Sunday, August 28, 2016

लोकतंत्र को कंधे पर उठाए मांझी

आज नौ बजते ही मैं रो पडा यह सुनकर कि एक इंसान को अपनी पत्नी के शव को 12 किलोमीटर दूर तक कंधे पर लादकर गया। पैसे न होने की वजह से अस्पताल की एंबुलेंस नहीं मिली। लोग देखते रहे किसी ने मदद नहीं की। दरअसल वो एक लाश लेकर खडी हुई कई लाशों के बीच से होकर गुजर रहा था। कैसा समाज? कैसी इंसानियत? कैसे लोग? हम और आप सब उसमें शामिल हैं, सोचो किसी को कुछ हो जाए तो हम या तो फोटो खींचेगे या फिर मुंह फेर कर निकल जाएगे। शर्मनाक है यह। माझी से हमें दशरथ माझी भी याद आ गया. वही दशरथ माझी जिसने अपनी पत्‍नी का इलाज नहीं होने देने के लिए दोषी पहाड़ को काटकर गिरा दिया था, बिना किसी सरकार के, बिना किसी स्‍मार्ट योजना के. उसने अपने हौसले से पहाड़ को मनुष्‍य की शक्ति का बोध कराया था. दोनों माझी में एक बात यह साझी है कि दोनों अपने-अपने प्रेम में कितने कोमल और अपने निश्‍चयों के धनी हैं. दाना माझी क्‍या सोच रहे होंगे... अमंग देई के शव को कंधों पर लादे हुए! कंधे पर अमंग को लेकर चलते हुए उसे क्‍या कुछ याद आ रहा होगा? उसके साथ दौड़ रही बे‍टी के आंसू और पत्‍नी का शव मिलकर दाना की मनोस्थिति को कितना व्‍याकुल कर रहे होंगे. उसे शायद प्रधानमंत्री और मुख्‍यमंत्री के सपने और भाषण भी याद आ रहे होंगे. उसे लोकतंत्र की उन रस्‍मों की याद नहीं आ रही होगी.दाना को ओडिशा सरकार की उस योजना की भी याद आई होगी, जिसे नवीन पटनायक सरकार ने फरवरी में शुरू किया था.. ‘महापरायण’ योजना. जिसके तहत शव को सरकारी अस्पताल से मृतक के घर तक पहुंचाने के लिए मुफ्त परिवहन की सुविधा दी जाती है. तो यह दाना को क्‍यों नहीं मिली. क्‍या यह योजना उस जिला मुख्यालय के अस्पताल तक पहुंचने से पहले विकलांग हो गई, जहां टीबी से अमंग की मौत हुई. माझी ने बहुत कोशिश की लेकिन इस देश में सब कुछ आपकी हैसियत से तय होता है. यहां तक कि निजी अस्‍पताल में आपका इलाज भी.  की विवशता हम कैसे लिख सकते हैं. माझी को मदद उसी मीडिया से मिली जो इन दिनों सबके निशाने पर है. जब उन्‍हें अस्पताल के अधिकारियों से किसी तरह की मदद नहीं मिली तो उन्‍होंने पत्नी के शव को एक कपड़े में लपेटा और कंधे पर लादकर भवानी पटना से करीब 60 किलोमीटर दूर रामपुर ब्लॉक के मेलघारा गांव के लिए पैदल चलना शुरू कर दिया. इसके बाद कुछ स्थानीय संवाददाताओं ने उन्हें देखा. जिला कलेक्टर को फोन किया और फिर शेष 50 किलोमीटर की यात्रा के लिए एक एम्बुलेंस की व्यवस्था की गई. दाना डर गया होगा कि कहीं उसकी प्रिय अमंग देई का शव अंतिम विदा से पहले सड़ न जाए. उसके जीते जी भले कोई नागरिक अधिकार नसीब न हुए हो, लेकिन कम से कम मरने के बाद तो सम्मानजनक अंतिम विदाई दी जाए. इस नाते मुझे दो माझी एक जैसे लग रहे हैं. दोनों सरकार से लड़े, अपनी जिद पर जिए. दोनों की पत्‍नी व्‍यवस्था से हारीं.साउथ सूडान में जब इमरजेंसी थी तो केविन कार्टर की खींची हुई यह तस्वीर आज ताजा हो जाती है, जिसमें एक बच्चा और गिद्ध बैठा है। यहां के राष्ट्रवादी मीडिया के लिए लाश लादे हुए तस्वीर तो टीआरपी के लिए अच्छी है, लेकिन जब उसके बुनियादी स्वास्थय के सवालों पर चर्चा होगी तो बोरिंग हो जाएगा सब।

