दो
दशक बाद ऐसा होगा कि मध्य प्रदेश में लोकसभा चुनावों के समय कांग्रेस की
सरकार होगी. इससे पहले 1999 में जब लोकसभा चुनाव हुए थे तब अविभाजित मध्य
प्रदेश में दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी. यही कारण
है कि इस बार प्रदेश से कांग्रेस को काफी उम्मीदें हैं. 2014 के बीते लोकसभा चुनावों में प्रदेश की 29 लोकसभा सीटों में से
भाजपा 27 सीटें अपनी झोली में डालने में सफल रही थी जिसने केंद्र में पूर्ण
बहुमत की भाजपा सरकार के बनने में बड़ा योगदान दिया था. केवल दो सीटें
कमलनाथ की छिंदवाड़ा और ज्योतिरादित्य सिंधिया की गुना ही कांग्रेस बचा पाई
थी. अजय सिंह, कांतिलाल भूरिया, अरुण यादव, विवेक तन्खा, सुरेश पचौरी,
सुंदरलाल तिवारी, मीनाक्षी नटराजन जैसे कांग्रेस के बड़े-बड़े दिग्गजों को
हार का सामना करना पड़ा था. कांग्रेस का वह प्रदेश में अब तक का सबसे घटिया
प्रदर्शन रहा. लेकिन अब कांग्रेस बदली – बदली नजर आ रही है. प्रदेश में सरकार के गठन
ने उसके नेताओं में नई जान फूंक दी है. यही कारण है कि मुख्यमंत्री और
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया
सार्वजनिक मंचों से 20 -22 से अधिक लोकसभा सीटें जीतने के दावे कर रहे हैं.
हालांकि, दावे तो पार्टी की ओर से विधानसभा चुनावों के दौरान भी 150 सीट
से अधिक जीतने के किए गए थे. लेकिन पार्टी 114 सीटों पर सिमटकर बड़ी
मुश्किल से जोड़-तोड़ की सरकार बनाने में सफल हुई थी. वहीं, भाजपा को फिर से 2014 का प्रदर्शन दोहराने की उम्मीद है. सत्ता
गंवाने के बावजूद प्रदेश भाजपा के बड़े नेता सभी 29 सीटें जीतने के अति
आत्मविश्वासी दावे कर रहे हैं. जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह
चौहान, केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
प्रभात झा और नरोत्तम मिश्रा जैसे बड़े नाम शामिल हैं. लेकिन किसके दावों में कितना दम है. इसकी पड़ताल के लिए यदि हालिया
संपन्न प्रदेश विधानसभा चुनावों के नतीजों पर नजर डालें तो तस्वीर काफी हद
तक साफ हो जाती है. हालिया संपन्न विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने 114 और भाजपा ने 111
विधानसभा सीटें जीती थीं. भाजपा को 41 तो कांग्रेस को 40.9 फीसद मत मिले
थे. प्रदेश के कुल 230 विधानसभा क्षेत्र 29 लोकसभा सीटों में विभाजित है. 27
लोकसभा सीटों में 8-8 विधानसभा क्षेत्र और दो लोकसभा सीटों में 7-7
विधानसभा क्षेत्रों को समाहित किया गया है. नतीजे बताते हैं कि कुल 29 लोकसभा सीटों में से 17 में भाजपा आगे रही है जबकि कांग्रेस ने 12 सीटों पर बढ़त बनाई है. अगर इन नतीजों को ही लोकसभा के नतीजे मान लें तो कुल 10 सीटों के फायदे
में कांग्रेस दिखाई दे रही है और इतनी ही सीटों का भाजपा को नुकसान हुआ है.
हालांकि, पिछली बार जीती छिंदवाड़ा और गुना लोकसभा सीटों में से गुना पर
विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस पिछड़ गई है लेकिन अन्य 11 सीटों पर
भारी बढ़त बना ली है. बैतूल, भिंड, देवास, धार, ग्वालियर, खरगोन, मंडला,
मुरैना, राजगढ़, रतलाम और शहडोल वे 11 सीटें हैं. भाजपा के नजरिए से देखें तो इन 11 सीटों का नुकसान उठाकर एक गुना की सीट पर वह बढ़त बनाने में कामयाब रही है. वैसे ऐसा प्रचलित है कि विधानसभा और लोकसभा के मुद्दे अलग होते हैं.
