अभी एक दो दिन पहले ही मैने एक ब्लॉग लिखा था। जिसमें मैने मोदी पर साम्प्रदायिकता और हिन्दुत्व की ओर लौटने का आरोप लगाया था। लेकिन 2014 के चुनाव पता नहीं किस चाल से होने जा रहे हैं, कि दो दिन बाद ही राजनाथ सिंह ने दिल्ली में मुस्लिम नेताओं के साथ एक कार्यक्रम किया और उसमें मुस्लिमों से माफी मांग ली। मैं बड़ा ही भौचक्का रह गया। यह भाजपा की एक बहुत बड़ी चाल हो सकती है। अगर यह बात स्वयं मोदी कहते तो शायद विपक्षियों को हमला करने का मौका मिल जाता। इसी को देखते हुए भाजपा अध्यक्ष से यह बातकहलवाई गई कि देश का मुस्लिम इसे पूरे भाजपा की तरफ से संदेश समझे। अब सवाल यह उठता है क़ि क्या अल्पसंख्यक समुदाय खासकर मुस्लिम मोदी या भाजपा को माफ कर सकते हैं। मुझे नहीं लगता है कि इतने बुरे बर्ताव के बाद मुस्लिम समुदाय भाजपा या मोदी को माफ कर देगा। वैसे तो भारतीय समाज में माफी को बहुत अच्छा माना जाता है। और कई बार प्रयास करने पर लोगों को माफी मिल भी जाती है। आप कांग्रेस का उदाहरण ले सकते हैं। सब को पता है 1984 के दंगों में कांग्रेस का हाथ था। लेकिन कांग्रेस ने उन दंगों के बाद अपनी छवि सुधारने का प्रयास किया। सिखों को पार्टी और देश में मौके दिए। कई बार कांगेस और गाँधी परिवार ने माफी भी मांगी। यह बात और है कि दंगों के आरोपियों को सजा नहीं मिली। लेकिन दिल्ली और पंजाब में भी कुछ हद तक सिखों नें कांग्रेस की इस माफी का स्वागत किया और उसे स्वीकार किया। पार्टी ने एक सिक्ख को प्रधानमंत्री तक बना दिया। वहीं भाजपा को गुजरात के विधानसभा चुनाव में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं मिलता है। पूरे देश में लोकसभा या विधान सभाओं में नक़वी और शहनवाज जैसों को छोड़कर न के बराबर मुस्लिमों को टिकट दिए जाते हैं। भाजपा के प्रवक्ता इस प्रश्न पर हमेशा ही गुजरात की लोकल ग्राम और नगरपंचायतों में मुस्लिमों का उदाहरण देते हैं। यह आंकड़ा देते वक्त क्या वो यह समझते हैं कि देश की जनता इतनी नासमझ है कि उसे यह भी नहीं पता कि कानून कहाँ बनाए जाते हैं। जब कानून लोकसभा और विधानसभा में बनाए जाते हैं, तो उन्हें उसमें प्रतिनिधित्व क्यों नहीं दिया जाए। आखिर मोदी ने 2002 दंगों के बाद कभी प्रयास ही नहीं किया है इस समाज को जोड़ने का। क्यों मोदी ने केन्द्र द्वारा भेजी गई अल्पसंख्यकों की स्कॉलरशिप राशि को वापस भेज दिया और हाईकोर्ट के कहने पर भी नहीं देते रहे? देश को उनका वह भाषण अभी तक याद है जब उन्होंने जनवरी 2006 कहा था " हम नर्मदा का पानी अभी लाए हैं, अगर आप होते तो रमजान में लाते। " उनका हर वो भाषण याद है जब उन्होने मुस्लिमों को मियाँ मुसर्रफ की औलादें कहा करते थे। उन्हें दंगा पीड़ितों के शिविरों पर की गई टिप्पणी," हम दो हमारे दो, वो पांच उनके पच्चीस" भी आज तक देश भुला नहीं है। क्या देश आगरा का वो मंच भूल जाएगा जिसमें उन्होने संगीत सोम और राणा (मुजफ़्फ़र नगर दंगों के आरोपियों) को सम्मानित किया था। आखिर भाजपा भी यह माफी कौन सा मुंह लेकर मांग रही है। भाजपा के बड़े नेता अरुण जेटली के ब्लॉग में मैने पढ़ा कि आखिर 2002 के बाद गुजरात में कोई दंगा नहीं हुआ। लेकिन उन्हें यह क्यों याद नहीं रहता कि 2002 में ही मुस्लिमों को इतना कुचल दिया गया कि अब उनमें जुर्म का विरोध करने की ताकत अब उनमें बची ही नहीं है। अगर आप साम्प्रदायिकता की बात करें तो देश में एक दो को छोड़कर कोई भी दल सेकुलर नहीं बचा है। लेकिन भाजपा का पूरा का पूरा इतिहास ही साम्प्रदायिकता की स्याही से लिखा हुआ है। हम मानते हैं कि कांग्रेस के शासनकाल में भी बहुत जगह दंगे हुए हैं लेकिन उसके लिए दंगे कभी राजनैतिक फायदे का स्टंट नहीं रहे हैं। वहीं भाजपा के लिए यह नैसर्गिक हथियार है। अगर 1961 के बाद हुए सभी दंगों की जांच आयोग की रिपोर्ट आप पढेंगे तो पता चल जाता है कि हर दंगे में संघ या भाजपा से जुड़े संगठनों के के कार्यकर्ता शामिल रहे हैं।
