आज नौ बजते ही मैं रो पडा यह सुनकर कि एक इंसान को अपनी पत्नी के शव को 12 किलोमीटर दूर तक कंधे पर लादकर गया। पैसे न होने की वजह से अस्पताल की एंबुलेंस नहीं मिली। लोग देखते रहे किसी ने मदद नहीं की। दरअसल वो एक लाश लेकर खडी हुई कई लाशों के बीच से होकर गुजर रहा था। कैसा समाज? कैसी इंसानियत? कैसे लोग? हम और आप सब उसमें शामिल हैं, सोचो किसी को कुछ हो जाए तो हम या तो फोटो खींचेगे या फिर मुंह फेर कर निकल जाएगे। शर्मनाक है यह। माझी से हमें दशरथ माझी भी याद आ गया. वही दशरथ माझी जिसने अपनी पत्नी का इलाज नहीं होने देने के लिए दोषी पहाड़ को काटकर गिरा दिया था, बिना किसी सरकार के, बिना किसी स्मार्ट योजना के. उसने अपने हौसले से पहाड़ को मनुष्य की शक्ति का बोध कराया था. दोनों माझी में एक बात यह साझी है कि दोनों अपने-अपने प्रेम में कितने कोमल और अपने निश्चयों के धनी हैं. दाना माझी क्या सोच रहे होंगे... अमंग देई के शव को कंधों पर लादे हुए! कंधे पर अमंग को लेकर चलते हुए उसे क्या कुछ याद आ रहा होगा? उसके साथ दौड़ रही बेटी के आंसू और पत्नी का शव मिलकर दाना की मनोस्थिति को कितना व्याकुल कर रहे होंगे. उसे शायद प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के सपने और भाषण भी याद आ रहे होंगे. उसे लोकतंत्र की उन रस्मों की याद नहीं आ रही होगी.दाना को ओडिशा सरकार की उस योजना की भी याद आई होगी, जिसे नवीन पटनायक सरकार ने फरवरी में शुरू किया था.. ‘महापरायण’ योजना. जिसके तहत शव को सरकारी अस्पताल से मृतक के घर तक पहुंचाने के लिए मुफ्त परिवहन की सुविधा दी जाती है. तो यह दाना को क्यों नहीं मिली. क्या यह योजना उस जिला मुख्यालय के अस्पताल तक पहुंचने से पहले विकलांग हो गई, जहां टीबी से अमंग की मौत हुई. माझी ने बहुत कोशिश की लेकिन इस देश में सब कुछ आपकी हैसियत से तय होता है. यहां तक कि निजी अस्पताल में आपका इलाज भी. की विवशता हम कैसे लिख सकते हैं. माझी को मदद उसी मीडिया से मिली जो इन दिनों सबके निशाने पर है. जब उन्हें अस्पताल के अधिकारियों से किसी तरह की मदद नहीं मिली तो उन्होंने पत्नी के शव को एक कपड़े में लपेटा और कंधे पर लादकर भवानी पटना से करीब 60 किलोमीटर दूर रामपुर ब्लॉक के मेलघारा गांव के लिए पैदल चलना शुरू कर दिया. इसके बाद कुछ स्थानीय संवाददाताओं ने उन्हें देखा. जिला कलेक्टर को फोन किया और फिर शेष 50 किलोमीटर की यात्रा के लिए एक एम्बुलेंस की व्यवस्था की गई. दाना डर गया होगा कि कहीं उसकी प्रिय अमंग देई का शव अंतिम विदा से पहले सड़ न जाए. उसके जीते जी भले कोई नागरिक अधिकार नसीब न हुए हो, लेकिन कम से कम मरने के बाद तो सम्मानजनक अंतिम विदाई दी जाए. इस नाते मुझे दो माझी एक जैसे लग रहे हैं. दोनों सरकार से लड़े, अपनी जिद पर जिए. दोनों की पत्नी व्यवस्था से हारीं.साउथ सूडान में जब इमरजेंसी थी तो केविन कार्टर की खींची हुई यह तस्वीर आज ताजा हो जाती है, जिसमें एक बच्चा और गिद्ध बैठा है। यहां के राष्ट्रवादी मीडिया के लिए लाश लादे हुए तस्वीर तो टीआरपी के लिए अच्छी है, लेकिन जब उसके बुनियादी स्वास्थय के सवालों पर चर्चा होगी तो बोरिंग हो जाएगा सब।
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