Thursday, August 25, 2016

मोहन भागवत के बयान के मायने

मोदीजी के गुरू जी कहते हैं कि महिलाओं को बच्चे पैदा करने चाहिए। उन्हें क्या पता स्त्री होना क्या होता है? वो क्या जाने मातृत्व का दर्द? अगर एक स्त्री 10 बच्चे पैदा करेगी तो उसकी जिंदगी के कम से कम 10 साल तो गए? और हर साल बच्चा पैदा कर सके यह संभव नहीं है। जिस औरत की शादी 24-25 साल में हो गई उसकी जिंदगी के 40 साल तक वो बच्चे ही पैदा करेगी। फिर उनको संभालना मुश्किल होगा? मतलब स्त्री की पूरी जिंदगी घर में कैद कर दिया? वो खुद के लिए कुछ कर नहीं सकती है? ये पुरुषवादी समाज का घिनौना चेहरा है। इन्ही आरएसएस के गुरु गोलवलकर कहते थे कि स्त्री को वोट देने का अधिकार मत दिया जाए। इसके पहले भी यही मोमोहन भागवत कह चुके हैं कि जो स्त्री घर के काम न करे उसको तलाक दे देना चाहिए?
अच्छा हुआ कि अंबेडकर कानून बनाकर गए नहीं तो कोई इनके जैसा बनाता तो स्त्रियों को कोई अधिकार नहीं होता। न वोट देने का। न बराबर चलने का और न खुद से शादी करने का। आज जो ट्रेन, बस से लेकर पंचायत, स्कूल काॅलेज और सरकारी नौकरी में जो आरक्षण मिलता है स्त्रियों को वो अंबेडकर की ही देन है। जब वो हिन्दू कोड बिल संसद में पेश कर रहे थे तो इन लोगों ने खूब विरोध किया और अंबेडकर ने स्तीफा दे दिया। अगर वो कानून होता तो औरतें बहुत आगे होती। उन्हें बराबर की संपत्ति का अधिकार होता।
एक बार शिवसेना के कोई नेता बोले कि रेप तो जींस पहनने के कारण होता है। कोई मौलवी साहब ने कहा कि रेप मोबाइल के कारण होता है? अजीब गधे भरे हुए हैं देश में। मेरे ऑफिस में एक दिन सब लोग मुझे बता रहे थे कि कहीं 2 साल की लडकी के साथ दुष्कर्म किया गया? कोई बताए कि उसने क्या पहना था? और कौन सा मोबाइल लिए थी वो मासूम। मैं लिखते हुए सुबकने लगा आज कि मैं क्या कर सकता हूं इस र्निर्दयी समाज के लिए? जब कुछ बात करो तो कोई खुद को बडा समझदार मानने वाला मूर्ख मजाक उडाने लगता है कि "बडे आए गांधी जी।" जब उनपर आ जाए तो पता चले? खैर भगवान न करे किसी के साथ ऐसा हो।
आज बात चांद पर जाने की हो रही है और हमारे देश में ऐसी बातें? अभी अभी मैटरनिटी लीव को बढाया गया है समाजिक कार्यकर्ताओं की लंबी कानूनी लडाई के बाद। हम तो कहते हैं कि चाइना की तरह महिलाओं को हर महीने पीरियड्स के समय सरकारी या प्राइवेट जाॅब में छुट्टी मिलनी चाहिए। उन्हें रसोई से लेकर मंदिर तक में जाने की आजादी होनी चाहिए। कोई अपवित्र नहीं होता है? यह सब हमारे समाज में ढोंग फैलाया गया है। उन्हें भगवान ने बनाया है हम पुरूषों से अलग बनाया है इसका मतलब है कि वो अधिक सहनशील हैं। वो दर्द और असहजता हम झेल नहीं सकते हैं। एक औरत को मां बनते समय 20 हड्डी टूटने के बराबर दर्द सहना पडता है, उसके बाद उसकी देखभाल से लेकर दूध पिलाने तक क्या क्या कष्ट होते हैं हम सोच भी नहीं सकते। जब पूछो बच्चे किसके हैं? बाप के  नाम से बताते हैं? अगर कभी बच्चा बिगड जाए तो माँ बदनाम कि माँ ने गलत शिक्षा दी बाप फिर भी सेफ।
किसी औरत के नाम पर कोई संपत्ति नहीं होती है बडे लोग कुछ खरीद भी देते हैं तो टैक्स या सरकार के कानून में छूट के लिए।
बेटियों की शादी में ही 50% ऊर्जा खर्च कर रहे हैं लोग जबकि ऐसा शुरुआत किसने की? निश्चय तौर पर पुरुष समाज ने। मैं गूगल पर देख रहा था कि शीर्ष 10 देश जहाँ पर लडकियों की संख्या सबसे कम है, सबसे ऊपर ओमान और भारत नवें नंबर पर है, पाकिस्तान इसमें 40 के पार है मतलब हम बेटी बचाओ अभियान में उससे भी बहुत पीछे हैं। डर लगता है कि कोई देशद्रोही न कह दे पाकिस्तान को आगे बताने पर लेकिन यह हकीकत है। सैराट फिल्म के बाद मैंने लिखा था कि लडकी आजादी से बुलट तब तक ही चला सकती है जबतक वो खुद के फैसले न ले सके। मुंह न खोले किसी को जवाब न दे। जिस दिन यह हुआ उस दिन से उसकी आजादी भाड में गई। औरत को हमारे समाज में फ्रेम में सजा कर रखने का चलन है, यह सोच उन राजा महाराजाओं से आई जो युद्ध में स्त्री मांगते थे, अय्याशी के लिए 4-5 शादी करते थे सबके सब। वैसे ही आज नारी पहले बेटी, बहन, पत्नी, माँ, सास, दादी के फ्रेम में सेट होती जाती है वो खुद कब होती है? अगर लडका भागकर शादी करे तो कुछ नहीं लडकी करे तो इज्जत गई? जो लोग ऐसा कहते हैं वो केवल दूसरों पर अंगुली उठा सकते हैं बस। और क्या क्या सहे लडकी?  एक कपल में प्यार हुआ, लडके की गांव भर में तारीफ और लडकी चरित्रहीन? ये कौन सा चश्मा है भाई? शादी के बाद भी औरत औरत की दुश्मन। ननद से लेकर सास तक के ताने। एक दो साल फैमिली प्लानिंग कर ली तो सवाल कि बांझ है। अगर जल्दी हो जाए तो भी चुप चुपकर बातें। क्यों? सवाल बहुत से हैं जिसपर समाज से लेकर सरकार तक सामना नहीं कर सकते हैं। मैं अपनी बात खत्म करते हुए बस इतना ही कहना चाहता हूं कि उसे आजादी से जीने दो। मैं कहने का दम रखता हूं, कि मुझे अगर कभी कोई अपने बच्चे के लिए कोई पूछे तो लडकी को गोद लूं। अगर खुद की भी हो तो उसे सब आजादी दूंगा, सब मतलब सब? शादी की भी। इसलिए आप भी औरत को माल या आइटम जैसे बाजारू शब्दों से मुक्त करो। और हाँ देवी तो बिल्कुल भी मत बनाओ, उसे खुद जीने दो बस। क्योंकि आज अपने पैरों पर खडा होने से कुछ नहीं होगा, पैरों पर खडा होकर ओलंपिक से लेकर हर रेश में पुरुषों से कंपटीशन करके जीतना भी है।

