दशकों से बाहरियों के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ने वाले असम ने बीजेपी के आने के
बाद एनआरसी प्रक्रिया को अंतिम चरण में जाते हुए भी देखा है और नागरिकता
संशोधन बिल से बढ़ते ख़ौफ़ को भी. क्या इस ख़ौफ़ के बढ़ने से बीजेपी
की मज़बूत जड़ें असम में इन चुनावों में हिल सकती हैं? इस जानने से पहले वो
अतीत समझना होगा, जब असम में बीजेपी ने अपने शुरुआती कदम रखे थे. छह
साल लंबे आंदोलन के बाद असम में पहली बार 1985 में असम गण परिषद की सरकार
बनी. लेकिन जिस आंदोलन के दम पर एजीपी को सत्ता मिली, उसके मकसद को पूरा
करने में वो नाकाम रही. 1991 में हुए विधानसभा चुनावों से पहले उल्फा की ओर से बढ़ती हिंसा और एजीपी की ख़ामियां सामने आ चुकी थीं.
यही
वो चुनाव थे, जिसमें बीजेपी ने पहली बार असम में जीत का स्वाद चखा. इन
चुनावों में बीजेपी 10 सीटें जीतने में सफल रही. बीजेपी की ये जीत राम
मंदिर आंदोलन के दौर में मिली थी. लेकिन 66 सीटें जीतकर सरकार
कांग्रेस ने बनाई. हितेश्वर सैकिया मुख्यमंत्री बने, जिनके बारे में एक
नारा प्रचलित था- ऊपर में ईश्वर, नीचे में हितेश्वर. 1996 चुनावों
में एजीपी फिर मज़बूती के साथ लड़ी. नतीजा 59 सीटें. बीजेपी के लिए ये
चुनाव सिर्फ़ चार सीटें लेकर आया. राम मंदिर आंदोलन ठंडे बस्ते में जा चुका
था.
असमिया जनता ने जिस उम्मीद के साथ एजीपी को चुना था, वो उसे
पूरा करने में फिर विफल रही. इसी विफलता के साथ 2001 में कांग्रेस के तरुण
गोगोई की चुनावी सफलताएं शुरू हुईं, जो लगातार तीन बार सत्ता दिलाने में
सफ़ल रहीं. 126 सीटों वाली विधानसभा में 2001 में आठ, 2006 में दस
और 2011 में पांच सीटें जीतकर बीजेपी असम में अच्छे दिनों का इंतज़ार करती
रही.
कभी
बीजेपी को कुछ सीटें देकर मैदान में खुला खेलने वाली एजीपी 2014 में एक भी
लोकसभा सीट जीतने में नाकाम रही. ये बीजेपी की सफलता थी. 2019
चुनावों में बीजेपी असम की 10 सीटों से मैदान में है. सहयोगी दलों में
एजीपी को तीन और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) को एक सीट मिली है. ज़ाहिर
है कि बीजेपी के यहां तक पहुंचने में 2014 की नरेंद्र मोदी 'लहर' सबसे अहम
रही. लेकिन कई और फैक्टर्स थे, जिन्होंने जमकर काम किया.
असम में संघ
के राष्ट्रवाद के हल चलाने की जो बात सुनील देवधर ने की, इसकी शुरुआत
1946 में हुई थी. तब गुवाहाटी के एक मारवाड़ी व्यापारी केशवदेव बावड़ी की
गुजारिश पर संघ की पहली शाखा असम में बनाई गई थी. एक तरफ़ जहां बीजेपी की ज़मीन संघ तैयार कर रहा था. वहीं कांग्रेस सालों साल से अपनी पाई ज़मीन खोने की तरफ़ बढ़ रही थी. असम में बीजेपी के आने का एक कारण कांग्रेस के ख़िलाफ़ सत्ता विरोधी लहर भी रही. असम में बीजेपी के पक्ष में वोट जाने की एक वजह 2016 में आया 84 फ़ीसदी टर्नआउट भी रहा.
इस
टर्नआउट को बीजेपी के ख़ाते में लाने में हेमंत बिस्वा सरमा की भूमिका
रही. असम आंदोलन से निकले हेमंत कांग्रेस में रहे थे. तरुण गोगोई के बाद
हेमंत दूसरे नंबर के नेता थे. लेकिन हेमंत के नंबर-2 से नंबर-1 तक पहुंचने
की राह में तरुण गोगोई एक पिता के तौर पर खड़े थे. गौरव गोगोई को
मिलती विरासत और ''बैठकों के दौरान राहुल गांधी का मुद्दों से ज़्यादा
कुत्तों को बिस्किट खिलाने पर ध्यान होने'' की शिकायत लिए हेमंत बीजेपी में
शामिल हो गए.
हेमंत असम में छात्रों के बीच काफ़ी लोकप्रिय हैं.
चुनावों में 200 से ज़्यादा सभाएं करते हैं. ऐसे में बीजेपी को हेमंत के
पार्टी में आने का निश्चित तौर पर फ़ायदा हुआ. हालांकि नंबर-2 हेमंत अब भी
नंबर दो ही हैं.
