Thursday, October 29, 2015

क्या अपराधी भी इसी तरह वकील बनेगे?

न्यायिक सुधारों पर बात होती है तो वह सिर्फ न्यायाधीशों और न्यायालयों की कार्यप्रणाली तक सीमित रहती है. वकील, जो न्याय व्यवस्था का सबसे बड़ा अंग हैं इस बहस से अक्सर अछूते रह जाते हैं
भारतीय राजनीति को अपराधियों से मुक्त करने के प्रयास समय-समय पर होते रहे हैं. कभी न्यायालयों ने हस्तक्षेप करके तो कभी संसद ने स्वयं ही जनप्रतिनिधित्व कानून में बदलाव करते हुए आपराधिक छवि के लोगों को राजनीति से दूर रखने की पहल की है. अब ऐसी ही पहल न्याय व्यवस्था को अपराधियों से मुक्त कराने के लिए भी होने लगी हैं. हाल ही में मद्रास उच्च न्यायालय ने इस संबंध में एक महत्वपूर्ण फैसला दिया है. न्यायालय ने माना है कि आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों का वकालत जैसे पेशे में होना एक गंभीर समस्या है और इसे जल्द से जल्द रोका जाना बेहद जरूरी है.
बीती जुलाई में ‘बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया’ (बीसीआई) के अध्यक्ष ने चेन्नई में आयोजित एक समारोह में बताया था कि देश भर में लगभग 30 प्रतिशत वकील या तो फर्जी हैं या वकालत की जगह अवैध धधों में संलिप्त हैं. उनका यह भी कहना था कि न्यायालयों में काला कोट पहनकर घूमने वाले 20 प्रतिशत से ज्यादा वकीलों के पास सही डिग्रियां तक नहीं हैं. दिल्ली सरकार में मंत्री रहे जितेन्द्र तोमर भी इस दावे का एक उदाहरण हो सकते हैं. कानून की फर्जी डिग्री हासिल करने के आरोप में उन्हें हाल ही में जेल जाना पड़ा जबकि इसी डिग्री के सहारे वे कानून मंत्री तक बन बैठ थे. ऐसे कई मामलों का जिक्र अपने फैसले में करते हुए मद्रास उच्च न्यायालय के जस्टिस एन किरुबकरण ने लिखा है, ‘न तो कानूनी पेशा अपराधियों को आश्रय देने का कोई अड्डा है और न ही कानून की डिग्री उनकी आपराधिक गतिविधियों की कोई ढाल.
मद्रास उच्च न्यायालय ने यह फैसला एसएम अनंत मुरुगन द्वारा लगाई गई एक याचिका की सुनवाई के दौरान दिया है. इस याचिका में प्रार्थना की गई थी कि अपराधियों को वकालत के पेशे में घुसने से रोका जाए. न्यायालय ने याचिकाकर्ता की बातों को गंभीरता से लेते हुए माना कि इसमें काफी हद तक तीन वर्षीय पाठ्यक्रम का भी दोष है. अपने फैसले में जस्टिस एन किरुबकरण ने लिखा है, ‘लॉ कॉलेजों को चाहिए कि वे किसी भी छात्र को दाखिला देने से पहले यह सुनिश्चित करें कि उसका कोई आपराधिक रिकॉर्ड तो नहीं है. यह एलएलबी के तीन वर्षीय पाठ्यक्रम में ही होता है कि अपराधी भी दाखिला पा जाते हैं. पांच वर्षीय पाठ्यक्रम में आयु सीमा तय होती है इसलिए इसमें किसी अपराधी के दाखिले की संभावनाएं नहीं होती. तीन वर्षीय पाठ्यक्रम को समाप्त किया जाना ही न्याय व्यवस्था के हित में है.’
