Tuesday, April 8, 2014

कौन है असली हिन्दू?

कल साम को मेरे दोस्त के पास उसके दोस्त का फोन आया, उसने कहा कि वो मुझसे भी बात करना चाहता है। मैने बात की, तो बोला सुना है आप मोदी के विरोधी हैं। (मेरे दोस्त ने उसको यह बता रखा था कि कमलेश मोदी का विरोध करता है। ) मैंने कहा हाँ लेकिन मोदी का नहीं मोदी की नीतियों का विरोधी हूँ। बोला आप हिन्दू हैं? मैने कहा हाँ। वो बोला आप राम की पूजा करते हैं? मैने कहा हाँ। वो बोला आप पाकिस्तान से नफरत करते हैं? मैने कहा नहीं। बोला बस आपसे बात नहीं करनी है, आप असली हिन्दू नहीं हैं। फोन काट दिया। ऐसा ही दो-तीन महीने पहले हुआ था, जब गाँव के मेरे एक ब्राम्हण मित्र ने कह दिया था कि जो भाजपा के साथ नहीं हैं, वो हिन्दू नहीं हैं। मैने बहुत करारा जवाब दिया था, असल में वो शराब और मांस खाते-पीते थे, बस मैने उन्हें घेरा और दो-तीन लोगों के सामने माफी तक मंगवा ली थी। तब से मैने सिर मुँडवा कर अपनी एक बड़ी सी चोटी भी रखी हुई है। बचपन से मांस खाता था, लेकिन 2011 में छोड़ दिया था। असल में जिसने मांस कभी नहीं खाया होगा, उसे तो कोई दिक़्कत नहीं है। लेकिन जो खाता रहा है और उसका स्वाद जानता है, उसके लिए बहुत कठिन कार्य है। फिर इतिहास तो हर संत का होता है, वाल्मीकि का भी था। और नसे के नाम पर तो जिंदगी में कोई चीज नहीं छुई होगी। रामायण, रामचरित मानस, भगवत गीता, एक-दो पुराणों के कुछ हिस्से, उपनिषदों के कुछ भागों का अध्ययन भी किया है। हर मंगलवार को तेल नहीं लगता हूँ, और मंदिर भी जाता हूँ। फिर भी मुझपर टैग लग गया कि मैं हिन्दू नहीं हूँ
किसी व्यक्ति विशेष का समर्थन ना करने से ही लोग किसी को गैर-हिन्दू और पाकिस्तानी घोषित कर दे रहे हैं। आज व्हाट्स एप पर मोदी के पक्ष और विरोधियों के विपक्ष में इतनी शर्मनाक बातें चलाई जा रही हैं, कि आपको लिखकर बता नहीं सकता। बहुत गन्दे और अस्लील वीडियो और फोटो बनाकर भेजे जा रहे हैं। पूरा का पूरा प्रचार हार्ड हिन्दुत्व और साम्प्रदायिकता पर चल रहा है। मोदी और उनके बड़े नेता या बीजेपी का ओफ़िसियल पेज भले ही फ़ेसबुक और ट्विटर साम्प्रदायिकता ना फैलाए, लेकिन उनकी टीम और समर्थक पूरी तरह से नफरत की राजनीति करना चाहते हैं। पूरा का पूरा प्रचार पाकिस्तान के खिलाफ किया जा रहा है। मतलब जो मोदी के पक्ष में वो हिन्दू और हिन्दुस्तानी, जो विरोधी वो पाकिस्तानी और मुस्लिम? भाजपा समर्थक व्हाट्स एप पर लगातार मुजफ़्फ़र नगर दंगों को भुना रहे हैं। कहते हैं यह हमारा जवाब था लव जिहाद को (यह बात तो अशोक सिंहल भी कह चुके हैं, जिनकी खुद की बेटी ने मुस्लिम से शादी की है।) हर जगह यह स्वीकार हो रहा है कि अमित शाह ने यह काम किया था। असल में यूपी के जिन दो साल के 150 दंगों की बात की जा रही है। उनमें बरेली और लखनउ का दंगा छोड़ कर हर जगह अमित शाह ने इनडायरेक्ट रूप से भूमिका अदा की है। जब से अमित शाह यूपी प्रभारी बने हैं, तब से बजरंग दल और संघ का कैडर इस तरह की हरकतों के लिए तैयार हो गया था। हर जगह मुस्लिमों को हिंदुस्तान विरोधी बताया गया। यूपी जैसे बड़े राज्य में होने वाले अपराधों में भी अगर एक पक्ष हिन्दू-मुस्लिम है तो उसे भी साम्प्रदायिकता का रंग दिया गया है.इस तरह से मैं यूपी का युवा होने के नाते यह कह सकता हूँ क़ि अगर मोदी जी प्रधानमंत्री बने तो 2014 के अंत तक यूपी में फिर से कोई बड़ा दंगा हो सकता है। जो देश के लिए बहुत घातक होगा. वैसे यह बात किसी बड़े नेता ने भी कही थी कि अगर देश का अल्पसंख्यक, सम्प्र्यादयिक होता है, जो कुछ हद तक लोगों के बहकावे में आ जाते हैं तो वह अपना ही नुकसान करेगा। लेकिन जिस दिन इस देश का बहुसंख्यक जो सेकुलर है, सम्प्रदायिक हो गया तो देश के लिए बहुत घटक होगा
देश का दुर्भाग्य ही है कि आज एक व्यक्ति विशेष का समर्थक और विरोधी होने पर हिन्दू और हिन्दुस्तानी होने का सर्टिफिकेट मिल रहा है
। देखना है यह मार्केटिंग कब तक छ्लेगी. क्योंकि सवाल है कि अगर देश को नफरत की राजनीति पसंद है तो क्यों नोट(जिसके सब मारामार मची है।) के गाँधी की तस्वीर है, उन्हें मारने वाले हिन्दुत्ववादी गोडसे की नहीं

