Friday, December 11, 2015

क्या सच में न्याय हुआ है?

सलमान खान को बॉम्बे हाईकोर्ट ने हिट एंड रन केस में सभी आरोपों से मुक्त कर दिया, क्योंकि सरकारी पक्ष आरोपों के समर्थन में निर्णायक पेश सबूत नहीं कर सका। न्याय होना ही नहीं चाहिए, होते हुए भी दिखना चाहिए। भले ही न्याय की मूर्ति पर पट्टी लगी है लेकिन न्याय होने के इंतज़ार में खड़े लोगों की आंख पर पट्टी नहीं होती है। 
जज की मंशा की तो नहीं लेकिन अदालत के फैसलों की सार्वजनिक समीक्षा की जा सकती है। हाई कोर्ट ने एक तरह से सेशन कोर्ट के फैसले की समीक्षा की है और अभी सुप्रीम कोर्ट की समीक्षा बाकी है। लेकिन 6 मई के फैसले में सलमान ख़ान को पांच साल की सज़ा सुनाई जाती है और 10 दिसंबर को उनके खिलाफ कोई सबूत ही नहीं मिलता है। अदालतों के इतिहास में ऐसा होता है। दो अदालतों के फैसले में अंतर होता है और सुप्रीम कोर्ट के ही एक से लेकर दो और तीन जजों की बेंच के फैसले में अंतर होता है। लेकिन क्या इतना अंतर आना चाहिए। पांच साल की सज़ा और फिर सीधे बरी। क्या सलमान ख़ान को सलमान होने का लाभ मिला है। अगर ये सवाल है तो क्या सलमान को सलमान होने की सज़ा नहीं मिली।
आखिर उस रात गाड़ी कौन चला रहा था, चलाने वाला नशे में था या नहीं। इन सवालों के जवाब क्या अब कभी नहीं मिलेंगे। क्या गाड़ी अपने आप चल रही थी या मरने वाला मरा ही नहीं। फिर अब्दुल की एक टांग कैसे खराब हो गई। क्या इतने सारे गरीब लोग ताकतवर सलमान के ख़िलाफ साज़िश कर रहे थे। यह भी समझना चाहिए कि अदालत के पास जैसे सबूत होंगे फैसला भी वैसा ही आएगा। सबूत से जुड़े सवालों की ज़िम्मेदारी पुलिस की बनती है। क्या पुलिस इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी। यह सवाल महाराष्ट्र सरकार से पूछा जाना चाहिए। अदालत ने पुलिस के पेश किए हुए सबूतों को पर्याप्त नहीं माना या पुलिस के इरादे को लेकर कुछ शक हुआ। इस सवाल का मुकम्मल जवाब तो फैसले की कापी पढ़ने के बाद ही मिलेगा। क्या अदालत ने ऐसा कहा कि पुलिस ने सलमान की मदद की। मैंने फैसला नहीं पढ़ा है। पर क्या आपको भी लग रहा है कि इस मामले में सलमान के साथ साथ मामले की जांच करने वाली पुलिस भी बरी हो गई है। अदालत ने कहा कि संदेह का लाभ आरोपी को मिलता है लेकिन क्या इसकी बहस हो सकती है कि जांच के दौरान संदेह की स्थितियां पैदा भी की जा सकती हैं। इसलिए इस केस को लेकर पुलिस से जुड़े सवालों और फैसले से जुड़े सवालों में फर्क करना होगा। सरकारी पक्ष के पास सबसे बड़ा गवाह कांस्टेबल रविन्द्र पाटिल था। उसका बयान धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने हुआ था लेकिन हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। हाई कोर्ट ने कहा कि रविन्द्र पाटिल की गवाही को पूरी तरह से सबूत मानकर नीचली अदालत ने गलती की। कांस्टेबल रविंद्र पाटिल हादसे के वक्त सलमान के साथ था और उसी ने पुलिस को हादसे की सूचना दी थी।
अब सवाल यह उठता है क़ि क्या सलमान खान की मदद के लिए पुलिस द्वारा लचर केस बनाया गया या बड़े वकीलों ने न्याय व्यवस्था को लचर बना दिया? सलमान खान मुक्त हो गए, परंतु उनका पूर्व सुरक्षा अधिकारी रवींद्र पाटिल न्यायिक सड़ांध का शिकार होकर 30 वर्ष की उम्र में ही मर गया।
सलमान खान को जनवरी, 2002 मे अंडरवर्ल्ड की धमकी के बाद महाराष्ट्र पुलिस द्वारा सुरक्षा मुहैया कराई गई थी, जिसके लिए रवींद्र पाटिल की नियुक्ति हुई थी। सितंबर, 2002 में दुर्घटना के वक्त रवींद्र पाटिल टोयोटा लैंडक्रूसर कार में मौजूद था और उसने सलमान खान को शराब के नशे में तेज़ कार चलाने से मना किया था। दुर्घटना के बाद रवींद्र ने ही बांद्रा पुलिस के सम्मुख इस मामले की पहली एफआईआर दर्ज कराई थी।
इसके बाद रवींद्र के खिलाफ अदालत से असहयोग करने, तथा ड्यूटी में कोताही बरतने के आरोप लगाए गए, और उनकी पुष्टि किए बिना 2006 में उसे गिरफ्तार कर आर्थर रोड जेल भेज दिया गया, जहां वह अपराधियों के बीच आत्मग्लानि और टीबी का शिकार होकर वर्ष 2007 में मुंबई के एक अस्पताल में गुमनाम मौत का शिकार हो गया। एक पुलिस अधिकारी मरकर भी सलमान खान की सुरक्षा और रिहाई की अपनी जिम्मेदारी पूरी कर गया, लेकिन सारे सबूतों के बावजूद अदालत ने निम्न कारणों से सलमान खान को बरी कर दिया...
