Tuesday, April 30, 2019

योगी जी की सवर्ण मानसिकता बाहर आई

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने एक भाषण में कहा कि ‘संविधान नहीं होता तो अखिलेश यादव सैफई के किसी जमींदार के घर की भैंस चरा रहे होते.’ कुछ समय पहले केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के बारे में केरल में भाजपा के एक मुखपत्र में कार्टून छपा कि विजयन को राजनीति छोड़ कर अपना पुश्तैनी पेशा यानी ताड़ी उतारना शुरू कर देना चाहिए!
इससे पहले अन्ना आंदोलन के दौरान एक मंचीय कवि और कथित राजनीतिक ने कहा था कि ‘जिन्हें भैंस चराना चाहिए था, वे राज चलाने लगे हैं.’ जाहिर है, निशाने पर लालू प्रसाद थे। दिवंगत कर्पूरी ठाकुर जब बिहार के मुख्यमंत्री थे और उन्होंने बिहार में ओबीसी के लिए आरक्षण लागू किया था तब सवर्णों ने उनके लिए नारा प्रचारित किया था- ‘कर कर्पूरी कर पूरा, गद्दी छोड़ धर उस्तरा’…
मायावती के मुख्यमंत्री बन जाने के बाद भी उनकी जाति को लेकर क्या टिप्पणियां की गई थीं, यह छिपा नहीं रहा। इस तरह के जहरीले बयानों की एक लंबी सूची बन सकती है. इसके अलावा कि आज भी रोजमर्रा की जिंदगी में आम दलित-वंचित तबकों के लोगों को इसी तरह के अपमानजनक और कमतर करने वाली बातें अलग-अलग शक्ल में सुनने को मिलती हैं। जिस दौर में भारत और इसके सत्ताधारी तबके देश की ‘आसमानी कामयाबियों’ का हवाला पेश कर रहे हैं, उसी दौर में दलित-पिछड़ी जातियों की पृष्ठभूमि से आने वाले लोकप्रिय नेताओं के लिए इस तरह की बातें अगर आम हैं तो यह समझना मुश्किल नहीं है कि आज भी सत्ताधारी सवर्ण जातियों के कई लोगों के मन में किस तरह की सामंती ग्रंथियां गहरे पैठ की हुई हैं। आखिर दलित-पिछड़ी जातियों के किसी व्यक्ति के सत्ता में आ जाने के बाद उन्हें अपमानित करने या कमतर साबित करने के लिए उनकी जाति और उनके जातिगत पेशे का ही हवाला क्यों दिया जाता है! क्या इसके उलट कभी किसी ब्राह्मण नेता या मुख्यमंत्री को किसी ने कहा कभी कि ‘जिन्हें भिक्षा मांगना चाहिए था… जिन्हें पूजा-पाठ कराना चाहिए था, वे राज चलाने लगे हैं’?
शायद ऐसा किसी ने नहीं कहा हो! नहीं कहने की वजह भी है कि इस देश में सामाजिक हो या राजनीतिक या फिर आर्थिक या धार्मिक सत्ता, उस पर सवर्णों या ब्राह्मणों का स्वाभाविक अधिकार माना जाता है. इसलिए विधायक, सांसद, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री होने को इन जातियों के लिए एक सहज राजनीतिक आचरण के रूप में देखा जाता है. सवाल है कि जब दलित-पिछड़ों के जीवन को उनके जातिगत पेशों से जोड़ कर पेश किया जाता है और अलग-अलग शक्लों में उन्हें हिदायत के लहजे में अपने जातिगत पेशों के दायरे में रहने को कहा जाता है तो उसके पीछे मंशा और मकसद क्या होता है?
सच यह है कि इस समाज में जाति और उनके साथ पेशे या काम तक को इस कदर श्रेणीबद्ध कर दिया गया है कि काम को भी उच्च या निम्न दर्जे में बांट कर देखा जाता है. काम के प्रति नजरिये का यह विभाजन केवल बाहरी नहीं होता, बल्कि इसका मनोवैज्ञानिक असर काफी गहरा होता है. एक ऐसा काम, जो उपयोगिता के लिहाज से समूचे समाज के लिए बेहद अहम होता है, उस काम को करने वाले लोगों को कमतर और हेय नजर से देखा जाता है.
लेकिन सवाल है कि समाज में मौजूद यह ‘नजर’ किसने तय की है?
आखिर मांग कर गुजारा करने वाले दो समूहों के लोगों के बारे समाज का नजरिया दो क्यों होता है? दिनभर मेहनत करके अपनी मजदूरी मांगने वाले के प्रति क्या लोग वही भाव रखते हैं, जो आधा घंटा कोई कथा पढ़ कर ‘दक्षिणा’ मांगने वाले के प्रति होता है? फटा-पुराना ही सही, शरीर पर पूरा कपड़ा पहने एक गरीब व्यक्ति जब किसी व्यक्ति से भीख के रूप में कुछ मांगता है तो उस पर दया करके कुछ देने के साथ ही उसके प्रति असम्मान की भावना और इसके बरक्स कंधे पर जनेऊ लटकाए एक पुरोहित जब किसी से कुछ मांगता है तो उसके प्रति सम्मान और उलटे उससे कृपा या दयाभाव प्राप्त करने की भावना का स्रोत क्या है? जाति और कर्म के विभाजन के बारे में बाबा साहेब और महात्मा फुले ने अपने साहित्य में विस्तार से लिखा है।
इसी तरह हिंदू समाज में अलग-अलग जातियों और पारंपरिक रूप से उनके पेशों के प्रति ‘बेहतर’ या ‘कमतर’ दृष्टि निर्धारित है! लेकिन यह ध्यान रखने की जरूरत है कि 21वीं सदी और इस बदलते दौर में व्यवसाय और उसमें मुनाफे को ध्यान में रख कर अगर किसी उच्च कही जाने वाली जाति के व्यक्ति ने किसी निम्न कही जाने वाली जाति के पारंपरिक पेशे को अपना कारोबार बनाया, तो उस उच्च जाति के व्यक्ति के प्रति समाज के नजरिये में कोई फर्क नहीं पड़ता।
यानी वह काम के आधार पर किसी उच्च जाति के बारे में अपनी ‘दृष्टि’ को संचालित नहीं करता. मसलन, शहरों-महानगरों में बाल काटने, दाढ़ी साफ करने यानी हेयर पार्लर के महंगी दुकानों शायद ही किसी नाई जाति से आने वाले व्यक्ति हो, लेकिन सामाजिक वर्णक्रम में नाई जाति की जो ‘निम्न’ हैसियत है, वह यही काम ‘उच्च और आभिजात्य स्तर पर’ करने वाले किसी ब्राह्मण या राजपूत या भूमिहार जाति के व्यक्ति की नहीं मान ली जाएगी. चमड़े के जूते या अन्य सामान, फूलों के कारोबार और यहां तक कि बीफ के निर्यात जैसे व्यवसाय में लगे हुए किसी उच्च जाति के व्यक्ति के प्रति सामाजिक नजरिया ‘निम्न’ नहीं होता।
साफ है कि यह ‘दृष्टि’ या भाव काम के प्रति नहीं है, बल्कि इसलिए है कि उससे कोई खास जाति जुड़ी हुई है. फिर वह काम भी हेय मान लिया गया।
वर्णक्रम और जाति की हाइरार्की के मुताबिक संबोधन की भाषा और उसमें निहित अपमान या कमतर करने का भाव दरअसल वह मनोवैज्ञानिक हथियार है, जिससे किसी व्यक्ति या समूह के मनोबल को कमजोर बनाए रखा जाता है. तो ऐसा लगता है कि अपनी समूची परिकल्पना में एक बेहद पिछड़ी हुई, असभ्य और अमानवीय व्यवस्था होने के बावजूद ब्राह्मणवाद अपने व्यवहार में मानो एक बारीक मनोवैज्ञानिक सूत्र के सहारे काम करता है।
पारलौकिक भ्रम और आस्था के जाल में फंसा कर एक समूचे समाज को आत्मविश्वास से हीन और अंधविश्वास में डुबोए रखना और फिर उस अंधविश्वास के उपचार के लिए कुछ चुनी हुई जातियों और लोगों को सामने रख देना. इसके समांतर सामाजिक व्यवहार के लिए संबोधन की भाषा रच देना।
लेकिन अब इस रवायत के बरक्स चुनौती खड़ी हो रही है, ऐसी भाषा पकड़ी जाती है, उस पर बात होती है, बोलने वाले को कठघरे में खड़ा किया जाता है और किसी तरह का अपमान बर्दाश्त नहीं करने की बात साफ लहजे में कही जाती है. यह स्थिति ब्राह्मणवाद और उसके पैरोकारों के लिए चिंता पैदा करने वाली है. इसलिए मौजूदा दौर में देखा जा सकता है कि सामाजिक, राजनीतिक और नीतिगत स्तर पर हर तरफ से ऐसे फैसले किए जा रहे हैं, जिनके जरिए दलित-वंचित जातियों-तबकों के बीच तेजी से पसरती चेतना की लड़ाई को बाधित किया जा सके. लेकिन समाज में आगे की ओर बढ़ने वाले इस सफर में वापसी का रास्ता नहीं है।