लेकिन 2014 के चुनावों में देखा गया कि विधानसभा वाले नतीजे ही लोकसभा में
मिले. तब 2013 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने 165 और कांग्रेस ने 58 सीटें
जीती थीं. इन नतीजों को लोकसभा सीटों के आधार पर विभाजित करके देखते तो तब
कुल 29 में से 25 सीटें भाजपा की झोली में जा रही थीं. छह महीने बाद हुए लोकसभा चुनावों में नतीजे इससे मिलते-जुलते ही आए. 29
में से 27 सीटें भाजपा जीतने में सफल रही थी. हालांकि, भाजपा ही नहीं,
कांग्रेस ने भी 2014 लोकसभा के मध्य प्रदेश के नतीजों को मोदी लहर बताया
था. लेकिन, तस्वीर तो 2013 के विधानसभा चुनावों में ही साफ हो गई थी. इसलिए
मोदी के होने या न होने का तब नतीजों पर कोई खास असर नहीं पड़ा था. हालांकि, मध्य प्रदेश में यह ट्रेंड 2003 से ही बन गया है कि विधानसभा
चुनावों से मिलते – जुलते नतीजे ही छह माह बाद होने वाले लोकसभा चुनावों
में दिखाई देते हैं. 2003 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को 173 और कांग्रेस को 38 सीटों पर
जीत मिली थी. छह माह के भीतर हुए लोकसभा चुनाव में भी नतीजे मिलते-जुलते
रहे जहां 29 में से 25 सीट भाजपा और 4 कांग्रेस जीती. 2008 विधानसभा चुनावों में भाजपा को कुछ सीटों का नुकसान उठाना पड़ा.
विधानसभा में उसकी सीट संख्या घटकर 143 रह गई. जबकि कांग्रेस की सीटें
बढ़कर 71 हो गईं. नतीजे लोकसभा में भी बदले-बदले नजर आए. 2004 में 25 सीटें जीतने वाली
भाजपा 16 पर सिमट गई और 4 सीटें जीतने वाली कांग्रेस की सीट संख्या 12 हो
गई. यहां तक कि विधानसभा चुनावों का असर तब लोकसभा पर इस कदर दिखा था कि
मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों में अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन कर 7
सीटें जीतने वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रदेश में लोकसभा में भी खाता
खोलने में सफल रही. विधानसभा चुनावों में जिस रीवा लोकसभा सीट पर वह
कांग्रेस को पीछे छोड़कर दूसरे पायदान पर रही थी, लोकसभा में यही रीवा सीट
उसने जीत ली.
हालांकि, 2003 के पहले यानी अविभाजित मध्य प्रदेश में वोटिंग ट्रेंड ठीक
इसके विपरीत था. राज्य में जिस पार्टी की सरकार होती थी, लोकसभा में नतीजे
उसके विपरीत आते थे. यह ट्रेंड 1989 से ही चलता रहा. 1989 के लोकसभा चुनावों के समय प्रदेश
में कांग्रेस शासन में थी. लेकिन भाजपा 40 में से 27 लोकसभा सीट जीत गई, 8
सीटें कांग्रेस के हाथ लगीं. 1991 में भाजपा प्रदेश की सत्ता में थी. लेकिन कांग्रेस 40 में से 27 सीटें जीत गई और 12 ही भाजपा के हाथ लगीं. बीसवीं सदी के अंतिम दशक में देश राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा
था और तीन सालों के भीतर 3 बार लोकसभा चुनाव हुए, 1996, 1998 और 1999 में.
इस दौरान मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार
थी. राज्य में सरकार होने और विधानसभा में अच्छा खासा वोट पाने के बावजूद इन
तीनों ही लोकसभा चुनावों में जनता ने प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी को नकार
दिया.
