आज मैने जी एस टी के बारे में संसद में कुछ एक भाषण सुने जो काफ़ी अच्छे लगे। विपक्ष का भी समर्थन इसमें मिल गया है, इसलिए यह और भी अहम हो जाता है। ऐसे में जब एक या दो दिन बाद संसद में बहस होगी, ख़ासकर अपर हाउस में तो काफ़ी अच्छा माहौल देखने को मिलेगा।
जीएसटी का पूरा नाम गुड्स (वस्तु) एंड सर्विस (सेवा) टैक्स है, जो केंद्र और राज्यों द्वारा लगाए गए 20 से अधिक अप्रत्यक्ष करों के एवज में लगाया जा रहा है। जीएसटी लागू होने के बाद सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी, सर्विस टैक्स, एडिशनल कस्टम ड्यूटी (सीवीडी), स्पेशल एडिशनल ड्यूटी ऑफ कस्टम (एसएडी), वैट / सेल्स टैक्स, सेंट्रल सेल्स टैक्स, मनोरंजन टैक्स, ऑक्ट्रॉय एंड एंट्री टैक्स, परचेज टैक्स, लक्ज़री टैक्स खत्म हो जाएंगे।जीएसटी लागू होने के बाद वस्तुओं एवं सेवाओं पर केवल तीन तरह के टैक्स वसूले जाएंगे। पहला सीजीएसटी, यानी सेंट्रल जीएसटी, जो केंद्र सरकार वसूलेगी। दूसरा एसजीएसटी, यानी स्टेट जीएसटी, जो राज्य सरकार अपने यहां होने वाले कारोबार पर वसूलेगी। कोई कारोबार अगर दो राज्यों के बीच होगा तो उस पर आईजीएसटी, यानी इंटीग्रेटेड जीएसटी वसूला जाएगा। इसे केंद्र सरकार वसूल करेगी और उसे दोनों राज्यों में समान अनुपात में बांट दिया जाएगा। जीएसटी क़ानून को हम किसी आम बिल की तरह ना देखकर एक टैक्स रिफ़ॉर्म क़ानून के रूप में देखें। दुनिया के लगभग 160 से भी अधिक देशों में एक टैक्स प्रणाली (सिंगल टैक्स सिस्टम) है। ऐसे में भारत जैसे उभरते हुए विकासशील देश के लिए यह बहुत ही अहम हो जाता है। भारत की राजनीति की वजह से अभीतक यह क़ानून अटका पड़ा था, जिसे बहुत साल पहले आ जाना चाहिए था। भारत में इसका विचार अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा सन् 2000 में लाया गया। फिर इसकी सार्थक शुरुआत सन 2005 में कांग्रेस की सरकार के समय की गई थी। तब भी बात नहीं बनी तो यूपीए सरकार के तत्कालीन वित्तमंत्री पी चिदम्बरम द्वारा फरवरी, 2007 में ठोस शुरुआत की और जीएसटी के लिए राज्यों के वित्तमंत्रियों की संयुक्त समिति का गठन कर वर्ष 2010 से इसके लागू करने की घोषणा की गई, जिसके बाद विपक्ष के विरोध के चलते कभी इसपर सार्थक पहल नहीं हो सकी क्योंकि उस समय यूपीए 1 की सरकार वामपंथी दलों के समर्थन से चल रही थी। (वामपंथी हमेशा से ही इस आर्थिक नीति के खिलाफ रहे हैं।) फिर यह बिल स्टइंडिंग कमेटी में जाता है, और वहाँ राज्यों के वित्त आयोगों को भेजा जाता है। तब से आजतक इसी प्रक्रिया में यह बिल अटका हुआ पड़ा था। जब मोदी सरकार आई तो वित्तमंत्री अरुण जेटली ने इसके प्रति अपनी सरकार की प्रतिबद्धता जताई। मोदी सरकार ने 122वां संविधान संशोधन विधेयक (अनुछेद 246, 248 एवं 268 इत्यादि में संशोधन) दिसंबर, 2014 में संसद में पेश किया, जिसे लोकसभा द्वारा मई, 2015 में पारित कर दिया गया। पहले तो पूरा विपक्ष इसके विरोध में था, लेकिन जब इसपर मोदी सरकार को सीरियस देखा गया तो चिदंबरम, केसी त्यागी, नीतीश कुमार जैसे नेताओं ने समर्थन देने की बात कही।