कार में कुल तीन लोग थे... पहला - सलमान खान, जो खुद को बचा रहे थे। दूसरा - पुलिस अधिकारी रवींद्र पाटिल, जिसने मामले की एफआईआर दर्ज कराई, लेकिन बाद में उसी को फंसाकर जेल भेज दिया गया। तीसरा - कमाल खान, जो मामले के बाद विदेश भाग गए। विदेशी नागरिक होने की वजह से उनके विरुद्ध वर्ष 2003 में लुकआउट नोटिस जारी किया गया, लेकिन वह पुलिस तफ्तीश में शामिल ही नहीं हुए। अब दलील दी जा रही है कि कमाल खान वर्ष 2008 से उपलब्ध थे, लेकिन उनका बयान नहीं लिया गया और यह अदालती निर्णय का बड़ा आधार बन गया। मामले के अनुसार सलमान खान नशे में थे, जिसके प्रमाणस्वरूप पुलिस द्वारा बार में शराब पीने के बिल पेश किए गए थे। फिल्मी तरीके से सलमान खान ने बार में अपनी उपस्थिति से इनकार नहीं किया, लेकिन उनके अनुसार उन्होंने शराब नहीं, वरन नींबू पानी पिया था, जिसे अदालत ने मान भी लिया।
मामले के अनुसार शराब पीने के बाद सलमान खान ने तेज स्पीड में गाड़ी चलाकर एक्सीडेंट किया। सलमान खान ने शुरू में कहा कि वह 30 किलोमीटर की स्पीड से गाड़ी चला रहे थे। बाद में उनके एक और ड्राइवर अल्ताफ को मामले में लाने की कोशिश की गई। दुर्घटना के 12 साल बाद इनके पुराने वफादार अशोक सिंह ने गाड़ी चलाने की जिम्मेदारी ले ली और इस तरह सलमान खान बगैर ड्राइविंग लाइसेंस के गाड़ी चलाने के आरोप से मुक्त हो गए और हर बात पर सबूत की बात करने वाली अदालत ने इस पर कोई सबूत नहीं मांगा।
मामले के अनुसार सलमान खान गाड़ी चलाने के बाद ड्राइविंग सीट से उतरकर भाग गए थे। बचाव पक्ष के वकीलों के अनुसार, क्योंकि दूसरा दरवाजा नहीं खुल रहा था, इसलिए सलमान खान ड्राइविंग सीट से उतरकर 15 मिनट बाद वहां से गए, जिसे अदालत ने मान भी लिया। सलमान खान के वकीलों के अनुसार टोयोटा लैंडक्रूसर जैसी बड़ी गाड़ी का टायर फट गया, जिससे दुर्घटना हुई। इसके लिए आरटीओ के अधिकारियों ने झूठे साक्ष्यों को प्रमाणित भी कर दिया, कितना फिल्मी लगता है ना यहाँ पर घटनाक्रम?
अदालत ने सोहैल खान के बॉडीगार्ड तथा अन्य प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों पर भी गौर नहीं किया, जिन्होंने कार में सिर्फ तीन लोगों के होने की बात कही थी, और जिनमें अशोक सिंह शामिल नहीं था। ट्रायल कोर्ट ने मामले को आईपीसी के 304-ए से 304-II में परिवर्तित कर सलमान खान को सभी आरोपों का दोषी माना, परंतु हाईकोर्ट ने सलमान खान को सभी आरोपों से दोषमुक्त करते हुए पुलिस को उनका पासपोर्ट वापस करने का निर्देश दिया है।
अदालत द्वारा 12 साल बाद अशोक सिंह के बयान को प्रामाणिक मानकर सलमान खान को छोड़ने से आपराधिक विधि-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। देश में चार लाख कैदी हैं, जिनमें अधिकांश गरीब, कमजोर और अशिक्षित हैं। इस फैसले से साबित होता है कि अदालती व्यवस्था गरीबों को जेल भेजने के लिए बनी है। रसूखदार कभी भी कानून के शिकंजे में नहीं आते, और अगर फंस भी जाएं, तो वरिष्ठ अधिवक्ताओं की फौज अपने तर्कों से पूरे मामले को ध्वस्त कर देती है,  सलमान खान का बरी होना कई कहानियां कहता है। कुछ वह जो मैं लिख नहीं सकता, जो महज इंसाफ के गलियारों की गप्प हैं। कुछ वह जो मैं लिख सकता हूं, लेकिन डर लगता है कि अदालतें न जाने किस नजर से उसे अपनी तौहीन समझ लें। मैं इन सबके बीच, बचते बचाते यह पुख्ता तरीके से कह सकता हूं कि मीडिया का मन अदालत ने पहले ही बना दिया था। फैसले को लेकर कोई शॉक नहीं लगा। अदालत में जो कुछ हो रहा था वह यह बताने के लिए काफी था कि सलमान छूट रहे हैं। यह सब सिलसिलेवार हो रहा था। जज साहब एक के बाद एक सबूतों की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठा रहे थे। मीडिया में यह लगातार रिपोर्ट भी हो रहा था।
ऊपरी अदालत को पूरा हक है कि निचली अदालत के फैसले को पलट दे, लेकिन इन सबके बीच कुछ छूट गया है। किसी फिल्म की कहानी जैसा लगता है एक किसी अशोक सिंह नाम के ड्राइवर का सामने आना... 13 साल चुप रहना... और एक दिन अचानक सेशन कोर्ट में कहना कि - जज साहब मैं हूं वह शख्स जिसने गाड़ी से फुटपाथ पर सोते लोगों को रौंदा था। सेशन कोर्ट सवाल पूछता रहा कि तुम इतने साल कहां थे ?  विशेष सरकारी वकील की यह दलील मुझे सही लगी है कि पाटिल के पास ऐसी कोई वजह नहीं थी कि सलमान के खिलाफ झूठ बोले। ऊपरी अदालत ने उसे पूरी तरह नकार दिया। 
तो क्या अदालतें सिर्फ सबूत देखती हैं ? या मामला सबूतों की गुणवत्ता को लेकर था। इस सवाल का जवाब सिर्फ वह लोग दे सकते हैं जिनको फैसले लेने हैं। उनके चश्मे के नंबर पर निर्भर करता है कि वे किसी अशोक सिंह को, रवीन्द्र पाटिल को कितना वजन देते हैं। बहरहाल, अदालतों के फैसले सिर माथे। जज साहब रिटायर होने वाले हैं, उनके तर्कों को चुनौती देने के रास्ते राज्य के सामने खुले हैं।

