Tuesday, December 1, 2015

अरविंद का लोकपाल या जोकपाल?

आज मैं अपने भीतर के राजनीतिक द्वंद से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा हूं। डॉ. आंबेडकर कहते थे किराजनीति में व्यक्ति पूजा अर्थात किसी का भी फैन नहीं होना चाहिए। हमेशा से केजरीवाल के अच्छे काम के साथ हुई छोटी गलतियों का समर्थन करता रहा हूँ। केवल एक बार ही योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण को बाहर निकालने के मामले में हुई अनियमितता के खिलाफ हुआ था। आज जब लोकपाल बिल के बारे में जानकारी एकत्र की तो बडा दुख हुआ। ज़ाहिर है जब उस पार्टी की सरकार जनलोकपाल लेकर आए तो उसकी सख्त समीक्षा होनी चाहिए कि उसका जनलोकपाल कैसा है। जिसे एक बार लाने के प्रयास में आम आदमी पार्टी ने अपनी सरकार छोड़ दी थी। जो पार्टी ही जनलोकपाल बिल के आंदोलन पर खड़ी हुई, वो कैसे उन मुद्दों पर पीछे हट सकती है? क्योंकि प्रशांत भूषण बिल ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष थे, इसलिए उन्होंने जो मुद्दे उठाए हैं, उन्हें केजरीवाल को खुद ही देखना चाहिए। माना कि उनके निजी झगड़े हैं केजरीवाल की टीम से लेकिन जो मुद्दे हैं वे मुझे भी जायज लग रहे हैं। पहला बिंदु है सेलेक्शन कमेटी के बारे में। इसके चार सदस्यों में 3 राजनैतिकहोगे। नेता प्रतिपक्ष, मुख्यमंत्री और असेंबली कास्पीकर। मुख्यमंत्री और स्पीकर एक ही पार्टी के होते हैं इसलिए उनका बहुमत या इक्वल तो ऐसे ही होता है। अरविंद केजरीवाल ने 2011 के आंदोलन में कहा था कि अगर नेता ही लोकपाल को चुनेंगे तो लोकपाल निष्पक्ष स्वतंत्र और ईमानदार कैसे हो सकता है। अब वह खुद अपनी बात से पीछे हट गए।
इस एक्ट के मसौदे के हिसाब से वही होगा जो सुप्रीम कोर्ट में जज या भारत के किसी भी हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस या हाई कोर्ट में जज रहा हो। सदस्य वही होगा, जिसके पास लोक प्रशासन, वित्त या जांच के क्षेत्र में विशेष अनुभव और योग्यता हो और जिसकी साख अच्छी हो, ईमानदार हो। जनलोकपाल और सदस्य पांच साल के लिए नियुक्त किए जाएंगे और उन्हें तभी हटाया जा सकेगा जब विधानसभा उसके खिलाफ दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पास करेगी। यानी सरकार इसे हटा सकती है। जबकि पहले कहा गया था कि शिकायत के बाद जब तक सुप्रीम कोर्ट दोषी न मान ले तब तक नहीं हटाया जा सकता है। अब यह साफ नहीं है कि जनलोकपाल के खिलाफ कोई शिकायत हुई तो कौन जांच करेगा। सरकार या सुप्रीम कोर्ट? 
गलत शिकायत करने पर एक साल की जेल हो सकती है या एक लाख रुपये का जुर्माना या दोनों भी हो सकते हैं। क्या शिकायत करने वाले से ये उम्मीद की जाती है कि उसके पास अपनी कोई जांच एजेंसी होगी? शिकायत करने वाले की सुरक्षा का प्रबंध करने का अधिकार जनलोकपाल को दिया गया है। जनलोकपाल मामले की जांच के लिए खुद भी जांच अधिकारी नियुक्त कर सकता है या सरकार की सहमति से किसी अधिकारी या एजेंसी को जांच अधिकारी नियुक्त कर सकता है।
2013 के केंद्र के कानून के अनुसार लोकपाल को चुनने वाली कमेटी में प्रधानमंत्री, लोकसभा के स्पीकर, नेता विपक्ष, भारत के चीफ जस्टिस, या चीफ जस्टिस के द्वारा तय जज, एक विशिष्ट न्यायविद होंगे, जिसका सुझाव पहले चार सदस्यों की तरफ से आएगा और राष्ट्रपति नियुक्त करेंगे। यहाँ पर केजरीवाल को एक आदमी कम करना चाहिए अपना। क्योंकि वे किसी पद के लिए तो राजनीति में नहीं आए थे। बीजेपी की बात कि उपराज्यपाल को रबर स्टैंप बना दिया गया है, से मैं सहमत नहीं हूं। क्योंकि जिस तरह से बार बार एलजी चुनी हुई सरकार के खिलाफ कार्रवाई करते रहे हैं, इससे लगता है कि उनकी भूमिका ठीक नहीं है। राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र से बाहर निकलने पर भी मुझे आपत्ति है। प्रशांत भूषण ने अरविंद केजरीवाल को सीधे बहस की चुनौती दी है। उनका यह भी आरोप है कि जनलोकपाल बिल का मसौदा विधानसभा में रखे जाने से पहले वेबसाइट पर नहीं डाला गया। लोगों से सुझाव नहीं मांगे गए। आम आदमी पार्टी जो हर कानून को पारदर्शी तरीके से बनाने की बात करती थी, उसने ड्राफ्ट को वेबसाइट पर क्यों नहीं डाला और सीधे विधानसभा में क्यों रखा? ऐसे में पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी के नेताओं का कहना है कि यह वही जनलोकपाल है जो फरवरी 2014 में रखा गया था। तब सदन में रखे जाने के सवाल को लेकर कांग्रेस के समर्थन से चल रही आम आदमी पार्टी की सरकार ने इस्तीफा दे दिया था।

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