क्योंकि जीएसटी से राज्यों के अर्थतंत्र पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा, इसलिए इस बिंदु पर 13वें वित्त आयोग द्वारा गठित कार्यदल ने दिसंबर, 2009 तथा 14वें वित्त आयोग ने फरवरी, 2015 में जीएसटी पर अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंप दी है। सरकार के अनुसार जीएसटी आज़ादी के बाद टैक्स सुधार का सबसे बड़ा कदम है, जिससे जीडीपी में वृद्धि और रोज़गारों का सृजन होगा। केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने अमेरिकी कॉरपोरेट क्षेत्र की चिंताओं को दूर करने के अपने प्रयासों के तहत पीटरसन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स को दिए गए संबोधन में कहा कि जीएसटी व्यवस्था आने से भारत एक बड़े और एकीकृत बाज़ार के रूप में तब्दील होगा और जटिल करारोपण खत्म होने से विदेशी निवेशकों को आसानी होगी। एसोचैम के अनुसार छोटे या मध्यम उद्योग समूह (SMEs), जो असंगठित क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं, को इस टैक्स सुधार कानून से काफी फायदा होगा। 13वें केंद्रीय वित्त आयोग के अनुसार जीएसटी से कर संकलन में हो रहे कई तरह के व्यर्थ के खर्चों को रोकने में सहायता मिलेगी, जिससे राज्यों की आर्थिक हालात में सुधार होगा। 14वें वित्त आयोग के अनुसार जीएसटी से उन राज्यों को फायदा होगा, जहां कर रिसाव (टैक्स लीकेज) की वजह से कर संकलन प्रणाली में भ्रष्टाचार चरम पर है। जीएसटी लागू होने से हर सौदा इस कर व्यवस्था के तहत आ जाएगा, जिससे लोगों के लिए करों की चोरी कर पाना आसान नहीं होगा, इसीलिये जीएसटी को काले धन से निबटने के विरुद्ध मज़बूत हथियार के तौर पर देखा जा रहा है।
जब कांग्रेस इस बिल का सूत्रधार थी, तब बीजेपी-शासित गुजरात जैसे राज्य इसका विरोध करते थे। अब पासा पलट गया है। कांग्रेस अब जीएसटी बिल पर असहयोग कर रही है और बीजेपी जीएसटी की सबसे बड़ी लम्बरदार बनकर सामने आई है। जीएसटी पर बनी राज्यसभा सेलेक्ट कमेटी में कांग्रेस के तीन सदस्यों - मधुसूदन मिस्त्री, मणिशंकर अय्यर तथा भालचंद्र मुंगेकर - ने असहमति जताते हुए एक नोट दाखिल किया है। उनका दावा है कि संविधान संशोधन बिल में हालात से समझौता करते हुए इतने अपवाद छोड़ दिए गए हैं कि इसका समर्थन करना नामुमकिन हो गया है। सरकार के अनुसार 32 में से 30 राजनीतिक दलों द्वारा इस बिल पर राज्यसभा में सहयोग का आश्वासन मिल गया है, परन्तु कांग्रेस के समर्थन के बगैर संसद में दो-तिहाई बहुमत और आधे राज्यों की सहमति मुश्किल है और इस पर कोई फैसला सोनिया गांधी की विदेश यात्रा के बाद ही संभव हो सकेगा। कांग्रेस इस कानून को पारित होने में विलंब कर राजनीतिक मोल-भाव के अलावा मोदी सरकार को झटका भी देना चाहती है।
सरकार को लोकसभा में तो कोई समस्या नहीं थी लेकिन राज्यसभा में कांग्रेस से मोदी जी ने समर्थन माँगा, और जिस तरह का नरम रुख़ दिखाया, उससे मैं निजी तौर पर खुश हुआ। खुश इसलिए हुआ क़ि मैने पहली बार प्रधानमंत्री देखा, जो नेहरू के टक्कर की राजनीति करने आया। बिहार की चुनावी रैलियों में दिखने वाले पीएम से यह पीएम संसद में एकदम अलग थे। खैर कांग्रेस ने भी समर्थन दिया। और सरकार ने भी कांग्रेस की 7 में से 5 बड़ी बड़ी माँगे मान ली। पहली माँग थी क़ि इस क़ानून को संवैधानिक सांसोधन(कोन्स्टीट्यूशनल एमएण्डमेंट) के तहत लाया जाए। इससे यह होगा क़ि सरकार इसमें कुछ भी बदलाव मनमाने ढंग से नहीं कर सकती है। जिस किसी की भी सरकार आएगी, उसको फिर से पूरी संवैधानिक प्रक्रिया से होकर ही गुज़रना पड़ेगा।
