Tuesday, August 16, 2016

गुजरात की राजनीति में उभरे तीन युवा नेता

गुजरात को राजनीतिक तौर पर मैं बहुत अधिक नहीं जानता हूँ. क्योंकि राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन के तौर पर वहाँ की जनता निर्बल या कहें कोमा मे चली गई थी. कोई भी नेता नहीं उभर पाया महात्मा गाँधी के बाद. मुझे तो ऐसा शुरू शुरू में तो मुझे लगा कि शायद वहाँ सामाजिक समस्याएँ होंगी ही नहीं. लेकिन जब हार्दिक पटेल का आरक्षण को लेकर बड़ा आंदोलन हुआ तो पोल खुलनी शुरू हुई और मैने राजनीतिक तौर पर इसको परखना शुरू किया. वो एक साल पहले का दौर था जब लोग अपनी समस्याओं का पहली बार गुजराती या हिंदू अस्मिता से उपर उठकर प्रदर्शन कर रहे थे. शायद यह मोदी जी के पीएम बनने पर अत्यधिक महत्वाकांक्षा की भी बात हो? उस आंदोलन की प्रमुख बात यह थी कि लोग आरक्षण के लिए बात कर रहे थे, साथ ही साथ आरक्षण के खिलाफ भी बोल रहे थे. अपने हक का विरोध होते देख पिछड़ा वर्ग से एक नेता आया जिसका नाम था अल्पेश ठाकोर. ओबीसी वर्ग से खूब समर्थन मिला. अब तक जिस गुजरात में युवा राजनीति को देखते ही नहीं थे, या फिर वोट के नाम पर दो दशक से एक ही दल या नेता को हिंदुत्व के नाम पर वोट दे रहे थे, वहाँ दो युवा अपने अपने समुदायों से जनाधार वाले नेता बनकर उभर चुके थे. ऐसे में केवल दलित समुदाय ही पीछे रहा. फिर गुजरात के ऊना एक बड़ी घटना हुई जिसने पूरे देश के दलित समुदाय को हिला कर रख दिया. इस घटना का समय भी कुछ अलग था. इस घटना के कुछ दिन पहले ही दलितों  ने बहुत बड़ी रैली की थी मुंबई के दादर में जिसको मैने कवर किया था. वो रैली अंबेडकर भवन के तोड़ने पर हुई थी. इसमें बहुत दूर दूर से दलित शामिल होने आए थे, महाराष्ट्र में बहुत दिनों बाद बाबा साहब के नाम पर काम करने वाले दलितों ने बिना किसी नेता के यह एकता दिखाई थी. फिर ऊना की घटना पर भी यही दलित एक साथ मुंबई में रैली करने आए. इसके साथ ही साथ उत्तर प्रदेश में मायावती पर भाजपा के नेता की टिप्पणी जिससे उत्तर प्रदेश का दलित समाज उबाल में आ गया. पंजाब से लेकर, महाराष्ट्र और गुजरात तक में बसपा कार्यकर्ताओं ने दलितों में एकता लाकर दोनों घटनाओं को एक साथ जोड़कर खूब आंदोलन किया. जबकि गुजरात में दलित आह्वान पर जो रैली हुई वो ऐतिहासिक थी. गुजरात में दलितों ने बहुत बड़ी रैली का आयोजन किया जिसके दूसरे दिन ही वहाँ की राजनीति पलट गई. मुख्यमंत्री आनन्दी बेन पटेल को इस्तीफ़ा देना पड़ा. फिर शुरू की गई दलित अस्मिता यात्रा जो कुछ दिन में ही ख़त्म हो गई लेकिन 15 अगस्त को गुजरात में इसकी फिर से बड़ी रैली देखने को मिली जिसने भाजपा कांग्रेस सबकी नींदें उड़कर रख दी. गुजरात के इस पूरे दलित आंदोलन के सूत्रधार थे युवा नेता जिग्नेश मेवानी. राजनीतिक तौर पर ये आम आदमी पार्टी से जुड़े हुए हैं, लेकिन इस पूरे आंदोलन में कभी भी यह नहीं देखने को मिला कि कभी भी उन्होने आम आदमी पार्टी या किसी अन्य नेता का समर्थन लिया हो. यह रैलियाँ लोगों के चंदे से हो रही थी. जिग्नेश दलित हीरो बनकर उभरे. यह गुजरात का वर्तमान समय का तीसरा बड़ा सामाजिक आंदोलन से निकला नेता है. कल मैं जिग्नेश के भाषण सुन रहा था और उसके बारे में पता कर रहा था. तो पता चला कि वो शारीरिक तौर पर बहुत कमजोर है, लेकिन इस आंदोलन ने वो बहुत मजबूत युवा नेता बनकर उभरे. उसको गुजरात के दलितों और मुस्लिमों का खूब समर्थन मिला. मैंने जिस जिस जिस आंदोलन का नाम लिया उन सबमें जेएनयू अध्यक्ष कन्हैया कुमार शामिल था. कन्हैया ने जेल से आने के बाद पूरे देश में आंदोलनों में हिस्सा लिया.  रोहित वेमूला की माँ के साथ हैदराबाद यूनिवर्सिटी से लेकर केरल, महाराष्ट्र, गुजरात, यूपी और बिहार तक. उन्होंने अपनी राजनीति में एक चीज़ प्रमुखता से रखी है कि सबको दलित और महिलाओं के नाम पर एकता में बाँधा है. कहीं से भी सेकूलरिज़्म या मुस्लिमों के नाम पर खुलकर सामने नहीं आए. उन्होने खुद को आगे ना करके हर जगह और समाज से कुछ नेता निकाले. वैसे गुजरात का यह दूसरा रूप था, जो मेरे ही नहीं पूरे राजनीतिक जगत के लिए अलग था. अब देखते हैं आने वाले चुनावों में ये आंदोलन क्या सत्ता परिवर्तन कर पाएँगे. या कोई नई राजनीतिक शक्ति उभरकर सामने आएगी. इसमें आम आदमी पार्टी ने अपने लिए सपने देखने शुरू कर दिए हैं. लेकिन दुविधा उनके गुजरात प्रभारी आशुतोष के बयानों से ही हो जाती है. वो हार्दिक पटेल को अपने साथ रखना चाहते हैं. दूसरी तरफ जिग्नेश मेवानी को अपना नेता मानते हैं. जबकि जिग्नेश मेवानी ने तो आम आदमी पार्टी के बिना यह आंदोलन किया है. सामाजिक परिस्थितियों में दोनों को एक साथ रख पाना बहुत मुस्किल है.   

No comments:

Post a Comment

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...