Monday, April 29, 2019

राजस्थान में कहाँ खडी है भाजपा

राजस्थान भाजपा के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है कि 2014 में भाजपा की सफलता का दर यहां 100 प्रतिशत थी। राजस्थान भाजपा के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है कि 2014 में भाजपा की सफलता की दर यहां 100 प्रतिशत थी। पार्टी ने उस समय राज्य की सारी 25 सीटें जीत ली थीं जबकि कांग्रेस राज्य में शून्य पर आ गई थी। लेकिन अब पार्टी के लिए इस सफलता को बनाए रखना काफी मुश्किल है। राज्य में बीजेपी के पास कुछ ठोस मुद्दा नहीं दिखाई देता, लिहाजा पार्टी राष्ट्रवाद की भावनाओं के बल पर ही चुनाव जीतना चाहती है। बहरहाल, बीजेपी की लहर यहां धीरे-धीरे कमजोर पड़ती गई। 2018 की शुरुआत में 2 लोकसभा सीटों अजमेर और अलवर में उपचुनाव हुए। ये दोनों सीट भाजपा के पास थी। दोनों सीट भाजपा हार गई। कांग्रेस ने दोनों सीटों पर जोरदार जीत हासिल की। 2018 के अंत में राज्य में विधानसभा चुनाव हुए। कांग्रेस ने भाजपा से सत्ता छीन ली। हालांकि विधानसभा चुनाव में जिस सफलता की उम्मीद कांग्रेस लगाई बैठी थी, वो सफलता नहीं मिली, जिस तरह से राज्य और केंद्र की भाजपा सरकार के बीच राजस्थान में असंतोष था वो वोट में तब्दील नहीं पाया।
बहरहाल, विधानसभा चुनाव से ठीक पहले अंदाज लगाया गया था कि कांग्रेस विधानसभा की 200 में से 130 के करीब सीटें जीत लेगी। लेकिन चुनाव परिणामों में कांग्रेस को सिर्फ 99 सीटें हाथ आईं। वहीं भाजपा ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया। भाजपा को 73 सीटें मिली। छोटी पार्टियों और निर्दलीय ने भी ताकत दिखाई। 13 निर्दलीय जीते। 2014 में लोकसभा चुनावों से पहले 2013 के विधानसभा चुनावों में राजस्थान में भाजपा की लहर थी। भाजपा को 200 में से 162 सीटें आईं थी। कांग्रेस 21 पर सिमट गई थी। यह लहर 2014 में बरकरार थी। लेकिन 2018 में कांग्रेस के सता में आने के बाद ठीक उसी तरह का लाभ 2019 में कांग्रेस को मिलेगा, इस पर शंका है। लेकिन उम्मीद जताई जा रही है कि भाजपा को राजस्थान में 10 सीटें गंवानी पड़ सकती है। इन परिस्थितियों में नुकसान भाजपा को ही है। 
दरअसल, सारे राजनीतिक विश्लेषकों का तर्क है कि किसी भी पार्टी के लिए 100 प्रतिशत स्ट्राइक रेट को बरकरार कठिन है। बीते कुछ महीनों में अशोक गहलोत सरकार के कुछ फैसलों ने कांग्रेस का ग्राफ बढ़ाया है। इसमें किसानों की ऋण माफी शामिल है। भाजपा की चिंता यह है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को राजस्थान में 55 प्रतिशत मत मिले थे, लेकिन 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का मत प्रतिशत 38.8 प्रतिशत रह गए। उधर कांग्रेस का मत प्रतिशत 2014 के लोकसभा चुनावों के 30 प्रतिशत के मुकाबले 2018 के विधानसभा चुनाव में 39.3 प्रतिशत हो गया। भाजपा की कोशिश है कि किसी तरह से 2018 के विधानसभा में मिले मत प्रतिशत में सुधार किया जाए। ताकि भाजपा 18-20 सीट जीतने में कामयाब हो जाए। यही कारण है कि भाजपा ने जाट नेता हनुमान बेनीवाल के लिए नागौर सीट छोड़ी है। गुर्जर नेता किरोड़ी सिंह बैंसला को भाजपा में शामिल करवाया है, लेकिन राहुल गांधी के किसान ऋण माफी और गरीब परिवारों के 72 हजार रुपये सलाना आर्थिक सहायता की घोषणा ने भाजपा के नाक में दम कर दिया है। राजस्थान की चुनावी रैलियों में दो बातें उभरकर आई हैं। राहुल गांधी मुद्दों पर चुनाव लड़ रहे है। नरेंद्र मोदी इमोशंस पर वोट पाने की स्थिति में दिख रहे हैं। राजस्थान में अबतक चार रैलियां भाजपा के स्टार प्रचारक और पीएम नरेंद्र मोदी ने की है। चार रैली राहुल गांधी ने की। मोदी ने उदयपुर, जोधपुर, बाड़मेर और चितौड़गढ़ में पार्टी का ही यशोगान किया। राहुल गांधी ने बांसवाड़ा, कोटा, अजमेर, में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, गरीबी, नोटबंदी, किसानों की खराब हालत की बात की। पश्चिम राजस्थान में पानी का गंभीर संकट है। वहीं पूरे राजस्थान में किसान संकट में है। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के कार्यकाल में किसान आंदोलन भी हुए। भाजपा को इसका खामियाजा भी विधानसभा चुनावों में भुगतना प़ड़ा। राज्य में बेरोजगारी मुख्य मुद्दा है यही वजह है कि गुर्जर जाति के नेता लंबे समय तक आरक्षण के मुददे पर  आंदोलन करते रहे।  स्थानीय पत्रकारों के अनुसार अगर जनता को 72 हजार रुपये सलाना देने की बात नीचे तक लोगों को समझ में आ गई तो राजस्थान मे भारी उलटफेर हो सकता है, क्योंकि फिलहाल भाजपा ने कांग्रेस पर बढ़त बना रखी है। राजस्थान उन राज्यों में से एक है जहां कांग्रेस और भाजपा में सीधी टक्कर है। हाल ही में विधानसभा चुनावों में हार ने भाजपा को बैचेन कर दिया, इसलिए छोटे-छोटे दलों को भी भाजपा साध रही है। हनुमान बेनीवाल को भाजपा ने अपने साथ लिया और उन्हें नागौर सीट दे दी, लेकिन दोनों दलों में गुटबाजी भी है। राजस्थान में दोनों पार्टियां राहुल और मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ रही हैं। भाजपा के अंदर वसुंधरा राजे सिंधिया का महत्व घटा है, उनके तमाम विरोध के बावजूद जयपुर की राजकुमारी दीया को राजसमंद से भाजपा ने टिकट दिया।
वसुंधरा प्रधानमंत्री की एक रैली को छोड़ बाकी रैलियों में नजर भी नहीं आईं। लोकसभा चुनाव सीधे अमित शाह के नियंत्रण में हो रहा है। विधानसभा चुनावों में वसुंधरा की टिकट बंटवारे में चली। लेकिन लोकसभा में वसुंधरा विरोधी भी टिकट पाने में कामयाब हो गए।
उधर गुटबाजी कांग्रेस में भी है। अशोक गहलोत सचिन पायलट के बीच सबकुछ पहले जैसा नहीं है। जानकार बताते हैं कि सचिव पायलट ने काफी चालाकी से अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत को जोधपुर से चुनाव में उतरवा दिया। अशोक गहलोत अपने बेटे के लिए  सिरोही से टिकट चाहते थे। लेकिन सचिन पायलट का तर्क था कि अशोक गहलोत राज्य के बड़े नाम हैं। जोधपुर सीट पर मजबूत उम्मीदवार चाहिए, इसलिए वैभव ठीक रहेंगे।
अशोक गहलोत को मजबूरी में वैभव को जोधपुर से उतारना प़ड़ा। जोधपुर से केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत चुनाव मैदान में हैं लिहाजा वैभव की जीत आसान नहीं होगी।  गजेंद्र सिंह शेखावत स्वजातीय वोटों समेत दूसरी जाति के वोट भी ले रहे हैं। अगर वैभव की हार होती है तो सचिन पायलट का कद कांग्रेस में और बढ़ेगा, क्योंकि वैभव की हार अशोक गहलोत के कद को कम करेगी। आपको बता दें कि मुख्यमंत्री पद को लेकर पायलट औऱ गहलोत के बीच जोरदार टकराव की बात किसी से छिपी नहीं है।  
अशोक गहलोत, राहुल गांधी, सचिन पायलट की तिकड़ी से कांग्रेस को आस है।
विधानसभा चुनाव में हार के बाद भाजपा का अहंकार टूटा लिहाजा लोकसभा चुनाव में इज्जत बचाने के लिए राजस्थान में भाजपा ने छोटे दलों और नेताओं को अपने साथ लिया है। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के हनुमान बेनीवाल के लिए भाजपा ने नागौर सीट छोड़ दी है। बेनीवाल पहले भाजपा से विधायक थे। 2013 में निर्दलीय जीते। फिर नई पार्टी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी बना ली। अब फिर भाजपा से गठबंधन कर लिया।
हनुमान बेनीवाल जाट हैं। राजस्थान में जाटों का वोट महत्वपूर्ण है। जाट परंपरागत रूप से कांग्रेस के साथ ऱहे हैं। बेनीवाल नागौर में कांग्रेस उम्मीदवार ज्योति मिर्धा से टकरा रहे हैं। यही नहीं भाजपा ने अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए गुर्जर नेता किरोडी बैंसलां को भी भाजपा में शामिल कर लिया। बैंसला लगातार गुर्जर आरक्षण को लेकर रेल पटरियों को जाम करने के लिए मशहूर रहे हैं। उधर, मेवाड़ और मारवाड़ इलाके में भारतीय ट्राइबल पार्टी भी अपनी उपस्थिति दिखा रही है। जोधपुर, बांसवाड़ा, उदयपुर, राजसमंद लोकसभा क्षेत्र में बीटीपी के उम्मीदवार मैदान में हैं। बीटीपी आदिवासी अधिकारों की बात करती है, भाजपा, कांग्रेस को आदिवासियों का दुश्मन बताती है। बीते विधानसभा चुनावों में इस दल के दो विधायक राजस्थान विधानसभा में जीतकर पहुंचे है। वहीं सीकर से सीपपीएम के अमराराम और बीकानेर से श्योपतराम अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहे हैं। सीकर में पिछले साल सीपीएम ने बड़ा किसान आंदोलन चलाया था। राजस्थान विधानसभा मे इस समय सीपीएम के दो विधायक हैं।
अन्य प्रदेशों की तरह राजस्थान की राजनीति भी जातिवाद से प्रभावित है। प्रदेश में 18 प्रतिशत दलित और 13 प्रतिशत जनजातीय आबादी है, वहीं राज्य की राजनीति में राजपूत, जाट,  ब्राह्मण और गुर्जर जातियां भी महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। राज्य की राजनीति पर में लंबे समय तक राजपूतों का दबदबा रहा है और उनके खिलाफ जाट मोर्चेबंदी करते रहे हैं। राजपूतों की आबादी राज्य में 9 प्रतिशत है। राज्य में जाट 12 प्रतिशत, गुजर 9 प्रतिशत और ब्राह्मण 7 प्रतिशत है। राज्य में मीणा भी मजबूत हैं। राजपूत और जाट राजस्थान की राजनीति में एक दूसरे के विरोधी रहे हैं। इन दो जातियों के आपसी विरोध का प्रभाव भाजपा और कांग्रेस पर पड़ता रहा है। दोनों जातियों को दोनों दल महत्व दे रहे हैं। जाट परंपरागत रूप से कांग्रेस के साथ थे, लेकिन 1998 के चुनाव के बाद परसराम मदेरणा की जगह अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद जाटों की नाराजगी कांग्रेस से थोड़ी बढ़ी। जाटों का कांग्रेस के साथ मोहभंग होना शुरू हो गया। 1999 के आम चुनाव से पहले अटल बिहारी वाजपेयी ने केंद्रीय सेवाओं में राजस्थान के जाटों को आरक्षण देने का फैसला लिया। इसके बाद जाटों का भाजपा प्रेम और बढ़ा। राजपूत परंपरागत तौर पर 1950 से ही कांग्रेस विरोधी रहे हैं, क्योंकि कांग्रेस की नीतियां राजपूत जागीरदारों के मुफीद नहीं थीं।
2019 लोकसभा चुनाव में भी राहुल के मुद्दे और मोदी के राष्ट्रवाद के साथ-साथ जातीय गणित भी प्रभावी है। भाजपा ने जाट वोटों को हासिल करने के लिए हनुमान बेनीवाल के लिए नागौर लोकसभा सीट छोड़ दी। दूसरी तरफ प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण राजपूत भी वैचारिक आधार पर नहीं, जातीय गुणा-भाग के आधार पर वोट दे रहे हैं। परंपरागत रूप से राजपूत राजस्थान में भाजपा के साथ रहे हैं, लेकिन बाड़मेर में राजपूत इस बार कांग्रेस उम्मीदवार मानवेंद्र सिंह के साथ हैं, लेकिन जोधपुर में राजपूत भाजपा उम्मीदवार गजेंद्र सिंह शेखावत के साथ हैं। मानवेंद्र और गजेंद्र दोनों राजपूत हैं। यही कुछ स्थिति जाटों की है। इनकी प्राथमिकता भी पार्टी नहीं बिरादरी है। चूंकी दोनों जातियों में जबरजस्त विरोध है, इसलिए भाजपा और कांग्रेस दोनों सतर्क होकर राजनीति करती है। दोनों जातियां समय-समय पर राज्य में अलग-अलग मुद्दों पर आंदोलन चलाती रही हैं। राजपूत गैंगेस्टर आनंदपाल के एनकाउंटर के बाद राजपूत समाज ने वसुंधरा राजे सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। सीकर इलाके में हाल ही में एक राजपूत लड़की का जाट लड़के दवारा अपहऱण के बाद दोनों जातियों में भारी तनाव है। गुर्जर और मीणा वोट लेने के लिए दोनों पार्टियां गुणा भाग लगा रही हैं। वैसे गुर्जरों के सबसे बड़े नेता सचिन पायलट कांग्रेस में हैं। उनके प्रभाव को काउंटर करने के लिए भाजपा ने किरोड़ी सिंह बैसलां को भाजपा में शामिल किया है।
क्या है मुस्लिम वोट की स्थिति?
राज्य में 10 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। हालांकि राजनीतिक रूप से मुस्लिम वोट काफी महत्वपूर्ण है। मुस्लिम कांग्रेस के साथ शुरू से रहे हैं। गौ हत्या के नाम पर बीते साल काफी संवेदनशील राजस्थान रहा। रकबर और पहलू खान की हत्या ने राजस्थान में हिन्दू-मुस्लिम विभाजन को और तीखा किया है। पश्चिमी राजस्थान के बीकानेर, नागौर से लेकर बाड़मेर तक मुस्लिम वोट प्रभावी है। वहीं जयपुर से लेकर अलवर तक भी मुस्लिम महत्वपूर्ण है।

Friday, April 26, 2019

सनी पाजी का ढाई किलो कम क्यों?