Tuesday, August 16, 2016

गुजरात की राजनीति में उभरे तीन युवा नेता

गुजरात को राजनीतिक तौर पर मैं बहुत अधिक नहीं जानता हूँ. क्योंकि राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन के तौर पर वहाँ की जनता निर्बल या कहें कोमा मे चली गई थी. कोई भी नेता नहीं उभर पाया महात्मा गाँधी के बाद. मुझे तो ऐसा शुरू शुरू में तो मुझे लगा कि शायद वहाँ सामाजिक समस्याएँ होंगी ही नहीं. लेकिन जब हार्दिक पटेल का आरक्षण को लेकर बड़ा आंदोलन हुआ तो पोल खुलनी शुरू हुई और मैने राजनीतिक तौर पर इसको परखना शुरू किया. वो एक साल पहले का दौर था जब लोग अपनी समस्याओं का पहली बार गुजराती या हिंदू अस्मिता से उपर उठकर प्रदर्शन कर रहे थे. शायद यह मोदी जी के पीएम बनने पर अत्यधिक महत्वाकांक्षा की भी बात हो? उस आंदोलन की प्रमुख बात यह थी कि लोग आरक्षण के लिए बात कर रहे थे, साथ ही साथ आरक्षण के खिलाफ भी बोल रहे थे. अपने हक का विरोध होते देख पिछड़ा वर्ग से एक नेता आया जिसका नाम था अल्पेश ठाकोर. ओबीसी वर्ग से खूब समर्थन मिला. अब तक जिस गुजरात में युवा राजनीति को देखते ही नहीं थे, या फिर वोट के नाम पर दो दशक से एक ही दल या नेता को हिंदुत्व के नाम पर वोट दे रहे थे, वहाँ दो युवा अपने अपने समुदायों से जनाधार वाले नेता बनकर उभर चुके थे. ऐसे में केवल दलित समुदाय ही पीछे रहा. फिर गुजरात के ऊना एक बड़ी घटना हुई जिसने पूरे देश के दलित समुदाय को हिला कर रख दिया. इस घटना का समय भी कुछ अलग था. इस घटना के कुछ दिन पहले ही दलितों  ने बहुत बड़ी रैली की थी मुंबई के दादर में जिसको मैने कवर किया था. वो रैली अंबेडकर भवन के तोड़ने पर हुई थी. इसमें बहुत दूर दूर से दलित शामिल होने आए थे, महाराष्ट्र में बहुत दिनों बाद बाबा साहब के नाम पर काम करने वाले दलितों ने बिना किसी नेता के यह एकता दिखाई थी. फिर ऊना की घटना पर भी यही दलित एक साथ मुंबई में रैली करने आए. इसके साथ ही साथ उत्तर प्रदेश में मायावती पर भाजपा के नेता की टिप्पणी जिससे उत्तर प्रदेश का दलित समाज उबाल में आ गया. पंजाब से लेकर, महाराष्ट्र और गुजरात तक में बसपा कार्यकर्ताओं ने दलितों में एकता लाकर दोनों घटनाओं को एक साथ जोड़कर खूब आंदोलन किया. जबकि गुजरात में दलित आह्वान पर जो रैली हुई वो ऐतिहासिक थी. गुजरात में दलितों ने बहुत बड़ी रैली का आयोजन किया जिसके दूसरे दिन ही वहाँ की राजनीति पलट गई. मुख्यमंत्री आनन्दी बेन पटेल को इस्तीफ़ा देना पड़ा. फिर शुरू की गई दलित अस्मिता यात्रा जो कुछ दिन में ही ख़त्म हो गई लेकिन 15 अगस्त को गुजरात में इसकी फिर से बड़ी रैली देखने को मिली जिसने भाजपा कांग्रेस सबकी नींदें उड़कर रख दी. गुजरात के इस पूरे दलित आंदोलन के सूत्रधार थे युवा नेता जिग्नेश मेवानी. राजनीतिक तौर पर ये आम आदमी पार्टी से जुड़े हुए हैं, लेकिन इस पूरे आंदोलन में कभी भी यह नहीं देखने को मिला कि कभी भी उन्होने आम आदमी पार्टी या किसी अन्य नेता का समर्थन लिया हो. यह रैलियाँ लोगों के चंदे से हो रही थी. जिग्नेश दलित हीरो बनकर उभरे. यह गुजरात का वर्तमान समय का तीसरा बड़ा सामाजिक आंदोलन से निकला नेता है. कल मैं जिग्नेश के भाषण सुन रहा था और उसके बारे में पता कर रहा था. तो पता चला कि वो शारीरिक तौर पर बहुत कमजोर है, लेकिन इस आंदोलन ने वो बहुत मजबूत युवा नेता बनकर उभरे. उसको गुजरात के दलितों और मुस्लिमों का खूब समर्थन मिला. मैंने जिस जिस जिस आंदोलन का नाम लिया उन सबमें जेएनयू अध्यक्ष कन्हैया कुमार शामिल था. कन्हैया ने जेल से आने के बाद पूरे देश में आंदोलनों में हिस्सा लिया.  रोहित वेमूला की माँ के साथ हैदराबाद यूनिवर्सिटी से लेकर केरल, महाराष्ट्र, गुजरात, यूपी और बिहार तक. उन्होंने अपनी राजनीति में एक चीज़ प्रमुखता से रखी है कि सबको दलित और महिलाओं के नाम पर एकता में बाँधा है. कहीं से भी सेकूलरिज़्म या मुस्लिमों के नाम पर खुलकर सामने नहीं आए. उन्होने खुद को आगे ना करके हर जगह और समाज से कुछ नेता निकाले. वैसे गुजरात का यह दूसरा रूप था, जो मेरे ही नहीं पूरे राजनीतिक जगत के लिए अलग था. अब देखते हैं आने वाले चुनावों में ये आंदोलन क्या सत्ता परिवर्तन कर पाएँगे. या कोई नई राजनीतिक शक्ति उभरकर सामने आएगी. इसमें आम आदमी पार्टी ने अपने लिए सपने देखने शुरू कर दिए हैं. लेकिन दुविधा उनके गुजरात प्रभारी आशुतोष के बयानों से ही हो जाती है. वो हार्दिक पटेल को अपने साथ रखना चाहते हैं. दूसरी तरफ जिग्नेश मेवानी को अपना नेता मानते हैं. जबकि जिग्नेश मेवानी ने तो आम आदमी पार्टी के बिना यह आंदोलन किया है. सामाजिक परिस्थितियों में दोनों को एक साथ रख पाना बहुत मुस्किल है.   

