Tuesday, April 5, 2016

भारतीय बनाम पश्चिमी कल्चर

अक्सर बातें हमारी संस्कृति को लेकर की जाती हैं, हर बात में संस्कृति को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है इसलिए मैं भी पहली बार इस बारे में कुछ लिखने की कोशिश कर रहा हूँ. सबसे पहले मैं दो बातें स्पष्ट कर देना चाहता हूँ. पहली यह क़ि मेरे हिसाब से भारतीय संस्कृति भी पूरी तरह से स्वीकारने लायक है यह कहा नहीं जा सकता है. कुछ % ग़लतियाँ हो सकती हैं उसमें. ठीक उसी तरह वेस्टर्न कल्चर भी पूरी तरह ग़लत नहीं कहा जा सकता है, उसमें भी कुछ बातें हमारे स्वीकारने लायक हो सकती हैं. ऐसा मैने इसलिए कहा क्योंकि कोई भी देश, समाज और कल्चर 100% सही नहीं होता है उसे सही बनाना पड़ता है. हमारी भारतीय संस्कृति 5000 साल पुरानी है जब यूरोप और अमेरिका के लोग शरीर पर पत्ते बाँधकर घूमते थे. कई देशों का पता नहीं था। आप यहाँ पर यह सवाल कर सकते हैं कि फिर वो हमसे आगे कैसे पहुँच गए? कौन कहता है क़ि सांस्कृतिक रूप से वो हमसे आगे हैं. वैसे भी हमारे अपने विकास कार्य हैं। अगर उनके पास टेक्नॉलॉजी है तो हमारे पास भी एग्रीकल्चर प्रोडक्शन पावर है, हम पूरी दुनिया को खाना खिलाने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं. क्या उन्होने ऐसी कोई मशीन बनाई जिससे आनाज पैदा होता है? हमारे पास भी ह्यूमन पावर है. आज माइक्रोसॉफ़्ट में 46% लोग भारत के बेटे-बेटियाँ हैं, ओबामा की हेल्थ टीम में 17 में से 6 लोग भारतीय हैं. नासा में ना जाने कितने भारत के लोग हैं, जो पूरे विश्व को रास्ता दिखा रहे हैं? इसको इस तरह से मत देखिए कि वो भारत छोड़कर गए, उसे इस तरह से देखिए कि अगर वो ना जाते तो लोग भारत की शक्ति कैसे जान पाते? नासा में भारतीय वैज्ञानिक किसी भी परीक्षण के पहले गणपति बप्पा की पूजा करते हैं, यह भारतीय कल्चर उनमें आज भी जिंदा है, वो अपनी पीढ़ी में भी रखना चाहते हैं. 
हमारे देश की संस्कृति अमेरिका और यूरोप जैसी 10-20 संस्कृति को अकेले समाहित किए हुए है. 29 राज्य, 400-500 जातियाँ, इतने धर्म, 300 से अधिक भाषाएं, हर राज्य में अलग अलग संगीत, नृत्य कल्चर, हर तरफ अलग रीति रिवाज यह क्या है? इतनी आसमानताएँ होते हुए भी हमारा देश आज इतना बड़ा है. नॉर्थ अमेरिका और इंग्लैंड में न जाने कितने टुकड़े हो गए छोटी छोटी बातों पर. लेकिन भारत अबतक एक है, मतलब संस्कृति में कुछ तो ख़ास होगा ही. जब वेस्टर्न कल्चर की बात शुरू होती है तो सबसे पहले पहनावे से बात शुरू की जाती है. मैं हमेशा से ही लिबरल रहा हूँ। दूसरों के कपड़ो को लेकर ख़ासकर लड़कियों के. मैं चाहे जितने पुराने फैशन का हूँ लेकिन दूसरों के लिए लिबरल हूँ. लेकिन ज़्यादा westernisation तो ठीक नहीं है. मान लीजिए हम और आप कॉलेज कैम्पस में खड़े हैं, वहाँ पर एक Professor साड़ी, सलवार कमीज़ या फिर मुस्लिम है तो बुर्क़े में निकलती है। तो सोचो उसपर हम क्या कमेंट्स कर पाएँगे? ज़्यादा से ज़्यादा यह कि बहुत अच्छी है, बस ना। इसके उलट सोंचो वो किसी ख़ास छोटी ड्रेस या शॉर्ट्स में, किसी बहुत टाईट जींस में निकलती है, तो देखो हमारे कमेंट्स कितने भद्दे होंगे. उसको माल, आइटम और ना जाने कितने बाजारू शब्दों के साथ जोड़ देंगे. ये हकीकत है। मैं ऐसा नहीं हूँ फिर भी खुद को अलग कर अपने मुँह से गांधी नहीं बनना चाहता। भगवान न करे वो लड़की हमारे घर की हो. तब हमारा रिएक्शन क्या होगा? मुझे लगता है कि अब तो जवाब आपको मिल गया होगा. 