सनी देओल बड़े स्क्रीन पर भले ही विरोधियों को पटखनी देने में माहिर हों और नेश्नलिस्ट एक्टर के तौर पर उनकी छवि माचो मैन (Macho man) वाली हो, लेकिन, उनके लिए सियासत की रियल लाइफ, रील लाइफ जितनी आसान नहीं रहने वाली। क्योंकि, बीजेपी ने उन्हें पार्टी में शामिल करके जिस सीट पर उतारा है, वहां से पंजाब कांग्रेस के चीफ सुनील जाखड़ मौजूदा सांसद हैं, जो 2017 में विनोद खन्ना के निधन के बाद उपचुनाव में विजय हुए थे। इसके अलावा कई और चीजें हैं, जो देओल की राह में रोड़े बन सकते हैं। आइए समझने की कोशिश करते हैं कि वो कौन सी बातें हैं, जिसके चलते कांग्रेस का 'हाथ',सनी देओल के 'ढाई किलो का हाथ' पर फिलहाल भारी पड़ता नजर आ रहा है।
सनी देओल के पक्ष में क्या है?
सनी देओल को गुरदासपुर में पेश आने वाली दिक्कतों पर विचार करें, उससे पहले ये देख लेते हैं, कि उनके पक्ष में क्या हैं, जिसके बारे में सोचकर भाजपा ने उनकी उम्मीदवारी पर भरोसा किया है। अगर भाजपा के नजरिए से देखें तो गुरदासपुर में सनी देओल के पक्ष में कई चीजें जाती हैं। मसलन, यहां के मतदाता विनोद खन्ना जैसे फिल्म स्टार को 4 बार चुनकर संसद भेज चुकी है। खन्ना ने अपने क्षेत्र के लोगों को कभी निराश भी नहीं किया था। खन्ना ने कांग्रेस से उसके गढ़ को छीनकर वहां अपना दबदबा बना लिया था। 1952 से इस सीट पर जीतती आ रही कांग्रेस को उन्होंने ही पहली बार 1998 में हराया। वे 2009 तक सांसद रहे। लेकिन, 2009 का इलेक्शन वे हार गए थे। 2014 के चुनाव में उन्होंने एक बार फिर कांग्रेस के तत्कालीन सांसद प्रताप सिंह बाजवा को हरा दिया। यानी अगर गुरदासपुर के मतदाताओं ने खन्ना पर बार-बार भरोसा किया था, तो इससे जाहिर है कि उन्हें अभिनेताओं को अपना सांसद चुनने से परहेज नहीं है और देओल के लिए यह सकारात्मक संकेत है।
भारतीय जनता पार्टी मौजूदा लोकसभा चुनाव राष्ट्रवाद के मुद्दे पर लड़ रही है। 'बॉर्डर' और 'गदर-एक प्रेम कथा' जैसी फिल्मों के चलते देओल की छवि राष्ट्रवादी हीरो की बनी हुई है। यह क्षेत्र बॉर्डर से भी सटा हुआ है और यहां 2015 में दीनानगर और 2016 में पठानकोट एयरफोर्स स्टेशन पर पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी हमले भी हो चुके हैं। ऐसे में बीजेपी के लिए यह सोचना गैर-वाजिब नहीं है कि गुरदासपुर के लिए सनी देओल एक बेहद फिट ज्वाइस हैं। क्योंकि, दर्शकों तो यही छवि बनी हुई है कि सनी पाकिस्तान में अकेले भी घुसकर वहां की सेना की ऐसी की तैसी कर सकते हैं। यह उनकी लोकप्रियता की बड़ी वजह है, इसमें दो राय नहीं हो सकती।
ऊपर की परिस्थितियां भले ही सनी देओल के लिए आसान लग रही हों, लेकिन सुनील जाखड़ से मुकाबले के चलते उनका यह चुनावी दांव केकवॉक नहीं रहने वाला है। जाखड़ ने इकोनॉमिक टाइम्स को बताया है कि उन्होंने क्षेत्र के लिए बहुत सारे काम किए हैं। पठानकोट में 12 सौ करोड़ की पेप्सी बॉटलिंग प्लांट लगवाने में उन्होंने सहायता की है, जो सैकड़ों जॉब दे सकता है। वे शहर के विकास समेत क्षेत्र में तेल और प्राकृतिक गैस खोजने के लिए संबंधित एजेंसियों से सहायता लेने का भी प्रयास कर रहे हैं। यही नहीं, गुरदासपुर संसदीय क्षेत्र में आने वाले 9 विधानसभा क्षेत्रों में से 7 पर अभी कांग्रेस का कब्जा है। पंजाब में अभी कांग्रेस की सरकार है और राज्य में कैप्टन अमरिंदर सिंह का दबदबा बरकरार है।
जानकारी के मुताबिक विनोद खन्ना की पत्नी कविता परिवार के सदस्य को टिकट नहीं मिलने से नाखुश हैं। शुरू में विनोद खन्ना के बेटे एक्टर अक्षय खन्ना को भी यहां से टिकट मिलने की बात उठी थी। खबरों के मुताबिक कविता और स्वर्ण सलारिया के समर्थकों ने उन्हें देओल के खिलाफ निर्दलीय चुनाव लड़ने का भी दबाव डाला है। सलारिया 2017 का उपचुनाव जाखड़ से हार गए थे। कविता ने अभी तक अपनी अगली रणनीति का खुलासा नहीं किया है। लेकिन, निर्दलीय चुनाव लड़ने के बारे में वो अपना पत्ता भी नहीं खोल रही हैं। हालांकि, कविता हों या सालरिया भाजपा से अलग लड़कर वो चुनाव जीत तो नहीं सकते, लेकिन सनी देओल की राह मुश्किल जरूर कर सकते हैं।
गुरदासपुर में ही डेरा बाबा नानक वह स्थान है, जहां से सिख तीर्थयात्रियों के लिए पाकिस्तान में करतारपुर तक कॉरिडोर शुरू होना है। गुरदासपुर में सिखों की जनसंख्या लगभग आधी है, जो करतारपुर कॉरिडोर के लिए पाकिस्तान के साथ अभी अच्छा ही संबंध रखना चाहेंगे। अगर उन्हें लगेगा कि पीएम मोदी या सनी देओल की पाकिस्तान विरोधी सख्त नीति पाकिस्तान से भारत के ताल्लुकात बिगाड़ सकता है, तो वे देओल को सपोर्ट करने के बारे जरूर दोबारा सोचने को मजबूर हो सकते हैं।

Thursday, April 25, 2019

अब तीसरी पीढ़ी की बारी

हरियाणा में सियासी बिसात में इस आम चुनावों में एक खास बात देखने में आ रही है. जिन सीटों पर कभी दादा आपस में टकराए, फिर पिताओं ने ताकत की आजमाइश की, उसी सियासी शतरंज पर अब तीसरी पीढ़ी चुनाव के मोहरे सजाकर बैठ गई है. तीसरी पीढ़ी की चुनावी अदावत में हरियाणा देश में सबसे आगे है. मूल तौर पर देश के इस सूबे की सियासत का स्टीयरिंग तीन परिवारों के पास रहता आया है. अब भी वही तीन परिवार हरियाणा की राजनीति में हावी हैं.
हरियाणा में तीन ताकतवर सियासी परिवार तीन लालों के नाम से जाने जाते हैं. यानी भजनलाल, बंसीलाल और देवीलाल. इन तीनों परिवारों की धमक 60-70 के दशक से शुरू हुई जो अब तक जारी है. हालांकि एक परिवार अब और इस टक्कर में शामिल हो चुका है, जो हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा का परिवार है. इन तीनों परिवारों से जो युवा लोकसभा चुनावों में भाग्य आजमा रहे हैं उसमें श्रुति चौधरी, भव्य विश्नोई और दुष्यंत चौटाला हैं. हिसार ऐसी सीट है जहां दो लालों की मौजूदा पीढी के युवा टकराने जा रहे हैं.
बंसीलाल के परिवार की तीसरी पीढ़ी से अबकी उनकी पोती श्रुति चौधरी पारिवारिक सीट भिवानी से खड़ी हैं. आपातकाल के दिनों में चर्चित हुए बंसीलाल को यहां के पुराने लोग अब भी याद करते हैं. हालांकि ये शहर के बजाय एक छोटा कस्बा ज्यादा लगता है. लेकिन ये वो इलाका है, जहां से लगातार बंसीलाल के परिवार के लोग चुनाव जीतकर मंत्री बनते रहे हैं. पिछले चुनाव में परिवार को जरूर झटका लगा था, जब श्रुति चौधरी भाजपा के धर्मवीर से चुनाव हार गईं थीं. इससे पहले श्रुति के पिता सुरेंद्र सिंह यहां से चुनाव लड़ चुके हैं. वो प्रदेश सरकार में मंत्री भी रहे हैं. बंसीलाल की बहू किरण चौधरी हरियाणा की पिछली कांग्रेस सरकार में चर्चित मंत्री रही हैं. श्रुति की शुरुआती पढ़ाई दिल्ली में हुई. उन्होंने आरके पुरम के दिल्ली पब्लिक स्कूल के बाद ऑक्सफोर्ड में पढाई की. वो पेशे वकील हैं. खूबसूरत श्रुति को पॉलिटिक्स विरासत में मिली है.
सही बात ये है कि हरियाणा की राजनीति चौटाला परिवार के बगैर हमेशा अधूरी कही जाएगी. इसकी शुरुआत देवीलाल से होती है. वो कद्दावर नेता थे. वो हरियाणा में मुख्यमंत्री रहे और फिर प्रधानमंत्री वीपी सिंह के कार्यकाल में उप प्रधानमंत्री बने. देवीलाल की राजनीतिक विरासत ओमप्रकाश चौटाला ने संभाली. वो भी हरियाणा में मुख्यमंत्री रहे.
हकीकत में चौटाला परिवार की ये तीसरी नहीं बल्कि चौथी पीढ़ी चुनाव मैदान में होगी. तीसरी पीढ़ी की अगुआई अजय और अभय चौटाला ने की. उन्होंने पारिवारिक पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल का मोर्चा संभाला. लेकिन चौथी पीढ़ी तक आने के बाद पारिवारिक कलह का असर ये हुआ है कि ये पार्टी बंट गई है. इसमें एक ओर पूर्व सांसद अजय चौटाला के युवा बेटे दुष्यंत चौटाला हैं, जिन्होंने जननायक जनता पार्टी बना ली है. इसी पार्टी से वो हिसार से चुनावी दंगल में कूदे हैं. दुष्यंत वर्ष 2014 में लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं. लंबे समय तक वो टीवी पर इनेलो का चेहरा हुआ करते थे. उन्होंने कैलिफोर्निया से बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन की पढाई की है. हालांकि दुष्यंत के चाचा अभय और दादा ओमप्रकाश चौटाला इनेलो का झंडा बुलंद कर रहे हैं.
हरियाणा के भजनलाल ऐसे लाल हैं, जो 1979 में जनता पार्टी का मुख्यमंत्री बनने के बाद अगले ही साल अपनी पूरी पार्टी को दलबदल कराते हुए कांग्रेस में ले गए. उन्हें राजनीति का चाणक्य और दलबदल के ‘इंजीनियर’ के नाम से भी जाना जाता था. हालांकि कांग्रेस ने उन्हें 2008 में निलंबित भी किया. भजनलाल ने नई पार्टी भी बनाई, लेकिन अब फिर वो कांग्रेस में हैं.
उनके पोते भव्य विश्नोई को कांग्रेस ने हिसार से उतारा है. वो आक्सफोर्ड से पढ़कर लौटे हैं. वो अच्छे क्रिकेटर रह चुके हैं. आक्सफोर्ड की क्रिकेट टीम से वो एक मैच भी खेल चुके हैं. वो स्मार्ट हैं. अच्छा भाषण देते हैं और जनसंपर्क की कला में माहिर हैं. भव्य के पिता कुलदीप विश्नोई भी चुनाव जीत चुके हैं. जबकि भजनलाल के एक और चर्चित बेटे चंद्रमोहन करनाल से चुनाव लड़ सकते हैं. करनाल की सीट भजनलाल परिवार की पारंपरिक सीट कही जाती रही है.
सोनीपत से कांग्रेस के उम्मीदवार भूपेंद्र सिंह हुड्डा हैं. वो हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री रहे हैं. उनकी तीसरी पीढ़ी भी सियासत में है. भूपेंद्र के पिता रणबीर सिंह आजादी के बाद भारतीय संविधान सभा के सदस्य थे. इस परिवार की तीसरी पीढ़ी को रिप्रजेंट करते हैं दीपेंद्र सिंह हुड्डा, जो रोहतक से सांसद रहे हैं. कांग्रेस ने फिर उन्हें रोहतक से ही टिकट दिया है.

Monday, April 22, 2019

क्या असम में प्रदर्शन दोहरा पाएगी बीजेपी?