Monday, August 15, 2016

लाल किले से मोदी जी 2016

सुबह से ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भाषण सुन रहा था. एक राजनैतिक प्राणी होने के नाते उनके भाषण का विश्लेषण करते समय एक बात सबसे प्रमुख समझ में आई कि वो हमेशा की तरह बहुत लंबा बोले, अर्थात ज़्यादा कुछ बोलने के लिए था नहीं. वो बार बार जन धन योजना, सड़क, नरेगा, फ्री बीमा और डिजिटल इंडिया पर बोलते रहे, उन्हीं बातों में वो खींच पर बोलने की कोशिश करते रहे. आप संसद में वित्तमंत्रियों या लाल किले पर ही मनमोहन सिंह के भाषण से तुलना करने जाएँगे, तो लगेगा कि मोदी जी रिथा कर बोल रहे थे. मतलब किसी मैच को ड्रा करवाने के लिए स्लो स्लो खेल रहे थे. इसके चक्कर में वो राज्य सरकारों की कई योजनाओं पर क्रेडिट ले गये. वो किसानों की तारीफ़ करते हुए कुछ ज़्यादा ही भावुक होते नज़र आए. दालों की बुआई में किसानों के प्रोत्साहन को बता रहे थे, लेकिन भूल गए कि यही सरकार देश के किसानों को भूलकर दाल उत्पादन के लिए विदेश के किसानों पर इनवेस्ट कर रही है. जिन किसानों ने आत्महत्याएँ की उनपर किसी भी तरह का ज़िक्र तक नहीं किया. सरकार की किसी भी अन्य योजना जो किसान हित में है, नहीं गिनाई. सिचाईं, माइक्रो एग्रीकल्चर, जल संरक्षण पर बल दे रहे थे, लेकिन बिल्कुल भी ध्यान नहीं रहा कि इस बार पूरे देश में सूखे से क्या हाल हुआ था? खाद के उत्पादन पर भी दावे बिल्कुल ग़लत थे. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना पर भी हवा ही भरते नज़र आए. बस बिजली, सौंचालय पर तो उनके दावे कुछ हद तक ठीक थे, लेकिन उसपर भी बिजली की मंहगाई पर क्या किया. सौर्य उर्जा पर तो बहुत क्रेडिट लिया लेकिन देश के कई राज्य, उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश इसमें बहुत आगे है. सायिल हेल्थ कार्ड पर बोलते हुए बहुत क्रांतिकारी हो गए और एल पीजी कनेक्शन पर 3-4 बार घुमा घुमा कर बोल रहे थे. डाक घरों को पुनर्जीवित करने के लिए बोलते बोलते एकदम फिल्मी हो गए और कहने लगे ग़रीब डाकिए को पूरा देश प्यार करता है. वो बहुत सीधा आदमी होता है. न्याय को लेकर  केवल एक बात ही कही क़ि हमने 15-16 सौ बेकार पड़े क़ानूनो को ख़त्म करने का आदेश दिया है, अरे वो तो जाने कब से संविधान कमेटी की सिफारिशों के कारण ख़त्म होने के लिए आगे भेजे जा चुके थे. क्या केवल इससे ही न्याय मिल जाएगा आम आदमी को? फास्ट ट्रैक कोर्ट, पुलिस सुधार, जाँच की क्वालिटी, इंटेलीजेंस फ्रीडम पर एक भी शब्द नहीं बोला क्योंकि इन राजनैतिक दलों के हथियार जो होते हैं ये सब अपने खिलाफ बोलने वालों के लिए. तभी तो चीफ़ जस्टिस ऑफ इंडिया ने जमकर हमला बोला सरकार पर. आधार कार्ड पर इतना क्रेडिट ले गए कि बस सब जगह काला बाज़ारी बंद होकर राम राज्य आ गया है. जहाँ जहाँ आधार कार्ड कनेक्ट किया गया अभी तक समस्याएँ ही मिली हैं. राजस्थान की पीडीएस मशीन में यही हुआ है. लोगों के अंगूठे के निशान नहीं मिलते हैं तो बेचारे बूढ़े ग़रीब बिना राशन के मार रहे हैं. बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और महिला शशक्तिकरण पर बहुत क्रांतिकारी ढंग से बोलते हुए दिखे, लेकिन यह नहीं समझ में आया कि वो इसपर ज़मीनी स्तर पर क्या करते हुए दिखाई देता है. छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश राज्य महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों में सबसे ऊपर के 10 राज्यों में आते हैं, लेकिन केंद्र सरकार इसपर राज्यों पर कोई दबाव नहीं डालती दिखती है. बाकी राज्यों की भी यही व्यवस्था है, लेकिन खुद तो सबसे अलग हैं. यहाँ तक की बाबा रामदेव के पुत्र उत्पन्न बीजक दवा पर कोई कारवाई तक नहीं की. यही दावे पहले 60 सालों से होते आए हैं. सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लड़ने के लिए बात तो करते हैं लेकिन खुद के ही नेताओं पर लगाम नहीं लगा पाते हैं. ऊना की घटना पर वो तब बोले जब गौरक्षकों ने जमकर हंगामा किया. पूरा देश दलित क्रांति में आ गया. जगह जगह आंदोलन होने लगा. पहले मुस्लिमों पर जब हमले हो रहे थे, तब नहीं बोले लेकिन जब दलितों पर आत्याचार की बात खुलकर सामने आई तो दलितों के वोट बैंक के खिसकने के डर से बोल बैठे.अंत होते होते मेरे ओफिस के जूनियर्स भाषण से बोर हो चुके थे, और पीछे से हंस रहे थे, जबकि खुद नेता भी सो रहे थे. बोले कि अगर अपने काम गिनाने लगा तो एक हफ़्ता लग जाएगा. मैं हंसा खूब इस जोक पर कि इतना पकाया और भी एक हफ्ते का दम रखते हैं? सही है उनके पास बोलने के लिए कुछ भी नहीं था............ इसलिए ही 1.5 घंटे बोले.