Thursday, December 10, 2015

पाकिस्तान पर बदलती रणनीति

अमित शाहनुसार अभी पाकिस्तान में दीवाली के पटाखों की गूँज कम नहीं हुई थी क़ि एक के बदले 10 सिर काटकर लाने वाली सुषमा स्वराज पाकिस्तान दौरे पर गई हैं। राष्ट्रभक्त योगी आदित्यनाथ, साक्षी महाराज, साध्वी प्राची और गिरिराज सिंह सहित लाखों भक्त अपना सिर पटक रहे हैं। आतंकवाद के खत्म होने तक के इंतज़ार में ही तीन साल से भारत का कोई विदेश मंत्री पाकिस्तान नहीं गया। दस साल तक प्रधानमंत्री रहते हुए भी मनमोहन सिंह नहीं जा सके। 2012 में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री गिलानी ने बुलाया, 2013 में नवाज़ शरीफ़ ने भी मनमोहन सिंह को बुलाया, मनमोहन सिंह का जवाब रहा कि जब तक आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान ठोस कदम नहीं उठायेगा तब तक नहीं जायेंगे। असल में मनमोहन सिंह विपक्ष  के दबाव के कारण भी नहीं जा सके।  किसी सनसनी से कम नहीं है विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का हार्ट ऑफ एशिया के सम्मेलन में भाग लेने के लिए इस्लामाबाद जाना  आखिरी वक्त तक असमंजस की स्थिति थी कि जाएंगी या नहीं जाएंगी। अचानक बैंकाक में दोनो देशों के सुरक्षा सलाहकारों की हुई मीटिंग से सबकुछ सही हो गया। रातो रात सब बदल गया।  आलोचक भी स्वागत करते-करते सवाल पूछने लगे कि अचानक ऐसा क्या हो गया। क्या सीमा पर आतंकवाद बंद हो गया है। जवान और अफसर शहीद नहीं हो रहे हैं या पाकिस्तान में आतंकवाद को चलाने वाले नॉन स्टेट एक्टर सीरिया चले गए हैं। 2008 के मुंबई हमले के बाद तो यही कहा गया था कि जब तक आतंकवाद खत्म नहीं होता है, तब तक बातचीत नहीं होगी। भारत की तरफ से तो कोई मंत्री पाकिस्तान को चेता रहा है, कोई सांसद सख्त बयानबाज़ी कर रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि पाकिस्तान से ज्यादा भारत में हालात बदल गए हैं या फिर पाकिस्तान में भी बदल गए हैं, क्योंकि वहां भी कोई इस तरह की उग्र बातें नहीं कर रहा है।  एक सर के बदले दस सर लाने का बयान देने वाली सुषमा स्वराज ने इस्लामाबाद पहुंचते ही बयान दिया कि मैं संबंधों को सुधारने आई हूं। भारत, पाकिस्तान की तरफ हाथ बढ़ाने के लिए तैयार है। हम सब की सामूहिक जिम्मेदारी है कि आतंकवाद और कट्टर ताकतों को किसी भी नाम या रूप में अपने यहां जगह दें।यह सही है कि यहां तक पहुंचने में प्रधानमंत्री मोदी ने कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखाई। नवाज़ शरीफ को शपथ ग्रहण पर बुलाया, बाहर के मुल्कों में कई बार मिले, विदेश सचिवों से लेकर सुरक्षा सलाहकारों की बातचीत हुई तब जाकर सुषमा स्वराज का दौरा हुआ। पाकिस्तान की राजनयिक शेरी रहमान ने पाकिस्तानी चैनल एआरवाई से कहा कि ख़्वाहिशात को ख़बर बनाने की जल्दबाज़ी नहीं होनी चाहिए। ऐसा कुछ नहीं हुआ है कि कोई नया सूरज निकल आया है या बर्फ निकल आई है। ऐसे बेबी स्टेप का स्वागत होना चाहिए। सब धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं तो क्या इसलिए कि सारी कवायद सिर्फ तस्वीर के लिए है। किसी बड़ी उम्मीद से पाकिस्तान से बातचीत की पहल क्यों नहीं की जाए।
मैं रवीश कुमार के प्राइमटाइम में उनकी बात सुनकर खूब हंसा जब उन्होंने कहा क़ि, "क्या यह सोच कर रोमांच नहीं होता कि सार्क सम्मेलन के लिए पाकिस्तान जाने को तैयार प्रधानमंत्री मोदी ने अगर लाहौर के किसी स्टेडियम में मेडिसन स्कावयर या वेम्बली स्टेडियम जैसा जलवा कर दिया तब क्या होगा। क्या विरोधी टीवी बंद कर देंगे,"
 