वर्तमान व्यवस्था में वकालत की डिग्री हासिल करने के लिए दो तरह के पाठ्यक्रम मौजूद हैं. पहला पांच वर्षीय पाठ्यक्रम है. इसमें 12वीं कक्षा के बाद ही दाखिला लिया जा सकता है. जस्टिस एन किरुबकरण की ही तरह कानून के कई अन्य जानकार भी इसी पाठ्यक्रम की पैरवी करते हैं. इन लोगों का मानना है, चूंकि पांच वर्षीय पाठ्यक्रम में छात्रों को 12वीं पास करते ही दाखिला लेना होता है, इसलिए इसमें वही छात्र आते हैं जो इस पेशे के प्रति गंभीर होते हैं. यह लगभग वैसी ही व्यवस्था है जैसी मेडिकल या इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए देश में मौजूद है.
इसके अलावा दूसरी और पारंपरिक व्यवस्था है तीन वर्षीय पाठ्यक्रम की. इसमें दाखिले के लिए स्नातक होना जरूरी है. इस व्यवस्था को समाप्त करने की मांग पिछले कुछ समय से उठने लगी है. ऐसी मांग करने वालों का तर्क है कि इस व्यवस्था से मुख्यतः वे लोग वकालत के पेशे में आते हैं जिनके पास अन्य कोई विकल्प नहीं होता. इसमें कोई अधिकतम आयु सीमा न होने के चलते कई ऐसे लोग भी वकालत के पेशे में चले आते हैं जिन्हें भ्रष्टाचार या किसी अन्य आरोप में अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा हो. कुछ अपराधी प्रवृत्ति के लोग कानून से संरक्षण के लिए भी वकालत का रुख करते हैं. मद्रास उच्च न्यायालय ने भी ऐसे ही कारणों के चलते इस व्यवस्था को समाप्त करने की बात कही है.
तीन वर्षीय पाठ्यक्रम में कोई अधिकतम आयु सीमा न होने से ऐसे लोग भी वकालत में आ आते हैं जिन्हें भ्रष्टाचार के आरोप में अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा हो. कुछ अपराधी प्रवृत्ति के लोग भी कानून से संरक्षण के लिए वकालत का रुख करते हैं
न्याय व्यवस्था में बढ़ते अपराधीकरण का उदाहरण देते हुए न्यायालय ने कई मामलों का जिक्र किया है जिनमें कोर्ट परिसर में हुई हत्याएं, वकीलों का हत्या जैसे अपराधों में दोषी होना, कई वकीलों पर गुंडा अधिनियम लगाया जाना और कई वकीलों द्वारा सरकारी कर्मचारियों से मारपीट करने जैसी घटनाएं शामिल है. इन तमाम कमियों को दूर करने और न्याय व्यवस्था में सुधार के लिए जस्टिस एन किरुबकरण ने अपने फैसले में केंद्र सरकार और बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया को 14 निर्देश जारी किये हैं. इनमें पचास साल पुराने अधिवक्ता अधिनियम में संशोधन करने, बीसीआई की व्यवस्था में भारी बदलाव करने, आपराधिक मामलों में दोषी लोगों के पंजीकरण पर रोक लगाने, कानून के छात्रों का पुलिस से सत्यापन कराने, आपराधिक मामलों में आरोपित छात्रों के दाखिले पर रोक लगाने, कानून की पढ़ाई पूरी करने वाले हर छात्र को पंजीकरण से पहले आवश्यक प्रशिक्षण प्राप्त करने, लॉ कॉलेजों की संख्या कम करने और तीन वर्षीय पाठ्यक्रम समाप्त करने जैसे निर्देश शामिल हैं.
कानून के जानकारों की मानें तो इन सभी निर्देशों को लागू करना आसान नहीं है क्योंकि कई मौजूदा वकील इसका विरोध करेंगे और इस फैसले को निश्चित ही सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देंगे. लेकिन इन्हें यह भी लगता है कि यदि इनमें से कुछ महत्वपूर्ण निर्देश भी लागू हो पाए तो न्याय व्यवस्था में क्रांतिकारी सुधार हो सकते हैं.
