Wednesday, April 20, 2016

अंबेडकर से प्रेम या राजनीति ढोंग?

जब से यह अप्रैल लगा है तब से पूरे देश में बाबा साहब अंबेडकर के लिए राजनीतिक दलों ने कार्यक्रम शुरू कर दिए हैं। जिस तरह से अंबेडकर के लिए अचानक सियासी दलों में सुनामी की तरह प्यार उमड़ा है, उसके पीछे कुछ विशेष कारण भी हैं। क्या कारण हो सकते हैं? कई राज्यों में चुनाव करीब हैं जहां दलित आबादी मायने रखती है। देश भर में दलित 16.2% हैं। पंजाब में 28.9, दिल्ली में 16.9, यूपी में 21.1, उत्तराखण्ड में 17.9 फीसदी। इन राज्यों में हार जीत के फैसले में इन वोटरों की भूमिका अहम होने वाली है। लेकिन प्रत्यक्ष तौर पर कोई भी पार्टी उनकी सोच पर खरी उतरती नजर नहीं आ रही है।
कांग्रेस के मुंबई अध्यक्ष संजय निरुपम घूम घूम कर रैली कर रहे हैं। कांग्रेस की राष्ट्रीय लीडरशिप नागपुर में जहां अंबेडकर ने बौद्ध धर्म में दीक्षा ली थी, वहां एक बड़ी रैली की तैयारी में है। उसकी भीम ज्योति यात्रा पहले से पूरे यूपी में घूम रही है। कांग्रेस तो श्रेय भी लेने में लगी हुई है। उसका कहना है कि कांग्रेस ने ही अम्बेडकर की खूबियों को पहचाना था इ‍सलिए उनसे आग्रह किया कि संविधान बनाएं। समाजवादी पार्टी जो दलित विरोधी मानी जाती है, वो अंबेडकर की दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति लगाने जा रही है। जिन्होंने 2012 में लखनऊ में उनकी मूर्ति तोडी थी। आम आदमी पार्टी ने अखबारों में एक पूरे पन्ने के बड़े विज्ञापन में बाबा साहेब को याद किया और शाम को तालकटोरा स्टेडियम में आयोजित उनकी याद में कार्यक्रम में हर दिल्लीवासी को आमंत्रित किया। आम आदमी पार्टी कांश राम के लिए पंजाब में उनके गांव पहुंच कर भारत रत्न की मांग करती है लेकिन यहां दिल्ली में महीनों सफाई कर्मचारियों का वेतन देने से चूकती रही। हालांकी सुन कर अच्छा लगा कि संयुक्त राष्ट्र में भी उनको याद किया गया। 
लेकिन सबसे अजीब बात है भाजपा और संघ का अंबेडकर प्रेम। जिस विचारधारा ने युवा अम्बेडकर पर निशाना साधा वो आज उनको अपनाने में लगे हैं, ये सब एक दिखावा है। तो सवाल ये है कि ये दिखावा क्यों हो रहा है। शायद वोट बैंक की खातिर। मोदी सरकार ने तो 26 नवंबर को संविधान दिवस घोषित कर दिया। अंबेडकर की तस्वीर वाले सिक्‍के जारी कर दिए, लखनऊ में अंबेडकर की अस्थियों पर फूल चढ़ाए, अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी में रोहित वेमुला पर भाषण देते देते भावुक हो गए, वाराणसी के रविदास मंदिर में दलितों के साथ भोजन किया और अंबेडकर की जन्मभूमि महू में एक रैली की और एक चाय वाले के बेटे को पीएम बनाने का श्रेय भी बाबा साहब को ही दिया। कुछ दिनों पहले भाजपा की यूपी महिला अध्यक्ष को दलित विरोधी टिप्पणी करने पर बर्खास्त कर दिया था। अगर अंबेडकर और दलित विरोधी चीजों को भाजपा रिजेक्ट करे तो उसकी पूरी विरासत छोडनी होगी। लेकिन यह ढोंग सरकार की दलित विरोधी छवि को सुधारने के लिए हो रहा है। यह सब हैदराबाद में रोहित का इंस्टीटयूशनल मर्डर, हरियाणा में दलितों की हत्या, जेएनयू से उठी आवाज, संघ के आरक्षण विरोधी बयान आदि की भरपाई है।