नेशनल हेराल्ड केश

संसद के शीतकालीन सत्र में तीसरे दिन भी कांग्रेस पार्टी ने जोरदार हंगामा किया। कांग्रेस का आरोप है क़ि सरकार सुब्रमण्यम स्वामी से राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी पर कीचड़ उछलवा रही है। स्वामी ऐसे नेता हैं जिनको  बीजेपी नहीं समझ सकी उन्हें कांग्रेस भी समझने का प्रयास कर रही है। 19 नवंबर को राहुल गांधी ने कहा कि मोदी जी ये कचरा आप अपने चमचों से मेरे ऊपर फेंकवाते हो, मेरे परिवार पर फेंकवाते हो, अब आप विपक्ष में नहीं हैं, सरकार में हैं। 56 ईंच की छाती निकालो, एंजेंसियां लगाओ मेरे पीछे, और मुझे बंद करो, अगर मैंने कुछ ग़लत किया है तो। स्वामी किसके खिलाफ क्या बोल देंगे ऐसा अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता है। उनको भाजपा का दिग्विजय सिंह कहा जा सकता है। स्वामी खुलकर वित्त मंत्री जेटली की आलोचना करते हैं। मंगलवार को कपिल सिब्बल ने भी स्वामी को परिभाषित करते हुए कहा कि कांग्रेस पार्टी को मुकदमें फंसाने के लिए उन्हें बीजेपी ने पावर आफ एटार्नी दे रखी है। वे बीजेपी की सेंट्रल कमिटी के सदस्य हैं। उन्हें कांग्रेस पार्टी को टारगेट करने की ज़िम्मेदारी दी गई है। वे अपने स्वामी की आवाज़ हैं। his master's voice हैं और उनके दम पर पिछले एक साल से बीजेपी कांग्रेस के नेताओं को टारगेट कर रही है। सरकार के कई मंत्रियों और बीजेपी के सांसदों ने बार बार कहा कि नेशनल हेरल्ड केस में जो कुछ हुआ है वो अदालत में हुआ है। जब कांग्रेस नहीं मानी तो बीजेपी के नेता केस के डिटेल पर आ गए। कैबिनेट मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि कांग्रेस शिकायतकर्ता की बात कर रही है लेकिन आरोप क्या है इस पर नहीं बोल रही है।
ये सीधा सीधा विश्वासघात का मामला बनता है। मजिस्ट्रेट कोर्ट ने भी reasoned order के बाद उन लोगों को समन किया था। हाई कोर्ट ने समन की चुनौती को खारिज कर दिया। ना इसमें कहीं दिल्ली पुलिस है और ना सीबीआई है। ये दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला है।
मैंने भी इंडियन एक्सप्रेस की एक पुरानी रिपोर्ट उठाकर देखी और इस केश के बारे में समझने की कोशिश की। 
1938 में जवाहर लाल नेहरू ने नेशनल हेराल्ड अखबार शुरू किया।
इसका मालिकाना हक़ एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (AJL) के पास था।
2008 में 90 करोड़ के कर्ज़ के साथ ये अख़बार बंद हो गया।
90 करोड़ का ये कर्ज़ कांग्रेस ने समय-समय पर AJL को ब्याज़ मुक्त लोन के तौर पर दिया।
AJL एक पब्लिक लिमिटेड कंपनी थी जिसके पास देश के कई शहरों में करोड़ों की अचल संपत्ति थी।
इस मामले में याचिका दायर करने वाले सुब्रह्मण्यम स्वामी के मुताबिक सारी गड़बड़ी इसके बाद ही शुरू हुई।।।
नवंबर 2010 में एक नॉट फॉर प्रॉफिट कंपनी यंग इंडियन कंपनी बनाई गई।
जिसमें सोनिया गांधी और राहुल गांधी 38-38 फीसदी के हिस्सेदार थे।
दिसंबर 2010 में यंग इंडियन ने 50 लाख रुपए में AJL का अधिग्रहण कर लिया।
AJL की 90 करोड़ की देनदारी के साथ-साथ करोड़ों की अचल संपत्ति भी यंग इंडियन के पास चली गई।
सुब्रह्मण्यम स्वामी का आरोप है कि सोनिया गांधी, राहुल गांधी ने मोतीलाल वोरा, ऑस्कर फर्नांडिस, सुमन दुबे और सैम पित्रोदा के साथ मिलकर कांग्रेस और AJL को नुकसान पहुंचाने की आपराधिक साज़िश बनाई। लेकिन सोनिया गांधी कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने की साज़िश क्यों करेंगी। क्या सोनिया बीजेपी की मदद करना चाहती हैं। अगर सोनिया कांग्रेस को नुकसान पहुंचा रही हैं तो बीजेपी नेता स्वामी इतनी मेहनत क्यों कर रहे हैं। बीजेपी एक तरफ कांग्रेस मुक्त भारत का नारा देती है दूसरी तरफ बीजेपी के स्वामी कांग्रेस को नुकसान से बचाने का प्रयास कर रहे हैं। फिर तो बीजेपी को स्वामी पर आरोप लगाना चाहिए कि वे वित्त मंत्री न बनाए जाने पर बीजेपी से वेनडेटा कर रहे हैं। ऐसा कुछ कर दे रहे हैं कि जीएसटी पास ही न हो। खैर हम बात कर रहे थे कि ये मामले है क्या तो स्वामी के अनुसार AJL की दो हज़ार करोड़ की संपत्ति पर कब्ज़ा करने के लिए ही यंग इंडियन कंपनी बनाई गई और हड़प लिया। इसके लिए 90 करोड़ के लोन को संदिग्ध तरीके से यंग इंडियन के पक्ष में इक्विटी शेयर में बदल दिया।
इस प्रक्रिया में कांग्रेस के समर्थकों और AJL के शेयर होल्डरों के साथ Criminal breach of trust गया।  आरोप यह लग रहे हैं कि कांग्रेस एक राजनीतिक पार्टी है। इस नाते वो किसी कंपनी यानी एजेएल को लोन कैसे दे सकती है और क्या पब्लिक लिमिटेड कंपनी AGL को बेचते समय उसके शेयर धारकों की मंज़ूरी ली गई। इस पर कपिल सिब्बल के जवाब इस तरह से हैं। इनकम टैक्स ट्राइब्यूनल ने एक मामले में ये फ़ैसला दिया है कि राजनीतिक पार्टी पैसे कमाने और खर्च करने के लिए स्वतंत्र है। चुनाव आयोग भी ये साफ़ कर चुका है कि राजनीतिक पार्टी के खर्च को लकर कोई नियम या क़ानून नहीं हैं। इस डील के लिए एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी जनरल मीटिंग (EGM) बुलाई गई थी। उसमें ये फ़ैसला लिया गया कि AGL को बेच दिया जाए और शेयर धारकों के दो तिहाई बहुमत से फ़ैसले को मंज़ूरी दी लिहाज़ा शेयर धारकों से मंज़ूरी नहीं लेने का आरोप ग़लत है। बड़ा आरोप यह भी है कि गांधी परिवार ने AGL की क़रीब 2000 करोड़ की संपत्ति मात्र 51 लाख देकर हड़प ली। सिब्बल का जवाब ये है कि यंग इंडियन कंपनी एक्ट के सेक्शन 25 के तहत कंपनी है यानी चैरिटेबल कंपनी है जिसकी संपत्ति बेची भी जाएगी तो उसका हिस्सा शेयरधारक को नहीं मिलेगा। तो आपराधिक मामला कैसे बना। इसी साल अगस्त में जब प्रवर्तन निदेशालय ईडी ने नेशनल हेराल्ड केस बंद करने का फैसला किया तो निदेशक राजन एस कटोच को पद से हटा दिया गया। अगले ही महीने नए निदेशक ने मामले को फिर से खोल दिया। कौन से निदेशक का जजमेंट सही है यह तो अदालत से भी तय हो जाएगा लेकिन सोमवार को जो याचिका रद्द हुई उसे कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट में चुनौती नहीं देगी और 19 दिसंबर को सोनिया राहुल दिल्ली के पटियाला कोर्ट में पेश होंगे। यही सही तरीका भी है लेकिन संसद में भिड़ने का तरीका क्या सही है। क्या कांग्रेस को कड़े सवालों का सामना नहीं करना चाहिए। 

कालेधन पर कमजोर पड़ती सरकार

सरकार के पास अपराधियों को पकड़ने और उन्हें तुरंत जेल में डालने की कोई नीति, कानून या खुफिया ताकत नहीं है। नरेंद्र मोदी सरकार की बड़ी असफलता लक्ष्य प्राप्त करने के लिए बेहतर जांच और प्रॉसिक्यूशन सिस्टम की जरूरत है क्योंकि मौजूदा कानून बेकार है।
'कालाधन की पूरी रणनीति मजाक है। काला धन का पता लगाने की रणनीति गलत तरीके से तैयार हुई है और यह बेकार है। इस देश में रहने के लिए कोई भी 60 प्रतिशत टैक्स नहीं देगा। दूसरी बात, आपकी काला धन पहल बेहतर नीति और बेहतर सूचना पर आधारित होनी चाहिए।'
'सरकार के पास अब तक बेहतरीन इंटेलिजेंस सिस्टम नहीं है। उसके पास बेहतर अभियोजन क्षमता नहीं है और जब तक बेहतर सूचना प्रणाली न हो, बेहतर तरीके से अभियोजन न हो, फास्ट ट्रैक अदालतें स्थापित न हों कुछ नहीं होगा।'
'कालाधन आपके लिए किसी विदेशी बैंक में आपका इंतजार नहीं कर रहा कि आप जाएं, सूचना प्राप्त करें और इस पर अमल करें। सफिस्टिकेट स्ट्रक्चर्स हैं, सरकार को यह पता लगाना चाहिए कि ये ढांचे क्या हैं, कौन कर रहा है और कैसे किया जा रहा है।'

