कभी कभी मुझे नरेंद्र मोदी जी सच में बहुत पसंद आ जाते हैं। आज जगजीवन राम की याद में भाषण, अंबेडकर के विचारों की बात करना, विश्व सूफी कार्यक्रम का वो यादगार भाषण, पाकिस्तान से सकारात्मक बात की कोशिश, आरक्षण के पक्ष में बोलना उनको एक मैच्योर इंटरनेशनल लीडर की तरह दिखाता है। वे गुजरात के सीएम से पीएम होते ही उनके विचार 90 डिग्री घूम गए। सेकुलरिज्म और गांधी की बात करने लगे जो सकारात्मक है। पूर्व में जो किया उन्होंने वह सही नहीं ठहराया जा सकता है लेकिन जब हम संविधान की बात करते हैं तो यह भी ध्यान रखना चाहिए कि वो अदालत से छूटे और जनता के सेलेक्टेड पीएम हैं। वे कैसे छूटे उसपर बात हो सकती है। लेकिन देश के पीएम हैं 2019 तक कम से कम तब तक अगर वह हमारे विचारों की तरफ बढ रहे हैं तो स्वागत किया जाना चाहिए। कोई इंसान कंपलीट नहीं है वैसे ही उनकी और उनकी सरकार की गलत नीतियों का विरोध करते रहेगे। दरअसल सरकार के खिलाफ जनता इतना न भडकती अगर वह खुद विकास के लिए 100 में महगाई रोकने, पाकिस्तान पर हमला करने, 15 लाख देने के वादे न कर देते। बीजेपी के एक प्रवक्ता मुझे बता रहे थे कि ऐसे वादों को मीडिया में डिफेंड करना कितना कठिन है। विकास एक निरंतर प्रक्रिया है। वह सामाजिक विकास के साथ ही बढता है। बस नई सरकारें भ्रष्टाचार दूर कर सिस्टम सही करें। यही कांग्रेस की सरकार में नहीं था। आज उनकी ही कई योजनाएं यह सरकार अच्छी तरह चला रही है। इसकी जगह और भी कोई सरकार इससे बहुत बेहतर करती यह कहा नहीं जा सकता है। जनता ने दो गलत पार्टी में से कम गलत को चुना है। और कोई ऑप्शन केंद्र में अबतक तो मौजूद नहीं है आगे का भगवान मालिक।
अगर मैं निष्पक्ष तौर पर एक राजनीतिक छात्र की तरह अपनी बात रखूं तो यह कह सकता हूँ कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी अब कुछ मैच्योर नेता हो गए हैं. वो इंटरनैशनल लेवल पर एक बड़े नेता के तौर पर उभरे हैं. मैं यह भी मानता हूँ कि कोई दूसरी सरकार भी अगर होती तो अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर शायद 19-20 इतना ही कर पाती. कुछ फ़ैसले ऐसे हो सकते हैं जो इस सरकार के के बहुत ज़्यादा विरोधाभाषी होंगे. इस बिगड़ती अर्थव्यवस्था और क़ानून व्यवस्था के लिए वो केवल इतने ही ज़िम्मेदार हैं कि वादे कुछ ज़्यादा बड़े कर गए. मेरे पहचान के एक भाजपा प्रवक्ता हैं जिन्होने कहा कि यह सच है कि जिस तरह से मोदीजी ने 2014 में जनता को सपने दिखाए वो सत्ता में आने के बाद डिफेंड करना मुस्किल है. विकास एक निरंतर प्रक्रिया है जिसमें भ्रष्टाचार ख़त्म करके उसे लगातार चालू रखा जाता है. लेकिन जिस तरह से गुब्बारा भर के छोड़ा गया अब उसे संभालना भी मुस्किल है. जहाँ तक सरकार की बात है तो इससे बेहतर विकल्प उस समय में मौजूद थे नहीं. ना अभी भी.
फिलहाल मैं मोदी जी की पर्सनल इमेज पर बात कर रहा था. जो उन्होने पिछले समय में किया वो बिल्कुल भी डिफेंसीव नहीं है. यही कारण है कि आज तक मैं उनका विरोधी हूँ. वो गुजरात का नरसंहार और पूरी एक सांप्रदायिकता की मुहिम जो गुजरात में सालों तक चली. उससे बड़ी मुश्किल से मोदी जी निकल पाए थे. निकल जाने के अपने कारण थे, जिनका यहाँ पर ज़िक्र ठीक नहीं है. लेकिन आप देखेंगे क़ि जब से वो भारत के लीडर के तौर पर खुद को गुजरात से बाहर ला रहे थे तभी से वो खुद को सेकुलर लीडर के तौर पर प्रोजेक्ट कर रहे थे. मुस्लिम महिलाओं का रैली में आना. ज़फर सरेशवाला, सलीम ख़ान जैसे लोगों का साथ आना कई ऐसे मौके थे जो एक एजेंडे के तहत हुए उनकी मुस्लिम विरोधी छवि को बाहर निकालने के लिए. शायद उनकी विचारधारा भी कुछ हद तक बदल चुकी थी. वो भाजपा और संघ परिवार के टिपिकल राजनीतिक स्टाइल को छोड़ चुके थे. अमित शाह और उनमें कुछ विरोधाभाष दिखते तो हैं. वहीं मोहन भागवत भी उस संघ के पुराने एजेंडे पर नहीं दिखते हैं जो पहले था. उनके ज़मीनी कार्यकर्ताओं की सोंच से अब वो मेल नहीं खाते हैं. अब तो मैं देखता हूँ कि 2005-06 के मोदी 2014 में जितने बदले थे, आज उतने ही 2014 से बदल गए हैं. यह बदलाव भारतीय राजनीति ख़ासकर संविधान और लोकतंत्र के लिए सकारात्मक है. मैं तब से उनका निजी तौर पर अब सम्मान करने लगा हूँ, वो इसलिए नहीं कि अब मोदी जी प्रधानमंत्री हैं, बल्कि इसलिए कि अब वो संविधान, देश और राजनीति को समझ चुके हैं, कट्टर हिंदुत्ववादियों की नहीं सुनते हैं, कुछ हद तक सेकुलर हो चुके हैं. यह सेकूलरिज़्म मुझे पसंद है. उनकी जो पसंदीदा टीम भी है वो भी सेकुलर ही है, मजबूरी है नहीं तो कितने ऐसे तत्वों को शायद बाहर भी कर देते, अगर भाजपा ऐसे ही सफल रही तो हो सकता है क़ि आने वाले समय में साध्वी और योगी जैसे लोगों को पार्टी में जगह ना मिले, और यह केवल मोदी ही करेंगे.
मुझे लगता है कि कुछ सालों बाद एक समय आएगा जब संघ और उसके सभी संगठनों को मोदी साइड लगा देंगे और खुद को एक सर्वमान्य नेता बनाएँगे.
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