दशकों से बाहरियों के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ने वाले असम ने बीजेपी के आने के बाद एनआरसी प्रक्रिया को अंतिम चरण में जाते हुए भी देखा है और नागरिकता संशोधन बिल से बढ़ते ख़ौफ़ को भी. क्या इस ख़ौफ़ के बढ़ने से बीजेपी की मज़बूत जड़ें असम में इन चुनावों में हिल सकती हैं? इस जानने से पहले वो अतीत समझना होगा, जब असम में बीजेपी ने अपने शुरुआती कदम रखे थे. छह साल लंबे आंदोलन के बाद असम में पहली बार 1985 में असम गण परिषद की सरकार बनी. लेकिन जिस आंदोलन के दम पर एजीपी को सत्ता मिली, उसके मकसद को पूरा करने में वो नाकाम रही. 1991 में हुए विधानसभा चुनावों से पहले उल्फा की ओर से बढ़ती हिंसा और एजीपी की ख़ामियां सामने आ चुकी थीं.
यही वो चुनाव थे, जिसमें बीजेपी ने पहली बार असम में जीत का स्वाद चखा. इन चुनावों में बीजेपी 10 सीटें जीतने में सफल रही. बीजेपी की ये जीत राम मंदिर आंदोलन के दौर में मिली थी. लेकिन 66 सीटें जीतकर सरकार कांग्रेस ने बनाई. हितेश्वर सैकिया मुख्यमंत्री बने, जिनके बारे में एक नारा प्रचलित था- ऊपर में ईश्वर, नीचे में हितेश्वर. 1996 चुनावों में एजीपी फिर मज़बूती के साथ लड़ी. नतीजा 59 सीटें. बीजेपी के लिए ये चुनाव सिर्फ़ चार सीटें लेकर आया. राम मंदिर आंदोलन ठंडे बस्ते में जा चुका था.
असमिया जनता ने जिस उम्मीद के साथ एजीपी को चुना था, वो उसे पूरा करने में फिर विफल रही. इसी विफलता के साथ 2001 में कांग्रेस के तरुण गोगोई की चुनावी सफलताएं शुरू हुईं, जो लगातार तीन बार सत्ता दिलाने में सफ़ल रहीं. 126 सीटों वाली विधानसभा में 2001 में आठ, 2006 में दस और 2011 में पांच सीटें जीतकर बीजेपी असम में अच्छे दिनों का इंतज़ार करती रही.
कभी बीजेपी को कुछ सीटें देकर मैदान में खुला खेलने वाली एजीपी 2014 में एक भी लोकसभा सीट जीतने में नाकाम रही. ये बीजेपी की सफलता थी. 2019 चुनावों में बीजेपी असम की 10 सीटों से मैदान में है. सहयोगी दलों में एजीपी को तीन और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) को एक सीट मिली है. ज़ाहिर है कि बीजेपी के यहां तक पहुंचने में 2014 की नरेंद्र मोदी 'लहर' सबसे अहम रही. लेकिन कई और फैक्टर्स थे, जिन्होंने जमकर काम किया.
असम में संघ के राष्ट्रवाद के हल चलाने की जो बात सुनील देवधर ने की, इसकी शुरुआत 1946 में हुई थी. तब गुवाहाटी के एक मारवाड़ी व्यापारी केशवदेव बावड़ी की गुजारिश पर संघ की पहली शाखा असम में बनाई गई थी. एक तरफ़ जहां बीजेपी की ज़मीन संघ तैयार कर रहा था. वहीं कांग्रेस सालों साल से अपनी पाई ज़मीन खोने की तरफ़ बढ़ रही थी. असम में बीजेपी के आने का एक कारण कांग्रेस के ख़िलाफ़ सत्ता विरोधी लहर भी रही. असम में बीजेपी के पक्ष में वोट जाने की एक वजह 2016 में आया 84 फ़ीसदी टर्नआउट भी रहा.
इस टर्नआउट को बीजेपी के ख़ाते में लाने में हेमंत बिस्वा सरमा की भूमिका रही. असम आंदोलन से निकले हेमंत कांग्रेस में रहे थे. तरुण गोगोई के बाद हेमंत दूसरे नंबर के नेता थे. लेकिन हेमंत के नंबर-2 से नंबर-1 तक पहुंचने की राह में तरुण गोगोई एक पिता के तौर पर खड़े थे. गौरव गोगोई को मिलती विरासत और ''बैठकों के दौरान राहुल गांधी का मुद्दों से ज़्यादा कुत्तों को बिस्किट खिलाने पर ध्यान होने'' की शिकायत लिए हेमंत बीजेपी में शामिल हो गए.
हेमंत असम में छात्रों के बीच काफ़ी लोकप्रिय हैं. चुनावों में 200 से ज़्यादा सभाएं करते हैं. ऐसे में बीजेपी को हेमंत के पार्टी में आने का निश्चित तौर पर फ़ायदा हुआ. हालांकि नंबर-2 हेमंत अब भी नंबर दो ही हैं.
इन लोकसभा चुनावों में भी टिकट न मिलने के बाद एक बयान काफ़ी चर्चा में रहा था, ''हेमंत पर अमित शाह से कहीं ज़्यादा ज़िम्मेदारियां हैं.'' ये बयान और ज़िम्मेदारियां हेमंत को जिसने दी थी, वो मोदी के सबसे क़रीबी रणनीतिकार माने जाते हैं.
कहा जाता है कि राम माधव चुपचाप काम करते हैं. संघ की नियमावली में इसे 'प्रसिद्धि परिमुक्त' कहा जाता है.
असम में कांग्रेस से कई नेताओं को बीजेपी में लाने का काम राम माधव ने किया था. बीजेपी में हेमंत बिस्वा सरमा भी राम माधव की कोशिशों का नतीजा था. अलगाववादी संगठनों और क्षेत्रीय दलों से बातचीत करने की
इस जनाधार को मज़बूत करने के लिए एजीपी, बीपीएफ जैसे दलों को साथ रखने का श्रेय भी माधव के खाते में ही जाता है. लेकिन कुछ दल ऐसे भी हैं, जो बीजेपी के सहयोगी तो नहीं हैं लेकिन वो कई मायनों में बीजेपी के लिए फ़ायदेमंद होते रहे हैं.
लोअर असम की पार्टी एआईयूडीएफ के प्रमुख बदरुद्दीन अजमल. एक बड़े इत्र व्यापारी और मुस्लिमों के बीच लोकप्रिय माने जाने वाले नेता. अजमल की भूमिका असम में इसलिए भी अहम हो चली है क्योंकि राज्य में मुस्लिमों की संख्या क़रीब 34 फ़ीसदी हो चुकी है. 'असम अगला कश्मीर होगा या असम का मुख्यमंत्री मुसलमान हो जाएगा.' इस बात पर बहस और डर लोगों में पैदा किया गया. इसकी झलक 2016 में असम में छिड़े पोस्टर वॉर से भी लगाया जा सकता है. जहां ऑटो में एक तरफ सर्बानंद सोनोवाल का पोस्टर था और दूसरी तरफ़ बदरुद्दीन अजमल का. सवाल था- किसे चुनेंगे अगला मुख्यमंत्री?
बीजेपी की ओर से पोस्टर्स में ऐसा भी प्रचार किया गया, जिसमें बदरुद्दीन अजमल और कांग्रेस के बीच ''समझौता'' होने की बातें कही गईं. हालांकि कांग्रेस ने भी सर्बानंद सोनोवाल के अरुण जेटली के पैर छूती तस्वीर को ये कहकर प्रचारित किया कि असमिया अस्मिता को ये कैसे बचाएंगे? सोशल मीडिया पर मज़बूत बीजेपी ने कथित बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा जमकर उठाया. अमित शाह के आक्रामक बयान और मोदी की शैली असमिया लोगों को भा गई. 'चाय पर चर्चा' करने वाले मोदी ने चाय के लिए मशहूर असम में घुसपैठियों के ख़िलाफ़ जो चर्चाएं की, वो असर कर गईं.
लेकिन बीजेपी की मज़बूत जड़ें क्या एनआरसी और कैब की वजह से कमज़ोर हुईं हैं? एनआरसी प्रक्रिया अभी चालू है, फिलहाल इसमें लाखों लोगों का नाम नहीं है. लेकिन असमिया लोगों की चिंताएं नागरिकता संशोधन बिल को लेकर हैं. ये बिल अगर पास हुआ तो असम में बांग्लादेश से आने वाले हिंदू बंगालियों को नागरिकता मिल सकती है. बिल में मुस्लिमों को छोड़कर दूसरे धर्मों का भी ज़िक्र है. ऐसे में असम की 34 फ़ीसदी मुस्लिम आबादी और एनआरसी से मिली राहतें महसूस करने वाले असमिया लोग कुछ परेशान भी हैं.
असम में बीजेपी ने अपने कई सांसदों का टिकट काटा है. एजीपी को भी साथ रखने की मजबूरी है. अगर इतनी मज़बूत होती तो क्यों साथ में चुनाव लड़ते. असम में कैब के आने का लोगों को ये डर है कि कहीं उनकी भाषा, संस्कृति, रोज़गार न छिन जाए. मोदी की 2014 में इमेज अलग थी लेकिन अभी घटते-घटते कम हुई है. इन चुनावों में लोग स्थानीय मुद्दे ज़्यादा देखेंगे. हालांकि सोनोवाल की छवि भी लोगों के बीच अच्छी है. सर्बानंद सोनोवाल की असम में छवि माजुली द्वीप के इंदेश्वर गाम की बात से समझिए, ''असम में सोनोवाल सरकार आने से व्यक्तिगत फायदा भले ही न हुआ हो लेकिन लोगों का काम ज़रूर हुआ है. रास्ते बनाए गए हैं. सोनोवाल बैचलर आदमी है. बच्चे हैं नहीं. ढाई सौ ग्राम चावल होंगे तो उसका काम चल जाएगा.''

Friday, April 19, 2019

एमपी में इसबार भी कमल करेंगे सिंधिया?

दो दशक बाद ऐसा होगा कि मध्य प्रदेश में लोकसभा चुनावों के समय कांग्रेस की सरकार होगी. इससे पहले 1999 में जब लोकसभा चुनाव हुए थे तब अविभाजित मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी. यही कारण है कि इस बार प्रदेश से कांग्रेस को काफी उम्मीदें हैं. 2014 के बीते लोकसभा चुनावों में प्रदेश की 29 लोकसभा सीटों में से भाजपा 27 सीटें अपनी झोली में डालने में सफल रही थी जिसने केंद्र में पूर्ण बहुमत की भाजपा सरकार के बनने में बड़ा योगदान दिया था. केवल दो सीटें कमलनाथ की छिंदवाड़ा और ज्योतिरादित्य सिंधिया की गुना ही कांग्रेस बचा पाई थी. अजय सिंह, कांतिलाल भूरिया, अरुण यादव, विवेक तन्खा, सुरेश पचौरी, सुंदरलाल तिवारी, मीनाक्षी नटराजन जैसे कांग्रेस के बड़े-बड़े दिग्गजों को हार का सामना करना पड़ा था. कांग्रेस का वह प्रदेश में अब तक का सबसे घटिया प्रदर्शन रहा. लेकिन अब कांग्रेस बदली – बदली नजर आ रही है. प्रदेश में सरकार के गठन ने उसके नेताओं में नई जान फूंक दी है. यही कारण है कि मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया सार्वजनिक मंचों से 20 -22 से अधिक लोकसभा सीटें जीतने के दावे कर रहे हैं.
हालांकि, दावे तो पार्टी की ओर से विधानसभा चुनावों के दौरान भी 150 सीट से अधिक जीतने के किए गए थे. लेकिन पार्टी 114 सीटों पर सिमटकर बड़ी मुश्किल से जोड़-तोड़ की सरकार बनाने में सफल हुई थी. वहीं, भाजपा को फिर से 2014 का प्रदर्शन दोहराने की उम्मीद है. सत्ता गंवाने के बावजूद प्रदेश भाजपा के बड़े नेता सभी 29 सीटें जीतने के अति आत्मविश्वासी दावे कर रहे हैं. जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा और नरोत्तम मिश्रा जैसे बड़े नाम शामिल हैं. लेकिन किसके दावों में कितना दम है. इसकी पड़ताल के लिए यदि हालिया संपन्न प्रदेश विधानसभा चुनावों के नतीजों पर नजर डालें तो तस्वीर काफी हद तक साफ हो जाती है. हालिया संपन्न विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने 114 और भाजपा ने 111 विधानसभा सीटें जीती थीं. भाजपा को 41 तो कांग्रेस को 40.9 फीसद मत मिले थे. प्रदेश के कुल 230 विधानसभा क्षेत्र 29 लोकसभा सीटों में विभाजित है. 27 लोकसभा सीटों में 8-8 विधानसभा क्षेत्र और दो लोकसभा सीटों में 7-7 विधानसभा क्षेत्रों को समाहित किया गया है. नतीजे बताते हैं कि कुल 29 लोकसभा सीटों में से 17 में भाजपा आगे रही है जबकि कांग्रेस ने 12 सीटों पर बढ़त बनाई है. अगर इन नतीजों को ही लोकसभा के नतीजे मान लें तो कुल 10 सीटों के फायदे में कांग्रेस दिखाई दे रही है और इतनी ही सीटों का भाजपा को नुकसान हुआ है.
हालांकि, पिछली बार जीती छिंदवाड़ा और गुना लोकसभा सीटों में से गुना पर विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस पिछड़ गई है लेकिन अन्य 11 सीटों पर भारी बढ़त बना ली है. बैतूल, भिंड, देवास, धार, ग्वालियर, खरगोन, मंडला, मुरैना, राजगढ़, रतलाम और शहडोल वे 11 सीटें हैं. भाजपा के नजरिए से देखें तो इन 11 सीटों का नुकसान उठाकर एक गुना की सीट पर वह बढ़त बनाने में कामयाब रही है. वैसे ऐसा प्रचलित है कि विधानसभा और लोकसभा के मुद्दे अलग होते हैं. लेकिन 2014 के चुनावों में देखा गया कि विधानसभा वाले नतीजे ही लोकसभा में मिले. तब 2013 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने 165 और कांग्रेस ने 58 सीटें जीती थीं. इन नतीजों को लोकसभा सीटों के आधार पर विभाजित करके देखते तो तब कुल 29 में से 25 सीटें भाजपा की झोली में जा रही थीं. छह महीने बाद हुए लोकसभा चुनावों में नतीजे इससे मिलते-जुलते ही आए. 29 में से 27 सीटें भाजपा जीतने में सफल रही थी. हालांकि, भाजपा ही नहीं, कांग्रेस ने भी 2014 लोकसभा के मध्य प्रदेश के नतीजों को मोदी लहर बताया था. लेकिन, तस्वीर तो 2013 के विधानसभा चुनावों में ही साफ हो गई थी. इसलिए मोदी के होने या न होने का तब नतीजों पर कोई खास असर नहीं पड़ा था. हालांकि, मध्य प्रदेश में यह ट्रेंड 2003 से ही बन गया है कि विधानसभा चुनावों से मिलते – जुलते नतीजे ही छह माह बाद होने वाले लोकसभा चुनावों में दिखाई देते हैं. 2003 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को 173 और कांग्रेस को 38 सीटों पर जीत मिली थी. छह माह के भीतर हुए लोकसभा चुनाव में भी नतीजे मिलते-जुलते रहे जहां 29 में से 25 सीट भाजपा और 4 कांग्रेस जीती. 2008 विधानसभा चुनावों में भाजपा को कुछ सीटों का नुकसान उठाना पड़ा. विधानसभा में उसकी सीट संख्या घटकर 143 रह गई. जबकि कांग्रेस की सीटें बढ़कर 71 हो गईं. नतीजे लोकसभा में भी बदले-बदले नजर आए. 2004 में 25 सीटें जीतने वाली भाजपा 16 पर सिमट गई और 4 सीटें जीतने वाली कांग्रेस की सीट संख्या 12 हो गई. यहां तक कि विधानसभा चुनावों का असर तब लोकसभा पर इस कदर दिखा था कि मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों में अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन कर 7 सीटें जीतने वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रदेश में लोकसभा में भी खाता खोलने में सफल रही. विधानसभा चुनावों में जिस रीवा लोकसभा सीट पर वह कांग्रेस को पीछे छोड़कर दूसरे पायदान पर रही थी, लोकसभा में यही रीवा सीट उसने जीत ली.
हालांकि, 2003 के पहले यानी अविभाजित मध्य प्रदेश में वोटिंग ट्रेंड ठीक इसके विपरीत था. राज्य में जिस पार्टी की सरकार होती थी, लोकसभा में नतीजे उसके विपरीत आते थे. यह ट्रेंड 1989 से ही चलता रहा. 1989 के लोकसभा चुनावों के समय प्रदेश में कांग्रेस शासन में थी. लेकिन भाजपा 40 में से 27 लोकसभा सीट जीत गई, 8 सीटें कांग्रेस के हाथ लगीं. 1991 में भाजपा प्रदेश की सत्ता में थी. लेकिन कांग्रेस 40 में से 27 सीटें जीत गई और 12 ही भाजपा के हाथ लगीं. बीसवीं सदी के अंतिम दशक में देश राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा था और तीन सालों के भीतर 3 बार लोकसभा चुनाव हुए, 1996, 1998 और 1999 में. इस दौरान मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी. राज्य में सरकार होने और विधानसभा में अच्छा खासा वोट पाने के बावजूद इन तीनों ही लोकसभा चुनावों में जनता ने प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी को नकार दिया.
40 सीटों में से 1996 में भाजपा को 27 और कांग्रेस को 8, 1998 में भाजपा को 30 और कांग्रेस को 10, 1999 में भाजपा को 29 और कांग्रेस को 11 सीटें मिलीं. प्रदेश के विभाजन के बाद यह ट्रेंड बदल गया था. हालांकि, 1989 से ही प्रदेश का वोटिंग ट्रेंड यह तो बताता ही है कि केंद्र में जिस पार्टी की हवा चलती है, यहां की जनता जरूरी नहीं कि उसके साथ बह जाए. तो इस तरह आंकड़ों के नजरिए से देखें तो दोनों ही दलों के वर्तमान दावे हकीकत से काफी दूर नजर आते हैं. न तो भाजपा के लिए सभी 29 सीटें जीतना संभव दिखता है और न ही कांग्रेस का 20 से अधिक सीटें जीतने का सपना पूरा होता दिखता है. वैसे तो भाजपा इस बार 10 सीटों के नुकसान में दिख रही है. लेकिन बैतूल, भिंड और मुरैना सीट के भी उन 10 सीटों में शामिल होने ने पार्टी के नेताओं के माथे पर बल डालना शुरू कर दिया है. ये तीन वे सीट हैं जो भाजपा का गढ़ बन चुकी हैं. भिंड से लगातार आठ चुनाव से भाजपा अपराजेय है. आखिरी बार उसे 1984 में यहां से हार मिली थी. तो वहीं बैतूल और मुरैना से 6 चुनावों से भाजपा नहीं हारी है. 1991 में आखिरी बार हारी थी.
भिंड में भाजपा 94,492 मतों से, बैतूल में 40,676 मतों से और मुरैना में 1,26,842 मतों के भारी अंतर से पिछड़ गई है. 2014 के लोकसभा चुनावों में ये सीटें भाजपा ने क्रमश: 159961, 328614 और 132981 मतों के बड़े भारी अंतर से जीती थीं. यही छटपटाहट के चलते भाजपा ने तीनों सीटों पर मौजूदा सांसदों के टिकट काट दिए हैं.
इन तीनों के अतिरिक्त मध्य प्रदेश की वे अन्य 8 लोकसभा सीटें जिन पर विधानसभा चुनावों के दौरान भाजपा पिछड़ गई है, नीचे सूचीबद्ध हैं. भिंड, मुरैना और बैतूल के साथ-साथ इन आठ सीटों पर भी मौजूदा सांसदों के टिकट काटने की कार्रवाई पार्टी की ओर से की गई है.
पिछड़ने वाली इन कुल 11 सीटों में से 10 पर भाजपा के सांसद हैं जिनमें से 8 मौजूदा सांसदों के टिकट काटे गए हैं. केवल मंडला में फग्गन सिंह कुलस्ते और राजगढ़ में रोडमल नागर पर भाजपा ने फिर से दांव खेला है. वहीं, इनमें से एक सीट रतलाम है जिस पर कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया सांसद हैं. 2014 में भाजपा ने यह सीट जीती थी लेकिन सांसद दिलीप सिंह भूरिया के निधन के बाद उपचुनाव में कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी. पार्टी ने इस सीट पर भी प्रत्याशी बदला है. उपचुनाव में निर्मला भूरिया को उतारा था और अब झाबुआ के वर्तमान विधायक जीएस डामोर को टिकट दिया है. इन सीटों पर भाजपा की चिंता ऐसे भी समझी जा सकती है कि किसी भी विधायक को लोकसभा चुनाव न लड़ाने की घोषणा करने वाली भाजपा को अपना नियम ताक पर रखकर डामोर को टिकट देना पड़ा है.
वहीं गुना सीट जो कि कांग्रेस का गढ़ है, उस पर विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के पिछड़ने ने पार्टी से अधिक ज्योतिरादित्य सिंधिया को परेशानी में डाल दिया है. यही कारण है कि कांग्रेस के लिए सुरक्षित मानी जाने वाली इस सीट पर अंत समय तक सिंधिया के नाम पर सस्पेंस बना रहा. सिंधिया की ओर से कई बार ऐसे संकेत भी मिले कि वे सीट बदलकर ग्वालियर से लड़ने के इच्छुक हैं, लेकिन फैसला पार्टी आलाकमान राहुल गांधी और प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ को करना था. बहरहाल, कांग्रेस ने सभी 29 सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं जबकि भाजपा ने इंदौर को छोड़कर बाकी 28 सीटों पर उम्मीदवारों के नामों पर अंतिम मुहर लगा दी है.