Sunday, December 6, 2015

चेन्नई पर संकट के कारण


चेन्नई में हो रही मूसलाधार बारिश ने लगभग 100 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। जिसके कारण रक्षा बलों को राहत एवं बचाव कार्यों के लिए तैनात करना पड़ा है। लबालब भरी झीलों और बांधों में दरारों के कारण लोगों को अपने इलाके छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। मुदिचुर, वरदराजपुरम, पश्चिमी तांब्रम, मणिवक्कम की झीलों के कारण इलाकों में बाढ़ आ गई है और जनजीवन पूरी तरह पटरी से उतर गया है। वहीं, बारिश से अब तक 269 लोगों के मारे जाने की खबर है। 
आइए अब जानते हैं क़ि चेन्नई पर आए इस भारी संकट के कारण क्या हैं? क्या सचमुच कुदरत ही इसके लिए ज़िम्मेदार है, या फिर हम भी कुछ हद तक भविष्य में जलवायु के बारे में सोचना बंद कर चुके हैं. आपको 2008 में बिहार में कोसी नदी में आई बाढ़ का तो याद ही होगा। राष्ट्रीय मीडिया को जब तक खबर लगती तब तक कोसी बीस लाख लोगों को विस्थापित कर चुकी थी। तीन लाख घरों को तबाह कर दिया था। क्यों बाढ़ आएगी हम सब जानते हैं मगर तबाही के कुछ दिनों बाद भूल जाते हैं।  तबाही ऊपर से नहीं आती है। हम तबाही का कारण खुद से जुटा कर रखते हैं। हमारा सारा फोकस राहत और बचाव कार्य के बहादुरी के किस्सों पर ही टिक जाता है और उसी की वाहवाही के बाद हम सामान्य हो जाते हैं। सरकार को भी बचकर निकल जाने का मौका मिल जाता है। चेन्नई की बाढ़ के बाद भी हम यमुना नदी के किनारे बसे मकानों को देखने नहीं जाएंगे। आप निजामुद्दीन पुल या एक्सप्रेस वे देखियेगा तो पता चलेगा कि यमुना के बहाव क्षेत्र में कितने मंदिर और मकान बन चुके हैं। पर क्या आपको लगता है कि यह बात आप तभी जानेंगे जब मीडिया बतायेगा।
आप भी तो देखकर अनदेखा कर देते हैं। अंग्रेजों के समय तक मद्रास प्रेसिडेंसी में 53,000 तालाब थे। वहां सन 1885 में सिर्फ 14 ज़िलों में कोई 43,000 तालाबों पर काम चल रहा था। ये जानकारी मैंने अनुपम मिश्र की किताब से ली है जो उन्होंने 1993 में लिखी थी। मद्रास प्रेसिडेंसी ब्रिटिश हुकूमत की प्रशासनिक ईकाई थी। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, केरल और कर्नाटक का कुछ हिस्सा मद्रास प्रेसिडेंसी में आते थे। क्या आज ये तालाब बचे होंगे। आप जवाब जानते हैं। नेताओं ने लोगों को टीवी और मंगलसूत्र दे दिये। बिल्डरों ने इन तालाबों को भर कर प्लाट काट कर लोगों को बेच दिया। लोगों ने सपना समझ कर मकान खरीदा, मकान मौत का सामान बन गया। चेन्नई की इस अडयार नदी को देखिये। आम तौर पर किसी भी नदी की उम्र लाखों करोड़ों साल होती है। हम बीस तीस साल के अनुभव के देखकर उसके फैलाव की ज़मीन को भर देते हैं।जब बारिश हो जाती है तो हल्ला करने लगते हैं कि सौ साल में ऐसी बारिश नहीं हुई। पर क्या आप और हम या कोई भी दावा कर सकता है कि ऐसी बारिश हज़ार साल में बीस बार नहीं हुई होगी। जब होती होगी तब यह अडयार नदी कहां कहां फैलती होगी। क्या अडयार नदी के लिए फैलने की ऐसी जगह बची होगी।
गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा में जो बयान दिया है उसमें कारण तो है मगर वो कारण नहीं है जिसके कारण रिज़र्वायर बारिश के पानी को संभाल नहीं पाया। रिज़र्वायर अंग्रेज़ी का शब्द है जो अंग्रेज़ों के साथ आया। उससे पहले तमिलनाडु में जलाशयों को ऐरी कहा करते थे। गृहमंत्री ने नहीं कहा कि अडियार के दोनों तरफ के रास्तों पर भी अतिक्रमण हो चुका है।अगर तालाब, नदी के किनारे की दलदल ज़मीन बची होती तो बारिश के पानी को सोखने का रास्ता मिलता, बहने का रास्ता मिलता। chamber cum reservoir में safety से अधिक पानी होने की वजह से बाद में 25000 क्यूसेक पानी छोड़ा गया है। ये पानी अडियार नदी में आने से उसका जलस्तर और बढ गया है। पिछले 24 घंटों में चेन्नई में भी बरसात कम हुई है।
(Special Thanks to Ravish Ki Report in Prime Time for giving information.)