वहीं आप पुरुषों के कपड़ों पर बात करें तो कोई विशेष परिवर्तन हुआ नहीं है. हो सकता है यह मुझे ही ना दिखता हो. नजरिया अलग हो। लेकिन आप भी नहीं बता पाएँगे ऐसा कुछ वल्गर क्योंकि मार्केट ही वेस्टर्न कल्चर में ढाल दिया गया कि हर एड लड़की से कराओ ज़्यादा चलेगा. यहाँ पर पुरषवादी मानसिकता वहीं से आई है. इसी कारण पुरुषों के कपड़ों में वो परिवर्तन हैं नहीं. पैंट शर्ट, जींस तो नॉर्मल पायजामे कुर्ते का ही मॉर्डन रूप है. जो समय के साथ बदलना ज़रूरी था. मामूली बदलाव तो हमारे यहाँ के महिलाओं के कुछ कपड़ों(नाइटी, साडी, सलवार सूट, जींस कुर्ता,  लहंगा) में हुआ है, जो सबको स्वीकार है मेरे ख़याल से. कोई गलत नहीं कहता है इसको क्योंकि यह सामाजिक परिवर्तन हमारे अपने हैं. बाहर से तो वल्गैरटी आई है. 
अब बात थोड़े से खाने पीने की भी कर लेते हैं. तो आपको बता दूं कि इतिहास बताता है कि हमारे देश में वेज या नॉनवेज सब खाने चलते रहे हैं. जो चीज़ें बाहर से भी आईं उनमें हमारा देशीपन दिखता है. चाइनीज की ही बात करो तो हम उसमें भी तड़का लगा देते हैं. इसी तरह से भाषाओं में है. अँग्रेज़ी एक वैश्विक भाषा है, जिसको पूरे विश्व में विकसित किया गया. उसका पूर्णतया विरोध करके आप प्रोग्रेसिव सोंच तो नहीं ला सकते हैं. लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि आप हर भारतीय भाषाओं को गिरा हुआ समझने लगें. जहाँ ज़रूरत है वहाँ इंग्लिश ठीक है, लेकिन हमारी अपनी इतनी अधिक भाषाएं हमारी संस्कृति को बयां करती हैं और उसको जोड़ने वाली एक भाषा. यह और कहीं नहीं है. पूरा विश्व अँग्रेज़ी के लिए ही मरता है यह भी सही नहीं है, मैं 10-12 उदाहरण दे सकता हूँ  पूरे विश्व में अंग्रेजी के विरोध के. लेकिन फिर बात का टॉपिक बदल जाएगा. जिस तरह से हमने इंग्लिश को स्वीकार किया उसी तरह से हर तरह की टेक्नॉलॉजी को ले रहे हैं इसे आप भारतीय संस्कृति के खिलाफ नही बता सकते हो. लेकिन अगर इस टेक्नॉलॉजी का प्रयोग वेस्टर्न तरीके से होने लगे तो भारतीय कल्चर के खिलाफ कह सकते हैं. मोबाइल को ही ले लो. उसका प्रयोग ठीक है, हमारे समाज में विकास लाया है, लेकिन बच्चों में फ़्रस्टेशन होना, पोर्नोग्राफ़ी का बढ़ावा यह वेस्टर्न कहा जा सकता है. मेरे पास बहुत सारे सर्वे के आँकड़े मौजूद हैं जो बच्चों में पढाई की बर्बादी, डिप्रेशन, सेक्सुअल प्राब्लम के कारण मोबाइल फोन के गलत तरीके से प्रयोग से होते हैं। अगर मोबाइल भी सही से यूज होता है तो क्या बुराई है?