40 सीटों में से 1996 में भाजपा को 27 और कांग्रेस को 8, 1998 में भाजपा
को 30 और कांग्रेस को 10, 1999 में भाजपा को 29 और कांग्रेस को 11 सीटें
मिलीं. प्रदेश के विभाजन के बाद यह ट्रेंड बदल गया था. हालांकि, 1989 से ही
प्रदेश का वोटिंग ट्रेंड यह तो बताता ही है कि केंद्र में जिस पार्टी की
हवा चलती है, यहां की जनता जरूरी नहीं कि उसके साथ बह जाए. तो इस तरह आंकड़ों के नजरिए से देखें तो दोनों ही दलों के वर्तमान दावे
हकीकत से काफी दूर नजर आते हैं. न तो भाजपा के लिए सभी 29 सीटें जीतना संभव
दिखता है और न ही कांग्रेस का 20 से अधिक सीटें जीतने का सपना पूरा होता
दिखता है. वैसे तो भाजपा इस बार 10 सीटों के नुकसान में दिख रही है. लेकिन बैतूल,
भिंड और मुरैना सीट के भी उन 10 सीटों में शामिल होने ने पार्टी के नेताओं
के माथे पर बल डालना शुरू कर दिया है. ये तीन वे सीट हैं जो भाजपा का गढ़
बन चुकी हैं. भिंड से लगातार आठ चुनाव से भाजपा अपराजेय है. आखिरी बार उसे
1984 में यहां से हार मिली थी. तो वहीं बैतूल और मुरैना से 6 चुनावों से
भाजपा नहीं हारी है. 1991 में आखिरी बार हारी थी.
भिंड में भाजपा 94,492 मतों से, बैतूल में 40,676 मतों से और मुरैना में
1,26,842 मतों के भारी अंतर से पिछड़ गई है. 2014 के लोकसभा चुनावों में
ये सीटें भाजपा ने क्रमश: 159961, 328614 और 132981 मतों के बड़े भारी अंतर
से जीती थीं. यही छटपटाहट के चलते भाजपा ने तीनों सीटों पर मौजूदा सांसदों
के टिकट काट दिए हैं.
इन तीनों के अतिरिक्त मध्य प्रदेश की वे अन्य 8 लोकसभा सीटें जिन पर
विधानसभा चुनावों के दौरान भाजपा पिछड़ गई है, नीचे सूचीबद्ध हैं. भिंड, मुरैना और बैतूल के साथ-साथ इन आठ सीटों पर भी मौजूदा सांसदों के टिकट काटने की कार्रवाई पार्टी की ओर से की गई है.
पिछड़ने वाली इन कुल 11 सीटों में से 10 पर भाजपा के सांसद हैं जिनमें
से 8 मौजूदा सांसदों के टिकट काटे गए हैं. केवल मंडला में फग्गन सिंह
कुलस्ते और राजगढ़ में रोडमल नागर पर भाजपा ने फिर से दांव खेला है. वहीं, इनमें से एक सीट रतलाम है जिस पर कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया
सांसद हैं. 2014 में भाजपा ने यह सीट जीती थी लेकिन सांसद दिलीप सिंह
भूरिया के निधन के बाद उपचुनाव में कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी. पार्टी ने
इस सीट पर भी प्रत्याशी बदला है. उपचुनाव में निर्मला भूरिया को उतारा था
और अब झाबुआ के वर्तमान विधायक जीएस डामोर को टिकट दिया है. इन सीटों पर भाजपा की चिंता ऐसे भी समझी जा सकती है कि किसी भी विधायक
को लोकसभा चुनाव न लड़ाने की घोषणा करने वाली भाजपा को अपना नियम ताक पर
रखकर डामोर को टिकट देना पड़ा है.
वहीं गुना सीट जो कि कांग्रेस का गढ़ है, उस पर विधानसभा चुनाव के दौरान
कांग्रेस के पिछड़ने ने पार्टी से अधिक ज्योतिरादित्य सिंधिया को परेशानी
में डाल दिया है. यही कारण है कि कांग्रेस के लिए सुरक्षित मानी जाने वाली
इस सीट पर अंत समय तक सिंधिया के नाम पर सस्पेंस बना रहा. सिंधिया की ओर से कई बार ऐसे संकेत भी मिले कि वे सीट बदलकर ग्वालियर से
लड़ने के इच्छुक हैं, लेकिन फैसला पार्टी आलाकमान राहुल गांधी और प्रदेश
अध्यक्ष कमलनाथ को करना था. बहरहाल, कांग्रेस ने सभी 29 सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं
जबकि भाजपा ने इंदौर को छोड़कर बाकी 28 सीटों पर उम्मीदवारों के नामों पर
अंतिम मुहर लगा दी है.
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