क्या साध्वी प्रज्ञा पाक साफ़ हो गई?

महाराष्ट्र के मालेगांव में अंजुमन चौक और भीकू चौक के बीच शकील गुड्स ट्रांसपोर्ट के सामने 29 सितंबर 2008 की रात 9.35 बजे बम धमाका हुआ था जिसमें छह लोग मारे गए और 101 लोग घायल हुए थे.
इस धमाके में एक मोटरसाइकिल इस्तेमाल की गई थी. एनआईए की रिपोर्ट के मुताबिक यह मोटरसाइकिल प्रज्ञा ठाकुर के नाम पर थी. महाराष्ट्र एटीएस ने हेमंत करकरे के नेतृत्व में इसकी जांच की और इस नतीजे पर पहुँची कि उस मोटरसाइकिल के तार गुजरात के सूरत और अंत में प्रज्ञा ठाकुर से जुड़े थे. प्रज्ञा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की सदस्य रह चुकी थीं. पुलिस ने पुणे, नासिक, भोपाल इंदौर में जांच की. सेना के एक अधिकारी कर्नल प्रसाद पुरोहित और सेवानिवृत मेजर रमेश उपाध्याय को भी गिरफ़्तार किया गया.
इसमें हिंदूवादी संगठन अभिनव भारत का नाम सामने आया और साथ ही सुधाकर द्विवेदी उर्फ़ दयानंद पांडेय का नाम भी आया. एटीएस चार्जशीट के मुताबिक प्रज्ञा ठाकुर के ख़िलाफ़ सबसे बड़ा सबूत मोटरसाइकिल उनके नाम पर होना था. इसके बाद प्रज्ञा को गिरफ़्तार किया गया. उन पर महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण क़ानून (मकोका) लगाया गया. चार्जशीट के मुताबिक जांचकर्ताओं को मेजर रमेश उपाध्याय और लेफ़्टिनेंट कर्नल पुरोहित के बीच एक बातचीत पकड़ में आई जिसमें मालेगांव धमाके मामले में प्रज्ञा ठाकुर के किरदार का ज़िक्र था. मामले की शुरुआती जांच महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधक दस्ते ने की थी, जिसे बाद में एनआईए को सौंप दी गई थी. एनआईए की चार्जशीट में उनका नाम भी डाला गया.
मालेगांव ब्लास्ट की जांच में सबसे पहले 2009 और 2011 में महाराष्ट्र एटीएस ने स्पेशल मकोका कोर्ट में दाखिल अपनी चार्जशीट में 14 अभियुक्तों के नाम दर्ज किये थे. एनआईए ने जब मई 2016 में अपनी अंतिम रिपोर्ट दी तो उसमें 10 अभियुक्तों के नाम थे. इस चार्जशीट में प्रज्ञा सिंह को दोषमुक्त बताया गया. साध्‍वी प्रज्ञा पर लगा मकोका (MCOCA) हटा लिया गया और कहा गया कि प्रज्ञा ठाकुर पर करकरे की जांच असंगत थी.
इसमें लिखा गया कि जिस मोटरसाइकिल का ज़िक्र चार्जशीट में था वो प्रज्ञा के नाम पर थी, लेकिन मालेगांव धमाके के दो साल पहले से कलसांगरा इसे इस्तेमाल कर रहे थे. हालांकि इस चार्जशीट के बाद एनआईए कोर्ट ने प्रज्ञा को जमानत तो दे दी लेकिन उन्हें दोषमुक्त नहीं माना और दिसंबर 2017 में दिए अपने आदेश में उसने कहा कि प्रज्ञा और पुरोहित पर यूएपीए (अनलॉफ़ुल एक्टिविटीज़ प्रीवेंशन एक्ट) के तहत मुकदमा चलता रहेगा. इसी आदेश में साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित पर से मकोका (महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण क़ानून) हटा लिया गया. हालांकि साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित समेत सात अभियुक्तों पर अब भी चरमपंथ के ख़िलाफ़ बनाए गए क़ानून यूएपीए की धारा 16 और 18, आईपीसी की धारा 120बी (आपराधिक साज़िश), 302 (हत्या), 307 (हत्या की कोशिश) और 326 (इरादतन किसी को नुकसान पहुंचाना) के तहत मामला चल रहा है. प्रज्ञा ठाकुर फिलहाल जमानत पर बाहर हैं. बीबीसी से बातचीत में वो तत्कालीन गृह मंत्री पी चिदंबरम और कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह पर उन्हें झूठे मामले में फंसाने का आरोप लगाती हैं. प्रज्ञा ठाकुर के ख़िलाफ़ समझौता एक्सप्रेस विस्फोट मामले के अभियुक्त सुनील जोशी की हत्या का आरोप भी लगा था. जोशी की 29 दिसंबर 2007 को हत्या कर दी गई थी. इस मामले में फ़रवरी 2011 में प्रज्ञा की गिरफ़्तारी भी की गई थी. हालांकि, 2017 में मध्‍य प्रदेश के देवास कोर्ट ने प्रज्ञा को सुनील जोशी हत्‍याकांड से बरी कर दिया था. दिल्ली और लाहौर के बीच दौड़ने वाली समझौता एक्सप्रेस में 18 फ़रवरी 2007 को हरियाणा में पानीपत के समीप धमाका हुआ था जिसमें कम से कम 68 लोग मारे गए थे. अजमेर दरगाह ब्लास्ट मामले में भी प्रज्ञा ठाकुर का नाम आया था लेकिन अप्रैल 2017 में एनआईए ने प्रज्ञा ठाकुर, आरएसएस नेता इंद्रेश कुमार और दो अन्य के ख़िलाफ़ राजस्थान के स्पेशल कोर्ट में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी.