घोषणा पत्र 2014

पिछले कई दिनो से राजनैतिक पार्टियों के घोषणापत्र पर कुछ लिखने की सोंच रहा था, लेकिन सभी ने इसे जनता के सामने रखने में बहुत देर कर दी। इतने कम समय में तो यह आम जनता तक पहुंच भी नहीं पाएगा। सबसे पहले कांग्रेस, फिर सपा, आप, जेडीयू, लेफ्ट और अन्य दलों ने बारी-बारी से इसे 2-3 अप्रैल तक सामने रख दिया। लेकिन चर्चा के अनुसार जिस पार्टी (भाजपा) की सरकार बननी है,  वो तो इसपर बिल्कुल भी गंभीर नहीं दिखाई दी। जिस दिन पूर्वोत्तर में वोटिंग हो रही थी, उसी दिन भाजपा माफ करिए.... मोदी जी का घोषणापत्र आया। अब उस जनता के साथ इससे बड़ा और क्या धोखा हो सकता है, जिससे यह वादा किया था कि पूरे भारत में क्षेत्रीय अंतर मिटाने का कार्य करेंगे। अब अगर जनता के अहम मुद्दों की बात करें जो इसबार घोषणापत्र में रखे गए हैं, तो उनकों बिन्दुवार निम्नवत देखना होगा।
1). भ्रष्टाचार: यह वो मुद्दा है जो यूपीए सरकार के लिए घातक रहा और इसी के विरोध मे अन्ना आन्दोलन और फिर आम आदमी पार्टी का उदय हुआ। कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में इसे रोकने के लिए लोकपाल कानून बनाया है और आगे भी ऐसे ही कानून बनाने के वादे कर रही है। लेकिन जितना अच्छे से वह भ्रष्टाचार करती रही है, वह भी किसी से छिपा नहीं है। भाजपा ने इस मुद्दे पर आम आदमी पार्टी की कॉपी कर ई-गर्वर्नेंस का उपाय तो बताया है लेकिन येदुरप्पा, बोखारिया, गडकरी और श्रीरामलु जैसे नेताओं के साथ वो भ्रष्टाचार से कैसे लड़ेगी? यह सवाल जनता जरूर पूंछेगी। बाकी सभी दलों ने भी इसपर अपनी राय रखने का काम किया है। महज़ औपचारिकता स्वरूप।
2). कालाधन: इस मुद्दे को भाजपा के सहयोगी बाबा रामदेव पिछले 3-4 सालों से उठाते रहे हैं, और मोदी जी को कालाधन लाने में सक्षम एकमात्र नेता भी बताते रहे हैं। लेकिन पिछले दिनों जब केजरीवाल ने अंबानी के स्विसबैंक के अक़ाउंट बताए तो उन्होंने कोई आस्वशन नहीं दिया। कांग्रेस तो इस मुद्दे पर बिल्कुल भीगंभीर नहीं है। एक मात्र आम आदमी पार्टी इस मुद्दे पर अपना स्टैंड फिलहाल तो साफ दिखा रही है। लेकिन उसे भी उद्योगपतियों से लडकर ही यह काम करना होगा। जिस तरह से इस देश में राजनीति में उद्योगपति अपना दखल देने लगे हैं, उससे तो केजरीवाल को भी बहुत बच कर काम करना होगा। मोदीजी का स्पेशल टास्क फोर्स उन उद्योगपतियों का क़ालाधन कैसे देश में लाएगा, जो इस समय उनके प्रचार पर लाखों रुपए खर्च कर रहे हैं।
3). गरीबी और मँहगाई: देश का दुर्भाग्य ही है कि आज भी देश की लगभग 50 से अधिक आबादी अपना पेट भरने के लिए संघर्ष कर रही है। यही कारण है कि सरकार को खाद्य सुरक्षा कानून लाना पड़ा है। राहुल गाँधी देश की 70 करोड़ आबादी को मिडल क्लास में लाने की बात तो करते हैं, लेकिन यह तो इंदिरा गाँधी के जमाने का वादा था। वहीं मँहगाई कम करने की बात पर कांग्रेस इसे विकास दर बढ़ाकर रोंकेगी। भाजपा भी इसपर अपना स्टैंड क्लियर नहीं किया है। भाजपा इसके लिए केवल 6 महीने का समय मांग रही है। अब हमें यह भी समझना होगा कि आखिर यह मंहगाई कम कैसे होगी? 2012 के गुजरात विधानसभा में मोदी का गरीबों को घर देने का वादा भी जैसे का तैसे पड़ा है। आम आदमी पार्टी ने इसपर अपनी कुछ स्कीम और सब्सिडी जैसी योजनाएँ दिल्ली में अपनाई हैं, जिनका फिर से देश को भरोसा दिलाया है।
4). रोजगार और शिक्षा: ये दोनों मुद्दे एक-दूसरे से मिलते हुए हैं। कांग्रेस ने शिक्षा का कानून तो ला दिया लेकिन जमीन पर यह कानून खोखला ही साबित हुआ है। देश में नए आई. आई. टी., आई. आई. एम. और यूनिवर्सिटी बनाने की बात तो दोनो दल कर रहे हैं। लेकिन कांग्रेस के साथ-साथ गुजरात में शिक्षा के निजीकरण पर पूरे देश ने मोदी का भी स्टैंड देखा है। इसपर नीतीश कुमार और अरविन्द केजरीवाल ने अपना रुख सही ढंग से साफ किया है. केजरीवाल की सरकार में मनीष सिषोदिया जैसी शिक्षा मंत्री का कार्य जनता ने देखा है। ये दोनों नेता सरकारी स्कूलों की हालात ठीक करने की बात कर रहे हैं, इनका कहना है कि अगर देश का हर गरीब आदमी अपने बच्चे को सही शिक्षा दे पाएगा तब आई. आई. टी. और यूनिवर्सिटी काम आएंगे।
हर आदमी को अच्छी शिक्षा मिलेगी तब वह जातीय, धार्मिक और क्षेत्रीय अंतर को दूर कर सकता है। उनको ऐसी शिक्षा दी जाए जो उनके रोजगार के काम आए। वहीं रोजगार के लिए सब पर हावी नरेन्द्र मोदी दिखते हैं। यह बात भी है कि उन्होंने गुजरात में रोजगार दिया भी है। लेकिन पूरे देश में यह केवल गुजरात जैसी प्राइवेटाइजेशन की स्कीम पर चलना मुस्किल होगा। नीतीश कुमार ने तो निजी क्षेत्र में भी आरक्षण की बात करके सबको चौंका दिया है। वहीं अखिलेश और अन्य नेताओं ने केवल वादे किए हैं। कांग्रेस तो इसपर अपना मुंह दिखाने लायक भी नहीं बची है। पिछले 10 सालों में लोगों ने देश में बेरोजगारी की समस्या को देखा है।
5). महिलाओं और देश की आंतरिक की सुरक्षा: यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, जिसमें कांग्रेस महिला सुरक्षा पर पूरी तरह से फेल हुई है। आंतरिक सुरक्षा की बात की जाए तो इस सरकार ने इसपर कुछ हद तक कामयाबी पाई है। वहीं राहुल गाँधी द्वारा पुलिस में 25% महिलाओं की बात करके कुछ सही तो किया है। उनका पूरा ध्यान महिलाओं के शशक्तीकरण पर रहा है। भाजपा ने भी इसे मुद्दा बनाकर कुछ लाभ लिया और कुछ वादे भी किए लेकिन कोई जिक्र करने लायक प्वाइंट नहीं है। आम आदमी पार्टी ने महिला सुरक्षा कमांडो बनाने का अपना वादा दोहराया है, जो अच्छा है। आंतरिक सुरक्षा पर भाजपा नहीं मोदी पर मुझे कुछ भरोषा है, अगर वो साम्प्रदायिकता संभाल लें तो? बाकी आप सपा जैसी पार्टियों का इस मुद्दे पर स्टैंड मुलायम सिंह के हालिया बयान से समझ सकते हैं।