एक भाजपा ही क्यों? देश की शायद ही कोई राजनैतिक बिरादरी हो जो उनकी विरासत को अपना बताने से पीछे छूट जाना चाहती हो। इसके अलावा कुछ और वजहों पर भी मैं नजर डालना चाहता हूं। वजहें मौजूदा दौर की कुछ अलग किस्म के राजनैतिक हालात में छुपी हैं। अगर ऐसा है तो ये हालात हैं क्या? इन सवालों के जवाब तलाशने से ही अंबेडकर नाम 'जपने' की आज की होड़ का मर्म समझा जा सकता है। आजादी की लड़ाई और उसके बाद भी जाति-विषमता, गैर-बराबरी और अन्याय के खिलाफ अपने संघर्ष में आंबेडकर निपट अकेले ही नहीं दिखते, बल्कि कई ओर से चुनौतियों का सामना भी करते दिखते हैं। यहां तक कि संविधान सभा में उन्हें कई बार कटु अनुभवों से गुजरना पड़ा। उसके बाद लंबे दौर तक वे लगभग भुला दिए गए। उनकी याद बस उनकी जयंतियों तक ही सीमित रही। संविधान की भी तीखी आलोचनाएं की जाती रहीं और उसे बदलने की भी आवाजें उठाई जाती रही हैं। लेकिन आज आजादी के करीब 68 साल बाद कोई ऐसा नहीं बचा है जो उनसे अपना गहरा नाता न जोड़ना चाहता हो। इस संबंध को समझने के लिए अपने ऊपर उठाए गए पाइंट को फिर से उठाना चाहता हूं। हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला की खुदकुशी और उसके बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के विवाद से दलित मुद्दा नए सिरे से बहस के केंद्र में आ गया है। इन दोनों ही घटनाओं ने सभी राजनैतिक दलों में अंबेडकर के प्रति एक नया आकर्षण पैदा किया है। मौजूदा सरकार और उसके खिलाफ मोर्चा लेने वालों, दोनों के लिए अंबेडकर और संविधान रक्षा कवच की तरह बन गए हैं। हाल ही में मैंने रोहित वेमुला के एक साथी प्रशांत को एक सभा में कहते सुना कि यह सरकार मुसलमानों को आतंकवादी कहकर जेल में बंद कर देती है, आदिवासियों को माओवादी बता देती है लेकिन कोई दलित जब अंबेडकर का संविधान हाथ में लेकर खड़ा होता है तो उस पर हाथ डालने से घबराती है। इस बात को मैंने जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया से जोड कर देखा वो लाल और नीले रंगों (कम्युनिस्ट और आंबेडकर) के साथ गांधी के समन्वय की बात करने लगे हैं और संविधान को ही अपने ऊपर लगे कथित आरोपों के लिए ढाल बनाने की कोशिश करते दिखते हैं। 
मैं बात को फिर से वोट बैंक की राजनीति के रास्ते पर आगे बढाता हूँ। यूपी की उपर्युक्त दलित आबादी जिस पर कांग्रेस की पकड़ हुआ करती थी और करीब दो दशकों से मायावती की बहुजन समाज पार्टी उसकी दावेदार बन गई है। लेकिन लोकसभा चुनावों में खासकर दलित युवाओं के वोट भाजपा और मोदी की ओर आकर्षित हुए थे जिससे उसे कुल 80 संसदीय सीटों में से 71 (सहयोगी अपना दल को मिलाकर 73) में जीत हासिल करने में मदद मिली थी। इसलिए अगर उत्तर प्रदेश में इस नए वोट बैंक को हासिल करने में भाजपा और मोदी कामयाब हो गए तो शायद 2019 के लोकसभा चुनावों में भी उनकी राह आसान हो जाएगी।
अब मैं अपनी बात को सामाजिक विकास के प्रश्न के साथ आगे बढाना चाहता हूं। बाबा साहेब अंबेडकर क्या अचानक ज्यादा प्रासंगिक हो गए हैं? अगर सिर्फ इसी साल के लिहाज से देखें तो 125वीं जयंती के विशेष अवसर पर उनका जिक्र स्वाभाविक है। लेकिन बात इतनी सी ही नहीं है। देश में राजनीतिक और सामाजिक हलचल भी इसका एक कारण है। एक-दो साल से आरक्षण का मुद्दा किसी न किसी बहाने उठा दिया जाता है। हमें देखना पड़ेगा कि माहौल में अचानक इस बदलाव के कारण क्या हैं? इसके साथ ही एक और बदलाव आया। अभी तक सिर्फ सरकारी नौकरियों में आरक्षण ही मुददा बनता रहता था। अब हमें निजी क्षेत्र की नौकरियों में आरक्षण की मांग सुनाई दे रही है। बाबा साहेब की जयंती पर इस मामले पर अगर सोच-विचार होता है तो इससे अच्छी बात और क्या होगी। आरक्षण का उपाय था क्या आजादी के बाद से अब तक हम समानता आधारित व्यवस्था बनाने में लगे हैं। सबसे पहले हमने यह सोचा कि पहला काम देश को आत्मनिर्भर बनाने का