अब सबसे अंतिम बात करूँगा भारतीय और वेस्टर्न कल्चर के रिश्तों की. जो लोग माँ बाप का नाम गूगल में सर्च करते हैं उन्हें रिश्तों की क्या समझ?  लेकिन हमारी संस्कृति में एक छोटे से घर में रक्षा बंधन पर 2 बहनें और 1 पिता जी की बहन(बुआ) घर आ जाएँ, और घर में सब लोग ज़मीन में बिछाकर सोते हैं फिर भी कहते हैं कि छोटी वाली बहन और आ जाती तो घर भरा भरा सा लगता. यह है भारतीय संस्कृति.  
असल में परिवार क्या होते हैं यह उनको पता ही नहीं है. वहाँ तो रिश्ते या शादियाँ एक समझौता हैं. हर 2-3 साल में तलाक़. फिर नई शादी. एक जिंदगी में 10-12 लिव इन रिलेशनशिप और शादियाँ हो जाती हैं. ऐसे में आने वाली पीढ़ी भी यही करती है. 60-70 साल की उम्र में भी उनका यही काम चालू रहता है. जब सब छोड़कर भारत में इंसान कुछ शांति से जीना चाहता है. अब तो विदेशों में शादी छोड़ो कॉन्ट्रैक्ट होने लगे हैं. बिना शादी के 3-4 साल साथ रहे, 1-2 बच्चे पैदा किए फिर वहाँ से संबंध ख़त्म दोनो नए की तलाश में निकल लिए. आप भारत में ऐसा कैसे सोंच सकते हैं? यह कितना सही है?  अगर हमारा कल्चर ग़लत है तो फिर उनके यहाँ की शादियाँ ज़्यादा क्यों टूटती हैं, हमारे यहाँ 7 जन्म की कसमों के चक्कर में कम से कम 50-60 साल तो साथ रह ही लेते हैं. (2-4% अपवादों को छोड़कर) 
भारतीय संस्कृति और समाज कभी भी प्रेम का विरोधी रहा ही नहीं है. लैला-मजनू, हीर-रांझा, शीरी-फरहाद और ताज जैसी हज़ारों कहानियाँ भरी पड़ी हैं. हमारे भगवानों की भी. जिस तरह से जिंदगी के हर पहलू पर कोई न कोई लिमिट होती है उसी तरह से प्रेम करने की एक बाउंड्री होती है. जो क्रॉस नहीं की जानी चाहिए. लेकिन अब यह बाउंड्री westernisaion के ज़रिए टूट रही है. लिव इन रिलेशनिशिप को ही देख लीजिए. अभी दो दिन पहले टीवी एक्ट्रेस प्रत्यूषा बनर्जी की आत्महत्या। इसका यही लिव इन रिलेशनशिप कारण था. वो 2 साल से लिव इन रिलेशनशिप में थी. 2 महीने की प्रेगनेंट भी थी. जबकि उम्र केवल 24 साल? लोग अकेलेपन और इंसोमिनिया से मरने लगे हैं इसके चक्कर में. 2 साल पहले जिया ख़ान का केस हुआ था जिसमें उसके प्रेमी ने उसका Abortion करवाया, फिर उसके बच्चे को बाथरूम में फ्लैश कर दिया, सोचकर देखिए यह सदमा कैसे वो झेल पाती? मर गई. हर लिव इन रिलेशनशिप में बॉयफ़्रेंड एक ही बात कहता है कि शादी करेगा लेकिन करता नहीं है। परिवार, पैसे, जाति या दूसरी बीवी के डर के. तो हम क्यों इस तरह के ट्रेंड को फॉलो करें?
गूगल करते करते आज देखा कि चाइना में 12-13 साल की लड़कियों का एबोर्शन हो रहा है। जापान के गर्ल स्कूल के सर्वे पढकर देखो घिन आएगी उस संस्कृति से। यूरोप में युवाओं के सुसाइड केश की फाइल में 70% सुसाइड का कारण लिव इन रिलेशनशिप से निकला फ़्रस्टेशन होता है. आप इसे बहुत ज़्यादा प्रोग्रेसिव कैसे कह सकते हो?
