Saturday, April 30, 2016

अगस्ता डील पर कांग्रेस बनाम भाजपा

संसद के अंदर और संसद के बाहर इस समय भाजपा और कांग्रेस में जबारजस्ट सियासी घमासान चालू है। बात आगस्टा डील हेलिकॉप्टर घोटाले की है। फरवरी 2012 में इस मामले में दलाली की बात सामने आई तभी रक्षा मंत्रालय ने रोम में दूतावास से रिपोर्ट मांगी। 12 फरवरी, 2013 को मामला सीबीआई को सौंपा गया और 10 फरवरी, 2014 को पाबंदी की प्रक्रिया शुरू की गई। जब तक यह प्रक्रिया पूरी हुई तब तक केंद्र में सरकार बदल गई। 3 जुलाई 2014 को अगस्ता को चिट्ठी भेजी गई। इसलिए मौजूदा रक्षा मंत्री इसका श्रेय ले रहे हैं जबकि स्पष्ट है कि ब्लैक लिस्टेड करने का निर्णय यूपीए गोर्वमेन्ट का था और यह केवल डाकिए का काम किये।
इटली की कंपनी फिनमेकानिका ने भारत के साथ 3500 करोड़ की जो डील साइन की है उसमें दलाली के आरोप लग रहे हैं। मेन कंपनी फिनमेकानिका है और अगुस्ता वेस्टलैंड सहायक कंपनी है। फिनमेकानिका इटली की सार्वजनिक उपक्रम टाइप की कंपनी है। फरवरी 2013 में इटालियन पुलिस ने फिनमेकानिका के चेयरमैन ओरसी को गिरफ्तार किया। चार्ज लगाया गया कि ओरसी ने दलालों को 360 करोड़ रुपये दिये हैं ताकि वे भारत के साथ हेलिकाप्टर की बिक्री को सुनिश्चित करवा सकें। फरवरी 2012 में इटली में जांच की ख़बर आते ही तब के रक्षा मंत्री जांच के आदेश दे देते हैं। इटली में तो 2011 के साल से ही इस तरह की चर्चा होने लगी थी। 'हिन्दू' अख़बार के अनुसार 17 फरवरी 2013 को छपी कि भारत ने इटली से इस मामले से जुड़े दस्तावेज़ मांगे थे, लेकिन इटली की अदालत ने नई दिल्ली की मांग को खारिज कर दिया था।
खबरों के अनुसार जब टेंडर निकला तो टेंडर के चैप्टर नंबर 2 में एक प्रावधान था कि टेंडर ओरिजिनल इंस्ट्रूमेंट बनाने वाले ही भर सकते हैं, लेकिन ऑगस्ता की 2012 रिपोर्ट के अनुसार वह ओरिजिनल इंस्ट्रुमेंट मैन्युफैक्चरर नहीं है। ऐसे में किसके इशारे पर यह टेंडर उन्हें दिया गया। अगस्ता वेस्टलैंड "फिनमैकेनिका" की कंपनी है जिसमें फिनमैकेनिका का 70% शेयर है , फिनमैकेनिका ओरिजिनल इंस्ट्रेन्ट मैन्यूफैक्चरर है। जब हेलीकॉप्टर का सौदा हुआ और जब खरीदना था तो उसका फील्ड टेस्ट करने की शर्त थी, उस नियम को बदलकर कंपनी के संस्थान के अंदर ट्रायल किया गया। यह किसके इशारे पर किया गया।
फिल्ड टेस्ट हुआ था और उड़ान की क्षमता 6000 मीटर की जगह 4572 मीटर पाई गयी , यह उड़ान भी उस समय की सबसे अधिक उड़ान करने वाले हेलिकॉप्टर की थी "AW101" उस समय का सबसे बेहतर विकल्प था इसलिए निर्णय लिया गया कि यह खरीदा जाए।
जब यह सौदा हुआ तो इटली की मीडिया में यह खबर थी कि टेंडर के लिए घूस दी गयी है। टेंडर में यह प्रावधान था कि टेंडर को पुट ऑन होल्ड किया जा सकता था लेकिन इसके बाद भी इस टेंडर को क्यों नहीं रोका गया। अधिकारी के इटली में गिरफ्तार होने के बाद ही इसे पुट ऑन होल्ड किया गया था। ऐसे में यह देरी क्यों की गयी। सौदे की शर्त यह थी कि भ्रष्टाचार का मामला सामने आने पर सौदा कैन्सिल होगा और जैसे ही दलाल की गिरफ्तारी हुई सौदा "पुट आन होल्ड" किया गया और फिर निरस्त किया गया। अंतरराष्ट्रीय सौदा निरस्त करने के लिए सबूत चाहिए जिसमें कुछ समय लगता है , दलाल की गिरफ्तारी हुई सबूत मिला और तुरंत सौदा पुट आन होल्ड हुआ।
यह दावा किया गया है कि सारी जमानत राशि को वापस ले लिया गया है लेकिन यह गलत है अभी तक यह राशि वापस नहीं आयी है। इस राशि का सिर्फ एक हिस्सा ही वापस आया है।
सौदा रद्द होने के बाद सारी रकम भारत में वापस गयी सिवाय 3 हेलिकॉप्टर के मुल्य के जिसका मुल्य 112 करोड़ यूरो अर्थात लगभग ₹800/= करोड़ रूपये है। क्युँकि हेलिकॉप्टर प्रयोग में लाया जा चुका था उड़ान भरी जा रही थी जो डील के अनुसार वापस नहीं किया जा सकता था। आज एक टूथपेस्ट की सील तोड़कर आप वापस नहीं कर सकते तो 300 करोड़ का हेलिकॉप्टर प्रयोग करके वापस कैसे करेंगे?
बीजेपी को इटली की अदालत के फैसले से नई ऊर्जा मिली है कि इसके ज़रिये सोनिया गांधी को भ्रष्टाचार के मामले में सीधे सीधे घेरा जा सकता है। सोनिया गांधी भले सबूत मांग रही हों लेकिन राजनीति सबूत का इंतज़ार नहीं करती। सही है कि फैसले की पूरी कॉपी अभी तक नहीं पढ़ी गई है। वहां भारत का पक्ष नहीं रखा गया लेकिन यह भी एक तथ्य है कि अगुस्ता वेस्टलैंड मामले में रिश्वत दी गई है। देने की बात साबित हो चुकी है। कांग्रेस इस सवाल को छोड़ अन्य सवालों के ज़रिये बीजेपी को घेरने का प्रयास कर रही है। सवाल तो बनते हैं मगर रिश्वत वाले सवाल के जवाब के रूप में नहीं। अब कांग्रेस इसमें भाजपा के दो मुख्यमंत्रियों रमन सिंह और वसुंधरा राजे पर भी आरोप लगा रही है। कई जानकार कह रहे हैं कि फिनमेकानिका को ब्लैक लिस्ट करना आसान नहीं है। 3 अप्रैल को फाइनेंशियल एक्सप्रेस में खबर छपी है कि भारत सरकार ने अगुस्ता वेस्टलैंड को 100 लाइट यूटिलिटी हेलिकाप्टर के लिए टेंडर में भाग लेने की अनुमति दे दी है। शर्त है कि कंपनी को किसी स्थानीय वेंडर से साझीदारी करनी होगी। अगर ये बात सही है तो फिर ब्लैक लिस्ट कहां हुई। नेता अधिकारी के साथ-साथ यह बात भी सामने रही है कि करोड़ों रुपये मीडिया मैनेज करने के लिए भी खर्च किये गए।


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