Saturday, April 13, 2019

पलटी मारती मायावती

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट, जिसकी बदौलत ऐतिहासिक दुश्मन रहे अखिलेश यादव और मायावती एक साथ आ गए थे, में आज मतदान हो रहा है. लेकिन लगभग एक साल पहले अखिलेश की समाजवादी पार्टी (SP) और मायावती की बहुजन समाज पार्टी (BSP) की मिली-जुली ताकत द्वारा भारतीय जनता पार्टी (BJP) को दी गई करारी शिकस्त से सामने आए 'कैराना मॉडल' के बाद से अब तक बहुत कुछ बदल चुका है, हालांकि इसी 'कैराना मॉडल' के परिणामों से उत्साहित होकर दोनों पार्टियां लोकसभा चुनाव 2019 में भी राज्य की 80 सीटों पर मिलकर लड़ रही हैं, ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दूसरा कार्यकाल हासिल करने से रोका जा सके. अटकलें गर्म हैं कि मायावती इस चुनाव में BJP के खिलाफ लड़ नहीं रही हैं, बल्कि शायद मज़ाक कर रही हैं. अटकलबाज़ी को दरकिनार कर भी दिया जाए, तो भी मायावती के हालिया कृत्यों ने विपक्ष के वरिष्ठ नेताओं के मन में गहरी चिंता पैदा कर दी है. वे मायावती द्वारा उत्तर प्रदेश के मुस्लिमों से की गई सार्वजनिक अपील का हवाला देते हैं, जिसमें BSP की मुखिया ने उन्हें कांग्रेस पर वोट बर्बाद न करने का आग्रह किया था. गौरतलब है कि कांग्रेस को अखिलेश और मायावती के गठबंधन से बाहर रखा गया है. अब मायावती की यह अपील कारगर साबित होती है या नहीं, इससे BJP को ठोस फायदा मिल सकता है, क्योंकि इससे लगेगा कि कांग्रेस और मायावती मुस्लिम वोटों के लिए लड़ रहे हैं, जिससे सवर्ण हिन्दुओं के वोटों का ध्रुवीकरण हो जाएगा.
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और BJP नेता योगी आदित्यनाथ ने मायावती की अपील के तुरंत बाद हमला बोलते हुए अपने पसंदीदा नारे 'अली बनाम बजरंग बली' का इस्तेमाल किया, जिसने धर्म के नाम पर पहले भी वोटों का ध्रुवीकरण किया है. मायावती ने अपने भाषणों में BJP पर करारे हमले किए हैं, लेकिन उतनी ही सख्ती से उन्होंने कांग्रेस पर भी हमले किए हैं, और दोनों ही पार्टियों को 'एक सिक्के के दो पहलू' करार दिया है. यदि इस बात को ध्यान में रखा जाए कि कांग्रेस खुद ही मान चुकी है कि उत्तर प्रदेश में उसका खेल अगले विधानसभा चुनाव के लिए चल रहा है, और इस बार के लोकसभा चुनाव में उन्हें खास उम्मीद नहीं है, तो मायावती द्वारा कांग्रेस को भी BJP की ही तरह लताड़ा जाना अजीब लगता है.
जहां तक इस लेखक का प्रश्न है, उसे इस सबसे लग रहा है कि जिस तरह की 'लेन-देन की राजनीति' आज तक 'बहन जी' करती रही हैं, वह किसी भी राष्ट्रीय पार्टी के साथ जा सकती हैं, जो 23 मई को आने वाले चुनाव परिणाम पर निर्भर करेगा.
इससे उनके सहयोगी अखिलेश यादव के लिए सिरदर्द पैदा हो सकता है, जो कांग्रेस की आलोचना बहुत हल्के-हल्के कर रहे हैं, ताकि चुनाव-बाद गठबंधन का रास्ता बना रहे. वरिष्ठ नेताओं ने मुझसे कहा कि मायावती ने अखिलेश के कांग्रेस के प्रति रुख को भी मुद्दा बनाया है और उन्हें पूरी ताकत के साथ कांग्रेस पर हमला बोलने के लिए कहा है.
समाजवादी पार्टी के पूर्व मुखिया मुलायम सिंह यादव पहले ही इस बात दुखड़ा रो रहे हैं कि उनका पुत्र सिर्फ अपने परिवार से ही कड़ाई से पेश आ सकता है (उनका इशारा अखिलेश के चाचा शिवपाल यादव के पार्टी से निकलकर नई पार्टी बना लेने की ओर था), जबकि बाकी नेताओं और पार्टियों के लिए तो वह बिछ-बिछ जाते हैं. जूनियर यादव, यानी अखिलेश ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान भी कांग्रेस को 100 सीटें दे दी थीं, और BJP रिकॉर्ड बहुमत पाकर सत्तासीन हो गई थी. उस वक्त भी, मायावती ने 100 मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में उतारे थे, और ज़्यादा से ज़्यादा ध्रुवीकरण सुनिश्चित कर दिया था.
भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने अपनी रैलियों में ज़ोरदार तरीके से इस बात को बार-बार कहा कि उन्होंने उन लोगों को टिकट नहीं दिया है, जो 'वोट बैंक' बनते हैं. गौरतलब है कि यह मुस्लिमों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला कोड है.
ऐसा लगता है, मायावती इसलिए कांग्रेस से नाराज़ हैं, क्योंकि वह भीम आर्मी अध्यक्ष तथा युवाओं में लोकप्रिय जाटव दलित नेता चंद्रशेखर को उनके खिलाफ खड़ा करने की कोशिश कर रही है. लेकिन उत्तर प्रदेश में कांग्रेस द्वारा किए गए बाकी सभी प्रयासों की ही तरह इसका नतीज़ा भी सिफर रहा, क्योंकि पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए पार्टी की महासचिव प्रियंका गांधी ने एक बार चंद्रशेखर से मुलाकात की, और फिर कोई फॉलो-अप नहीं.
मायावती इस बात से भी नाराज़ हैं कि तीन दशक तक उनके सबसे करीबी सहयोगी रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी, जिन्हें उन्होंने वर्ष 2017 में BSP से निकाल दिया था, को कांग्रेस ने ऐसी सीट से टिकट दे दिया है, जहां आज मतदान हो रहा है. दूसरी ओर कांग्रेस के पास भी मायावती के खिलाफ ढेरों शिकायतें हैं, जिनमें उनके घमंड से लेकर सीटों की अजीबोगरीब मांग तक शामिल हैं. लेकिन विपक्षी दलों के बीच इस तनाव से BJP खुश हो गई है. आखिरकार, 'कैराना मॉडल' का अर्थ BJP के खिलाफ एक साझा प्रत्याशी सुनिश्चित करना ही तो था, क्योंकि यही वह एकमात्र मणित है, जो BJP को पटखनी दे सकता था.
बहरहाल, अमित शाह ने सुनिश्चित कर दिया है कि BJP को उत्तर प्रदेश की हर सीट पर कई-कई प्रत्याशियों से भिड़ना पड़े. शिवपाल यादल की पार्टी, जो SP के वोट ज़रूर काटेगी, को संभवतः BJP से ही आर्थिक सहायता मिल रही है. शिवपाल यादव ने साफ-साफ मुझसे कहा, "मैं अपने भतीजे (अखिलेश यादव) को पसंद नहीं करता, जिसने मेरा अपमान किया... मैं BJP के साथ काम कर सकता हूं..."
चाचा के इरादे भले ही सार्वजनिक रूप से स्पष्ट हैं, लेकिन 'बुआ' मायावती ने BJP के साथ चुनाव-बाद सौदा हो जाने को लेकर अब तक चुप्पी साधी हुई है. एकमात्र संकेत यह हो सकता है कि मायावती के सबसे करीबी सहयोगी सतीश मिश्रा की ससुराल से जुड़ीं अनुराधा मिश्रा 9 मार्च को BJP में शामिल हुई थीं. विपक्ष के लिए सिरदर्द बढ़ गया है.

क्या कांग्रेस देश तोडना चाहती है?

कांग्रेस ने यही कहा है कि वह जम्मू कश्मीर में अफस्पा कानून की समीक्षा करेगी. सुरक्षा की ज़रूरतों और मानवाधिकार के संरक्षण में संतुलन के लिए कानून में बदलाव करेगी. कांग्रेस ने हटाने की बात नहीं की है फिर बीजेपी को क्यों लगता है कि कांग्रेस ने देश तोड़ने की बात कही है? सितंबर 2016 में सर्जिकल स्ट्राइक का नेतृत्व करने वाले रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल डीएस हुड्डा ने हाल ही में कांग्रेस के लिए सुरक्षा पर एक दस्तावेज़ तैयार कर दिया है. जी एस हुड्डा के ही सुझाव कांग्रेस के घोषणा पत्र का हिस्सा बने हैं. क्या सर्जिकल स्ट्राइक करने वाले लेफ्टिनेंट जनरल साहब ऐसा सुझाव दे सकते हैं, जिससे देश के टुकड़े हो जाए?
1 दिसंबर 2014 के लाइव मिंट में जम्मू कश्मीर बीजेपी के नेता रमेश अरोड़ा का बयान छपा है कि वादी में ऐसा माहौल बनाएंगे कि बिना किसी डर के और शांतिपूर्वक तरीके से सब काम होंगे और ऐसे सख्त नियम की ज़रूरत ही नहीं होगी, लेकिन 18 मार्च 2017 को राम माधव का बयान था कि यह कोई मज़ाक में लगाया गया कानून नहीं है कि इसे हटा दिया जाए. महबूबा मुफ्ती उस वक्त हटाने की बात कर रही थीं. वो देखना चाहती थीं कि देखा जाए कि हटाने से क्या असर पड़ता है.
मोदी सरकार के समय पूर्वोत्तर से अफस्पा हटाया गया है. 2015 में त्रिपुरा से हटाया गया. 2018 में मेघालय से भी हटा. अरुणाचल प्रदेश में भी इसे सीमित किया गया है. मगर जम्मू कश्मीर में इसे कभी नहीं हटाया गया. यहां बात जम्मू कश्मीर को लेकर हो रही है. 1958 में पूर्वोत्तर के राज्यों के लिए पारित किया गया. 1990 में जम्मू कश्मीर में लागू हुआ. इससे सेना और सशस्त्र बलों को अशांत इलाके में विशेष अधिकार मिल जाता है. इस प्रावधान से लैस सेना बिना वारंट के सर्च कर सकती है, गिरफ्तार कर सकती है, फायरिंग कर सकती है. आपको याद होगा कि इरोम शर्मिला ने इस कानून को मणिपुर से हटवाने के लिए सोलह साल अनशन किया था.  2004 में मणिपुर की थंगाजम मनोरमा का शव मिला था. उसे रात को उठाकर ले जाया गया और अगले दिन उसका शव मिलता है. गोलियों से छलनी. असम राइफल्स पर आरोप लगा था. इसी के खिलाफ 15 जुलाई 2004 को इंफाल में 14 माओं ने कांगला फोर्ट के बाहर ने निर्वस्त्र होकर प्रदर्शन किया था. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस बीपी जीवन रेड्डी कमेटी बनी थी. इस कमेटी ने सुझाव दिया था कि अफस्पा को समाप्त कर देना चाहिए. यह कानून नफरत और भेदभाव का प्रतीक बन चुका है, लेकिन बीपी जीवन रेड्डी की कमेटी नॉर्थ ईस्ट के संदर्भ में बनी थी, तो एक पूर्व जज, सेना के पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल अगर अफस्पा को हटाने या समीक्षा की बात करते हैं तो यह देशविरोधी कैसे हो गया? देश को तोड़ने वाला कैसे हो गया? 14 नवंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला दिया था.
मामला यह था कि सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई कि मणिपुर में 1980 से 2011 के बीच सेना, अर्धसैनिक बलों, मणिपुर पुलिस ने 1528 लोगों की एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल हत्या की है. इसकी जांच कराई जाए. सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश कर दिए. इस फैसले के खिलाफ जब 700 सेना के पूर्व अधिकारी मिलकर कोर्ट गए कि ऐसा नहीं होना चाहिए. सीबीआई जांच नहीं कर सकती और न ही एफआईआर हो सकती तो है सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका को रिजेक्ट कर दिया था. इस याचिका को केंद्र सरकार ने भी समर्थन दिया था. सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस यूयू ललित ने जो कहा था कि उन्हें सेना के मनोबल को लेकर राजनीति करने वालों को याद रखना चाहिए. दोनों माननीय जजों ने कहा था कि सेना, अर्धसैनिक बलों और राज्य पुलिस के मनोबल गिरने के भूत को खड़ा करना सही नहीं है.
कश्मीर का मामला पेचीदा है. ऐसे कई लोग जो इस मामले को लेकर किसी भी बयान को लेकर दौड़ पड़ते हैं वो इंटरनेट पर एक खबर तक सर्च नहीं करते हैं. मगर कश्मीर पर राय ज़रूर रखते हैं. बताइये क्या ये देशद्रोह नहीं है. व्हाट्सऐप मैसेज आता है. व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी में कश्मीर का कोर्स कर रहे खलिहर लोगों यानी फालतू लोगों को मेरी एक राय है. ज़रूर कश्मीर विवाद पर राय रखें मगर थोड़ा पढ़ें. पढ़ने से ही पता चलेगा कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मनोबल का भूत मत नचाओ. सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश दिए हैं. आपको याद होगा जम्मू कश्मीर में पत्थर बाज़ों का मामला चैनलों पर खूब चला.समस्या तो थी ही वो, लेकिन बाद में क्या हुआ. आपको याद दिलाते हैं. आप इंटरनेट पर इंडिया टुडे, आउटलुक, टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दू, स्क्रॉल, वायर में सर्च कीजिए. तारीख है 3 फरवरी 2018.
इस खबर में यही है कि ग़ृह मंत्रालय ने कुल 9,730 लोगों के खिलाफ मामले वापस लिए गए हैं. 1,745 के खिलाफ कुछ शर्तों के साथ केस वापस लिए गए हैं. यह जानकारी महबूबा मुफ्ती ने विधानसभा में लिखित जवाब में दिया था. उसी को अखबारों ने छापा है. जब सारे केस वापस लिए गए तब उन्हीं चैनलों पर आपने दिन-रात हंगामा देखा था. सरकार को ललकार देखी थी. तब तो महबूबा के साथ बीजेपी की ही सरकार जम्मू कश्मीर में थी. हिन्दुस्तान टाइम्स में 7 जून 2018 को गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि सरकार ने इसलिए मुकदमे वापस लिए हैं, क्योंकि युवाओं को बरगलाया जा सकता है. उनसे गलती हो जाती है. ख़बर में लिखा है कि राजनाथ सिंह ने शेरे कश्मीर इंडोर स्टेडियम में छह हज़ार युवाओं के सामने यह बात कही थी.
उत्तर भारत के व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी और न्यूज़ चैनल देखने वालों से पूछिए तो कहेंगे कि पत्थरबाज़ आतंकवादी है. न्यूज़ चैनलों ने पत्थरबाज़ों को लेकर खूब भड़काऊ कार्यक्रम किए, जिनमें आर-पार की बात होती थी. मगर जैसा कि राजनाथ सिंह को आपने सुना वो पत्तरबाज़ों के साथ आर-पार की बात नहीं कर रहे थे. उन्हें मौका दे रहे थे. बातचीत का रास्ता खोल रहे थे. अब कोई भी बिना पढ़े लिए ज्ञानी समझने वाले एंकर ऐलान कर सकता था कि गृहमंत्री ने सेना का मनोबल गिरा दिया, क्योंकि पत्थर तो सेना के खिलाफ चला था मगर 10,000 पत्थरबाज़ों से मुकदमा वापस ले लिया गया. किसी ने नहीं कहा कि मनोबल गिर गया. आज तक न्यूज़ चैनल के कार्यक्रम पंचायत में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि मैं यह विश्वास करने के लिए तैयार नहीं हूं कि पत्थरबाज़ आतंकवादी होते हैं. यूट्यूब पर आप यह इंटरव्यू सुन सकते हैं. कश्मीर पर खूब पढ़िए. अच्छी बात है कि आप इसे लेकर राय रखना चाहते हैं मगर प्लीज़ न्यूज़ चैनल देखकर और हिन्दी अखबार पढ़कर कश्मीर पर कोई राय न बनाएं. उससे अच्छा है शाम को टहल आएं और गन्ना चबाएं इससे दांत साफ होंगे और मज़बूत भी. सेना के मनोबल को लेकर चिंता न करें. सेना का मनोबल इस बात से भी गिरता होगा, अगर गिरता है तो जब योगी आदित्यनाथ भारत की सेना को मोदी की सेना बता देते हैं. वैसे यकीन रखिए भारत की सेना का मनोबल कम से कम भारत के गिरते राजनीतिक स्तर से कभी नहीं गिरता है.
1860 में अंग्रेज़ों ने भारतीय दंड संहिता बनाई. इसमें देशद्रोह का मामला नहीं था. यह प्रावधान तब आया जब देवबंद के उलेमाओं ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ फतवा दे दिया कि आज़ादी की लड़ाई इस्लामिक फर्ज़ है तब उसे कुचलने के लिए देशद्रोह का कानून लाया गया. यह कानून आया ही देशभक्ति की भावना को कुचलने के लिए. इसके जाने से देशभक्ति की भावना को कैसे ठेस पहुंच सकती है. अगर आप व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी में टाइम बिताएंगे तो यह सब पता नहीं चलेगा.