Sunday, August 7, 2016

जीएसटी के मायने

पिछले बुधवार को इस सरकार का सबसे अधिक प्रतीक्षित और अर्थव्यवस्था को लेकर बहुत संभावित बिल पास हुआ. इस बिल को लेकर मैं तो बहुत उत्साहित था, एक एकाउंटैंट और क़ानून का छात्र होने के नाते. ऊपर से घोर राजनीतिक प्राणी. इसलिए मैं इस बिल को 1 साल से कवर कर रहा था जब से  सरकार ने इस बिल पर चर्चा शुरू की थी तब से. बुधवार को पूरा दिन मैने राज्यसभा की चर्चा सुनी. इसके बाद घर जाकर 4-5 टीवी बहस के प्रोग्राम देखे. हमेशा की तरह एनडीटीवी वाले रवीश कुमार के शो के बाद एक राय बन पाई. फिर भी मैने इसपर बहुत सी रिसर्च की अपने सीनियर एकाउंटैंट और सीए से चर्चा की और इंडियन एक्सप्रेस से लेकर दैनिक जागरण तक के लेख पढ़े. राज्य सभा की वेबसाइट से बिल की कॉपी भी पढ़ने को मिली, जिसे पूरा नहीं पढ़ सका. इसी आधार पर जो समझ या जान सका लिख रहा हूँ. इस बिल पर राज्य सभा में और बाहर भी सभी दल एकजुट दिखे. ख़ासकर कांग्रेस और भाजपा की तो आर्थिक नीति में कुछ फ़र्क ही नहीं दिखा. कभी भी ऐसा नहीं देखने को मिला होगा जब अरुण जेटली (वित्तमंत्री) और पूर्व वित्तमंत्री कांग्रेस नेता पी चिदंबरम एक जैसा ही बोलते हुए दिखे. जीएसटी को जीडीपी बढ़ाने, रोज़गार बढ़ाने और ग़रीबी दूर करने के पैकेज के रूप में पेश किया गया. जबकि ऐसा उदाहरण किसी भी ने नहीं दिया कि फलाना देश में जीएसटी लागू हुआ है और वहाँ इतनी आर्थिक क्रांति आ गई है. एक बात चर्चा में बहुत रही कि भारत में जीएसटी बहुत देरी से लागू हो रहा है. लेकिन रवीश कुमार को पढ़ते हुए पाया कि ऑस्ट्रेलिया में 1975 से चर्चा शुरू हुई और लागू हुआ सन 2000 में. वहां भी कांग्रेस-बीजेपी की तरह लेबर और कंज़र्वेटिव पार्टी अपना स्टैंड बदलते रहे. कंज़र्वेटिव पार्टी ने तो मेनिफेस्टो से जीएसटी निकाल दिया था, लेकिन सत्ता में आने के बाद लागू करने में ही जुट गई. भारत जिस जीएसटी को ऐतिहासिक बता रहा है, वह सबसे पहले फ्रांस में 1954 में लागू हुआ था. इसी अप्रैल में मलेशिया ने जीएसटी लागू किया है. न्यूज़ीलैंड का जीएसटी दुनियाभर में बेहतरीन माना जाता है, वहां 1986 में लागू हुआ. 1991 में कनाडा और दक्षिण अफ्रीका में लागू हो चुका है. 140 से ज़्यादा देश जीएसटी लागू कर चुके हैं. अमेरिका में जीएसटी नहीं है.हम तो इतना भी बात कर लेते हैं. लेकिन भारत की 40% जनसख्या तो जान ही नहीं पाएगी क़ि जीएसटी है कौन सी बला? जो लोग सोसाल मीडिया में एक्टिव हैं उनको "एक देश एक टैक्स" जैसे इमोशनल नारों के साथ राष्ट्रवाद की भट्टी में खड़ा कर दिया जाएगा. मैं इसके मतलब और इतिहास पर बात करते हुए कुछ लिखना चाहता हूँ. यह उपभोग या सेवा कर कहा जा सकता है. जिसका भुगतान अंतिम व्यक्ति करता है जो उसका प्रयोग करेगा या उस सेवा को लेगा. यह 1950 के दशक में पहली बार दुनियाँ में इनकम टैक्स के विकल्प के रूप में आया. कई देशों का पढ़कर तो लगा कि जीएसटी केवल बड़े बड़े कॉरपोरेटर्स के लिए है. मतलब जो अधिक कमाता है वो टैक्स कम दे, और जो उपभोक्ता, आम आदमी और छोटे उद्योगों वाला आदमी है वो एक टैक्स एक देश के नाम पर अधिक टैक्स दे? यह तो त्रिकल डाउन थ्योरी के तरीके से हो गया. सरकार कहते नहीं तक रही है कि जीएसटी लागू