Sunday, April 3, 2016

लिव इन रिलेशनशिप सही या ग़लत?

आज लिव इन रिलेशनशिप के बारे में बहुत बातें हुई हम दोस्तों के बीच में। फेसबुक पर भी जाहिद भाई ने बात की।
अगर इस मुद्दे पर बात करूँ तो मैं खुद में बहुत कंफ्यूज हूँ. लेकिन जब बात है तो उसपर बात होनी चाहिए. इस असमंजस के बीच मैं हमेशा की तरह सेंट्रल होना चाहूँगा. सबसे पहली बात तो यह कि इसे भारतीय संस्कृति से जोड़ना ठीक नहीं है. आप जिस संस्कृति का हवाला देते हैं वो ही आज महिलाओं की इस स्थिति की ज़िम्मेदार भी है. 
आप अपना पूरा इतिहास उठाकर देखिए किस तरह से लिव इन रिलेशन को डिफयिन किया गया है. हर बार कुछ ना कुछ अजीब और भावनात्मक तर्क. जिनका असली बातों से कोई विशेष मतलब होता नहीं है. 
जब मन हुआ तब वेस्टर्न कल्चर को उठा लिया, जब मन हुआ तब उसके विरोध में भाषण होने लगे? जब मन हुआ तब संविधान का हवाला देने लगे,और जब मन हुआ तब उसके प्रावधानों के खिलाफ संस्कृति को लाकर खड़े हो गए. 
परिवर्तन बहुत ज़रूरी चीज़ है. परिवर्तन हो तभी सकता है जब हमारे समाज में संविधान को लागू किया जाए (संविधान में दिए उनके विवाह के अधिकारों, जाति प्रथा का अंत, लिव इन को सामाजिक मान्यता) और पुराने स्त्री विरोधी विचारों को छोड़ा जाए. मुझे लगता है जब पहली बात पूरी होगी तो दूसरी खूब ब खुद पूरी हो जाएगी. 
आपके पहले प्वाइंट की सब बातें संवैधानिक रूप से ठीक हैं, लेकिन समाज में उनकी क्या स्वीकृति है? मुझे त्वरित तौर पर इसके जवाब मे कोई बात सूझ नहीं रही है. खुद में बड़ा कंफ्यूज़न है जो रात भर सोने नहीं देगा. बात निकली है तो दूर तलक जाएगी अब......
जब बात दूसरों के रिलेशनशिप और पॉर्न देखने की है तो बड़ी आसानी से उसको ग़लत कहा जाता है? आज की पीढ़ी में अपवादों को छोड़कर कौन ऐसा होगा (अविवाहित) जिसकी महिला मित्र ना होती हों, बड़े बड़े संघी और संस्कृति के रक्षक देखे हैं पार्कों और कॉलेज में लाइन मारते हुए और अपने लिए कहीं से सेटिंग के जुगाड़ में. कितने लोग खुद से कह सकते हैं कि पॉर्न नहीं देखते हैं? रही बात होमो सेक्सुअल की तो वो कुछ % लोगों को जन्म से होता है. जिस तरह से हम विपरीत सेक्स के प्रति आकर्षित हैं उसी तरह उनकी भी भावनाएँ होंगी. कुछ तो कारण होगा जो इतने अधिक देशों में इन चीज़ों को क़ानूनी वैधता प्राप्त है. क्या उनकी संस्कृति नहीं होती है? हमसे भी अधिक प्रगतिशील समाज के लोग होंगे ऐसे जो इन मान्यताओं को मानते हैं. मेरी पिछली पोस्ट में मैं कंफ्यूज था जिसका जवाब यह है कि अगर यह क़ानूनी और सामाजिक तौर पर समाज में लागू या मान्य हो जाता है तो लोग इसपर इतनी अधिक चर्चा नहीं करेंगे. इसको महिला की बेइज़्ज़ती, रखैल या रंडीबाजी जैसे शब्दों से भी नहीं जोड़ा जाएगा. तब ये हादसे रुक भी जाएँगे. उदाहरण के तौर पर 10 लोग (लिवइन या होमो सेक्सुअल) ऐसे रह रहे हैं, और 8 सफल हैं, 2 फेल भी होंगे तो जब बात बेइज़्ज़ती या सामाजिक गिरावट के साथ नहीं देखी जाएगी तो दोनो ही वो बातें भूलकर कुछ दिन में  बढ़ जाएँगे. अब बात आती है कि ये सब होगा कैसे? क्योंकि क़ानूनी मान्यता तो है, सामाजिक नहीं. इसके लिए ज़रूरी है कि पुरानी कुधारणाओं को ख़त्म किया जाए. जब कुछ प्रगतिशील लोग ख़त्म करेंगे तो बाकी के कट्टर भी कुछ दिन में पीछे पीछे भागेंगे जब उनके बच्चे या खुद उसमें फँसेगे.

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