6). विदेशनीति: विदेश नीति पर अगर बात की जाए तो भाजपा का स्टैंड इसपर आक्रमक लगता है, जैसा मोदी कहते हैं पाकिस्तान से युध्द करो, चीन पर चड़ बैठो, अमेरिका से रिस्ते अहम होंगे। मोदी ने इसपर बांग्लादेशी घुसपैठियों पर रोंक के लिए बात की है, लेकिन यह भी वादा कर दिया है कि जिस भी देश में हिन्दुओं पर जुर्म हो रहा है वो भारत आ जाएँ. बिना यह सोंचे कि अगर देश में अल्पसंख्यकों को कष्ट हुआ तो वो किसी दूसरे मुल्क में भी जा सकते हैं। यह विचारधारा तो पूरी तरह से जिन्ना की थी। आम आदमी पार्टी ने अपनी उम्र और चुनाव में सरकार न बनाने की उम्मीदों के अनुसार इसपर ज्यादा विस्तारित बात नहीं की है। हाँ लेकिन देश को सम्मान के साथ सबको सात लेकर चलने की बात की है. अगर कांग्रेस की बात करें तो पिछले दस सालों में आपको कई उतार-चड़ाव देखने को मिल सकते हैं। आगे भी उसने यही कार्यक्रम जारी रखने का वादा किया है।
7). बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य और शहरीकरण: यह मुद्दे आज देश के लिए आवश्यक हैं, कांगेस ने इसपर काम तो किया है, लेकिन पूरे देश में यह विकास कमजोर रहा है। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में इसतरह के कार्य ना के बराबर हुए हैं। भाजपा ने इसपर अपना वादा किया है, गुजरात के इसी विकास के नाम पर जो हवा बनी है, वह देखना देश भर में कैसे जाता है। सभी पार्टियों ने इसपर अपने-अपने वादे किए हैं। भाजपा और कांग्रेस ने 100-100 नए मॉर्डन शहर बनाने का भी वादा किया है। बिजली और पानी पर आप ने दिल्ली जैसा वादा और भाजपा ने गुजरात जैसा वादा किया है। सभी दलों ने स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देने की बात कही है, जिसमें हर राज्य में एक-एक एम्स खोलने का वादा भी सामिल है।
8). कृषि: आज भी देश की लगभग 70 आबादी गावों में खेती पर निर्भर है। और कृषि हमारे देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है। आज देश में किसान आत्म हत्या कर रहे हैं। कोई भी किसान अपने बच्चों को किसान नहीं बनाता चाहता है। किसान की हालत बद से बदतर होती गई और देश की केन्द्र और राज्य सरकारें तमाशा देखती गईं। कांग्रेस ने जितना पिछले 10 सालों में किसानों को लुटा शायद ही किसी और ने ऐसा किया होगा? अब राहुल गाँधी ने यह रिस्ता फिर से बनाने की कोशिश की और किसानों से मिलकर उनकी समयस्याएं इसमें डाली हैं। उन्होंने आदिवासी किसानों और मछुआरों के लिए अलग मंत्रालय खोलने का वादा है। जब किसान शब्द आता है तो भाजपा कोई भी बड़ा और अच्छा वादा नहीं कर पाती है। गुजरात के हिसाब से तो मोदी जो 100 नए शहर बनाने वाले हैं वो तो गावों को उजाड़कर ही बनेंगे। एक-आध वादे अच्छे हैं जो मोदी के गुजरात में ही फेल हो गए हैं। सपा और जेडीयू ने अपने-अपने राज्य के किसानों के लिए अच्छे वादे किए हैं। सबने किसानों को लोन, फसल बीमा, सिंचाई और बिजली देने की बात की है। लेकिन किसी ने भी किसान के असली दर्द उनकी जमीन छीनने के मुद्दे को  समझने की कोशिश नहीं की है।
9). प्रवासी मजदूरों की समस्याएँ: प्रवासी मजदूर सबसे ज्यादा बिहार और उत्तरप्रदेश से ही बाहर जाते हैं। और दिल्ली में इन राज्यों की अच्छी खासी उपस्थिति के बावजूद इनकी समस्याओं के लिए कोई भी कदम नहीं उठाया जाता है। कांग्रेस ने तो इस क्षेत्र में 60 साल में कुछ नहीं किया है, अगर दिल्ली के एक-दो काम छोड़ दें तो। वहीं भाजपा ने इस मुद्दे पर अपने घोषणा पत्र में कुछ भी नहीं लिखा है। आम आदमी पार्टी ने प्रवासी मजदूरों के मुद्दों को सामिल किया है, जिसमें उनका रेग्युलर होना, ठेकेदारी प्रथा हटाना, उनके स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देना, उनके लिए कालोनियों का वितरण जैसी बुनियादी समस्याएं हैं। वहीं सबसे अच्छा वादा बिहार के मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार ने किया है। नीतीश कुमार ने प्रवासी मजदूरों की दिल्ली, मुम्बई, चण्‍डीगढ़ जैसे शहरों में सुरक्षा के लिए विशेष कानून बनाने का वादा किया है। वैसे मैने भी "प्रवासी होने के अधिकार" पर राहुल गाँधी को पत्र लिखा था, लेकिन उन्होंने कोई वादा नहीं किया।
10). चुनावप्राणाली: इसी क्रम में मैं भाजपा का एक और वादा याद दिलाना चाहता हूँ। वह है कि अगर उनकी सरकार बनी तो वो लोकसभा और विधान सभा के चुनाव साथ-साथ कराएंगे। आखिर क्या इतने राज्यों वाले विविधता पूर्ण और संसदीय राजनीति वाले देश में ऐसा करना उचित होगा? मुझे लगता है कि भाजपा देश की संसदीय प्रणाली को नहीं पसंद करती है और अमेरिका के जैसी व्यक्ति केन्द्रित व्यवस्था चाहती है। भाजपा हर बार एक लहर लेकर चलती है, जो केन्द्रिय राजनीति में कुछ सफल होती है लेकिन राज्यों के चुनाव में इसे कोई भी पसंद नहीं करता है। भाजपा एक तीर से दो निशाने साधने के मूड में है। और सभी पार्टियाँ चुनावों को ईमानदारी से कराने की बात तो कर रही हैं, लेकिन किसी ने भी यह आस्वासन नहीं दिया है कि वो चुनाव में कालाधन नहीं लगाएंगे या चुनाव आयोग की आचार संहिता का पालन करेंगे। सभी वोट के लिए चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था को कमजोर करना चाहते हैं।
साम्प्रदायिकता, आरक्षण, अल्पसंख्यक, जातिवाद और भी कई मुद्दे हैं, जिनपर हमारे राजनैतिक दल वादा तो करते हैं लेकिन सही से लागू नहीं कर पाते हैं। भाजपा जैसी पार्टियाँ तो राम मंदिर को अपने घोषणापत्र में सामिल करती हैं लेकिन इन बुनियादी मुद्दों से दूरी रखते हैं। कुछ गैर जरूरी और घातक वादे भी किए गए हैं जिनमें राम मंदिर, कॉमन सिविल कोड और धारा 370 सामिल हैं।  देश में मुद्दों की कमी नहीं है, लेकिन इन बुनियादी मुद्दों पर ही राजनैतिक दलों ने अपना वादा किया है। अब देखना है कि जिस दल की सरकार बनेगी वो इसे पूरा करेंगे या नहीं। कुछ लोग घोषणा पत्र को गंभीरता से नहीं लेते हैं लेकिन मेरा कहना है कि सबके घोषणा पत्र पढ़ना चाहिए और अगले चुनाव में वादे ना पूरे करने पर उनसे सवाल भी पूंछने चाहिए।