देशद्रोह का यह प्रावधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक विरोध के अधिकार को कुचलने में किया जाने लगा है. कार्टून बनाने पर असीम त्रिवेदी के खिलाफ देशद्रोह का आरोप लगा था. तब यूपीए की सरकार थी. यूपीए की सरकार में तमिलनाडु में न्यूक्लियर प्लांट के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे 27 लोगों के खिलाफ देशद्रोह का आरोप लगा. हाल ही में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्रों का रिपब्लिक टीवी के पत्रकार से विवाद हो गया तो पुलिस ने 14 छात्रों के खिलाफ देशद्रोह का आरोप लगा दिया. शिकायत भारतीय जनता युवा मोर्चा के ज़िला अध्यक्ष ने की थी कि कुछ छात्रप्रो पाकिस्तान नारे लगा रहे थे. मगर एसएसपी ने एक हफ्ते बाद यह बताया कि 19 फरवरी को सारे केस वापस ले लिए गए, क्योंकि छात्रों के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला. बेहतर है कि कांग्रेस अपनी पिछली गलतियों से सीख रही है.उसे ठीक कह रही है.
कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में एक और बात कही है जिसे लेकर न चर्चा है न विवाद है. कहा है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 499 में संशोधन करेंगे और मानहानि को दिवानी अपराध बनाएंगे. अब किसी को मानहानि के अपराध में जेल नहीं होगी. तो आपको जेल और बेल से छुटकारा मिल जाएगा. जीतेंगे तो मुआवज़ा मिलेगा. मेरी राय में इसमें मुआवज़े की भी राशि तय होनी चाहिए. संविधान के हिसाब से हम सब समान हैं तो हम सबका मान एक होना चाहिए.

Wednesday, April 10, 2019

राफेल पर फंसी सरकार

राफेल कांड छुपा जा रहा था। कम से कम चुनाव के दौरान इस कांड को लेकर मोदी सरकार निश्चिंत लग लग रही थी। सरकार ने अपने प्रचार तंत्र के जरिए बड़ी जुगत से जनता के बीच यह धारणा बनवा दी थी कि राफेल कांड पर सुप्रीमकोर्ट से सरकार को क्लीन चिट मिल चुकी है। हालांकि यह भी एक हकीकत है कि सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले को लेकर तरह तरह की व्याख्याएं चालू थीं। लेकिन राफेलकांड पर एक पुनर्विचार याचिका भी सुप्रीमकोर्ट में विचाराधीन थी। इसी याचिका को खत्म करवाने के लिए सरकार कह रही थी कि अब राफेल कांड पर कोई विचार नहीं हो सकता। कुलमिलाकर राफेल कांड में आगे कोई विचार न हो इसके लिए सरकार ने एड़ी से चोटी का दम लगा रखा था। सरकार कम से कम यह जरूर चाहती थी कि लोकसभा चुनाव निपट जाने तक रफाल सौदे की कोई चर्चा न हो। लेकिन लोकसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान के एक दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आ गया कि वह इस कांड पर तफ़्तील से सुनवाई को तैयार है। गौरतलब है कि बड़ी अदालतें अपने किसी फैसले पर पुनर्विचार के लिए तभी तैयार होती हैं जब अदालत को मामले में जान दिखाई देती है। बहरहाल, इसमें बिल्कुल भी शक नहीं कि चुनाव के ऐन मौके पर रफाल कांड का ज़िदा हो जाना सत्तारूढ दल के लिए एक बहुत बड़ा बखेड़ा खड़ा कर गया है।
इस सनसनीखेज राफेल कांड पर सुप्रीम कोर्ट ने साफ साफ कहा है कि पुनर्विचार याचिका दाखिल करने वालों को विस्तार से यानी तफ़्सील से सुना जाएगा। दूसरी बड़ी बात सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ कर दी है कि राफेल सौदे के जो दस्तावेज गोपनीय माने जा रहे थे उनका भी संज्ञान लिया जाएगा। अव्वल तो  इस कांड पर फिर से सुनवाई होना ही सरकार के लिए  बहुत बड़ा झटका है, ऊपर से रफाल सौदे से संबधित दस्तावेजों पर गोपनीयता का वह कवच भी हटा दिया है जिसकी वजह से सुप्रीमकोर्ट  इस मामले में तफ्तील से सुनवाई नहीं कर पाया था। कारण साफ है। एक तो सरकार का वह पुराना हलफनामा पुनर्विचार का कारण बना होगा जिसमें सरकार ने यह कहा था कि सौदे से संबंधित दस्तावेजों को सरकार की संबंधित संस्थाओं की नज़रों से गुज़ारा गया है। लेकिन बाद में यह शक पैदा हो गया कि वैसा हुआ नहीं था। यानी लोक लेखा समिति को उसकी जानकारी ही नहीं थी। बाद में सरकार को यह कहना पड़ा था कि हलफनामें की भाषा में व्याकरण संबंधी गलती हो गई। भाषा संबंधी इस गफलत को टाइपो एरर यानी टंकण की गलती कह कर छुटकारा पाने की कोशिश हुई थी। कुछ यह आभास भी दिया गया था कि सरकार की छोटी सी भूल के कारण सुप्रीमकोर्ट के समझने में ही चूक हो गई होगी। बहुत संभव है कि पूरी दुनिया में तहलका मचाने वाले इस कांड की फिर से सुनवाई के लिए ये कारण अदालत ने पर्याप्त देखे होंगे। गौरतलब है कि हमारी अपनी विलक्षण और विश्वसनीय न्याय व्यवस्था में कम से कम किसी वाक्य के आशय को समझने में अड़चन आने की परिकल्पना को कोई भी स्वीकार नहीं कर सकता। अदालतों में कोई भूल चूक न हो जाए इसीलिए एक एक शब्द और हर वाक्य की क्रियाओं और सहायक क्रियाओं को बड़े गौर से देखा जाता है। अदालतों से कोई चूक होने की गुंजाइश इसलिए भी नहीं बचती क्योंकि दूसरे पक्ष के वकील हर नुक्ते पर घंटों घंटों बहस करते हैं और अदालत को बताते हैं कि गलती कहां हो रही है। बहरहाल, कैग और लोक लेखा समिति को लेकर किए गए सरकार के बहलफ बयानों पर सवाल उठ गए थे। अदालत में बहलफ बयानों की गलती को बहुत गंभीर माना जाता है। उधर देश के प्रतिष्ठित अखबारों में राफेल से संबंधित गोपनीय दस्तावेज छप जाने से और भी ज्यादा बखेड़ा खड़ा हो गया था। इतना बड़ा मामला बन गया था कि मुख्य विपक्षी दल यानी कांग्रेस नेता राहुल गांधी राफेलकांड को जरा के लिए भी नहीं छोड़ रहे थे।
हम ऐसे दुष्काल में है जिसमें हमारे लोकतंत्र के बाकी सारे अंग विश्वसनीयता के संकट से गुजर रहे हैं। एक न्यायपालिका ही बची है जो अपने विलक्षण सांगठनिक ढांचे के कारण सर्वस्वीकार्य समझी जाती है। अदालती फैसला जिनके खिलाफ जाता है वे तक सिर झुकाकर उसे कबूल करते हैं। देश को पता है कि अगर न्यायतंत्र  की विश्वसनीय चली गई तो बाकी कुछ भी नहीं बचेगा। इस लिहाज़ से देखें तो राफेलकांड पर सुप्रीमकोर्ट के इस सनसनीखेज फैसले से उसकी विश्वसनीयता बहुत बढ़ गई है।
किसी भी सरकार के पास बड़े बड़े से संकट से निपटने के सैकड़ों तरीके होते हैं। लेकिन ये भ्रष्टाचार का मामला है। साधारण भ्रष्टाचार नहीं बल्कि राजनीतिक भ्रष्टाचार का मामला है। वैसे तो राजनीति में भ्रष्टाचार के आरोप अब उतने ज्यादा सनसनीखेज नहीं माने जाते। लेकिन चुनाव के मौके पर भ्रष्टाचार के आरोपों का बोझ कोई भी सरकार उठा नहीं पाती। इसीलिए चुनाव के ऐन मौके पर  सरकार पर राफेल कांड के बादल मंडरा जाना सरकार को हिला कर रख सकता है। कोई भी अनुमान लगा सकता है कि सरकार राफेल के मोर्चे पर अपने बचाव के लिए अब सबकुछ झोंक सकती है। वह क्या करेगी? इसका अनुमान लगाना हो तो उस रणनीति का हवाला दिया जा सकता है जिसमें कहा जाता है कि आक्रमण ही सबसे अच्छा बचाव होता है। इस तरह से लगता यही है कि मोदी सरकार अपने बचाव में विपक्ष पर भ्रष्टाचार के आरोपों के प्रचार को अचानक बढ़ा सकती है। ताकि और कुछ हो या न हो कम से कम आरोपों की धार तो कम हो जाए।
मीडिया यह मान रहा था कि राहुल गांधी राफेल पर जबरन ही ज्यादा बोल रहे हैं। इतना ही नहीं बल्कि यूपीए में  कांग्रेस के सहयोगी दल भी मानकर चल रहे थे कि भारी गोपनीयता के कवच में सुरक्षित रखे गए राफेलकांड की चर्चा देर तक ठहर नहीं पाएगी। बहुत संभव है इसीलिए कांग्रेस के अलावा दूसरे विपक्षी दलों ने राफेलसौदे की गोपनीयता के सामने हथियार डाल दिए थे। लेकिन अब जब सुप्रीमकोर्ट के फैसले से  राफेल कांड पहले से भी ज्यादा जोर से गूंज उठा है तो राहुल गांधी की बातों को दम मिलेगा ही। अब तो राहुल गांधी को अपने चुनावी भाषणों में यह साबित करने में आसानी हो जाएगी कि उनके घोषणापत्र में न्याय योजना के लिए पैसे कहां से आ सकते हैं। वे आसानी से यह साबित करते पाए जाएंगे कि जो लाखों करोड़ की रकम अनिल अंबानी जैसे धनवानों की जेब में जा रही है उस पैसे को वे गरीबों के खाते में भिजवा देंगे। राफेल पर अदालती फैसले से राहुल गांधी का हौसला एक और लिहाज़ से बढ़ेगा। अभी कुछ दिनों से वे नोटबंदी को भी एक बड़ा घोटाला बता रहे हैं। अब अपने चुनावी रैलियों में वे नोटबंदी के घोटाले भी ठोककर बता रहे होंगे।
इसमें कोई शक नहीं कि राफेल कांड पर पत्रकारिता थकीमरी सी दिखने लगी थी। एक दो अखबार ही जोखिम उठाकर राफेल सौदे की खुफिया जानकारी जमा करने और बताने में लगे थे। और इसे कोई नहीं नकार सकता कि उन्ही इक्का दुक्का अखबारों ने राफेल सौदे के गोपनीय दस्पावेजों की फोटू छापी थीं। वरना सरकार की दलीलों के सामने ऐसी कोई दलील नहीं बची थी जिसके आधार पर सुप्रीम कोर्ट पुनर्विचार याचिका की सुनवाई का फैसला कर पाता। यानी कुछ विद्वानों का यह अंदेशा ग़लत साबित हुआ कि अब भारतीय पत्रकारिता अपने समापन काल में है। गौरतलब है कि डेढ़ महीने बाद ही देश में नई सरकार काम करती दिखेगी। लेकिन वह सरकार अब पत्रकारिता की तरफ से खुद को निश्चिंत मानकर नहीं चल पाएगी।
राफेल पर अदालती फैसले के कुछ देर बाद ही केंद्रीय चुनाव आयोग के एक फैसले ने भी हलचल मचाई। चुनाव आयोग ने मोदी की बायोपिक फिल्म और नमो टीवी पर रोक लगा दी है। दरअसल, सोशल मीडिया पर केंद्रीय चुनाव आयोग का संक्षिप्त नाम केंचुआ धरा जाने लगा था। आयोग की विश्वसनीयता पर जनता में बातें होने लगी थीं। ऐसे में आयोग ने प्रधानमंत्री मोदी की बायोपिक फिल्म पर रोक लगाकर एक तरह से अपनी साख बढ़ाने का काम किया है। यानी जिन लोगों के मन में यह अंदेशा बैठ गया था कि मौजूदा सरकार ने देश की सारी संस्थाओं को अपनी दबिश में ले लिया है उन्हें ये फैसले सुनकर हाल फिलहाल कुछ राहत जरूर महसूस हुई होगी।