हो जाने से टैक्स की मार कम हो जाएगी. मतलब 25-30% से घटकर सीधे 18-20% हो जाएगा. अब यह बात नहीं समझ में आती है क़ि फिर सरकार यह कैसे कह रही है कि जीएसटी आने से 1.5 से 2% तक जीडीपी बढ़ जाएगा. ऐसा कैसे हो सकता है, दोनो बातें विरोधाभाषी हैं. जीडीपी तो तब बढ़ेगा जब रेवेन्यू कलेक्शन ज़्यादा होगा? रेवेन्यू कलेक्शन तभी बढ़ेगा जब टैक्स अधिक लिया जाएगा, तो फिर कैसे कहा जा रहा है कि देश पर टैक्स की मार कम पड़ेगी? मतलब साफ है कि सिर्फ़ और सिर्फ़ बड़े कॉरपोरेटर्स को टैक्स कम पड़ेगा, जनता से ही अधिक वसूली कर जीडीपी बढ़ाया जाएगा. सरकार की मंशा इस बात से भी पता चलती है कि संसद में नेता बड़ी आसानी से कहते रहे क़ि 3 साल के लिए मंहगाई बढ़ेगी. क्या मंहगाई कहकर आएगी कि मैं तीन साल ही रहूंगी. कब मंहगाई कम हुई है? ऐसा किसी देश की अर्थ व्यवस्था में हुआ हो तो बताया जाए? 
न्यूज़ीलैंड का जीएसटी सर्वोत्तम श्रेणी का माना जाता है. यहां पर किसी भी उत्पाद को जीएसटी के दायरे से बाहर नहीं रखा गया है. जीएसटी की दर एक है और सब पर लागू है. भारत की तरह तीन प्रकार की जीएसटी नहीं है. हो सकता है ऐसा इसलिए भी हो क्योंकि वहाँ की अर्थ व्यवस्था को भारत के जैसे विविधता और राज्यों की असमानता का सामना नहीं करना पड़ता है. जैसे भारत में शराब, तंबाकू और पेट्रोल को जीएसटी से बाहर रखा गया है. ऑस्ट्रेलिया की तरह भारत में शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी सेवाओं को बाहर नहीं रखा गया है. जीएसटी का समान टैक्स लागू होने से सर्विस टैक्स बढ़ेगा और स्वास्थ्य और शिक्षा और महंगे हो जाएंगे.
जहां भी जीएसटी लागू हुआ है, वहां कुछ साल तो एक टैक्स होता है, मगर उसके बाद बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू होती है. न्यूज़ीलैंड में जीएसटी 1986 में 10 फीसदी था, पहले 12.5 फीसदी बढ़ा और फिर 15 फीसदी हो गया. ऑस्ट्रेलिया में सन 2000 से 10 फीसदी है और वहां खूब बहस चल रही है कि इसे बढ़ाकर 15 फीसदी या उससे भी अधिक 19 फीसदी किया जाए. ब्रिटेन ने हाल ही में जीएसटी की दर बढ़ाकर 20 फीसदी कर दी है. एक दो और भी  इंटरनैशनल सर्वे के आँकड़ों में पता चलता है क़ि प्रत्येक देश में 2-2.5% तक जीएसटी बढ़ाया गया है. आख़िर यह बढ़ाने की ज़रूरत क्यों पड़ती है? जितना मुझे समझा उसके आधार पर बता रहा हूँ कि जीएसटी के नाम पर कॉरपोरेट टैक्स कम किया जाता है. अमीर लोगों के इन्कम टैक्स कम होते हैं. सरकार को कम राजस्व मिलता है. इसे छिपाने के लिए सरकार बताने लगती है कि कुल राजस्व में जीएसटी की भागीदारी बहुत कम है, इसलिए जीएसटी की दर बढ़ाई जा रही है. आस्ट्रेलिया, इंग्लैंड सहित कई देशों में देखने को मिला कि कुल रेवेन्यू का 20-25% या अधिकतम 40% हिस्सा ही जीएसटी में कॉरपोरेट सेक्टर से मिल पाता है. इसीलिए भारत में कांग्रेस कह रही है कि 18 फीसदी अधिकतम टैक्स का प्रावधान संविधान में जोड़ा जाए. मोदी सरकार इसलिए जोड़ने से मुकर रही है कि दुनिया में जहां भी जीएसटी लागू हुआ है, वहां कुछ साल के बाद जीएसटी बढ़ाने की नौबत आई है. हर जगह यह बात आई कि जीएसटी से ग़रीबों पर मार पड़ती है. न्यूज़ीलैंड ने इसका उपाय यह निकाला है कि वह ग़रीबों को कई तरह