Thursday, December 3, 2015

जीएसटी पर एक चर्चा

आज मैने जी एस टी के बारे में संसद में कुछ एक भाषण सुने जो काफ़ी अच्छे लगे। विपक्ष का भी समर्थन इसमें मिल गया है, इसलिए यह और भी अहम हो जाता है। ऐसे में जब एक या दो दिन बाद संसद में बहस होगी, ख़ासकर अपर हाउस में तो काफ़ी अच्छा माहौल देखने को मिलेगा। 
जीएसटी का पूरा नाम गुड्स (वस्तु) एंड सर्विस (सेवा) टैक्स है, जो केंद्र और राज्यों द्वारा लगाए गए 20 से अधिक अप्रत्यक्ष करों के एवज में लगाया जा रहा है। जीएसटी लागू होने के बाद सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी, सर्विस टैक्स, एडिशनल कस्टम ड्यूटी (सीवीडी), स्पेशल एडिशनल ड्यूटी ऑफ कस्टम (एसएडी), वैट / सेल्स टैक्स, सेंट्रल सेल्स टैक्स, मनोरंजन टैक्स, ऑक्ट्रॉय एंड एंट्री टैक्स, परचेज टैक्स, लक्ज़री टैक्स खत्म हो जाएंगे।जीएसटी लागू होने के बाद वस्तुओं एवं सेवाओं पर केवल तीन तरह के टैक्स वसूले जाएंगे। पहला सीजीएसटी, यानी सेंट्रल जीएसटी, जो केंद्र सरकार वसूलेगी। दूसरा एसजीएसटी, यानी स्टेट जीएसटी, जो राज्य सरकार अपने यहां होने वाले कारोबार पर वसूलेगी। कोई कारोबार अगर दो राज्यों के बीच होगा तो उस पर आईजीएसटी, यानी इंटीग्रेटेड जीएसटी वसूला जाएगा। इसे केंद्र सरकार वसूल करेगी और उसे दोनों राज्यों में समान अनुपात में बांट दिया जाएगा। जीएसटी क़ानून को हम किसी आम बिल की तरह ना देखकर एक टैक्स रिफ़ॉर्म क़ानून के रूप में देखें। दुनिया के लगभग 160 से भी अधिक देशों में एक टैक्स प्रणाली (सिंगल टैक्स सिस्टम) है। ऐसे में भारत जैसे उभरते हुए विकासशील देश के लिए यह बहुत ही अहम हो जाता है। भारत की राजनीति की वजह से अभीतक यह क़ानून अटका पड़ा था, जिसे बहुत साल पहले आ जाना चाहिए था।  भारत में इसका विचार अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा सन् 2000 में लाया गया। फिर इसकी सार्थक शुरुआत सन 2005 में कांग्रेस की सरकार के समय की गई थी।  तब भी बात नहीं बनी तो  यूपीए सरकार के तत्कालीन वित्तमंत्री पी चिदम्बरम द्वारा फरवरी, 2007 में ठोस शुरुआत की और जीएसटी के लिए राज्यों के वित्तमंत्रियों की संयुक्त समिति का गठन कर वर्ष 2010 से इसके लागू करने की घोषणा की गई, जिसके बाद विपक्ष के विरोध के चलते कभी इसपर सार्थक पहल नहीं हो सकी क्योंकि उस समय यूपीए 1 की  सरकार वामपंथी दलों के समर्थन से चल रही थी। (वामपंथी हमेशा से ही इस आर्थिक नीति के खिलाफ रहे हैं।) फिर यह बिल स्टइंडिंग कमेटी में जाता है, और वहाँ राज्यों के वित्त आयोगों को भेजा जाता है। तब से आजतक इसी प्रक्रिया में यह बिल अटका हुआ पड़ा था। जब मोदी सरकार आई तो वित्तमंत्री अरुण जेटली ने इसके प्रति अपनी सरकार की प्रतिबद्धता जताई। मोदी सरकार ने 122वां संविधान संशोधन विधेयक (अनुछेद 246, 248 एवं 268 इत्यादि में संशोधन) दिसंबर, 2014 में संसद में पेश किया, जिसे लोकसभा द्वारा मई, 2015 में पारित कर दिया गया। पहले तो पूरा विपक्ष इसके विरोध में था, लेकिन जब इसपर मोदी सरकार को सीरियस देखा गया तो चिदंबरम, केसी त्यागी, नीतीश कुमार जैसे नेताओं ने समर्थन देने की बात कही। 
क्योंकि जीएसटी से राज्यों के अर्थतंत्र पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा, इसलिए इस बिंदु पर 13वें वित्त आयोग द्वारा गठित कार्यदल ने दिसंबर, 2009 तथा 14वें वित्त आयोग ने फरवरी, 2015 में जीएसटी पर अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंप दी है। सरकार के अनुसार जीएसटी आज़ादी के बाद टैक्स सुधार का सबसे बड़ा कदम है, जिससे जीडीपी में वृद्धि और रोज़गारों का सृजन होगा। केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने अमेरिकी कॉरपोरेट क्षेत्र की चिंताओं को दूर करने के अपने प्रयासों के तहत पीटरसन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स को दिए गए संबोधन में कहा कि जीएसटी व्यवस्था आने से भारत एक बड़े और एकीकृत बाज़ार के रूप में तब्दील होगा और जटिल करारोपण खत्म होने से विदेशी निवेशकों को आसानी होगी। एसोचैम के अनुसार छोटे या मध्यम उद्योग समूह (SMEs), जो असंगठित क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं, को इस टैक्स सुधार कानून से काफी फायदा होगा। 13वें केंद्रीय वित्त आयोग के अनुसार जीएसटी से कर संकलन में हो रहे कई तरह के व्यर्थ के खर्चों को रोकने में सहायता मिलेगी, जिससे राज्यों की आर्थिक हालात में सुधार होगा। 14वें वित्त आयोग के अनुसार जीएसटी से उन राज्यों को फायदा होगा, जहां कर रिसाव (टैक्स लीकेज) की वजह से कर संकलन प्रणाली में भ्रष्टाचार चरम पर है। जीएसटी लागू होने से हर सौदा इस कर व्यवस्था के तहत आ जाएगा, जिससे लोगों के लिए करों की चोरी कर पाना आसान नहीं होगा, इसीलिये जीएसटी को काले धन से निबटने के विरुद्ध मज़बूत हथियार के तौर पर देखा जा रहा है।
जब कांग्रेस इस बिल का सूत्रधार थी, तब बीजेपी-शासित गुजरात जैसे राज्य इसका विरोध करते थे। अब पासा पलट गया है। कांग्रेस अब जीएसटी बिल पर असहयोग कर रही है और बीजेपी जीएसटी की सबसे बड़ी लम्बरदार बनकर सामने आई है। जीएसटी पर बनी राज्यसभा सेलेक्ट कमेटी में कांग्रेस के तीन सदस्यों - मधुसूदन मिस्त्री, मणिशंकर अय्यर तथा भालचंद्र मुंगेकर - ने असहमति जताते हुए एक नोट दाखिल किया है। उनका दावा है कि संविधान संशोधन बिल में हालात से समझौता करते हुए इतने अपवाद छोड़ दिए गए हैं कि इसका समर्थन करना नामुमकिन हो गया है।  सरकार के अनुसार 32 में से 30 राजनीतिक दलों द्वारा इस बिल पर राज्यसभा में सहयोग का आश्वासन मिल गया है, परन्तु कांग्रेस के समर्थन के बगैर संसद में दो-तिहाई बहुमत और आधे राज्यों की सहमति मुश्किल है और इस पर कोई फैसला सोनिया गांधी की विदेश यात्रा के बाद ही संभव हो सकेगा। कांग्रेस इस कानून को पारित होने में विलंब कर राजनीतिक मोल-भाव के अलावा मोदी सरकार को झटका भी देना चाहती है।
सरकार को लोकसभा में तो कोई समस्या नहीं थी लेकिन राज्यसभा में कांग्रेस से मोदी जी ने समर्थन माँगा, और जिस तरह का नरम रुख़ दिखाया, उससे मैं निजी तौर पर खुश हुआ। खुश इसलिए हुआ क़ि मैने पहली बार प्रधानमंत्री देखा, जो नेहरू के टक्कर की राजनीति करने आया। बिहार की चुनावी रैलियों में दिखने वाले पीएम से यह पीएम संसद में एकदम अलग थे। खैर कांग्रेस ने भी समर्थन दिया। और सरकार ने भी कांग्रेस की 7 में से 5 बड़ी बड़ी माँगे मान ली। पहली माँग थी क़ि इस क़ानून को संवैधानिक सांसोधन(कोन्स्टीट्यूशनल एमएण्डमेंट) के तहत लाया जाए। इससे यह होगा क़ि सरकार इसमें कुछ भी बदलाव मनमाने ढंग से नहीं कर सकती है। जिस किसी की भी सरकार आएगी, उसको फिर से पूरी संवैधानिक प्रक्रिया से होकर ही गुज़रना पड़ेगा।
दूसरी माँग यह थी क़ि इसकी दर 18% से अधिक ना की जाए। जबकि सरकार द्वारा बताई गई नीति के अनुसार इसका रेट 25-27% जा रहा है। जबकि दुनिया के हर देश में इसका रेट 20% से कम और एवरेज 17% ही है। ऐसे में भारत जो पहले से ही मंहगाई से जूझ रहा है, यहाँ 25% भी होने पर बहुत महगाई बढ़ जाएगी। सरकार ने कांग्रेस पार्टी की इस मांग पर विचार करने के लिए मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया है, जिसकी रिपोर्ट बहुत जल्द आने की उम्मीद है। 

