Monday, August 15, 2016

लाल किले से मोदी जी 2016

सुबह से ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भाषण सुन रहा था. एक राजनैतिक प्राणी होने के नाते उनके भाषण का विश्लेषण करते समय एक बात सबसे प्रमुख समझ में आई कि वो हमेशा की तरह बहुत लंबा बोले, अर्थात ज़्यादा कुछ बोलने के लिए था नहीं. वो बार बार जन धन योजना, सड़क, नरेगा, फ्री बीमा और डिजिटल इंडिया पर बोलते रहे, उन्हीं बातों में वो खींच पर बोलने की कोशिश करते रहे. आप संसद में वित्तमंत्रियों या लाल किले पर ही मनमोहन सिंह के भाषण से तुलना करने जाएँगे, तो लगेगा कि मोदी जी रिथा कर बोल रहे थे. मतलब किसी मैच को ड्रा करवाने के लिए स्लो स्लो खेल रहे थे. इसके चक्कर में वो राज्य सरकारों की कई योजनाओं पर क्रेडिट ले गये. वो किसानों की तारीफ़ करते हुए कुछ ज़्यादा ही भावुक होते नज़र आए. दालों की बुआई में किसानों के प्रोत्साहन को बता रहे थे, लेकिन भूल गए कि यही सरकार देश के किसानों को भूलकर दाल उत्पादन के लिए विदेश के किसानों पर इनवेस्ट कर रही है. जिन किसानों ने आत्महत्याएँ की उनपर किसी भी तरह का ज़िक्र तक नहीं किया. सरकार की किसी भी अन्य योजना जो किसान हित में है, नहीं गिनाई. सिचाईं, माइक्रो एग्रीकल्चर, जल संरक्षण पर बल दे रहे थे, लेकिन बिल्कुल भी ध्यान नहीं रहा कि इस बार पूरे देश में सूखे से क्या हाल हुआ था? खाद के उत्पादन पर भी दावे बिल्कुल ग़लत थे. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना पर भी हवा ही भरते नज़र आए. बस बिजली, सौंचालय पर तो उनके दावे कुछ हद तक ठीक थे, लेकिन उसपर भी बिजली की मंहगाई पर क्या किया. सौर्य उर्जा पर तो बहुत क्रेडिट लिया लेकिन देश के कई राज्य, उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश इसमें बहुत आगे है. सायिल हेल्थ कार्ड पर बोलते हुए बहुत क्रांतिकारी हो गए और एल पीजी कनेक्शन पर 3-4 बार घुमा घुमा कर बोल रहे थे. डाक घरों को पुनर्जीवित करने के लिए बोलते बोलते एकदम फिल्मी हो गए और कहने लगे ग़रीब डाकिए को पूरा देश प्यार करता है. वो बहुत सीधा आदमी होता है. न्याय को लेकर  केवल एक बात ही कही क़ि हमने 15-16 सौ बेकार पड़े क़ानूनो को ख़त्म करने का आदेश दिया है, अरे वो तो जाने कब से संविधान कमेटी की सिफारिशों के कारण ख़त्म होने के लिए आगे भेजे जा चुके थे. क्या केवल इससे ही न्याय मिल जाएगा आम आदमी को? फास्ट ट्रैक कोर्ट, पुलिस सुधार, जाँच की क्वालिटी, इंटेलीजेंस फ्रीडम पर एक भी शब्द नहीं बोला क्योंकि इन राजनैतिक दलों के हथियार जो होते हैं ये सब अपने खिलाफ बोलने वालों के लिए. तभी तो चीफ़ जस्टिस ऑफ इंडिया ने जमकर हमला बोला सरकार पर. आधार कार्ड पर इतना क्रेडिट ले गए कि बस सब जगह काला बाज़ारी बंद होकर राम राज्य आ गया है. जहाँ जहाँ आधार कार्ड कनेक्ट किया गया अभी तक समस्याएँ ही मिली हैं. राजस्थान की पीडीएस मशीन में यही हुआ है. लोगों के अंगूठे के निशान नहीं मिलते हैं तो बेचारे बूढ़े ग़रीब बिना राशन के मार रहे हैं. बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और महिला शशक्तिकरण पर बहुत क्रांतिकारी ढंग से बोलते हुए दिखे, लेकिन यह नहीं समझ में आया कि वो इसपर ज़मीनी स्तर पर क्या करते हुए दिखाई देता है. छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश राज्य महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों में सबसे ऊपर के 10 राज्यों में आते हैं, लेकिन केंद्र सरकार इसपर राज्यों पर कोई दबाव नहीं डालती दिखती है. बाकी राज्यों की भी यही व्यवस्था है, लेकिन खुद तो सबसे अलग हैं. यहाँ तक की बाबा रामदेव के पुत्र उत्पन्न बीजक दवा पर कोई कारवाई तक नहीं की. यही दावे पहले 60 सालों से होते आए हैं. सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लड़ने के लिए बात तो करते हैं लेकिन खुद के ही नेताओं पर लगाम नहीं लगा पाते हैं. ऊना की घटना पर वो तब बोले जब गौरक्षकों ने जमकर हंगामा किया. पूरा देश दलित क्रांति में आ गया. जगह जगह आंदोलन होने लगा. पहले मुस्लिमों पर जब हमले हो रहे थे, तब नहीं बोले लेकिन जब दलितों पर आत्याचार की बात खुलकर सामने आई तो दलितों के वोट बैंक के खिसकने के डर से बोल बैठे.अंत होते होते मेरे ओफिस के जूनियर्स भाषण से बोर हो चुके थे, और पीछे से हंस रहे थे, जबकि खुद नेता भी सो रहे थे. बोले कि अगर अपने काम गिनाने लगा तो एक हफ़्ता लग जाएगा. मैं हंसा खूब इस जोक पर कि इतना पकाया और भी एक हफ्ते का दम रखते हैं? सही है उनके पास बोलने के लिए कुछ भी नहीं था............ इसलिए ही 1.5 घंटे बोले.

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