Friday, April 4, 2014

नेताजी की "गंदी बात"

लोकतंत्र की सबसे बड़ी खासियत है कि इसमें सबको बोलने का अधिकार प्राप्त है। लेकिन हमारे देश में जैसे-जैसे चुनाव पास आते जा रहे हैं, वैसे-वैसे नेताओं के बोलने का अधिकार कुछ ज्यादा ही बढ़ता जा रहा है। नेताओं को लगता है कि वो कुछ भी बोल सकते हैं। भारत में चुनाव आयोग को जिस तरह काम करना चाहिए उस तरह हो नहीं पाता है। अगर हम देश के राजनैतिक इतिहास में जाएँ तो सत्तर के दशक तक यह मर्यादा पूरी तरह से कायम थी। 60 के दशक में एक बार के चुनाव में जवाहर लाल नेहरू ने अम्बेडकर साहब की लोक सभा में कहा था कि अगर आपको लगता है कि कांग्रेस पार्टी की नीतियाँ अच्छी हैं, तो हमे वोट करें लेकिन मैं यह नहीं कह सकता कि आप अम्बेडकर साहब को वोट ना करें। डा. राम मनोहर लोहिया जी हमेशा ही कांग्रेस की नीतियों के विरोधी रहे लेकिन कभी भी उसके नेताओं पर पर्सनल टिप्पणी नहीं की। एक बार इंदिरा गाँधीजी ने समाजवादी नेता मोहन सिंह के खिलाफ प्रचार करने से मना कर दिया था। इसी तरह से जयप्रकाश नारायण हमेशा ही व्यक्तिगत तौर पर इंदिरा गाँधी की बहुत इज्जत करते थे। अटल बिहारी बाजपाई ने भी कभी इंदिरा को दुर्गा का रूप बताया था.अगर अब देखा जाए तो हर नेता एक-दूसरे पर व्यक्तिगत टिप्पणी करने में लगा है। इसकी शुरुआत सबसे पहले मोदीजी ने की की थी. उन्होंने राहुल गाँधी को सहजादा कहना शुरु किया, मनमोहन को मौनमोहन, और सोसल मीडिया पर कांग्रेसी नेताओं खासकर गाँधी परिवार पर व्यक्तिगत आपत्तिजनक और गैरलोकतांन्त्रिक भाषा का प्रयोग करते या समर्थकों से करवाते रहे हैं। अगर कांग्रेस के बड़े नेताओं की तरफ देखें तो किसी ने भी व्यक्तिगत तौर पर कोई टिप्पणी ना करके अपने छोटे नेताओं को इस युद्ध में कूदने दिया। राहुल गाँधी ने स्वयं को गाँधी और मोदी को हिटलर की तरह पेश करते हुए बचना ही अच्छा समझा। मोदी इस युद्ध में आगे निकलते जा रहे थे कि अचानक एक दिन बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नें उन्हें जवाब देते हुए रोका ही नहीं बल्कि इतिहास ज्ञान भी करा दिया। कांग्रेस के दिग्विजय सिंह ने लगातार उनपर हमले किए, इसी लिस्ट में सबसे आगे खड़े थे बेनी प्रसाद वर्मा जिन्होंने मोदी, केजरीवाल और अपने पुराने मित्र मुलायम सिंह पर भी बहुत हमले किए। क्षेत्रीय दलों में मुलायम सिंह ने अगुवाई करते हुए पहले लालू की मिमिक्री की फिर उनके नेताओं ने मोदी और मायावती पर अभद्र गालीदार भाषा शुरु कर दी जो अब तक चालू है। आपको याद दिला दूं कि मोदी की बोटी-बोटी काटने की बात करने वाले कांग्रेस उम्मीदवार राशिद तब सपा में ही थे। मायावती की निजी जिंदगी और चरित्र पर भी सपा के विधायक स्तर के नेताबहुत पहले से करते रहे हैं। इसमें बसपा के भी नेता किसी से पीछे ना रहते हुए सामिल हो गए। हाँ बसपा सुप्रीमो ने इससे परहेज किया है। नई नवेली आम आदमी पार्टी ने भी कई बार इस तरह के बयान दिए हैं। चाहें कुमार विश्वाश का बार-बार राहुल और सोनिया गाँधी पर की गई टिप्पणी और उनके समर्थकों के द्वारा ही क्यों न हों. इस बात पर मैं केजरीवाल से सहमत हूँ कि भ्रष्टाचार के मामले में किसी पर भी हमले किए जा सकते हैं। कम्युनिस्टों ने अपने इतिहास के हिसाब से अपनी गरिमाएँ कायम रखी। उनके एक नेता ने ममता बनर्जी पर कुछ बोला था तो प्रकाश करात ने स्वयं उसे माफी मांगने और आगे ऐसा ना करने की सलाह दी। दक्षिण भारत में दक्षिणपंथियों के अलावा सब इससे दूर हैं। महाराष्ट्र तो इसका उदाहरण ही रहा है। अपने को यहाँ का शेर कहने वाले बाल ठाकरे के पुत्र उद्धव और भतीजे राज ठाकरे में इस समय जुबानी जंग बहुत जोरों पर है, दोनो भाई एक दूसरे को बदनाम करने में जूटे  हैं। राज ठाकरे ने यहाँ तक कह दिया कि बाला साहब ठाकरे को अंतिम समय से उद्धव सही से खाना भी नहीं देते थे। उन्हें वड़ा पाव खकर रहना पड़ता था। मैने (राज) खुद उन्हें कई बार खाने के लिए बिरियानी और चिकन सूप भेजा है, खाने के लिए. इसी का जवाब देते हुए उद्धव दे पुत्र आदित्य ठाकरे ने राज को दिमागी बीमार बता डाला। कोई सोंच भी नहीं सकता कि हमारे देश के नेताओं की मानसिकता यहाँ तक जा सकती है। पिछली पंक्तियाँ लिखे दो दिन ही हुए थे कि फिर से राजनैतिक दलों के नेताओं ने अपनी भाषा की पहचान करानी शुरु कर दी। इसमें अमित शाह का नाम सबसे पहले आता है, उन्होंने मायावती के खिलाफ बदले की भावना वाला बयान दिया, साथ ही साथ मुल्ला मुलायम सिंह जैसा अभद्र और भड़काऊ बयान दिया। उधर राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने भी कांग्रेस के नेता को बोटी-बोटी काटने के जवाब देते हुए कहा कि चुनाव के बाद पता चलेगा कि कौन कटेगा? इसी क्रम में एक सपा नेता ने मायावती को भैंस और आजम ख़ान ने मोदी को कुत्ते के पिल्ले का बड़ा भाई कह दिया। आजम ख़ान की बात तो कहीं तक ठीक भी है। मोदी ने खुद 2002 में मरने वाले किसानों की तुलना कुत्ते के पिल्ले से की थी, अगर हिन्दू-मुस्लिम भाई हैं, तो पिल्ले का भाई तो उसका बड़ा भाई ही होगा।
इस क्रम में कुछ बड़े नेता अरविन्द केजरीवाल, राहुल गाँधी, अखिलेश यादव, नीतीश कुमार हैं, जो किसी पर भी पर्सनल टिप्पणी नहीं कर रहे हैं। इनमें केजरीवाल को छोड़कर मोदी का तो कोई नाम ही नहीं लेता है। भारत की संसदीय प्रणाली में यह एक महत्वपूर्ण कदम है कि किसी पर भी व्यक्तिगत प्रहार न किए जाएँ लेकिन मोदी इसे मानने को बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं। उन्होंने हर नेता पर पाकिस्तानी, गद्दार, भ्रष्ट और ना जाने क्या-क्या आरोप लगाए हैं। उन्होंने सोनिया गाँधी की बीमारी तक का मजाक बना डाला। जब राहुल का नाम प्रधान मंत्री पद के लिए घोषित नहीं हुआ तो मोदी ने यह तक कह दिया कि एक माँ अपने बेटे की बलि नहीं देना चाहती है। लेकिन इसके उलट मोदी पर कोई छोटा सा भी राजनैतिक हमला करे तो वो और उनके समर्थक बौखला जाते हैं। आज़मी साहब का के नया विवादास्पद बयान... हालांकि मुलायम के बयान से इनका कुछ ठीक था लेकिन मीडिया ने इसे गलत ढंग से पेश किया। अबू आज़मी ने कहा कि जो रेप करे उसके लिए इस्लाम में पत्थर से मारने की सजा है। और अगर कोई शादीशुदा औरत अपने पति के अलावा किसी के साथ सेक्स करे तो उसे भी फांसी की सजा है। फिर भी आज के जमाने में जहाँ लोकतंत्र और समाज के खुलेपन को लेकर एक बहस चल रही है, वैसे में यह बयान उनकी तालिबानी विचारधारा को दर्शाता है। चुनाव खत्म होने को है लेकिन नेताओं की भाषा लगातार गिरती ही जा रही है कुछ नेताओं को छोड़ दिया जाए तो बेनिप्रसाद, दिग्विजय, गिरिराज सिंह, आजम ख़ान और अमित शाह अपना काम चालू किए हुए हैं इनको देश की जनता और चुनाव आयोग से कुछ भी मतलब नहीं हैअगर इस क्रम में गिरिराज सिंह के बयान की निन्दा ना की जाए तो शायद नाइंसाफी होगी बिहार भाजपा के बड़े नेता गिरिराज सिंह ने अपने एक बयान में कहा कि जो लोग मोदी को पी.एम. बनाने से रोकना चाहते हैं, आने वाले दिनों में उनकी जगह हिन्दुस्तान में नहीं पाकिस्तान में होगी हालांकि भाजपा ने अपनी राय इसपर स्पष्ट की और कहा कि यह भाजपा की लाइन नहीं है एक और मोदी समर्थक प्रवीण तोगडिया ने गुजरात में बयान दिया कि चुनाव के बाद हम मुसलमानों के घरों पर कब्जा कर लेंगे और उन्हें देश से निकाल देंगे।  शिवसेना के नेता कदम का बयान मुम्बई की एक जनसभा में मोदी की मौजूदगी में हुआ जब उन्होंने कहा क़ि अगर हमारी सरकार बनी तो 6 महीने में पाकिस्तान खत्म कर देंगे इन सभी बयानों पर भाजपा ने अपनी सहमति नहीं जताई लेकिन यह भाजपा के ही लोग हैंविश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, संघ और भाजपा के रिस्ते कौन नहीं जानता है? ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भाजपा यह हार्ड हिन्दुत्व का एजेंडा स्वयं ना उठाकर दूसरों से उठवा रही है?
कल से सभी टीवी चैनल और राजनैतिक दल शाजिया इल्मी के बयान के पीछे पड़े हैं उन्होने कहा क्या केवल यही कहा क़ि मुसलमानों को अपने लोगों को वोट देना चाहिए आजतक कांग्रेस ने आपको क्या दिया है अरविन्द केजरीवाल आपके अपने है। अब अर्नब गोस्वामी ही यह बता दें कि इसमें क्या गलत था?
इसी लिस्ट में शामिल हुए बाबा रामदेव भी बहुत बचकाना बयान दे गए उन्होंने कहा कि राहुल गाँधी दलितों के घर पर हनीमून मनाने जाते हैं इतने गलत बयान पर सारे देश में बाबा की बहुत निन्दा हुई लेकिन भाजपा के प्रवक्ता हनीमून शब्द का अर्थ बताने में जूते रहे अबू आसिम आज़मी ने एक और गंदा बयान देते हुए कहा कि जो मुस्लिम सपा को वोट ना दे, उसका डी. एन. ए. चेक कराना चाहिए यह बहुत गंदा बयान था, लेकिन अगर हम यूपी में देखें, तो सपा को सबसे ज्यादा हानि तो सेकुलरिज्म के चक्कर में ही हुई है फिर भी सपा अभी तक पूरी तरह से अपनी विचारधारा पर टिकी हुई है मुजफ़्फ़र नगर के दंगे अलग बात हैं, यहाँ पर सरकार से कुछ गलतियाँ हुईं, लेकिन उसके बाद सरकार से जो हो सकता था किया जिसका दंगो में हाथ था वो तो सबसे फायदे में दिख रहे हैं चलो अपनी बात को आगे बढ़ाते हैं, गिरिराज के बयान के जवाब में फारूख अब्दुल्ला ने कहा कि जो मोदी को वोट देंगे, उन्हें समंदर में डूब जाना चाहिए यह बयान भी बहुत खराब और निन्दनीय था