इन लोकसभा चुनावों में भी टिकट न मिलने के बाद एक
बयान काफ़ी चर्चा में रहा था, ''हेमंत पर अमित शाह से कहीं ज़्यादा
ज़िम्मेदारियां हैं.'' ये बयान और ज़िम्मेदारियां हेमंत को जिसने दी थी, वो मोदी के सबसे क़रीबी रणनीतिकार माने जाते हैं.
कहा जाता है कि राम माधव चुपचाप काम करते हैं. संघ की नियमावली में इसे 'प्रसिद्धि परिमुक्त' कहा जाता है.
असम
में कांग्रेस से कई नेताओं को बीजेपी में लाने का काम राम माधव ने किया
था. बीजेपी में हेमंत बिस्वा सरमा भी राम माधव की कोशिशों का नतीजा था. अलगाववादी संगठनों और क्षेत्रीय दलों से बातचीत करने की
इस जनाधार को मज़बूत करने के लिए एजीपी,
बीपीएफ जैसे दलों को साथ रखने का श्रेय भी माधव के खाते में ही जाता है.
लेकिन कुछ दल ऐसे भी हैं, जो बीजेपी के सहयोगी तो नहीं हैं लेकिन वो कई
मायनों में बीजेपी के लिए फ़ायदेमंद होते रहे हैं.
लोअर असम की पार्टी एआईयूडीएफ के प्रमुख बदरुद्दीन अजमल. एक बड़े इत्र व्यापारी और मुस्लिमों के बीच लोकप्रिय माने जाने वाले नेता. अजमल की भूमिका असम में इसलिए भी अहम हो चली है क्योंकि राज्य में मुस्लिमों की संख्या क़रीब 34 फ़ीसदी हो चुकी है. 'असम
अगला कश्मीर होगा या असम का मुख्यमंत्री मुसलमान हो जाएगा.' इस बात पर बहस
और डर लोगों में पैदा किया गया. इसकी झलक 2016 में असम में छिड़े पोस्टर
वॉर से भी लगाया जा सकता है. जहां ऑटो में एक तरफ सर्बानंद सोनोवाल का पोस्टर था और दूसरी तरफ़ बदरुद्दीन अजमल का. सवाल था- किसे चुनेंगे अगला मुख्यमंत्री?
बीजेपी
की ओर से पोस्टर्स में ऐसा भी प्रचार किया गया, जिसमें बदरुद्दीन अजमल और
कांग्रेस के बीच ''समझौता'' होने की बातें कही गईं. हालांकि कांग्रेस ने भी
सर्बानंद सोनोवाल के अरुण जेटली के पैर छूती तस्वीर को ये कहकर प्रचारित
किया कि असमिया अस्मिता को ये कैसे बचाएंगे? सोशल मीडिया पर मज़बूत
बीजेपी ने कथित बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा जमकर उठाया. अमित शाह के
आक्रामक बयान और मोदी की शैली असमिया लोगों को भा गई. 'चाय पर चर्चा' करने वाले मोदी ने चाय के लिए मशहूर असम में घुसपैठियों के ख़िलाफ़ जो चर्चाएं की, वो असर कर गईं.
लेकिन बीजेपी की मज़बूत जड़ें क्या एनआरसी और कैब की वजह से कमज़ोर हुईं हैं? एनआरसी
प्रक्रिया अभी चालू है, फिलहाल इसमें लाखों लोगों का नाम नहीं है. लेकिन
असमिया लोगों की चिंताएं नागरिकता संशोधन बिल को लेकर हैं. ये बिल
अगर पास हुआ तो असम में बांग्लादेश से आने वाले हिंदू बंगालियों को
नागरिकता मिल सकती है. बिल में मुस्लिमों को छोड़कर दूसरे धर्मों का भी
ज़िक्र है. ऐसे में असम की 34 फ़ीसदी मुस्लिम आबादी और एनआरसी से मिली राहतें महसूस करने वाले असमिया लोग कुछ परेशान भी हैं.
असम में बीजेपी ने अपने कई सांसदों का टिकट काटा है. एजीपी को
भी साथ रखने की मजबूरी है. अगर इतनी मज़बूत होती तो क्यों साथ में चुनाव
लड़ते. असम में कैब के आने का लोगों को ये डर है कि कहीं उनकी भाषा,
संस्कृति, रोज़गार न छिन जाए. मोदी की 2014 में इमेज अलग थी लेकिन अभी
घटते-घटते कम हुई है. इन चुनावों में लोग स्थानीय मुद्दे ज़्यादा देखेंगे.
हालांकि सोनोवाल की छवि भी लोगों के बीच अच्छी है. सर्बानंद सोनोवाल की असम में छवि माजुली द्वीप के
इंदेश्वर गाम की बात से समझिए, ''असम में सोनोवाल सरकार आने से व्यक्तिगत
फायदा भले ही न हुआ हो लेकिन लोगों का काम ज़रूर हुआ है. रास्ते बनाए गए
हैं. सोनोवाल बैचलर आदमी है. बच्चे हैं नहीं. ढाई सौ ग्राम चावल होंगे तो
उसका काम चल जाएगा.''
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