की आर्थिक मदद देता है. डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के ज़रिये भारत में भी इसकी वकालत हो रही है. मगर आप देखेंगे कि कई जगहों पर इस इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम के नाम पर बड़ी संख्या में ग़रीबों को अलग भी किया जा रहा है. न्यूज़ीलैंड में जीएसटी को समझने वालों का कहना है कि इसकी कामयाबी तभी है, जब राजनीतिक दबाव में किसी आइटम को जीएसटी से बाहर नहीं किया जाए. जब हर चीज़ पर टैक्स लगाएंगे, तभी ज़्यादा राजस्व आएगा. भारत के जीएसटी में मुझे सबसे खराब बात यह भी लगी क़ि पेट्रोलियम (जिसपर 50% से भी अधिक टैक्स लिया जाता है), लक्जरी आइटम, शराब तंबाकू आदि (जिनपर 30% से अधिक टैक्स लिया जाता है) इस सबको जीएसटी से बाहर क्यों रखा है? ध्यान देने वाली बात छोटे उद्योगों वाली भी हैं कि अभी वैट की लिमिटि 5-10 लाख तक हर राज्य में है. दूसरी तरफ एक्साइज की लिमिट 1.5 करोड़ तक है, ऐसे में दोनो टैक्स को क्लम्ब (मिलाकर) करके लिमिट 10-15 लाख तक ही कर दी जाएगी. इसलिए वैट वालों को तो कोई फायदा नहीं ऊपर से एक्साइज वाले जो 1.5 करोड़ से कम का बिजनेस कर रहे थे वो भी उसके अंदर आ गए. 
ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और न्यूज़ीलैंड के बारे में मैंने पढ़ा कि वहां पर जीएसटी लागू होने के साथ साथ इन्कम टैक्स में भी कमी की गई है, ताकि सामान्य आयकर दाता चीज़ों के दाम बढ़ने का झटका बर्दाश्त कर सके. भारत में आयकर में कटौती की कोई चर्चा तक नहीं कर रहा है. उल्टे वित्तमंत्री पिछले दो बजट से कॉरपोरेट टैक्स घटाने का ही ऐलान किए जा रहे हैं. तो क्या यह जीएसटी बड़े कॉरपोरेट और उच्च वर्गों को लाभ पहुंचाने के लिए आ रहा है. अब बहस यह चल रही है कि जीएसटी के दायरे से कुछ भी बाहर न हो, जैसा न्यूज़ीलैंड ने किया है.
ऑस्ट्रेलिया में एक अध्ययन यह भी हुआ कि जीएसटी लागू होने से वहां के छोटे उद्योगों पर क्या असर पड़ा है. पाया गया है कि शुरुआती दौर में जीएसटी लागू कराने के लिए सॉफ्टवेयर, कम्प्यूटर, खाता-बही विशेषज्ञ इन सब पर खर्चा काफी बढ़ गया, लेकिन बाद में उन्हें लाभ हुआ है. ज़ाहिर है जीएसटी से बिजनेस की प्रक्रिया सरल होती है. यह बिजनेस के लिए ज़रूरी है, मगर इससे आम आदमी का जीवन आसान नहीं होता, ग़रीबी दूर नहीं होती, बल्कि इन सबके नाम पर बड़े बिजनेस को बड़ा पैकेज मिलता है. ये नेता यह क्यों नहीं कहते हैं क़ि जीएसटी कॉरपोरेट या बड़े बिजनेसमैन के लिए है, वो यही क्यों कहते रहते हैं क़ि आम आदमी को बहुत फायदा होने वाला है? क्योंकि आम आदमी से ही वोट लेने हैं.  हर दल ने समर्थन किया क्योंकि सबको डर है कि अगर कॉरपोरेट का फायदा नहीं हुआ तो उनकी राजनीतिक दुकानों को डोनेशन कहाँ से मिलेगा? मैं भी टैक्स सिस्टम को समझने लगा हूँ और कॉरपोरेट सेक्टर में टैक्स का क्या आधार होता है वो पता है एक एकाउंटैंट के रूप में मैं कह सकता हूँ कि कॉरपोरेट और हमारा काम काफ़ी सरल हो जाएगा. लेकिन मैं आम आदमी की तरफ इसलिए बोल रहा हूँ क्योंकि मैं आम आदमी हूँ, मेरे माँ-बाप आम आदमी हैं, मैं राजनीति समझ रखने वाला इंसान भी हूँ, समाजवादी विचारधारा का हूँ इसलिए मेरा ज़ोर अंतिम इंसान के फाफदे की तरफ है. 