भगवान है, नहीं है या उसकी शक्तियों और इतिहास पर आप चर्चा कर सकते है. लेकिन क्या आप मुझे कोई ऐसा बाहरी कल्चर नहीं बता सकते हैं जो भगवान को न मानता हो. और जब बात भगवान की है तो यहां हमारा भारतीय कल्चर सबसे आगे नजर आता है। जैसे वे चर्च जाते हैं वैसे ही हमारे देश में लोगों के पूजा, नमाज या मंदिर जाना संस्कृति में सामिल है। जब देश इतना बडा इतनी Diversity तो पूजा के सिध्दांत भी वैसे अलग अलग हैं। लोग कहते हैं बार बार या दिन के हिसाब से मंदिर क्यों जाते हैं?  तो आप इसे आशिर्वाद या वरदान से मत जोड कर देखो तो भी क्या कोई मंदिर मस्जिद या चर्च में जाने के बाद कुछ बुरा सोचता है?  शायद 99.9% तो नहीं। जब उसका इस बहाने से एक दिन सही जा रहा है, दूसरे का भला करता है तो बाकी दिन भी जाने में क्या हर्ज है? भगवान कुछ दे न दे बस एक आस होती है कि ऐसा होगा भगवान साथ है तो उत्साह और जोश बढ जाता है। फिर एक बात अंत में कि अगर भगवान नहीं है तो जिक्र क्यों. ..? और अगर भगवान है तो फिर फिक्र क्यों??  अगर भगवान, पाप-पुण्य के डर से ही भारतीय संस्कृति में  आदमी सही रहता है तो यह काफ़ी सकारात्मक है.

हमारे यहाँ जब कोई मिलता है तो हाथ जोड़कर नमस्ते कहना, पैर छूना जो भाव देता है वो आपका कोई भी हैलो-हाय नहीं दे सकता है. आशिर्वाद में एक पाजिटिव मोटिवेशन है। फैमिली वैल्यू, बड़ों का आदर, अतिथि देवो भव जैसी ना जाने कितनी बातें हैं जिसपर अमेरिका जैसे देशों के रिसर्च स्काॅलर पीएचडी करके गए हैं, जो भारतीय संस्कृति को वहाँ देखना चाहते हैं। जाने कितने विदेशी भारत में इसकी संस्कृति के कारण बस गए। हिन्दी, मराठी, संस्कृत जैसी भारतीय भाषाओं में हजारों विदेशी रिसर्च करके गए हैं। एक मात्र कारण कि अंग्रेजी सब जगह बोलते हैं तो हम भी बोलेंगे और भारतीय भाषाओं को बेकार समझेंगे ठीक नहीं है। ऐसे तो झूठ भी सब जगह बोला जाता है तो क्या हम भी? उन्होंनें आज जो विकास किए हैं वो हमने पहले ही खूब किए हैं। हमारे पूर्वजों ने हजारों साल पहले समंदर पर पुल बना दिया था। वे आज दावा करते हैं, हमारे देश
का अनपढ किसान भी धूल में नहाती हुई चिडिया को देखकर कह देता है कि आज बारिश का जुगाड है, वो आज मौसम विज्ञान ले आए हैं। हमने उन्हें जीना सिखाया। वो मंगल में जीवन ढूंढते हैं, और हम जीवन में मंगल ढूढते हैं। सोचिए अगर उनका ही 200 साल तक राज न होता यहां तो हमने खुद क्या न ईर लिया होता। हमें 500 साल पीछे कर गए थे वो।
फिर भी मैं उनकी संस्कृति को पूरी तरह से इग्नोर नहीं करता हूँ कुछ अच्छा होगा उसमें भी। लेकिन आप उस गलत संस्कृति को इसलिए डिफाइन करें कि आप भी उसकी आदत (जाल) में फंस गए हैं, यह ठीक नहीं है। सोचिए अगर यही ऊपर कही गई बातें जिन्हें हम खुद के लिए अच्छा कह रहे हैं, वही व्यवहार कोई और हमारे करीबी के साथ करे तो? और हाँ दोस्त, नाईट पार्टी नहीं करना, 3-4 गर्लफ्रेंड या ब्रेकअप न करना, बीयर या दारू न पीना और अपनी कमाई के हिसाब से कम खर्च करना, इतिहास, संस्कृति की बातें करना, सत्य बोलना, सादगी से जीना और किताबें पढना गलत या पिछडे होना नहीं है। बस बात सही को सही और गलत को गलत कहने की है। 

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