Sunday, April 7, 2019

मायावती की राजनीती

सहारनपुर की रैली में मायावती के सामने चंद्रशेखर के पोस्टर लेकर लोग आये हैं, इससे साफ है कि मायावती उनको आर एस एस का एजेंट क्यों कहती हैं? उसके कुछ कारण हैं?
१. पहली बात साफ है कि मायावती बहुजन काशीराम के आंदोलन से निकली बसपा को अब प्राइवेट लिमिटेड कंपनी जैसे चलाती हैं. वो परिवार वाद के खिलाफ थीं, लेकिन पहले अपने भाई अनंत और अब भतीजे को बसपा की कमान सौंपना चाहती हैं. वो नहीं चाहती कि कोई भी दूसरा दलित युवा आकर दलितों का नेता बने. वो खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं कि अगर कोई धाकड बोलने वाला युवा आ गया तो  उनके भतीजे का राजनितिक भविष्य तो ख़त्म समझो और लोकप्रियता में मायावती को भी पछाड़ देगा.
२. कांशीराम के ज़माने के दर्जनों ओबीसी और दलित नेता बसपा से अलग हो गया क्योंकि मायावती के आसपास ब्राम्हणों का घेरा हो गया है. उनको पार्टी फंड के लिए इन लोगों से जरुरत है. जिस ब्राम्हणवादी विचारधार के खिलाफ काशीराम ने आंदोलन किया आज उसी विचारधार से मायावती घिरी रहती हैं.
३. मायावती ने बसपा तबतक ही संभाली जबतक काशीराम का बनाया संगठन, वामसेफ और उनके जातीय समीकरण काम करते रहे. जब कभी भी मायावती की सरकार बनी उन्होंने इन संगठनों के लिए कुछ नहीं किया। बीजेपी संघ के लिए और सपा ने लोहिया  लिए कितना कुछ किया। मायावती को जमीनी राजनीती की हकीकत ही नहीं पता है. बसपा का देश के हर प्रदेश में ७-८% वोट तो है लेकिन मायावती ने कभी यूपी से बाहर कदम ही नहीं रखा. अगर ये ठीक से बहुजन आंदोलन करती और मेहनत से पार्टी बढाती तो तीसरे नंबर की पार्टी की कई राज्यों में सरकार होती. लेकिन वो एसी कमरे से बाहर कभी निकली ही नहीं इसलिए आज यूपी में भी ओबीसी तो छोड़ो पुरे दलितों की नेता भी नहीं रह गई, केवल एक जाति जाटव की नेता हैं, बल्कि उसमें से भी लोग कट रहे हैं.
४. मायावती इस समय बसपा को बचाने की लड़ाई लड़ रही हैं. विधानसभा में केवल १७ सदस्य हैं, लोकसभा में शून्य और एक दो सदस्य ही राजयसभा में बचे होंगे. ऐसे में उनकी पार्टी राजनीति कैसे करेगी? उनको मलाई कैसे मिलेगी? इसलिए उनको किसी भी हाल में इस समय पार्टी बचानी है. तभी अपनी विचारधार से अलग और सबसे बड़ी विरोधी सपा के साथ गठबंधन भी किया है.
५. अब मायावती ने पार्टी के सिद्धांतो से भी समझौता चालू कर दिया है. पिछला कोई बहुजन आंदोलन आपको याद है जब मायावती ने हिस्सा लिया हो या उसको लीड किया हो? न एससी एसटी एक्ट के खिलाफ बोलीं न शहरन पुर दंगो के खलाफ. बस रोहित वेमुला के मामले में फर्जी तरीके से इस्तीफा  शहानुभूति लेनी चाही. और तो और १०% आरक्षण को समर्थन भी दे दिया? इससे बड़ा उनका मनुवादी होने का क्या सबूत चाहिए आपको?

बंगाल से क्यों मिटा लाल सलाम?

लगभग 60 साल तक बंगाल की राजनीति में हर जगह नज़र आने वाले वामदलों की चर्चा इस बार के लोकसभा चुनावों में लगभग अनुपस्थित रहने के लिए हो रही है. अगर आंकड़ों की नज़र से देखें तो वाम मोर्चा बंगाल में मौजूद है, लगभग हर सीट से चुनाव भी लड़ रहा है लेकिन लोगों के बीच होने वाली बहस, तमाम ओपिनियन पोल और चुनावी अभियान के नज़ारे, एक ही इशारा कर रहे हैं: वामदल कहीं गिनती में नहीं हैं. एक ऐसे राजनीतिक निकाय के लिए, जो छह दशक तक लगातार सत्ता में रहा हो, उसके लिए ये बहुत बड़ी गिरावट है. इस बार के चुनावी समर में पश्चिम बंगाल में बस दो पार्टियां हैं- सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस और मुख्य विपक्षी भारतीय जनता पार्टी. लेफ़्ट और कांग्रेस सिमटकर न के बराबर हो गए हैं. लेकिन ऐसा हुआ क्यों? इतने लंबे वक़्त तक सब पर भारी लेफ़्ट बंगाल में अचानक अप्रासंगिक कैसे हो गया?
वाम मोर्चे की पहली और दूसरी सरकारों के शुरुआती वक़्त में, वामदल सत्ता में अपने बने रहने को लेकर आश्वस्त नहीं थे. 1967 और 1969 के कड़वे अनुभवों की वजह से वो केंद्र को शक़ की नज़र से देखने लगे थे. इसलिए उन्होंने विशाल जनसमर्थन बनाने पर अपना ध्यान केंद्रित किया, ख़ासकर ग्रामीण बंगाल में. भूमि सुधार से लेकर तीन स्तरीय पंचायत व्यवस्था शुरू करके वामदलों ने बंगाल के ग्रामीण इलाकों को सशक्त कर दिया. इस तरह बंगाल में उनका वोट बैंक मज़बूत हो गया और वो कई वर्षों तक सत्ता में बने रहे.
चूंकि बंगाल का जनसंख्या घनत्व देश में सबसे ज़्यादा है इसलिए यहां खेती के लिए उपलब्ध ज़मीन कम है. साल 2000 के आंकड़ों के मुताबिक़ ग्रामीण बंगाल में एक व्यक्ति के पास एक बीघे से कम ज़मीन है. किसान परिवारों में ज़मीन पीढ़ी-दर-पीढ़ी बंटती जाती है इसलिए वो धीरे-धीरे और कम हो जाती है. नतीजन, इतनी कम ज़मीन पर खेती करना बेहद मुश्किल हो जाता है. ऐसे में निर्मल के. मुखर्जी और देबब्रत बंदोपाध्याय जैसे विशेषज्ञों ने वाममोर्चे की सरकारों को ज़मीन के छोटे-छोटे टुकड़ों को जोड़ने की सलाह दी लेकिन वामदल ग़रीबों और किसानों के विरोध के डर से ऐसा नहीं कर पाए. छोटे किसान और ग़रीब ही वामदलों के वोटबैंक थे इसलिए उनकी वो उनकी नाराज़गी मोल लेने का ख़तरा नहीं मोल सके. ज़मीन की ऐसी हालत की वजह से बंगाल में खेती लगातार कम होती गई. वामदलों ने बड़े स्तर पर औद्योगिक इकाइयों की मदद से हालात संतुलित करने की कोशिश की. सरकारों ने सोचा था कि ऐसा करके वो किसानों की बड़ी संख्या को कारखानों में ले आएंगे. लेकिन बंगाल के ज़्यादातर किसान इतने पढ़े-लिखे और कुशल नहीं थे कि कारखानों में नौकरी कर सकें. इसलिए छोटे किसानों को मजबूरी में खेती तक ही सीमित रहना पड़ा. यही वजह है कि सरकार ने सिंगूर और नंदीग्राम के लिए किसानों से ज़मीन लेने की कोशिश की, किसानों ने विद्रोह किया और वामदलों का जनाधार अपने आप कमज़ोर पड़ गया. इसके बाद जो हुआ, वो किसी से छिपा नहीं है. वामपंथ की पकड़ दूसरे क्षेत्र में भी कमज़ोर पड़ने लगी. 1990-91 तक सोवियत संघ के साथ शीत युद्ध समाप्त हो गया और पूर्वी यूरोपीय समाजवादी ब्लॉक का विघटन हो गया और पिश्चमी ताकतों की जीत हुई.
कई दशकों तक भारतीय कम्युनिस्ट समाजवाद के सपने को जीते रहे और दावा किया कि यह सपना हमारे देश में पूरा हो सकता है. अब जब समाजवादी दुनिया अतीत की बात हो चली है, कम्युनिस्टों के लिए उस सपने को लोगों के बीच बेचना मुश्किल हो गया है. लगभग उसी समय (1990-91) भारत में दो महत्वपूर्ण घटनाएं घटीं. देश में दो बड़े आंदोलनों की शुरुआत हुई, एक सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन, जिसे मंडल आंदोलन के रूप में जानता जात है. वहीं दूसरा धार्मिक-राजनीतिक आंदोलन, जिसे कमंडल आंदोलन के रूप में याद किया जाता है. इन दोनों आंदोलनों ने भारत की सदियों पुरानी राजनीति को बदल दिया. 1991 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने देश में नव-उदारवादी आर्थिक सुधार की शुरुआत की, जिसने न केवल निजी क्षेत्र की कंपनियों को एक बड़ा बाजार उपलब्ध कराया बल्कि नौकरी की सुरक्षा को भी ख़त्म कर दिया. नौकरी पर रखा और निकाला जाना, आम बात होने लगी. इसने सीधे तौर पर श्रमिकों के आंदोलनों को प्रभावित किया.
बंगाल की सत्ता पर काबिज़ कम्युनिस्ट सरकार के सामने यह चुनौती थी कि वो इन बदलावों से कैसे निपटे. उनकी वैचारिक दिवालियापन तब सामने आई जब उन्होंने समाजवादी क्रांति के सपने को साकार करने की कोशिश में नारा लगायाः मार्क्सवाद सर्व शक्तिशाली है क्योंकि यह सत्य है और यह विज्ञान है. ज़ाहिर सी बात है कि ये कम्युनिस्ट इस तथ्य से बेखबर थे कि मार्क्सवाद को वैज्ञानिक आधार पर खड़ा करने का दावा आत्मघाती साबित हो सकता था, जैसा कि हरबर्ट मार्क्यूज ने अपनी किताब 'वन डायमेंशनल मैन' में बहुत पहले ही लिखा था. और इस तरह कम्युनिस्ट केवल क्रांति के खोखले नारों से जनता के एक छोटे से हिस्से को ही प्रभावित कर पाया. लंबे समय तक ये कम्युनिस्ट संसद भी पहुंचते रहे. अब माओवादियों की सोच के विपरीत सीपीआईएम को यह एहसास हो गया है कि भारत में संसदीय लोकतंत्र का कोई दूसरा विकल्प नहीं है. लेकिन उनकी पुरानी सोच उन्हें आज लोगों से जोड़ नहीं पा रही है. इस सदी में लोगों की सच्ची भलाई के लिए कार्यक्रम बनाने में ये सोच आड़े आ रही है. वे अब भी अतीत में जी रहे हैं. जब तक वो अपने पुराने रूढ़िवादी मार्क्सवाद के विचारों से छुटकारा नहीं पा लेते हैं, वो आम लोगों के लिए अप्रासंगिक बने रहेंगे.

Friday, April 5, 2019

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अनुमान

पश्चीमी उत्तर प्रदेश की कुछ लोकसभा सीटों पर 11 अप्रेल के मतदान से केन्द्र की सरकार चुनने का दौर शुरू हो जाएगा। इन लोकसभा क्षेत्रों में शुरुआती मुकाबला भले त्रिकोणीय दिख रहा हो परन्तु जैसे जैसे प्रचार आगे बढ़ेगा इन क्षेत्रों में लड़ाई सीधी हो जाएगी और काँग्रेस लड़ाई से बाहर हो जाएगी या उसकी हैसियत भाजपा के कुछ सवर्ण वोट काटने की रह जाएगी। मेरी समझ से सपा-बसपा और काँग्रेस के बीच अधिकांश सीटों पर अघोषित गठबंधन और रणनीति बन चुकी है और कम से कम उत्तर प्रदेश का चुनाव इसी रणनीति के चक्रव्यूह में फँसकर भाजपा हारने जा रही है और मेरे अपने अनुमान के अनुसार वह 20-25 सीट तक सिमट कर रह जाएगी।
केवल पश्चीमी उत्तर प्रदेश की बात करूँ तो सपा-बसपा गठबंधन के पास दलित , यादव और ओबीसी के ठोस वोटर हैं जो मेरी समझ से उनको इकट्ठा मिलने जा रहे हैं , पश्चीमी उत्तर प्रदेश में मुसलमान वोटरों की संख्या जिला सहारनपुर में 41.94, मुजफ्फरनगर में 41.30, मेरठ में 34, गाजियाबाद में 25.34, गौतमबुद्वनगर में 13.07, बुलंदशहर में 22.21, बागपत में 27.97, बिजनौर में 43.04, मुरादाबाद में 47.12, रामपुर में 50.57 प्रतिशत है जिसके त्रिकोणीय मुकाबले में बिखरने का डर कुछ जानकार बता रहे हैं। मेरा आकलन है कि इन क्षेत्रों में जैसे ही भाजपा , मोदी , योगी की आक्रामक सभाएँ होंगीं , मुसलमान उस पार्टी की तरफ एकतरफा चला जाएगा जो पार्टी भाजपा को हराने की सबसे मज़बूत स्थीति में होगी।
अर्थात पश्चीमी उत्तर प्रदेश में मोदी-योगी , भाजपा और संघ की कोशिश बैक फायर कर जाएगी। क्युँकि मुसलमान इनके विरुद्ध उहापोह की स्थीति से निकलकर इनके विरुद्ध एक तरफा सबसे मज़बूत प्रत्याशी को वोट करेगा। दरअसल काँग्रेस के पास अपना कोई जनाधार नहीं है और सपा-बसपा गठबंधन के पास केवल दलित वोटरों की संख्या देखें तो सहारनपुर मे 21.73, मुजफ्फरनगर में 13.50, मेरठ में 18.44, बागपत में 10,98, गाजियाबाद में 18.4, गौतुमबुद्धनगर में 16.31, बिजनौर में 20.94, बुलंदशहर में 20.21, अलीगढ़ में 21.20, आगरा में 21.78. , मुरादाबाद में 15.86, बरेली में 12.65, रामपुर में 13.38 प्रतिशत है। अर्थात केवल मुसलमान और दलित ही मिल कर पश्चीमी उत्तर प्रदेश से भाजपा का सूपड़ा साफ कर देंगे , हालाँकि इसके अतिरिक्त अजीत सिंह के जाट वोटर और

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...