Monday, August 1, 2016

कश्मीर पर टिप्पणी

इतने दिनों से चल रहा है लेकिन मैं कश्मीर के बारे में कुछ नहीं लिख रहा था। इतने गंभीर मामले पर जल्दबाजी में क्या लिख दूं? लेकिन आज यह तस्वीर भी फेसबुक पर ही कहीं से मिल गई तो रहा नहीं गया। शायद कश्मीर के लोग और सेना इतना नफरत नहीं करते हैं एक दूसरे से, जितना इन नेताओं ने नफरत पैदा कर दी है। या फिर टीआरपी वाली मीडिया के लिए जरूरी है। आप कश्मीर के इतिहास को देखिए, हमेशा सूफीवाद के साथ मिलकर रहे हैं लोग। लेकिन थोडी सी सम्प्रदायिक चिंगारी को आग में अमन और चैन के दुश्मन बदल देते हैं। यह चिंगारी हमारी सामाजिक असफलता की वजह से निकल कर बाहर आती है। युवाओं को भडकाकर हथियार के रूप में प्रयोग करने के लिए अलगाववादी बैठे हुए हैं, कभी कश्मीर में, तो कभी छत्तीसगढ के दंतेवाडा में। हमारी खास कर बहुसंख्यक समाज की सामाजिक जिम्मेदारी है कि हम अपने अल्पसंख्यकों के साथ सौतेला व्यवहार न करें, जिससे वे गलत रास्ते पर भटक कर न जाने पाए। चाहे वह मुसलिम, ईसाई या फिर दलित समुदाय हो। बहुसंख्यक समाज को समझने की जरूरत है कि हमेशा बडे भाई के कर्तव्य अधिक होते हैं इसलिए छोटी मोटी बातों को अनसुना करके बदले की भावना से काम नहीं करना चाहिए। कहीं न कहीं कश्मीरी पंडितों के पलायन के कारण पर समाधान के बजाए हर दल ने राजनीतिक तौर पर इसे जिंदा रखा। कुछ लोगों कहीं के मुददे कहीं खडे किए, अयोध्या के मुददे पर वहां और  370 पर यूपी में राजनीति हुई। यही कारण है कुछ खराब लोग आम जनता से लोगों को भडकाकर कर ट्रेनिंग कैंप ले गए। 1990 के दशक में तो कुछ नहीं था? यही वह समय था जब देश में सम्प्रदायिक राजनीति पहली बार चरम पर पहुंच गई थी। मंडल कमीशन के बाद आरक्षण तो कभी बाबरी विध्वंस के दंगे। तब तक न मुस्लिम आतंकवाद था न कभी पलायन। कभी दंगों की आग जली तो कभी बम धमाके। फिर कभी अलगाववादियों ने खूब नरसंहार किया। फिर कभी अफास्पा कानून का का गलत इस्तेमाल तो कभी वहाँ के लोगों से पत्थरबाजी फिर जवाब में सेना की गोलियां। और हाँ ये जो दल, नेता और राष्ट्रवाद के नमूने पत्रकार सोसल मीडिया पर सेना सेना किया करते हैं ये सब सेना के दुश्मन हैं। इनको सेना की शहादत पर तिरंगा लगाकर पाकिस्तान की मां *** आता है बस। इनकी देशभक्ति यहां से समाप्त। किसी में दम नहीं है कि सेना के जिंदा जवानों के अधिकारों के लिए  सरकार से सवाल पूछ सकते। वन रैंक वन पेंशन के लिए आंदोलन में कितने सैनिक मरे? अबतक लड रहे हैं लेकिन कोई नहीं बोला। सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करके एक झुनझुना थमा दिया गया। मात्र 18 हजार रुपये सैलरी मिलती है, क्या हमारा देश उन्हें 50  हजार रुपये सैलरी नहीं दे सकता है? क्यों नहीं ये शिक्षित राष्ट्रवादी युवा ये सवाल करते हैं कि सेना के उस जवान के बच्चे अच्छे स्कूलों में नहीं पढ पाते हैं। 20 साल की नौकरी में 10-12 साल तो उस कर्ज को चुकाने में बीत जाते हैं जो उसकी नौकरी के समय मां बाप ने इन नेताओं तक जाने वाली रिश्वत के खातिर लिया था। जब मैं ये सवाल करता हूं तो आप मुझे राष्ट्रद्रोही या पाकिस्तान चले जाओ कह देते हैं। लेकिन जब जब ये नफरत के सौदागर दो समुदायों को लडाने के लिए ललकारेंगे, चित्कारेंगे तब तब मैं उन समुदायों को आपस में गले मिलने के लिए पुकारते हुए पाएंगे। आप इसे कुछ भी कह सकते हैं, लेकिन मैं इसे आंधियों के बीच खडा रहना कहता हूँ।
सेना के नाम पे भी हमें राष्ट्रवाद नाम की पट्टी पढाई जाती है पर उनकी बुनयादी जरुरतो पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता, अगली बार जब आप को सेना के नाम पर ललकारे तो इसे याद करना, और कभी दिल्ली आ के संसद के आस-पास नेताओ के घर के बाहर देखना दो कौड़ी के नेता अंदर AC रूम मैं बैठ के खाना खाते है और हमारे जवान उनके गेट के बहार सड़क पे बैठ के खाते है.

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...