तो हुआ था लेकिन जिन्होंने कभी वकालत नहीं की. यानी कि वे वकील, जो केवल नाम के लिए वकील बने थे.
सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू के अनुसार भारतीय न्यायालयों में इतने मामले लंबित हैं कि अब यदि एक भी नया मामला दाखिल न किया जाए, तो भी पुरानों को निपटाने में 360 साल का समय लगेगा. ऐसी स्थिति में न्यायालय का एक भी अतिरिक्त दिन बंद रहना पूरी न्याय व्यवस्था को प्रभावित करता है. जस्टिस किरुबकरण के फैसले में दिए गए 14 निर्देश ऐसी ही कई समस्याओं से न्याय व्यवस्था को मुक्त करने की बात करते हैं.

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...