दूसरी माँग यह थी क़ि इसकी दर 18% से अधिक ना की जाए। जबकि सरकार द्वारा बताई गई नीति के अनुसार इसका रेट 25-27% जा रहा है। जबकि दुनिया के हर देश में इसका रेट 20% से कम और एवरेज 17% ही है। ऐसे में भारत जो पहले से ही मंहगाई से जूझ रहा है, यहाँ 25% भी होने पर बहुत महगाई बढ़ जाएगी। सरकार ने कांग्रेस पार्टी की इस मांग पर विचार करने के लिए मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया है, जिसकी रिपोर्ट बहुत जल्द आने की उम्मीद है।
चौथी माँग यह थी कि इसपर लगाया जाने वाला 1% राज्य अतिरिक्त कर (स्टेट एडीशनल टैक्स) न लगाया जाए। क्योंकि सरकार इस क़ानून में किए गए वादे के तहत भविष्य के 5 सालों तक सभी राज्यों की वित्तीय ज़रूरतें पूरी करेगी। ऐसे में राज्य के लिए एडीशनल टैक्स की ज़रूरत नहीं रह जाती है। इसमें मैने एक टीवी डिबेट के दौरान सुना क़ि अगर कोई सामान कर्नाटक में बनता है, और जम्मू कश्मीर में जाना है, तो बीच में आने वाले हर राज्य को 1% एडीशनल टैक्स देना पड़ेगा। मैं इस बात पर कंफ्यूज हूँ, अगर आपको पता है तो मुझे भी सही बताएँ।
पाँचवी माँग इसमें यह थी कांग्रेस की तरह से क़ि जीएसटी को पूरी तरह सिंगल सिस्टम टैक्स ही रखा जाए। मतलब स्टेट जीएसटी और सेंट्रल जीएसटी ना हो। जबकि कांग्रेस की इस बात से कई राज्यों के मुख्यमंत्री बहुत नाखुश थे, क्योंकि ऐसे में राज्यों के वित्तीय अधिकार छीन सकते हैं। खुद कांग्रेस शासित राज्य भी इसके विरोध में थे। अभी भी मेरी जानकारी इसपर काफ़ी अधूरी है, और रिसर्च करने के बाद एडिट करूँगा। सभी के सुझाव आमंत्रित हैं।
अगली माँग यह है क़ि केंद्र और राज्यों के बीच टैक्स विवाद निपटाने के लिए पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में ट्रिब्यूनल पंचाट के गठन का प्रावधान हो, जिसमें जीएसटी काउंसिल का दखल न हो। इसकी काट के लिए मोदी सरकार द्वारा यूपीए की पुरानी फाइलों की नोटिंग और आदेशों का सहारा लिया जा रहा है, जहां कांग्रेस द्वारा पूर्व में जीएसटी काउंसिल के गठन की बात की गई थी, लेकिन राजनीति तो पाला बदलने का ही नाम है।
अगर मैं बात करूँ जीएसटी से होने वाले संभावित नुक़सानों का जो इसके विरोधी कह रहे हैं, तो इस प्रकार हैं।
राजनीतिक आग्रहों से किए गए निम्न समझौतों की वजह से जीएसटी का प्रस्तावित कानून न तो जीडीपी में विशेष वृद्धि ला पाएगा, न अर्थव्यवस्था की सेहत को दुरुस्त कर पाएगा।
वर्तमान में पेट्रोल-डीजल की कीमतें सभी राज्यों में अलग-अलग हैं, और यही हाल शराब का है। जीएसटी लागू होने के बाद भी फिलहाल ऐसा जारी रहेगा। पेट्रो पदार्थों पर सरकार ने निर्णय लिया है कि ये रहेंगे तो जीएसटी के अंदर, लेकिन इन पर राज्य पहले की तरह टैक्स वसूलते रहेंगे। यानी पेट्रोल, डीजल और एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में राज्यों में जो अंतर देखने को मिलता है, वह बरकरार रहेगा। इसी तरह राज्यों के दबाव पर केंद्र सरकार शराब को भी जीएसटी से बाहर रखने पर राजी हो गई है।
