Sunday, April 7, 2019

मायावती की राजनीती

सहारनपुर की रैली में मायावती के सामने चंद्रशेखर के पोस्टर लेकर लोग आये हैं, इससे साफ है कि मायावती उनको आर एस एस का एजेंट क्यों कहती हैं? उसके कुछ कारण हैं?
१. पहली बात साफ है कि मायावती बहुजन काशीराम के आंदोलन से निकली बसपा को अब प्राइवेट लिमिटेड कंपनी जैसे चलाती हैं. वो परिवार वाद के खिलाफ थीं, लेकिन पहले अपने भाई अनंत और अब भतीजे को बसपा की कमान सौंपना चाहती हैं. वो नहीं चाहती कि कोई भी दूसरा दलित युवा आकर दलितों का नेता बने. वो खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं कि अगर कोई धाकड बोलने वाला युवा आ गया तो  उनके भतीजे का राजनितिक भविष्य तो ख़त्म समझो और लोकप्रियता में मायावती को भी पछाड़ देगा.
२. कांशीराम के ज़माने के दर्जनों ओबीसी और दलित नेता बसपा से अलग हो गया क्योंकि मायावती के आसपास ब्राम्हणों का घेरा हो गया है. उनको पार्टी फंड के लिए इन लोगों से जरुरत है. जिस ब्राम्हणवादी विचारधार के खिलाफ काशीराम ने आंदोलन किया आज उसी विचारधार से मायावती घिरी रहती हैं.
३. मायावती ने बसपा तबतक ही संभाली जबतक काशीराम का बनाया संगठन, वामसेफ और उनके जातीय समीकरण काम करते रहे. जब कभी भी मायावती की सरकार बनी उन्होंने इन संगठनों के लिए कुछ नहीं किया। बीजेपी संघ के लिए और सपा ने लोहिया  लिए कितना कुछ किया। मायावती को जमीनी राजनीती की हकीकत ही नहीं पता है. बसपा का देश के हर प्रदेश में ७-८% वोट तो है लेकिन मायावती ने कभी यूपी से बाहर कदम ही नहीं रखा. अगर ये ठीक से बहुजन आंदोलन करती और मेहनत से पार्टी बढाती तो तीसरे नंबर की पार्टी की कई राज्यों में सरकार होती. लेकिन वो एसी कमरे से बाहर कभी निकली ही नहीं इसलिए आज यूपी में भी ओबीसी तो छोड़ो पुरे दलितों की नेता भी नहीं रह गई, केवल एक जाति जाटव की नेता हैं, बल्कि उसमें से भी लोग कट रहे हैं.
४. मायावती इस समय बसपा को बचाने की लड़ाई लड़ रही हैं. विधानसभा में केवल १७ सदस्य हैं, लोकसभा में शून्य और एक दो सदस्य ही राजयसभा में बचे होंगे. ऐसे में उनकी पार्टी राजनीति कैसे करेगी? उनको मलाई कैसे मिलेगी? इसलिए उनको किसी भी हाल में इस समय पार्टी बचानी है. तभी अपनी विचारधार से अलग और सबसे बड़ी विरोधी सपा के साथ गठबंधन भी किया है.
५. अब मायावती ने पार्टी के सिद्धांतो से भी समझौता चालू कर दिया है. पिछला कोई बहुजन आंदोलन आपको याद है जब मायावती ने हिस्सा लिया हो या उसको लीड किया हो? न एससी एसटी एक्ट के खिलाफ बोलीं न शहरन पुर दंगो के खलाफ. बस रोहित वेमुला के मामले में फर्जी तरीके से इस्तीफा  शहानुभूति लेनी चाही. और तो और १०% आरक्षण को समर्थन भी दे दिया? इससे बड़ा उनका मनुवादी होने का क्या सबूत चाहिए आपको?

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