चौथी माँग यह थी कि इसपर लगाया जाने वाला 1% राज्य अतिरिक्त कर (स्टेट एडीशनल टैक्स) न लगाया जाए। क्योंकि सरकार इस क़ानून में किए गए वादे के तहत भविष्य के 5 सालों तक सभी राज्यों की वित्तीय ज़रूरतें पूरी करेगी। ऐसे में राज्य के लिए एडीशनल टैक्स की ज़रूरत नहीं रह जाती है। इसमें मैने एक टीवी डिबेट के दौरान सुना क़ि अगर कोई सामान कर्नाटक में  बनता है, और जम्मू कश्मीर में जाना है, तो बीच में आने वाले हर राज्य को 1% एडीशनल टैक्स देना पड़ेगा। मैं इस बात पर कंफ्यूज हूँ, अगर आपको पता है तो मुझे भी सही बताएँ। 
पाँचवी माँग इसमें यह थी कांग्रेस की तरह से क़ि जीएसटी को पूरी तरह सिंगल सिस्टम टैक्स ही रखा जाए। मतलब स्टेट जीएसटी और सेंट्रल जीएसटी ना हो। जबकि कांग्रेस की इस बात से कई राज्यों के मुख्यमंत्री बहुत नाखुश थे, क्योंकि ऐसे में राज्यों के वित्तीय अधिकार छीन सकते हैं। खुद कांग्रेस शासित राज्य भी इसके विरोध में थे। अभी भी मेरी जानकारी इसपर काफ़ी अधूरी है, और रिसर्च करने के बाद एडिट करूँगा। सभी के सुझाव आमंत्रित हैं।
अगली माँग यह है क़ि केंद्र और राज्यों के बीच टैक्स विवाद निपटाने के लिए पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में ट्रिब्यूनल पंचाट के गठन का प्रावधान हो, जिसमें जीएसटी काउंसिल का दखल न हो। इसकी काट के लिए मोदी सरकार द्वारा यूपीए की पुरानी फाइलों की नोटिंग और आदेशों का सहारा लिया जा रहा है, जहां कांग्रेस द्वारा पूर्व में जीएसटी काउंसिल के गठन की बात की गई थी, लेकिन राजनीति तो पाला बदलने का ही नाम है।
अगर मैं बात करूँ जीएसटी से होने वाले संभावित नुक़सानों का जो इसके विरोधी कह रहे हैं, तो इस प्रकार हैं। 
राजनीतिक आग्रहों से किए गए निम्न समझौतों की वजह से जीएसटी का प्रस्तावित कानून न तो जीडीपी में विशेष वृद्धि ला पाएगा, न अर्थव्यवस्था की सेहत को दुरुस्त कर पाएगा।
वर्तमान में पेट्रोल-डीजल की कीमतें सभी राज्यों में अलग-अलग हैं, और यही हाल शराब का है। जीएसटी लागू होने के बाद भी फिलहाल ऐसा जारी रहेगा। पेट्रो पदार्थों पर सरकार ने निर्णय लिया है कि ये रहेंगे तो जीएसटी के अंदर, लेकिन इन पर राज्य पहले की तरह टैक्स वसूलते रहेंगे। यानी पेट्रोल, डीजल और एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में राज्यों में जो अंतर देखने को मिलता है, वह बरकरार रहेगा। इसी तरह राज्यों के दबाव पर केंद्र सरकार शराब को भी  जीएसटी से बाहर रखने पर राजी हो गई है।
जीएसटी की सबसे बड़ी खामी यह है कि असंतुष्ट राज्यों द्वारा बिना टैक्स संशोधनों के पुराने टैक्स नियमों को बिना जीएसटी के भी चालू रखा जा सकता है। दिल्ली जैसे केंद्रशासित राज्य में देश सरकारों का संघर्ष देख रहा है। जीएसटी पर रोज़ ऐसे संघर्ष होंगे और राजनीतिक दुराग्रहों के काल में इन्हें सुलझा न पाने की कीमत आम जनता को चुकानी पड़ेगी। सरलता का दावा करने वाली जीएसटी कर व्यवस्था में केंद्र और राज्यों में छह तरह के कुल आठ फॉर्म भरने पड़ेंगे। राज्य सरकारों को नए अप्रत्यक्ष कर लगाने की छूट नहीं होगी, जिससे उनके राजस्व स्रोतों में कमी आ जाएगी, जिससे आर्थिक संकटों, यथा - बाढ़-सूखा तथा सामाजिक कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में बड़ा गतिरोध हो सकता है। अगर करों की दरों को संविधान संशोधन कानून का हिस्सा बना दिया गया तो भविष्य की गठबंधन सरकारों में परिवर्तन मुश्किल हो सकता है, जिसकी कीमत पूरे देश को चुकानी पड़ सकती है। जीएसटी में दरों को कम करने के नाम पर सरकार द्वारा कॉरपोरेट टैक्स की दरों को 30 प्रतिशत से 25 प्रतिशत में लाकर कारोबार जगत के बड़े व्यापारियों को राहत देने का प्रबंध पहले ही कर दिया गया है, जिससे न सिर्फ कर-राजस्व में कमी आएगी, वरन आर्थिक विषमता भी बढ़ेगी। मोदी सरकार द्वारा एफआईआई (विदेशी निवेशकों) के 42 हजार करोड़ से अधिक की टैक्स डिमांड को माफ करने और भविष्य में टैक्स न लगाने के अनुबंधों को लागू कर विदेशी निवेशकों के लिए अनुकूल आर्थिक माहौल प्रदान किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एसआईटी की अनुशंसाओं के बावजूद इनकी जवाबदेही तय नहीं होने से काले धन की अर्थव्यवस्था के विशाल स्रोत पर लगाम लगाना मुश्किल होगा।
15-20 लाख रुपये का व्यापार करने वाले छोटे व्यापारी भी जीएसटी के दायरे में आकर हिसाब-किताब रखने को मजबूर होंगे, जो इन सुधारों का पुरज़ोर विरोध और असहयोग करेंगे। सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को मानने से केंद्र सरकार की आय का 55 फीसदी और राज्यों की आय का 70 फीसदी से अधिक सरकारी अधिकारियों के वेतन और पेंशन में ही खर्च हो जाएगा, और राज्यों के पास बिजली बोर्डों के बकाया देने के पैसे भी नहीं है। जीएसटी के माध्यम से करों में कटौती से राज्यों के राजस्व में कमी होने से राज्य कम आमदनी के बाद कैसे अपनी वित्तीय व्यवस्था को सफल रख पाएंगे, यह एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। इससे क्षेत्रीय असंतुलन और अपराध बढ़ेंगे। बिजली, रियल एस्टेट, पेट्रोलियम और शराब जैसे महत्वपूर्ण सेक्टरों को जीएसटी से बाहर रखने से करों की बहुलता जारी रहेगी, जिसके चलते तथाकथित सुधारों का कोई लाभ नहीं मिलेगा।
आधे-अधूरे सुधारों से विदेशी निवेशकों का उत्साह भंग होगा और घरेलू उत्पादकों की प्रतिस्पर्धी स्थिति को भी नुकसान पहुंचेगा। राज्यों द्वारा जीएसटी के माध्यम से समानांतर व्यवस्था खड़ी करने से रोज़गार तथा कर प्रणाली में सुधार और भी मुश्किल हो सकता है। राजनैतिक रस्साकशी के बीच जीएसटी के अधूरे सुधारों से देश में 'वित्तीय नक्सलवाद' पैदा हो सकता है, जहां छोटे और मध्यम उद्योगों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है।
वैसे सरकार ने तो इसके लिए अप्रैल 2016 की लागू तय तारीख रख दी है, लेकिन अभी भी इसमें बहुत लंबी प्रकिया बाकी है। संसद के दोनो सदनों के बाद फिर से बिल एक बार स्टइंडिंग कमेटी के पास जाएगा, फिर राष्ट्रपति के पास जाएगा। उसके बाद 50% से अधिक राज्यों की विधान सभा (जहाँ विधानपरिषद है, उसमें भी पास होना ज़रूरी है।) में पास होने के बाद लागू हो पाएगा। मेरा निजी मानना है क़ि यह एक बड़ा क़ानून है, टैक्स रिफ़ॉर्म या सिंपलिफ़िकेशन के रूप में इसका भविष्य में बड़ा योगदान होगा। सभी दलों को राजनीति से ऊपर उठकर इसमें सार्थक बहस करके पास करवाना चाहिए। जो चीज़े भी ग़लत हों सरकार को सुझाव दें, जैसे सरकार ने कुछ माँगे मानी है, वो भी मानने लायक होंगी तो मानना पड़ेगा। यही लोकतंत्र है, अच्छे क़ानून ही इसको मजबूत बनाते हैं।

