पिछले बुधवार को इस सरकार का सबसे अधिक प्रतीक्षित और अर्थव्यवस्था को लेकर बहुत संभावित बिल पास हुआ. इस बिल को लेकर मैं तो बहुत उत्साहित था, एक एकाउंटैंट और क़ानून का छात्र होने के नाते. ऊपर से घोर राजनीतिक प्राणी. इसलिए मैं इस बिल को 1 साल से कवर कर रहा था जब से सरकार ने इस बिल पर चर्चा शुरू की थी तब से. बुधवार को पूरा दिन मैने राज्यसभा की चर्चा सुनी. इसके बाद घर जाकर 4-5 टीवी बहस के प्रोग्राम देखे. हमेशा की तरह एनडीटीवी वाले रवीश कुमार के शो के बाद एक राय बन पाई. फिर भी मैने इसपर बहुत सी रिसर्च की अपने सीनियर एकाउंटैंट और सीए से चर्चा की और इंडियन एक्सप्रेस से लेकर दैनिक जागरण तक के लेख पढ़े. राज्य सभा की वेबसाइट से बिल की कॉपी भी पढ़ने को मिली, जिसे पूरा नहीं पढ़ सका. इसी आधार पर जो समझ या जान सका लिख रहा हूँ. इस बिल पर राज्य सभा में और बाहर भी सभी दल एकजुट दिखे. ख़ासकर कांग्रेस और भाजपा की तो आर्थिक नीति में कुछ फ़र्क ही नहीं दिखा. कभी भी ऐसा नहीं देखने को मिला होगा जब अरुण जेटली (वित्तमंत्री) और पूर्व वित्तमंत्री कांग्रेस नेता पी चिदंबरम एक जैसा ही बोलते हुए दिखे. जीएसटी को जीडीपी बढ़ाने, रोज़गार बढ़ाने और ग़रीबी दूर करने के पैकेज के रूप में पेश किया गया. जबकि ऐसा उदाहरण किसी भी ने नहीं दिया कि फलाना देश में जीएसटी लागू हुआ है और वहाँ इतनी आर्थिक क्रांति आ गई है. एक बात चर्चा में बहुत रही कि भारत में जीएसटी बहुत देरी से लागू हो रहा है. लेकिन रवीश कुमार को पढ़ते हुए पाया कि ऑस्ट्रेलिया में 1975 से चर्चा शुरू हुई और लागू हुआ सन 2000 में. वहां भी कांग्रेस-बीजेपी की तरह लेबर और कंज़र्वेटिव पार्टी अपना स्टैंड बदलते रहे. कंज़र्वेटिव पार्टी ने तो मेनिफेस्टो से जीएसटी निकाल दिया था, लेकिन सत्ता में आने के बाद लागू करने में ही जुट गई. भारत जिस जीएसटी को ऐतिहासिक बता रहा है, वह सबसे पहले फ्रांस में 1954 में लागू हुआ था. इसी अप्रैल में मलेशिया ने जीएसटी लागू किया है. न्यूज़ीलैंड का जीएसटी दुनियाभर में बेहतरीन माना जाता है, वहां 1986 में लागू हुआ. 1991 में कनाडा और दक्षिण अफ्रीका में लागू हो चुका है. 140 से ज़्यादा देश जीएसटी लागू कर चुके हैं. अमेरिका में जीएसटी नहीं है.हम तो इतना भी बात कर लेते हैं. लेकिन भारत की 40% जनसख्या तो जान ही नहीं पाएगी क़ि जीएसटी है कौन सी बला? जो लोग सोसाल मीडिया में एक्टिव हैं उनको "एक देश एक टैक्स" जैसे इमोशनल नारों के साथ राष्ट्रवाद की भट्टी में खड़ा कर दिया जाएगा. मैं इसके मतलब और इतिहास पर बात करते हुए कुछ लिखना चाहता हूँ. यह उपभोग या सेवा कर कहा जा सकता है. जिसका भुगतान अंतिम व्यक्ति करता है जो उसका प्रयोग करेगा या उस सेवा को लेगा. यह 1950 के दशक में पहली बार दुनियाँ में इनकम टैक्स के विकल्प के रूप में आया. कई देशों का पढ़कर तो लगा कि जीएसटी केवल बड़े बड़े कॉरपोरेटर्स के लिए है. मतलब जो अधिक कमाता है वो टैक्स कम दे, और जो उपभोक्ता, आम आदमी और छोटे उद्योगों वाला आदमी है वो एक टैक्स एक देश के नाम पर अधिक टैक्स दे? यह तो त्रिकल डाउन थ्योरी के तरीके से हो गया. सरकार कहते नहीं तक रही है कि जीएसटी लागू हो जाने से टैक्स की मार कम हो जाएगी. मतलब 