अमूमन जब भी न्यायिक सुधारों पर चर्चा होती है तो वह सिर्फ न्यायाधीशों और न्यायालयों की कार्यप्रणाली को बेहतर बनाने तक ही सीमित रह जाती है. लेकिन जो वकील इस व्यवस्था का सबसे बड़ा और सबसे अहम अंग हैं, उनके सुधार पर चर्चा कम ही होती है. जितने विश्वास से एक व्यक्ति अपना स्वास्थ्य किसी डॉक्टर के हवाले करता है, उतने ही विश्वास से कोई अपने कानूनी अधिकार भी एक वकील के हवाले करता है. इसलिए एक वकील का अपने क्षेत्र में पारंगत होना भी उतना ही जरूरी है जितना एक डॉक्टर का. लेकिन वकालत में हर जगह के चुके हुए भी आसानी से दाखिल हो सकते हैं.
अक्सर हडतालों का कारण किसी वकील की अन्य व्यक्ति से हुई झड़प या मारपीट होती है. इसके चलते लोगों को तरह-तरह की असुविधाओं का सामना तो करना ही पड़ता है उन्हें न्याय मिलने का रास्ता और भी लंबा हो जाता है
साल 2011 में पंजाब के तेजिंदर सिंह तब चर्चा में आए थे जब जज बनने की प्रारंभिक परीक्षा में उन्होंने शून्य से भी कम (नेगेटिव) अंक हासिल किए और फिर भी उनका चयन हो गया. आरक्षण के चलते प्रारंभिक परीक्षा पास करने वाले तेजिंदर अंततः जज बनने से तो चूक गए थे लेकिन एक वकील तो वे थे ही. अब कानून की शून्य जानकारी वाले तेजिंदर लोगों को कैसी कानूनी सलाह देते होंगे इसका अंदाजा लगाया जा सकता है. जस्टिस एन किरुबकरण का यह फैसला न्याय व्यवस्था के इसी पक्ष को सुधारने की बात करता है.
जिला न्यायालयों में आए दिन होने वाली हड़ताल न्याय व्यवस्था की एक बड़ी समस्या है. अक्सर ऐसी हडतालों का कारण किसी वकील की किसी अन्य व्यक्ति से हुई झड़प या मारपीट होती है. इसके चलते तमाम लोगों को तरह-तरह की असुविधाओं का सामना तो करना ही पड़ता है उन्हें न्याय मिलने का पहले से ही लंबा रास्ता और भी लंबा हो जाता है. क्योोंकि जिन मामलों की सुनवाई का नंबर कई महीनों बाद हड़ताल के दौरान आया था, वे कई और महीने आगे बढ़ जाते हैं. हड़ताल कराने वाले क्रियाकलापों में ज्यादातर वकीलों की वही खेप शामिल होती है जिस पर रोक लगाने की बात जस्टिस एन किरुबकरण ने अपने फैसले में की है.
हड़ताल के अलावा किसी वकील की मृत्यु होने पर भी जिला न्यायालयों में एक दिन का अवकाश घोषित कर दिया जाता है. कई बार ऐसे लोगों की मृत्यु पर भी न्यायालय बंद कर दिया जाता है जिनका नाम बतौर वकील कभी बार एसोसिएशन में दर्ज तो हुआ था लेकिन जिन्होंने कभी वकालत नहीं की. यानी कि वे वकील, जो केवल नाम के लिए वकील बने थे.
सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू के अनुसार भारतीय न्यायालयों में इतने मामले लंबित हैं कि अब यदि एक भी नया मामला दाखिल न किया जाए, तो भी पुरानों को निपटाने में 360 साल का समय लगेगा. ऐसी स्थिति में न्यायालय का एक भी अतिरिक्त दिन बंद रहना पूरी न्याय व्यवस्था को प्रभावित करता है. जस्टिस किरुबकरण के फैसले में दिए गए 14 निर्देश ऐसी ही कई समस्याओं से न्याय व्यवस्था को मुक्त करने की बात करते हैं.

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