Thursday, March 27, 2014

वाराणसी का महासंग्राम

आज कल बनारस का नाम पूरे मीडिया और समाज में बड़ी गंभीरता से लिया जा रहा है। इतना तो पहले कभी इस धर्मनगरी की चर्चा नहीं हुई थी। आज इस बहस या चर्चा का कारण है भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी का चुनाव लड़ना। उसके बाद सबकी नजर तब से और यहीं लगी है जब से आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल ने भी मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया है। अब अगर बात करें कि यहाँ पर किसका पलड़ा भारी है तो केजरीवाल को भी पता है कि मोदी यहाँ से हावी हैं। लेकिन उन्होंने संघर्ष करने की ठान ली है। वो नामुमकिन को मुमकिन करना जानते हैं। तभी तो वो मोदी को हराने की भी बात कह रहे हैं। दरअसल केजरीवाल ने खुद के लिए बहुत उंची गाइडलाइन्स बना दी हैं। मीडिया और उनके दोस्तों ने इस मुद्दे को इतना उठा दिया कि अगर केजरीवाल कहीं और से लड़ते तो जनता में गलत संदेश जाता। यही बात कुमार विश्वाश के साथ भी हुई थी। 
बनारस को लेकर भाजपा को निश्चिंत होना चाहिए था, लेकिन उन्हें पता नहीं क्या डर है कि मोदी बड़ोदरा से भी चुनाव लड रहे हैं। भाजपा को कुछ ना कुछ डर तो है ही। तभी तो अपने गढ में भी मोदी को सुरक्षित सीट नहीं लग रही है। उन्हें पता है कि अगर केजरीवाल ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया तो पिछले कई वर्षों का मुरली मनोहर जोशी, भाजपा विधायकों, नगर पार्षदों तक का हिसाब मोदी को ही देना पड़ेगा। केजरीवाल ने जिस तरह से नई दिल्ली में शीला दीक्षित को हराया था, उससे तो यही लगता है कि वो यहाँ भी यह करिश्मा कर सकते हैं। लेकिन यहाँ के हालात नई दिल्ली से बहुत अलग होने वाले हैं। यह वह जगह है जहाँ पिछले 2009 के लोकसभा चुनाव में भी सम्प्रदायिक ध्रवीकरण हुआ था। जबकि पहले पूरे यूपी में ऐसा नहीं हुआ था। यहाँ से एक बात और दिलचस्प हो गई है कि पूर्वांचल के बाहुबली मुख़्तार अन्सारी भी चुनाव लड रहे हैं। पिछली बार भी उन्होंने लगभग एक लाख 85 हजार वोट पाए थे, जो जोशी से 18 हजार कम थे। लेकिन पिछली बार वो बसपा से थे। इसबार उन्होने कौमी एकता दल से लड़ने का फैसला किया है। इसबार के कांग्रेस प्रत्याशी अजय राय पिछली बार सपा से लड़े थे, जिन्हें सवा लाख के करीब वोट मिले थे। कांग्रेस और अपना दल के प्रत्याशी को भी 65-65 हजार वोट मिले थे। अगर इस हिसाब से गणित लगाया जाए तो कहना मुस्किल नहीं है कि इसबार भी भाजपा ही मजबूत होगी। उपर से केजरीवाल भी मोदी का वोट काटने में फिलहाल अभी तो सक्षम नहीं हैं। क्योंकि यहाँ इसबार भी हिन्दुत्व का एजेंडा हावी हो रहा है। यहाँ के मुस्लिम और ब्राम्हण मतदाता जो 2.5-2.5 लाख की संख्या में हैं, बहुत निर्णायक साबित होंगे। इसबार अति-पिछड़ी जातियों का किसी के साथ जाना तय नहीं है। इसमें कुछ जातियाँ बसपा और अपना दल के साथ भी जाएंगी। अगर अटकलों के अनुसार अपना दल से स्वयं अनुप्रिया पटेल चुनाव लडती हैं तो कुर्मी जाति के वोट (जो मोदी की लहर में हैं) उन्हें ही प्राप्त होंगे। फिर भी यह भाजपा का पिछली बार के मुकाबले घाटा नहीं होगा। अजय राय को इसबार यादव वोट नहीं मिलेगा, कांग्रेस का कोई ठोस वोट बैंक ना होने परअपनी दबंग छवि पर ही भरोसा है। सपा का भी इसबार यहाँ यादव वोट छोड़ कर कुछ नहीं बचा है। अगर बसपा की बात करें तो यहाँ का दलित वो उनके लिए पक्का है, जिसकी सँख्या एक लाख से ज्यादा है। पिछली बार उसे मुख़्तार अन्सारी की मुस्लिमों के बीच रॉबिन हुड टाइप छवि के बावजूद  मुस्लिम वोट  बहुत ज्यादा नहीं मिला था। लेकिन इसबार मुस्लिम किसके साथ जाएंगे यह कहना मुस्किल है। कांग्रेस जीतने की हैसियत में नहीं है, सपा की मुजफ़्फ़र नगर दंगों के बाद छवि अल्पसंख्यक विरोधी हुई है, लेकिन मुलायम का आजमगढ से लड़ना एक बड़ा मास्टर स्ट्रोक है। बसपा को मुस्लिम धर्म गुरुओं के समर्थन के बाद उम्मीद है कि यह तबका उन्हें ही जिताएगा। लेकिन बीच में आ गए अरविन्द केजरीवाल। उनके पास केवल अपना बड़ा नाम छोड़कर कुछ नहीं है। वो किसका वोट कटेंगे यह कहना मुस्किल है। ईमानदारी और विकास के नाम पर मोदी का गैर-सम्प्रदायिक वोट भी वो खींच सकते हैं। (जैसा कि मैने पहले ही कहा कि मोदी का ब्राम्हण वोटबैंक मजबूत है। अगर सम्प्रदायिक ध्रवीकरण हुआ तो कुछ और भी इसमें जुड़ सकते हैं। ) गैर-यादव पिछड़ा वर्ग भी उन्हें मिल सकता है अगर निर्दलियों की संख्या ज्यादा ना हो तो। उन्हें अपना आधार अभी बनाना बाकी है। उन्हें सबसे अकेले लड़कर सबका वोट काटना पड़ेगा। मुस्लिम वोट का सब जगह जाना तितर-बितर होने का अंदेशा है, लेकिन पक्का कहना मुस्किल है कि मोदी को रोंकने के लिए यह किधर जाएगा। फिलहाल अभी तो लड़ाई केजरीवाल बनाम मोदी नहीं है, लेकिन बसपा भी बड़ी दावेदार होगी। यह कह सकते हैं कि इसमें कांग्रेस तो मोदी का ही फायदा कराएगी। मुझे तो यह भी अंदेशा है कि मुख़्तार अन्सारी का लड़ना भी कहीं भाजपा की ही चाल ना हो? हाँ एक बात मैं और कह सकता हूँ कि  केजरीवाल के आने से यह फायदा जनता को होगा कि साम्प्रदायिकता के अलावा जनता के मुद्दों की भी बातें होंगी। क्योंकि उन्हें विकास के मुद्दे का ही सहारा है, वो भी गुजरात विकास मॉडल को  को फेल करने का।
क्या होगा इसपर तो बहुत चर्चाएं और भविष्यवाणियाँ होती रहेंगी। लेकिन जो होगा वो किसी को पता नहीं है। फिलहाल मैने अपने यूपी के राजनैतिक अनुभव के आधार पर कुछ राय व्यक्त कर दी है। आगे की राजनीति पर नजर पूरे देश की रहेगी। कम से कम इसी बहाने काशी का कुछ भला हो जाए।

क्या करेगा उत्तर प्रदेश?