25-30% से घटकर सीधे 18-20% हो जाएगा. अब यह बात नहीं समझ में आती है क़ि फिर सरकार यह कैसे कह रही है कि जीएसटी आने से 1.5 से 2% तक जीडीपी बढ़ जाएगा. ऐसा कैसे हो सकता है, दोनो बातें विरोधाभाषी हैं. जीडीपी तो तब बढ़ेगा जब रेवेन्यू कलेक्शन ज़्यादा होगा? रेवेन्यू कलेक्शन तभी बढ़ेगा जब टैक्स अधिक लिया जाएगा, तो फिर कैसे कहा जा रहा है कि देश पर टैक्स की मार कम पड़ेगी? मतलब साफ है कि सिर्फ़ और सिर्फ़ बड़े कॉरपोरेटर्स को टैक्स कम पड़ेगा, जनता से ही अधिक वसूली कर जीडीपी बढ़ाया जाएगा. सरकार की मंशा इस बात से भी पता चलती है कि संसद में नेता बड़ी आसानी से कहते रहे क़ि 3 साल के लिए मंहगाई बढ़ेगी. क्या मंहगाई कहकर आएगी कि मैं तीन साल ही रहूंगी. कब मंहगाई कम हुई है? ऐसा किसी देश की अर्थ व्यवस्था में हुआ हो तो बताया जाए?
न्यूज़ीलैंड का जीएसटी सर्वोत्तम श्रेणी का माना जाता है. यहां पर किसी भी उत्पाद को जीएसटी के दायरे से बाहर नहीं रखा गया है. जीएसटी की दर एक है और सब पर लागू है. भारत की तरह तीन प्रकार की जीएसटी नहीं है. हो सकता है ऐसा इसलिए भी हो क्योंकि वहाँ की अर्थ व्यवस्था को भारत के जैसे विविधता और राज्यों की असमानता का सामना नहीं करना पड़ता है. जैसे भारत में शराब, तंबाकू और पेट्रोल को जीएसटी से बाहर रखा गया है. ऑस्ट्रेलिया की तरह भारत में शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी सेवाओं को बाहर नहीं रखा गया है. जीएसटी का समान टैक्स लागू होने से सर्विस टैक्स बढ़ेगा और स्वास्थ्य और शिक्षा और महंगे हो जाएंगे.
जहां भी जीएसटी लागू हुआ है, वहां कुछ साल तो एक टैक्स होता है, मगर उसके बाद बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू होती है. न्यूज़ीलैंड में जीएसटी 1986 में 10 फीसदी था, पहले 12.5 फीसदी बढ़ा और फिर 15 फीसदी हो गया. ऑस्ट्रेलिया में सन 2000 से 10 फीसदी है और वहां खूब बहस चल रही है कि इसे बढ़ाकर 15 फीसदी या उससे भी अधिक 19 फीसदी किया जाए. ब्रिटेन ने हाल ही में जीएसटी की दर बढ़ाकर 20 फीसदी कर दी है. एक दो और भी इंटरनैशनल सर्वे के आँकड़ों में पता चलता है क़ि प्रत्येक देश में 2-2.5% तक जीएसटी बढ़ाया गया है. आख़िर यह बढ़ाने की ज़रूरत क्यों पड़ती है? जितना मुझे समझा उसके आधार पर बता रहा हूँ कि जीएसटी के नाम पर कॉरपोरेट टैक्स कम किया जाता है. अमीर लोगों के इन्कम टैक्स कम होते हैं. सरकार को कम राजस्व मिलता है. इसे छिपाने के लिए सरकार बताने लगती है कि कुल राजस्व में जीएसटी की भागीदारी बहुत कम है, इसलिए जीएसटी की दर बढ़ाई जा रही है. आस्ट्रेलिया, इंग्लैंड सहित कई देशों में देखने को मिला कि कुल रेवेन्यू का 20-25% या अधिकतम 40% हिस्सा ही जीएसटी में कॉरपोरेट सेक्टर से मिल पाता है. इसीलिए भारत में कांग्रेस कह रही है कि 18 फीसदी अधिकतम टैक्स का प्रावधान संविधान में जोड़ा जाए. मोदी सरकार इसलिए जोड़ने से मुकर रही है कि दुनिया में जहां भी जीएसटी लागू हुआ है, वहां कुछ साल के बाद जीएसटी बढ़ाने की नौबत आई है. हर जगह यह बात आई कि जीएसटी से ग़रीबों पर मार पड़ती है. न्यूज़ीलैंड ने इसका उपाय यह निकाला है कि वह ग़रीबों को कई तरह की आर्थिक मदद देता है. डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के ज़रिये भारत में भी इसकी वकालत हो रही है. मगर आप देखेंगे कि कई जगहों पर इस इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम के नाम पर बड़ी संख्या में ग़रीबों को अलग भी किया जा रहा है. न्यूज़ीलैंड में जीएसटी को समझने वालों का कहना है कि इसकी कामयाबी तभी है, जब राजनीतिक दबाव में किसी आइटम को जीएसटी से बाहर नहीं किया जाए. जब हर चीज़ पर टैक्स लगाएंगे, तभी ज़्यादा राजस्व आएगा. भारत के जीएसटी में मुझे सबसे खराब बात यह भी लगी क़ि पेट्रोलियम (जिसपर 50% से भी अधिक टैक्स लिया जाता है), लक्जरी आइटम, शराब तंबाकू आदि (जिनपर 30% से अधिक टैक्स लिया जाता है) इस सबको जीएसटी से बाहर क्यों रखा है? ध्यान देने वाली बात छोटे उद्योगों वाली भी हैं कि अभी वैट की लिमिटि 5-10 लाख तक हर राज्य में है. दूसरी तरफ एक्साइज की लिमिट 1.5 करोड़ तक है, ऐसे में दोनो टैक्स को क्लम्ब (मिलाकर) करके लिमिट 10-15 लाख तक ही कर दी जाएगी. इसलिए वैट वालों को तो कोई फायदा नहीं ऊपर से एक्साइज वाले जो 1.5 करोड़ से कम का बिजनेस कर रहे थे वो भी उसके अंदर आ गए.
ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और न्यूज़ीलैंड के बारे में मैंने पढ़ा कि वहां पर जीएसटी लागू होने के साथ साथ इन्कम टैक्स में भी कमी की गई है, ताकि सामान्य आयकर दाता चीज़ों के दाम बढ़ने का झटका बर्दाश्त कर सके. भारत में आयकर में कटौती की कोई चर्चा तक नहीं कर रहा है. उल्टे वित्तमंत्री पिछले दो बजट से कॉरपोरेट टैक्स घटाने का ही ऐलान किए जा रहे हैं. तो क्या यह जीएसटी बड़े कॉरपोरेट और उच्च वर्गों को लाभ पहुंचाने के लिए आ रहा है. अब बहस यह चल रही है कि जीएसटी के दायरे से कुछ भी बाहर न हो, जैसा न्यूज़ीलैंड ने किया है.
ऑस्ट्रेलिया में एक अध्ययन यह भी हुआ कि जीएसटी लागू होने से वहां के छोटे उद्योगों पर क्या असर पड़ा है. पाया गया है कि शुरुआती दौर में जीएसटी लागू कराने के लिए सॉफ्टवेयर, कम्प्यूटर, खाता-बही विशेषज्ञ इन सब पर खर्चा काफी बढ़ गया, लेकिन बाद में उन्हें लाभ हुआ है. ज़ाहिर है जीएसटी से बिजनेस की प्रक्रिया सरल होती है. यह बिजनेस के लिए ज़रूरी है, मगर इससे आम आदमी का जीवन आसान नहीं होता, ग़रीबी दूर नहीं होती, बल्कि इन सबके नाम पर बड़े बिजनेस को बड़ा पैकेज मिलता है. ये नेता यह क्यों नहीं कहते हैं क़ि जीएसटी कॉरपोरेट या बड़े बिजनेसमैन के लिए है, वो यही क्यों कहते रहते हैं क़ि आम आदमी को बहुत फायदा होने वाला है? क्योंकि आम आदमी से ही वोट लेने हैं. हर दल ने समर्थन किया क्योंकि सबको डर है कि अगर कॉरपोरेट का फायदा नहीं हुआ तो उनकी राजनीतिक दुकानों को डोनेशन कहाँ से मिलेगा? मैं भी टैक्स सिस्टम को समझने लगा हूँ और कॉरपोरेट सेक्टर में टैक्स का क्या आधार होता है वो पता है एक एकाउंटैंट के रूप में मैं कह सकता हूँ कि कॉरपोरेट और हमारा काम काफ़ी सरल हो जाएगा. लेकिन मैं आम आदमी की तरफ इसलिए बोल रहा हूँ क्योंकि मैं आम आदमी हूँ, मेरे माँ-बाप आम आदमी हैं, मैं राजनीति समझ रखने वाला इंसान भी हूँ, समाजवादी विचारधारा का हूँ इसलिए मेरा ज़ोर अंतिम इंसान के फाफदे की तरफ है.
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