अभी एक-दो दिन से चिराग पासवान का एक बयान बहुत चर्चा में है जो पहले भाजपा कहा करती थी कि " सुप्रीम कोर्ट की एस.आई.टी. की क्लीन चिट के बाद मोदी पर दंगों के कोई आरोप रह नहीं जाते हैं। " लेकिन क्या देश की जनता यह नहीं समझती कि दंगे या कत्ल के मामलों में डायरेक्ट भूमिका होने पर ही उन्हें सजा मिलती है। जबकि मुख्यमंत्री जैसे पद पर बैठे व्यक्ति को कहीं भी सीधे जाने की जरूरत ही नहीं होती है। वह तो केवल एक फोन पर ही काम तमाम कर सकता है। उसने ग्रह मंत्री को कह दिया कि पुलिस को कार्यवाही करने से रोक दो। फिर यह बात ग्रहमंत्री के बाद भी कई चरणो में नीचे पुलिस तक पहुंचेगी। ऐसे में मुख्यमंत्री कोई खुद दंगों में शामिल होने नही जाता है। इतना भी नहीं इनके मंत्री बाबू बजरंगी और माया कोड़नानी को तो सजा भी मिल चुकी है। लेकिन सजा के पहले उन्हें अपने मंत्रिमण्डल में भी बनाए रखा। बात केवल मुस्लिमों के कत्ल की ही नहीं गोधरा काण्ड में भाजपा या मोदी सरकार की उतनी ही जिम्मेदारी बनती थी।
आजकल सेकुलरिज्म को लेकर एक खींचतान मची हुई है। 11 दलों ने मिलकर एक सेकुलर तीसरा मोर्चा बनाया है। कांग्रेस और भाजपा हो या आम आदमी पार्टी और ये तथाकथित सेकुलर दल सब चुनाव के समय किसी मंच पर एक-दो मुस्लिम नेताओं को बुलाकर अपने को सेकुलर होने का सर्टिफिकेट लेते रहे हैं। इसका मतलब है कि सब मुस्लिमों को केवल वोटबैंक मानते हैं। अगर ऐसा होता तो 2004 में बुखारी के कहने पर मुस्लिमों ने भाजपा को क्यों नहीं वोट दे दिया था। आखिर कोई भी सेकुलर दल बिना बहुसंख्यक सम्प्रदायवाद से लड़े कैसे अल्पसंख़्यकों को सुरक्षा की गारण्टी दे सकता है। अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक दोनों ही सम्प्रदायवाद देश के लिए घातक हैं लेकिन देश में बहुत पुराने समय से एक बात कही जाती रही है कि अल्पसंख्यक सम्प्रदायवाद अपने चरम पर भी कानून व्यवस्था की कमजोरी बताया जाता है। वहीं बहुसंख्यक सम्प्रदायवाद को राष्ट्रवाद का प्रतीक बना दिया जाता है। यह ऐसा राष्ट्रवाद है जो देश के बहुसंख्यक समाज में भी पूर्णतया स्वीकार नहीं होता है। अगर ऐसा नहीं तो क्यों वो भाजपा आज मुस्लिमों से माफी मांग रही है, जिसके नेता मोदी 2002 दंगों के बाद के चुनावों में कहते थे कि हमें उनका वोट नहीं चाहिए। क्यों अपनी किताब "ज्योतिपुंज" में संघ के विरासत और सावरकर तथा गोलवलकर को गुजरात और देश पर कर्ज़ बताने वाले मोदी उनकी जगह उस सरदार पटेल की मूर्ति बनवा रहे हैं, जिन्होंने गाँधीजी की हत्या के बाद संघ को प्रतिबंधित कर दिया था। यह वही सरदार पटेल हैं, जिनके नाम पर 1990 में अहमदाबाद एयरपोर्ट का नाम रखने पर ही मोदी के नेतृत्व में भाजपा और संघ ने 15 दिन तक आन्दोलन किया था। आज सब भूलकर गुजराती अस्मिता के नाम पर गाँधीजी की बजाय पटेल की मूर्ति बनवा रहे हैं। क्योंकि अगर गाँधी जी की मूर्ति बनवाते तो शायद इससे बड़ा मजाक कोई हो ही नहीं सकता था। इसका अर्थ तो यही है कि मोदी और भाजपा को यह बात समझ में आ गई है कि देश में कट्टरवाद को कभी स्वीकार नहीं किया जाता है। देश के नेताओं और व्यवस्था की मानसिक यदास्त इतनी कमजोर पड गई है कि थोड़े दिन में ही सबकुछ भूलने के नाम पर जनता को बेवकूफ बनाते हैं। अगर 84 के दंगों के आरोपियों को सजा होती तो शायद 1992 और 2002 भी नहीं होते, अगर 2002 वालों को सजा होती तो मुजफ़्फ़र नगर नहीं होता। देश की सिविल सोसायटी भी इसपर कुछ ज्यादा ही विचारहीनता दिखाकर इंदिरा गाँधी की हत्या, गोधरा और छेड़छाड़ बनाम में पड जाती है। देश को जर्मनी की सरकार से सबक लेना चाहिए आज इतने सालों बाद भी हिटलर के जमाने में सामिल रहे उन दंगाइयों को फांसी दे रही है जो आज उम्र के नब्बे वर्ष पार कर चुके हैं। पता नहीं ऐसा इंसाफ हिन्दुस्तान (हिन्दुस्थान नहीं) में कब होगा।
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