आजकल पूरे देश में उत्तर प्रदेश की ही बातें हो रही हैं। कारण है देश में होने वाले लोकसभा चुनाव। यह बात बहुत पहले से कही जाती रही है कि दिल्ली का रास्ता उत्तरप्रदेश से होकर ही जाता है। अब सवाल उठता है कि उत्तर प्रदेश किसको प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाएगा? इसमें सबसे पहले नंबर आता है नरेन्द्र मोदी का जो इस समय दिल्ली तक जाने के लिए यूपी के क़िले में अपने खास सिपाहसलार अमित शाह को भेज चुके हैं। और खुद यहाँ की धर्म नगरी बनारस से चुनाव भी लड रहे हैं। मैं हर दो तीन महीने में उत्तरप्रदेश जाता रहता हूँ। नवम्बर या दिसंबर के समय सच में पूरे यूपी में मोदी की चर्चा हो रही थी, जो फरवरी-मार्च आते-आते धीमी पड गई है। मोदी की लहर को कम करने के लिए केजरीवाल का हाथ शहरों में तो हो सकता है लेकिन उत्तरप्रदेश के ग्रामीण अंचलों में नहीं। इसके और भी अन्य कारण हैं। आज प्रदेश भर में राजनीतिक माहोल गर्म है। हर बड़ा नेता-अभिनेता यहाँ से चुनाव लड रहा है। अगर यूपी की राजनीति का मैं निष्पक्ष रूप से विश्लेषण करूं तो पाता हूँ। कि यहाँ का मुकाबला चतुष्कोणीय होने वाला है। यहाँ पर यह अनुमान लगा पाना कि किसको कितनी सीटें मिलेंगी? असंभव है। मुझे लगता है सभी सर्वे वाले भी सीटों के मामले में भी तुक्का मार रहे हैं। अगर पार्टीवार हम देखें तो सबसे पहले समाजवादी पार्टी को 2012 के विधानसभा चुनाव के हिसाब से बहुत बड़ा नुकसान होने वाला है। हाँ यह मान सकता हूँ कि 2009 लोकसभा के आस-पास उसका प्रदर्शन रह सकता है। समाजवादी पार्टी अपने MY वोट बैंक को बचना चाहती है लेकिन मुज़फ़्फरनगर दंगों का डैमेजकण्ट्रोल करना बहुत मुस्किल होता जा रहा है। मुलायम सिंह यादव के पास मुस्लिम धर्म गुरुओं की एक पूरी फ़ौज है जो इसबार सपा के लिए प्रचार कर रही है, लेकिन सफलता दूर है। यादव वोट कुछ हद तक बचा हुआ है लेकिन पिछले दो सालों में छुटभैये यादव नेताओं पर अखिलेश द्वारा लगाई गई लगाम उन्हें नाराज कर गई। एक बार को यादवों ने सोंचा भी था कि मोदी को देख लिया जाए। लेकिन अंततः उन्हें यही लगा कि भाजपा सरकार में ब्राम्हणों के अलावा किसी की नहीं चलेगी। अभी तो अपने 3 साल और हैं। मुलायम के पाले में फिर से यादव जा चुके हैं। मुलायम सिंह यादव को सबसे बड़ा नुकसान हुआ है गैर-यादव पिछड़े वोटों का जिनकों अखिलेश नें स्वयम् इकत्र किया था। मीडिया द्वारा बनाई गई छवि नें अखिलेश को मध्यवर्ग में हीरो से विलन बना दिया है।
अगर बात कांग्रेस की करें तो वो यहाँ के रण से पहले ही बाहर हो चुकी है। उसका अभेद क़िला "अमेठी" जहां के बारे में मैने खुद कई बार ट्वीट किया था कि राहुल को केवल यह बताना है कि वो राजीव गाँधी के पुत्र हैं, बस वो जीत जाएंगे। लेकिन अब कुमार विश्वास भी इस बाजी को पलटने की तरफ बढ गए हैं। कांग्रेस का कोई भी ठोस वोट बैंक बचा नहीं है। मुस्लिम भी इस बार कांग्रेस को वोट देगा इसकी गारण्टी कम है। कांग्रेस की सीटों की संख्या दहाई तक पहुंचना ही बहुत बड़ी बात होगी।
नई नवेली आम आदमी पार्टी को उत्तर प्रदेश में गाज़ियाबाद या एक दो और सीटों के अलावा कोई उम्मीद नहीं है। कुछ शहरों में उसको वोट तो अच्छा खासा मिल सकता है लेकिन जीत अभी दूर की बात होगी। आम आदमी पार्टी सबसे ज्यादा नुकसान भाजपा का करती दिख रही है। भाजपा के सेकुलर वोटर जो विकास के नाम पर मोदी से जुड़े थे, उनमें से कुछ प्रतिशत का  आम आदमी पार्टी के पक्ष में जाना तय है।
अगर मीडिया के अनुसार देखें तो बहुजन समाज पार्टी सबसे पिछड़ी नजर आ रही है। लेकिन इस समय बहुजन समाज पार्टी की जमीनी हकीकत, जो मैने देखी है वो सबसे मजबूत है। मायावती ने इस बार अपनी बेजोड़ सोसल इंजीनियरिंग से एक नया प्रयोग किया है। अपने दलित+ब्राम्हण(30%) वोटबैंक के बजाय वो इस बार दलित+मुस्लिम(40%) गठजोड़ बनाने पर लगी हैं। इसमें उनको बहुत हद तक सफलता भी मिल चुकी है। मायावती को आज ही बरेली के मुस्लिम धर्म गुरु तौकीर रजा का समर्थन मिल गया है। जिनका केजरीवाल से सम्बंध रहा है। उन्होंने इस बार मोदी के रथ को रोकने का सबसे बड़ा हथियार हाथी को ही बनाया है। इसके पहले बसपा को दिल्ली की जामा मस्जिद के साही इमाम बुखारी, जमियत-ए-उलेमा हिन्द के मुखिया महमूद मदनी और अन्य मुस्लिम संगठनो का साथ मिल चुका है। सभी ने मोदी को रोंकने के लिए बसपा को वोट देने की बात कह दी है। बसपा को सफलता के लिए दो-तीन बातों को संभालना होगा। जैसे अपने को भाजपा का नंबर एक दुश्मन बताना, जो 15 जनवरी की रैली में मायावती ने कहा भी था। और भाजपा से पिछले रिश्तों को याद ना आने देना। दूसरी बात अपने जागरूक दलित वोट को उदिटराज जैसे लोगों के झांसे में ना आने देना। तीसरी और महत्वपूर्ण बात उसे मुलायम पर छोड़ देनी है। मतलब मुलायम मोदी को मुसलमानों का कट्टर दुश्मन बताते रहें और खुद कांग्रेस और सपा की पिछली नाकामियों को गिनाती रहें। हालांकि इसमें कुछ रिस्क भी है। जैसे हिन्दुत्व का हावी होना भाजपा को फायदा पहुँचा सकता है। या इस दौर में मुस्लिम कांग्रेस को अपना साथी ना मान बैठे। वहीं अगर बसपा के पुराने गणित दलित+ब्राम्हण की बात की जाए, तो वो इस बार नहीं चलेगा।
इस बात का अहसास बसपा को भी है। क्योंकि ब्राम्हण वोट इसबार मोदी की लहर में आ गया है। इसीलिए बसपा ने टिकट बंटवारे में सबसे सफल प्रयोग कर दिया है। 18-18 मुस्लिम और ब्राम्हण उम्मीदवार उतार दिए हैं। इस सोसल इंजीनियरिंग में अगर बसपा को उसके प्रत्याशी के नाम पर कुछ ब्राम्हण वोट मिल गए तो यह उसके लिए बोनस जैसा होगा। उसने इसी को ध्यान में रखते हुए अति-पिछड़ा वर्ग के कांशीराम के पुराने साथियों रामसमुझ पासी और किशनपाल को अपने साथ लाने का प्रयास भी कर लिया है। उसका कैडर और कार्यकर्ता पूरी तरह से तैयार हैं। कमलेश दिवाकर और रामप्रकाश कुशवाहा जैसे पूर्व विधायकों ने पूरी तरह से तैयारी शुरु कर दी है। अगर बहन जी के दांव पूरी तरह से सही बैठ गए तो तहलका की उस स्टोरी को मैं भी जमीन पर महसूस कर रहा हूँ, कि मोदी के सपनों पर बसपा ही पानी फेर देगी।
अब अगर मैं मोदी या भाजपा की बात करूं तो यह निश्चित तौर पर कह सकता हूँ कि भाजपा इसबार अपने पिछले प्रदर्शन के मुकाबले बहुत सुधार करने जा रही है। अमित शाह के आने केबाद से भाजपा में एक नई जान आ गई है। लेकिन मोदी लहर को अभी पिछले हफ्ते ही तब एक बड़ा झटका लगा जब टिकट बंटवारा हुआ। यूपी में टिकट बंटवारे में कलराज मिश्र, जोशी और लालजी टंडन सरीखे नेता झंखार की तरह उलझे हैं। हर सीट पर कई दावेदार होने की वजह से भाजपा ने कुछ को असंतुष्ट तो किया ही है। सब अपने-अपने लिए सुरक्षित सीट भी मांग रहे थे। कानपुर में ही जोशी को श्रीप्रकाश जायसवाल से ज्यादा सतीश महाना से लड़ना पड़ेगा। राजनाथ को लालजी से, भोले(अकबरपुर, कानपुर देहात) को अरुण तिवारी बाबा से। इसी तरह भाजपा को बाहर से लाए हुए नेताओं पर की गई मेहरबानी महगी पड़ेगी। जमीनी स्तर पर भाजपा अब पहले के मुकाबले कमजोर पड रही है। इस तरह से देखा जाए तो इस बार यूपी के चुनाव सबसे मजेदार और दिलचस्प होने वाले हैं। हर दल और नेता अपनी ताकत झोंके हुए हैं, लेकिन जनता अपना वोट किसे देगी? यह तो भविष्य के गर्भ में छुपा है। लेकिन इसबार यूपी पर होने वाला हर सर्वे गलत साबित होगा। भाजपा और बसपा में टक्कर हो रही है। लेकिन मीडिया इसे स्वीकारने को तैयार नहीं हैं। वो कहीं और ही अपनी नजर लगाए बैठा है।

Thursday, February 27, 2014

फिर से जाति पर क्यों लौट रहे हैं?