Tuesday, December 1, 2015

अरविंद का लोकपाल या जोकपाल?

आज मैं अपने भीतर के राजनीतिक द्वंद से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा हूं। डॉ. आंबेडकर कहते थे किराजनीति में व्यक्ति पूजा अर्थात किसी का भी फैन नहीं होना चाहिए। हमेशा से केजरीवाल के अच्छे काम के साथ हुई छोटी गलतियों का समर्थन करता रहा हूँ। केवल एक बार ही योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण को बाहर निकालने के मामले में हुई अनियमितता के खिलाफ हुआ था। आज जब लोकपाल बिल के बारे में जानकारी एकत्र की तो बडा दुख हुआ। ज़ाहिर है जब उस पार्टी की सरकार जनलोकपाल लेकर आए तो उसकी सख्त समीक्षा होनी चाहिए कि उसका जनलोकपाल कैसा है। जिसे एक बार लाने के प्रयास में आम आदमी पार्टी ने अपनी सरकार छोड़ दी थी। जो पार्टी ही जनलोकपाल बिल के आंदोलन पर खड़ी हुई, वो कैसे उन मुद्दों पर पीछे हट सकती है? क्योंकि प्रशांत भूषण बिल ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष थे, इसलिए उन्होंने जो मुद्दे उठाए हैं, उन्हें केजरीवाल को खुद ही देखना चाहिए। माना कि उनके निजी झगड़े हैं केजरीवाल की टीम से लेकिन जो मुद्दे हैं वे मुझे भी जायज लग रहे हैं। पहला बिंदु है सेलेक्शन कमेटी के बारे में। इसके चार सदस्यों में 3 राजनैतिकहोगे। नेता प्रतिपक्ष, मुख्यमंत्री और असेंबली कास्पीकर। मुख्यमंत्री और स्पीकर एक ही पार्टी के होते हैं इसलिए उनका बहुमत या इक्वल तो ऐसे ही होता है। अरविंद केजरीवाल ने 2011 के आंदोलन में कहा था कि अगर नेता ही लोकपाल को चुनेंगे तो लोकपाल निष्पक्ष स्वतंत्र और ईमानदार कैसे हो सकता है। अब वह खुद अपनी बात से पीछे हट गए।
इस एक्ट के मसौदे के हिसाब से वही होगा जो सुप्रीम कोर्ट में जज या भारत के किसी भी हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस या हाई कोर्ट में जज रहा हो। सदस्य वही होगा, जिसके पास लोक प्रशासन, वित्त या जांच के क्षेत्र में विशेष अनुभव और योग्यता हो और जिसकी साख अच्छी हो, ईमानदार हो। जनलोकपाल और सदस्य पांच साल के लिए नियुक्त किए जाएंगे और उन्हें तभी हटाया जा सकेगा जब विधानसभा उसके खिलाफ दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पास करेगी। यानी सरकार इसे हटा सकती है। जबकि पहले कहा गया था कि शिकायत के बाद जब तक सुप्रीम कोर्ट दोषी न मान ले तब तक नहीं हटाया जा सकता है। अब यह साफ नहीं है कि जनलोकपाल के खिलाफ कोई शिकायत हुई तो कौन जांच करेगा। सरकार या सुप्रीम कोर्ट? 
गलत शिकायत करने पर एक साल की जेल हो सकती है या एक लाख रुपये का जुर्माना या दोनों भी हो सकते हैं। क्या शिकायत करने वाले से ये उम्मीद की जाती है कि उसके पास अपनी कोई जांच एजेंसी होगी? शिकायत करने वाले की सुरक्षा का प्रबंध करने का अधिकार जनलोकपाल को दिया गया है। जनलोकपाल मामले की जांच के लिए खुद भी जांच अधिकारी नियुक्त कर सकता है या सरकार की सहमति से किसी अधिकारी या एजेंसी को जांच अधिकारी नियुक्त कर सकता है।
2013 के केंद्र के कानून के अनुसार लोकपाल को चुनने वाली कमेटी में प्रधानमंत्री, लोकसभा के स्पीकर, नेता विपक्ष, भारत के चीफ जस्टिस, या चीफ जस्टिस के द्वारा तय जज, एक विशिष्ट न्यायविद होंगे, जिसका सुझाव पहले चार सदस्यों की तरफ से आएगा और राष्ट्रपति नियुक्त करेंगे। यहाँ पर केजरीवाल को एक आदमी कम करना चाहिए अपना। क्योंकि वे किसी पद के लिए तो राजनीति में नहीं आए थे। बीजेपी की बात कि उपराज्यपाल को रबर स्टैंप बना दिया गया है, से मैं सहमत नहीं हूं। क्योंकि जिस तरह से बार बार एलजी चुनी हुई सरकार के खिलाफ कार्रवाई करते रहे हैं, इससे लगता है कि उनकी भूमिका ठीक नहीं है। राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र से बाहर निकलने पर भी मुझे आपत्ति है। प्रशांत भूषण ने अरविंद केजरीवाल को सीधे बहस की चुनौती दी है। उनका यह भी आरोप है कि जनलोकपाल बिल का मसौदा विधानसभा में रखे जाने से पहले वेबसाइट पर नहीं डाला गया। लोगों से सुझाव नहीं मांगे गए। आम आदमी पार्टी जो हर कानून को पारदर्शी तरीके से बनाने की बात करती थी, उसने ड्राफ्ट को वेबसाइट पर क्यों नहीं डाला और सीधे विधानसभा में क्यों रखा? ऐसे में पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी के नेताओं का कहना है कि यह वही जनलोकपाल है जो फरवरी 2014 में रखा गया था। तब सदन में रखे जाने के सवाल को लेकर कांग्रेस के समर्थन से चल रही आम आदमी पार्टी की सरकार ने इस्तीफा दे दिया था।

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...