Thursday, August 25, 2016

मोहन भागवत के बयान के मायने

मोदीजी के गुरू जी कहते हैं कि महिलाओं को बच्चे पैदा करने चाहिए। उन्हें क्या पता स्त्री होना क्या होता है? वो क्या जाने मातृत्व का दर्द? अगर एक स्त्री 10 बच्चे पैदा करेगी तो उसकी जिंदगी के कम से कम 10 साल तो गए? और हर साल बच्चा पैदा कर सके यह संभव नहीं है। जिस औरत की शादी 24-25 साल में हो गई उसकी जिंदगी के 40 साल तक वो बच्चे ही पैदा करेगी। फिर उनको संभालना मुश्किल होगा? मतलब स्त्री की पूरी जिंदगी घर में कैद कर दिया? वो खुद के लिए कुछ कर नहीं सकती है? ये पुरुषवादी समाज का घिनौना चेहरा है। इन्ही आरएसएस के गुरु गोलवलकर कहते थे कि स्त्री को वोट देने का अधिकार मत दिया जाए। इसके पहले भी यही मोमोहन भागवत कह चुके हैं कि जो स्त्री घर के काम न करे उसको तलाक दे देना चाहिए?
अच्छा हुआ कि अंबेडकर कानून बनाकर गए नहीं तो कोई इनके जैसा बनाता तो स्त्रियों को कोई अधिकार नहीं होता। न वोट देने का। न बराबर चलने का और न खुद से शादी करने का। आज जो ट्रेन, बस से लेकर पंचायत, स्कूल काॅलेज और सरकारी नौकरी में जो आरक्षण मिलता है स्त्रियों को वो अंबेडकर की ही देन है। जब वो हिन्दू कोड बिल संसद में पेश कर रहे थे तो इन लोगों ने खूब विरोध किया और अंबेडकर ने स्तीफा दे दिया। अगर वो कानून होता तो औरतें बहुत आगे होती। उन्हें बराबर की संपत्ति का अधिकार होता।
एक बार शिवसेना के कोई नेता बोले कि रेप तो जींस पहनने के कारण होता है। कोई मौलवी साहब ने कहा कि रेप मोबाइल के कारण होता है? अजीब गधे भरे हुए हैं देश में। मेरे ऑफिस में एक दिन सब लोग मुझे बता रहे थे कि कहीं 2 साल की लडकी के साथ दुष्कर्म किया गया? कोई बताए कि उसने क्या पहना था? और कौन सा मोबाइल लिए थी वो मासूम। मैं लिखते हुए सुबकने लगा आज कि मैं क्या कर सकता हूं इस र्निर्दयी समाज के लिए? जब कुछ बात करो तो कोई खुद को बडा समझदार मानने वाला मूर्ख मजाक उडाने लगता है कि "बडे आए गांधी जी।" जब उनपर आ जाए तो पता चले? खैर भगवान न करे किसी के साथ ऐसा हो।
आज बात चांद पर जाने की हो रही है और हमारे देश में ऐसी बातें? अभी अभी मैटरनिटी लीव को बढाया गया है समाजिक कार्यकर्ताओं की लंबी कानूनी लडाई के बाद। हम तो कहते हैं कि चाइना की तरह महिलाओं को हर महीने पीरियड्स के समय सरकारी या प्राइवेट जाॅब में छुट्टी मिलनी चाहिए। उन्हें रसोई से लेकर मंदिर तक में जाने की आजादी होनी चाहिए। कोई अपवित्र नहीं होता है? यह सब हमारे समाज में ढोंग फैलाया गया है। उन्हें भगवान ने बनाया है हम पुरूषों से अलग बनाया है इसका मतलब है कि वो अधिक सहनशील हैं। वो दर्द और असहजता हम झेल नहीं सकते हैं। एक औरत को मां बनते समय 20 हड्डी टूटने के बराबर दर्द सहना पडता है, उसके बाद उसकी देखभाल से लेकर दूध पिलाने तक क्या क्या कष्ट होते हैं हम सोच भी नहीं सकते। जब पूछो बच्चे किसके हैं? बाप के  नाम से बताते हैं? अगर कभी बच्चा बिगड जाए तो माँ बदनाम कि माँ ने गलत शिक्षा दी बाप फिर भी सेफ।
किसी औरत के नाम पर कोई संपत्ति नहीं होती है बडे लोग कुछ खरीद भी देते हैं तो टैक्स या सरकार के कानून में छूट के लिए।
बेटियों की शादी में ही 50% ऊर्जा खर्च कर रहे हैं लोग जबकि ऐसा शुरुआत किसने की? निश्चय तौर पर पुरुष समाज ने। मैं गूगल पर देख रहा था कि शीर्ष 10 देश जहाँ पर लडकियों की संख्या सबसे कम है, सबसे ऊपर ओमान और भारत नवें नंबर पर है, पाकिस्तान इसमें 40 के पार है मतलब हम बेटी बचाओ अभियान में उससे भी बहुत पीछे हैं। डर लगता है कि कोई देशद्रोही न कह दे पाकिस्तान को आगे बताने पर लेकिन यह हकीकत है। सैराट फिल्म के बाद मैंने लिखा था कि लडकी आजादी से बुलट तब तक ही चला सकती है जबतक वो खुद के फैसले न ले सके। मुंह न खोले किसी को जवाब न दे। जिस दिन यह हुआ उस दिन से उसकी आजादी भाड में गई। औरत को हमारे समाज में फ्रेम में सजा कर रखने का चलन है, यह सोच उन राजा महाराजाओं से आई जो युद्ध में स्त्री मांगते थे, अय्याशी के लिए 4-5 शादी करते थे सबके सब। वैसे ही आज नारी पहले बेटी, बहन, पत्नी, माँ, सास, दादी के फ्रेम में सेट होती जाती है वो खुद कब होती है? अगर लडका भागकर शादी करे तो कुछ नहीं लडकी करे तो इज्जत गई? जो लोग ऐसा कहते हैं वो केवल दूसरों पर अंगुली उठा सकते हैं बस। और क्या क्या सहे लडकी?  एक कपल में प्यार हुआ, लडके की गांव भर में तारीफ और लडकी चरित्रहीन? ये कौन सा चश्मा है भाई? शादी के बाद भी औरत औरत की दुश्मन। ननद से लेकर सास तक के ताने। एक दो साल फैमिली प्लानिंग कर ली तो सवाल कि बांझ है। अगर जल्दी हो जाए तो भी चुप चुपकर बातें। क्यों? सवाल बहुत से हैं जिसपर समाज से लेकर सरकार तक सामना नहीं कर सकते हैं। मैं अपनी बात खत्म करते हुए बस इतना ही कहना चाहता हूं कि उसे आजादी से जीने दो। मैं कहने का दम रखता हूं, कि मुझे अगर कभी कोई अपने बच्चे के लिए कोई पूछे तो लडकी को गोद लूं। अगर खुद की भी हो तो उसे सब आजादी दूंगा, सब मतलब सब? शादी की भी। इसलिए आप भी औरत को माल या आइटम जैसे बाजारू शब्दों से मुक्त करो। और हाँ देवी तो बिल्कुल भी मत बनाओ, उसे खुद जीने दो बस। क्योंकि आज अपने पैरों पर खडा होने से कुछ नहीं होगा, पैरों पर खडा होकर ओलंपिक से लेकर हर रेश में पुरुषों से कंपटीशन करके जीतना भी है।

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