अभी तक 2014 के चुनाओं की तैयारी को लेकर अगर हम पिछले दो साल का घटनाक्रम उठाकार देखें तो पता चलता है कि नरेन्द्र मोदी का चुनाव प्रचार पूरी तरह से जाति से उपर उठकर चल रहा था। भले ही वो हिन्दुत्व को यदाकदा हथियार बनाते रहे हैं। नरेन्द्र मोदी ने विकास पर ज्यादा ध्यान रखा। लेकिन पिछले एक-दो महीने से इस मोदीमय गुब्बारे की हवा निकलती दिख रही है। आखिर वो भी उसी पुरानी सड़क पर क्यों लौट रहे हैं, जिसपर अभी तक हिन्दुस्तान की पूरी राजनीति चलती रही है। मोदी ने अचानक से जातीय समीकरण बनाने शुरु कर दिए हैं। खासकर उत्तरप्रदेश और बिहार में जो आरोप लालू, माया और मुलायम पर लगाते थे, वो अब खुद अपनाने लगे हैं। मोदी ने उत्तर प्रदेश में अपना दल के संस्थापक सोनेलाल पटेल की बेटी अनुप्रिया पटेल से गठबंधन की बात शुरु कर दी है। पूर्वांचल के अपनी जाति के बड़े नेता जगदम्बिका पाल की भी कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाने की खबरें तेज दिख रही हैं। उत्तरप्रदेश में इन तथाकथित जातियों का प्रभाव काफी प्रभाव है। उसी तरह बिहार में भाजपा ने जातिगत समीकरण बनाने शुरु कर दिए हैं। रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा के साथ गठबंधन लगभग पक्का ही हो गया है। उसी तरह कुशवाहा समाज के बड़े नेता उपेन्द्र कुशवाहा को भी अपने साथ मिला लिया है। इसके अलावा कांशीराम के साथ काम करने वाले बड़े दलित नेता उदित राज के दल का भी भाजपा में विलय हो गया है। अगर महाराष्ट में भी देखें तो दलित नेता रामदास अठावले की पार्टी आर.पी.आई. के साथ भी गठबंधन भाजपा ने कर लिया है।
अगर हम उपर्युक्त गठबंधनों की तरफ नजर डालें तो किसी भी दल या नेता का इतना ज्यादा प्रभाव नही है। हाँ यह बात हम मानते हैं कि इनका अपने क्षेत्रों या जातियों पर काफी वर्चस्व रहा है। अगर भाजपा इनके साथ गठबंधन करती है तो निश्चित तौर पर उसे फायदा पहुचेगा। अगर बात की जाए नैतिकता की तो क्या इन दलों खासकर दलित समुदाय वालों ने भाजपा के साथ गठबंधन करके बहुत अच्छा किया है। यह बात तो उन्हें अम्बेडकर साहब को याद करने पर ही पता चलेगी। यह वही भाजपा और संघ है जो हमेशा से ब्राम्हणवाद का प्रतीक रहा है। यही संघ हमेशा से अम्बेडकरवाद और आरक्षण विरोधी रहा है। क्या सोंचकर उदित राज ने भाजपा से हाथ मिलाया होगा? क्या उनका दलित समाज भाजपा को वोट करेगा? अगर करेगा, तो इसका मतलब है अभी तक दलित समाज सामाजिक चेतना और इतिहास नहीं जान पाया है। और जिम्मेदार भी उदितराज जैसे नेता हैं। इसका मतलब है कि कि उदित राज या पासवान को पता है कि दलित समाज इतना नासमझ है कि हम अपने फायदे के लिए उसे जहां कहेगें वहीं वोट देगा। इसके लिए हम मुस्लिमों के साथ भी धोखा मान सकते हैं। क्योंकि ग्रामीण आँचलों का मुस्लिम अभी भी दलितों की स्थिति से उपर नहीं उठा है। वह हमेशा दलित नेतृत्व पसंद करता हैं। (इसमें यह अपवाद हो सकता है कि किसी पार्टी का बड़ा मुस्लिम नेता क्षत्रीय हो, तब मुस्लिम उसे वोट कर दें।) हम मानते हैं कि कांग्रेस ने आज तक दलितों को कुछ नहीं दिया है। लेकिन ऐसा भी नहीं है थोड़ा सा ही दिया हो, लेकिन छीना कुछ भी नहीं है। वहीं अगर भाजपा को मौका मिल जाए तो उसका एक बड़ा तबका आरक्षण को खत्म करना चाहता है। यहाँ तक कि उसका पित्रसत्तात्मक सोंच संघ का यह प्रमुख एजेंडा रहा है। भाजपा ने हमेशा से दलितों के साथ भी किराएदारों जैसा व्यवहार किया है। भाजपा अपने ही दलित नेताओं को आगे क्यों नहीं बढाती है। उसके जो गिने चुने नेता रहे भी हैं, वो पूरी तरह से हिन्दुत्व से डुबे हुए हैं। भाजपा के दलित मोर्चा अध्यक्ष संजय पासवान की एक किताब से हम यह समझ सकते हैं। उन्होने अपनी किताब में बाबू जगजीवन राम को हिन्दुत्ववादी नेता बता दिया। इससे बड़ा झूंठ और क्या हो सकता है। उन्होंने आज कांशीराम को भारतरत्न देने की मांग कर दी। क्या वो कांशीराम के उस बयान का समर्थन करते हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि "अयोध्या की विवादित जमींन पर राम मंदिर नहीं सौचालय बनाना चाहिए।" अगर हाँ तो सर्वजनिक करो। फिर देखो संघ और भाजपा संजय को कैसे गरियाते हैं। अगर उनकी बात से इत्तेफाक नहीं रखते हो, तो ऐसे आदमी को भारत रत्न क्यों जिसकी विचारधारा ही पसंद नही हो।
आखिर क्यों मोदी इन सभी चालों से प्रधानमंत्री पद का ख्वाब देख रहे हैं। फिर कहेंगे कि अपना एजेंडा सेट करने में गठबंधन के साथियों का दबाव आ गया था। फिर क्यों मिशन 272+ चला रखा है? बंद करो जब पता है 272 तक नहीं पहुंचेंगे। इसका मतलब क्या यह समझा जाए कि अगर 272 नहीं आए तो गठबंधन। और अगर आ जाएँ तो सबको लत मारो अकेले सरकार चलाएंगे। इससे बड़ा धोखा और क्या होगा? इसके साथ-साथ ये तत्काथित दलित नेता भी अपने समाज के सबसे बड़े गद्दार हैं। रामविलास पासवान को ही ले लो। हर चुनाव में एक अलग गठबंधन। अपनी जाति के 6-7 प्रतिशत वोटों को क्या समझ रखा है। जब चाहा लालू के साथ, जब चाहा नीतीश के साथ, फिर कांग्रेस के साथ, अब भाजपा के साथ। वो भी उस आदमी के साथ जिसके कारण 2002 में मंत्रीपद छोड़ा था। यह वही भाजपा है जिसमें रणवीर सेना के नेता आज तक हैं। रणवीर सेना के आगे भाजपा किस दलित नेता की सुनेगी। इसी रणवीर सेना के आतंक के डर से तो दलितों ने बिहार में भाजपा को बाहर का रास्ता दिखाया था।  आखिर अपनी कुर्सी के लिए और कितना गिरेंगे? और कितनी जगह अपने समाज को लेकर जाएंगे? अगर ऐसा ही करते रहे तो जिस दिन यह दलित समाज जाग गया, उस दिन इनका साथ छोड़ कोई मजबूत समाजहितैषी नेता का साथ पकड़ेगा। 

Wednesday, February 26, 2014

क्या राजनाथ सिंह की माफी काफी है?