हो। यह काम हमने कर लिया। यह काम करते-करते पचास साल गुजर गए। सार्वजनिक क्षेत्र यानी सरकारी क्षेत्र और निजी क्षेत्र दोनों को साथ-साथ चलाने वाली व्यवस्था हमने स्वीकारी  थी। इसे इसलिए स्वीकारा था ताकि सबके कल्याण वाली व्यवस्था का काम सार्वजनिक क्षेत्र से होता रहे और देश की आर्थिक तरक्की का काम निजी क्षेत्र के जरिये हो जाएगा। दुनिया में यह कौन नहीं मानता कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को बनाए रखकर या चलाए रखकर बड़े -बड़े और दिग्गज देशों को हमने हैरत में डाल दिया। लेकिन एक कमी फिर भी रह गई। वह यह कि सामाजिक और आर्थिक समानता का लक्ष्य पूरे तौर पर हासिल नहीं हो पाया। यही वह बात है जो बाबा साहेब की जयंती पर करने की है। गौर से नजर डालेंगे तो इस मामले में एक दुविधा खड़ी करने की कोशिश होती दिखती है। जो लोग समझते हैं कि आरक्षण का उपाय सिर्फ आर्थिक समानता के लक्ष्य के लिए था, वे यही समझाएंगे कि आरक्षण के कारण आज समाज के विभिन्न वर्गों में असंतुलन की स्थिति बन रही है। अब चूंकि इतने बड़े देश में गरीबों और संपन्नों का अनुपात देखने का तो ठीक से प्रबंध है ही नहीं। है भी तो सामाजिक वर्गों के लिहाज से तो बिल्कुल भी नहीं। जातिगत आधार पर जनगणना का मामला भी अधर में ही है। सो कैसे पता चलेगा कि जातियों के आधार पर विपन्नता या संपन्नता की मौजूदा स्थिति है क्या? फिर भी गरीबी रेखा खींचकर जब उसके नीचे की जनसंख्या देखते हैं तो देश का दो तिहाई तबका गरीबी की श्रेणी में ही दिखाई देता है। और इसमें हर सामाजिक वर्ग वंचित ही नजर आता है। यह स्थिति क्या इस बात पर सोचने की तरफ इशारा नहीं कर रही है कि देश में हर व्यक्ति के लिए नौकरी या काम-धंधा देने का माहौल बनाने की बात होनी चाहिए। इसीलिए यह बात उठती है कि आरक्षण को लेकर बहस उठाना उस हालत से मुंह फेरना है जिसमें सब के लिए नौकरी या काम-धंधा है ही नहीं। सबके लिए पढ़ाई-लिखाई तक का इंतजाम नहीं है। किसी को अगर वाकई आरक्षण गलत लगता हो तो क्या उसे आरक्षण के मूल कारणों को नहीं देखना पड़ेगा। चाहे नौकरियों में हो और चाहे शिक्षा के क्षेत्र में, आरक्षण का उपाय मजबूरी में सूझा था। तब मजबूरी यह थी कि हमारे पास सर्वजन हिताय के लिए संसाधन नहीं थे। अब आज अगर हम देश के स्तर पर साधन संपन्न होने का दावा कर रहे हैं तो क्या सबसे पहले सबके लिए रोजगार के काम पर नहीं लग जाना चाहिए। कारण जो भी हों, अगर नहीं लग सकते तो नौकरियों में या शिक्षा के क्षेत्र में हम चयन का आधार बनाएंगे क्या? कोई भी वाजिब आधार सोच लें, घूम-फिर कर हमें वहीं आना पड़ेगा और कहना पड़ेगा कि जो शुरू में सोचा गया था, वही अकेला विकल्प आज भी है। अंबेडकर की जयंती पर ग्रामोदय का सपना निश्चित ही एक बेहतर पहल है। सरकार की सोच के केंद्र में गांव और किसान का होना बड़ी बात है। बाबा साहब की जन्मस्थली से इसकी शुरुआत तमाम निराशाओं के बीच उम्मीद का संचार करती है, लेकिन आज दिन कुछ और भी सोचने का है। गांव के लिए तो किसी भी दिन सोचा जा सकता है लेकिन बाबा साहब की सोच में गांव का दलित और पीड़ित वर्ग अधिक था। जातीय व्यवस्था के सबसे बड़े वाहक रहे गांवों में इन लोगों की स्थिति कैसे बदलेगी ? आज के दिन यह सोचने वाली बात है। जातीय व्यवस्था और आरक्षण के नाम पर आज के समाज में हरियाणा, राजस्थान और अन्य इलाकों में जो कुछ हुआ है, सोचिये क्या वह आंबेडकर की सोच के अनुकूल था? सोंचते रहिएगा।

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