अभी एक दो दिन पहले ही मैने एक ब्लॉग लिखा था। जिसमें मैने मोदी पर साम्प्रदायिकता और हिन्दुत्व की ओर लौटने का आरोप लगाया था। लेकिन 2014 के चुनाव पता नहीं किस चाल से होने जा रहे हैं, कि दो दिन बाद ही राजनाथ सिंह ने दिल्ली में मुस्लिम नेताओं के साथ एक कार्यक्रम किया और उसमें मुस्लिमों से माफी मांग ली। मैं बड़ा ही भौचक्का रह गया। यह भाजपा की एक बहुत बड़ी चाल हो सकती है। अगर यह बात स्वयं मोदी कहते तो शायद विपक्षियों को हमला करने का मौका मिल जाता। इसी को देखते हुए भाजपा अध्यक्ष से यह बातकहलवाई गई कि देश का मुस्लिम इसे पूरे भाजपा की तरफ से संदेश समझे। अब सवाल यह उठता है क़ि क्या अल्पसंख्यक समुदाय खासकर मुस्लिम मोदी या भाजपा को माफ कर सकते हैं। मुझे नहीं लगता है कि इतने बुरे बर्ताव के बाद मुस्लिम समुदाय भाजपा या मोदी को माफ कर देगा। वैसे तो भारतीय समाज में माफी को बहुत अच्छा माना जाता है। और कई बार प्रयास करने पर लोगों को माफी मिल भी जाती है। आप कांग्रेस का उदाहरण ले सकते हैं। सब को पता है 1984 के दंगों में कांग्रेस का हाथ था। लेकिन कांग्रेस ने उन दंगों के बाद अपनी छवि सुधारने का प्रयास किया। सिखों को पार्टी और देश में मौके दिए। कई बार कांगेस और गाँधी परिवार ने माफी भी मांगी। यह बात और है कि दंगों के आरोपियों को सजा नहीं मिली। लेकिन दिल्ली और पंजाब में भी कुछ हद तक सिखों नें कांग्रेस की इस माफी का स्वागत किया और उसे स्वीकार किया। पार्टी ने एक सिक्ख को प्रधानमंत्री तक बना दिया। वहीं भाजपा को गुजरात के विधानसभा चुनाव में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं मिलता है। पूरे देश में लोकसभा या विधान सभाओं में नक़वी और शहनवाज जैसों को छोड़कर  न के बराबर मुस्लिमों को टिकट दिए जाते हैं। भाजपा के प्रवक्ता इस प्रश्न पर हमेशा ही गुजरात की लोकल ग्राम और नगरपंचायतों में मुस्लिमों का उदाहरण देते हैं। यह आंकड़ा देते वक्त क्या वो यह समझते हैं कि देश की जनता इतनी नासमझ है कि उसे यह भी नहीं पता कि कानून कहाँ बनाए जाते हैं। जब कानून लोकसभा और विधानसभा में बनाए जाते हैं, तो उन्हें उसमें प्रतिनिधित्व क्यों नहीं दिया जाए। आखिर मोदी ने 2002 दंगों के बाद कभी प्रयास ही नहीं किया है इस समाज को जोड़ने का। क्यों मोदी ने केन्द्र द्वारा भेजी गई अल्पसंख्यकों की स्कॉलरशिप राशि को वापस भेज दिया और हाईकोर्ट के कहने पर भी नहीं देते रहे? देश को उनका वह भाषण अभी तक याद है जब उन्होंने जनवरी 2006 कहा था " हम नर्मदा का पानी अभी लाए हैं, अगर आप होते तो रमजान में लाते। " उनका हर वो भाषण याद है जब उन्होने मुस्लिमों को मियाँ मुसर्रफ की औलादें कहा करते थे। उन्हें दंगा पीड़ितों के शिविरों पर की गई टिप्पणी," हम दो हमारे दो, वो पांच उनके पच्चीस" भी आज तक देश भुला नहीं है। क्या देश आगरा का वो मंच भूल जाएगा जिसमें उन्होने संगीत सोम और राणा (मुजफ़्फ़र नगर दंगों के आरोपियों) को सम्मानित किया था। आखिर भाजपा भी यह माफी कौन सा मुंह लेकर मांग रही है। भाजपा के बड़े नेता अरुण जेटली के ब्लॉग में मैने पढ़ा कि आखिर 2002 के बाद गुजरात में कोई दंगा नहीं हुआ। लेकिन उन्हें यह क्यों याद नहीं रहता कि 2002 में ही मुस्लिमों को इतना कुचल दिया गया कि अब उनमें  जुर्म का विरोध करने की ताकत अब उनमें बची ही नहीं है। अगर आप साम्प्रदायिकता की बात करें तो देश में एक दो को छोड़कर कोई भी दल सेकुलर नहीं बचा है। लेकिन भाजपा का पूरा का पूरा इतिहास ही साम्प्रदायिकता की स्याही से लिखा हुआ है। हम मानते हैं कि कांग्रेस के शासनकाल में भी बहुत जगह दंगे हुए हैं लेकिन उसके लिए दंगे कभी राजनैतिक फायदे का स्टंट नहीं रहे हैं। वहीं भाजपा के लिए यह नैसर्गिक हथियार है। अगर 1961 के बाद हुए सभी दंगों की जांच आयोग की रिपोर्ट आप पढेंगे तो पता चल जाता है कि हर दंगे में संघ या भाजपा से जुड़े संगठनों के के कार्यकर्ता शामिल रहे हैं।
अभी एक-दो दिन से चिराग पासवान का एक बयान बहुत चर्चा में है जो पहले भाजपा कहा करती थी कि " सुप्रीम कोर्ट की एस.आई.टी. की क्लीन चिट के बाद मोदी पर दंगों के कोई आरोप रह नहीं जाते हैं। " लेकिन क्या देश की जनता यह नहीं समझती कि दंगे या कत्ल के मामलों में डायरेक्ट भूमिका होने पर ही उन्हें सजा मिलती है। जबकि मुख्यमंत्री जैसे पद पर बैठे व्यक्ति को कहीं भी सीधे जाने की जरूरत ही नहीं होती है। वह तो केवल एक फोन पर ही काम तमाम कर सकता है। उसने ग्रह मंत्री को कह दिया कि पुलिस को कार्यवाही करने से रोक दो। फिर यह बात ग्रहमंत्री के बाद भी कई चरणो में नीचे पुलिस तक पहुंचेगी। ऐसे में मुख्यमंत्री कोई खुद दंगों में शामिल होने नही जाता है। इतना भी नहीं इनके मंत्री बाबू  बजरंगी और माया कोड़नानी को तो सजा भी मिल चुकी है। लेकिन सजा के पहले उन्हें अपने मंत्रिमण्डल में भी बनाए रखा। बात केवल मुस्लिमों के कत्ल की ही नहीं गोधरा काण्ड में भाजपा या मोदी सरकार की उतनी ही जिम्मेदारी बनती थी।
आजकल सेकुलरिज्म को लेकर एक खींचतान मची हुई है। 11 दलों ने मिलकर एक सेकुलर तीसरा मोर्चा बनाया है। कांग्रेस और भाजपा हो या आम आदमी पार्टी और ये तथाकथित सेकुलर दल सब चुनाव के समय किसी मंच पर एक-दो मुस्लिम नेताओं को बुलाकर अपने को सेकुलर होने का सर्टिफिकेट लेते रहे हैं। इसका मतलब है कि सब मुस्लिमों को केवल वोटबैंक मानते हैं। अगर ऐसा होता तो 2004 में बुखारी के कहने पर मुस्लिमों ने भाजपा को क्यों नहीं वोट दे दिया था। आखिर कोई भी सेकुलर दल बिना बहुसंख्यक सम्प्रदायवाद से लड़े कैसे अल्पसंख़्यकों को सुरक्षा की गारण्टी दे सकता है। अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक दोनों ही सम्प्रदायवाद देश के लिए घातक हैं लेकिन देश में बहुत पुराने समय से एक बात कही जाती रही है कि अल्पसंख्यक सम्प्रदायवाद अपने चरम पर भी कानून व्यवस्था की कमजोरी बताया जाता है। वहीं बहुसंख्यक सम्प्रदायवाद को राष्ट्रवाद का प्रतीक बना दिया जाता है। यह ऐसा राष्ट्रवाद है जो देश के बहुसंख्यक समाज में भी पूर्णतया स्वीकार नहीं होता है। अगर ऐसा नहीं तो क्यों वो भाजपा आज मुस्लिमों से माफी मांग रही है, जिसके नेता मोदी 2002 दंगों के बाद के चुनावों में कहते थे कि हमें उनका वोट नहीं चाहिए। क्यों अपनी किताब "ज्योतिपुंज" में संघ के विरासत और सावरकर तथा गोलवलकर को गुजरात और देश पर कर्ज़ बताने वाले मोदी उनकी जगह उस सरदार पटेल की मूर्ति बनवा रहे हैं, जिन्होंने गाँधीजी की हत्या के बाद संघ को प्रतिबंधित कर दिया था। यह वही सरदार पटेल हैं, जिनके नाम पर 1990 में अहमदाबाद एयरपोर्ट का नाम  रखने पर ही मोदी के नेतृत्व में भाजपा और संघ ने 15 दिन तक आन्दोलन किया था। आज सब भूलकर गुजराती अस्मिता के नाम पर गाँधीजी की बजाय पटेल की मूर्ति बनवा रहे हैं। क्योंकि अगर गाँधी जी की मूर्ति बनवाते तो शायद इससे बड़ा मजाक कोई हो ही नहीं सकता था। इसका अर्थ तो यही है कि मोदी और भाजपा को यह बात समझ में आ गई है कि देश में कट्टरवाद को कभी स्वीकार नहीं किया जाता है। देश के नेताओं और व्यवस्था की मानसिक यदास्त इतनी कमजोर पड गई है कि थोड़े दिन में ही सबकुछ भूलने के नाम पर जनता को बेवकूफ बनाते हैं। अगर 84 के दंगों के आरोपियों को सजा होती तो शायद 1992 और 2002 भी नहीं होते, अगर 2002 वालों को सजा होती तो मुजफ़्फ़र नगर नहीं होता। देश की सिविल सोसायटी भी इसपर कुछ ज्यादा ही विचारहीनता दिखाकर इंदिरा गाँधी की हत्या, गोधरा और छेड़छाड़ बनाम में पड जाती है। देश को जर्मनी की सरकार से सबक लेना चाहिए आज इतने सालों बाद भी हिटलर के जमाने में सामिल रहे उन  दंगाइयों को फांसी दे रही है जो आज उम्र के नब्बे वर्ष पार कर चुके हैं। पता नहीं ऐसा इंसाफ हिन्दुस्तान (हिन्दुस्थान नहीं) में कब होगा।

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...