जीएसटी की सबसे बड़ी खामी यह है कि असंतुष्ट राज्यों द्वारा बिना टैक्स संशोधनों के पुराने टैक्स नियमों को बिना जीएसटी के भी चालू रखा जा सकता है। दिल्ली जैसे केंद्रशासित राज्य में देश सरकारों का संघर्ष देख रहा है। जीएसटी पर रोज़ ऐसे संघर्ष होंगे और राजनीतिक दुराग्रहों के काल में इन्हें सुलझा न पाने की कीमत आम जनता को चुकानी पड़ेगी। सरलता का दावा करने वाली जीएसटी कर व्यवस्था में केंद्र और राज्यों में छह तरह के कुल आठ फॉर्म भरने पड़ेंगे। राज्य सरकारों को नए अप्रत्यक्ष कर लगाने की छूट नहीं होगी, जिससे उनके राजस्व स्रोतों में कमी आ जाएगी, जिससे आर्थिक संकटों, यथा - बाढ़-सूखा तथा सामाजिक कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में बड़ा गतिरोध हो सकता है। अगर करों की दरों को संविधान संशोधन कानून का हिस्सा बना दिया गया तो भविष्य की गठबंधन सरकारों में परिवर्तन मुश्किल हो सकता है, जिसकी कीमत पूरे देश को चुकानी पड़ सकती है। जीएसटी में दरों को कम करने के नाम पर सरकार द्वारा कॉरपोरेट टैक्स की दरों को 30 प्रतिशत से 25 प्रतिशत में लाकर कारोबार जगत के बड़े व्यापारियों को राहत देने का प्रबंध पहले ही कर दिया गया है, जिससे न सिर्फ कर-राजस्व में कमी आएगी, वरन आर्थिक विषमता भी बढ़ेगी। मोदी सरकार द्वारा एफआईआई (विदेशी निवेशकों) के 42 हजार करोड़ से अधिक की टैक्स डिमांड को माफ करने और भविष्य में टैक्स न लगाने के अनुबंधों को लागू कर विदेशी निवेशकों के लिए अनुकूल आर्थिक माहौल प्रदान किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एसआईटी की अनुशंसाओं के बावजूद इनकी जवाबदेही तय नहीं होने से काले धन की अर्थव्यवस्था के विशाल स्रोत पर लगाम लगाना मुश्किल होगा।
15-20 लाख रुपये का व्यापार करने वाले छोटे व्यापारी भी जीएसटी के दायरे में आकर हिसाब-किताब रखने को मजबूर होंगे, जो इन सुधारों का पुरज़ोर विरोध और असहयोग करेंगे। सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को मानने से केंद्र सरकार की आय का 55 फीसदी और राज्यों की आय का 70 फीसदी से अधिक सरकारी अधिकारियों के वेतन और पेंशन में ही खर्च हो जाएगा, और राज्यों के पास बिजली बोर्डों के बकाया देने के पैसे भी नहीं है। जीएसटी के माध्यम से करों में कटौती से राज्यों के राजस्व में कमी होने से राज्य कम आमदनी के बाद कैसे अपनी वित्तीय व्यवस्था को सफल रख पाएंगे, यह एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। इससे क्षेत्रीय असंतुलन और अपराध बढ़ेंगे। बिजली, रियल एस्टेट, पेट्रोलियम और शराब जैसे महत्वपूर्ण सेक्टरों को जीएसटी से बाहर रखने से करों की बहुलता जारी रहेगी, जिसके चलते तथाकथित सुधारों का कोई लाभ नहीं मिलेगा।
आधे-अधूरे सुधारों से विदेशी निवेशकों का उत्साह भंग होगा और घरेलू उत्पादकों की प्रतिस्पर्धी स्थिति को भी नुकसान पहुंचेगा। राज्यों द्वारा जीएसटी के माध्यम से समानांतर व्यवस्था खड़ी करने से रोज़गार तथा कर प्रणाली में सुधार और भी मुश्किल हो सकता है। राजनैतिक रस्साकशी के बीच जीएसटी के अधूरे सुधारों से देश में 'वित्तीय नक्सलवाद' पैदा हो सकता है, जहां छोटे और मध्यम उद्योगों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है।
वैसे सरकार ने तो इसके लिए अप्रैल 2016 की लागू तय तारीख रख दी है, लेकिन अभी भी इसमें बहुत लंबी प्रकिया बाकी है। संसद के दोनो सदनों के बाद फिर से बिल एक बार स्टइंडिंग कमेटी के पास जाएगा, फिर राष्ट्रपति के पास जाएगा। उसके बाद 50% से अधिक राज्यों की विधान सभा (जहाँ विधानपरिषद है, उसमें भी पास होना ज़रूरी है।) में पास होने के बाद लागू हो पाएगा। मेरा निजी मानना है क़ि यह एक बड़ा क़ानून है, टैक्स रिफ़ॉर्म या सिंपलिफ़िकेशन के रूप में इसका भविष्य में बड़ा योगदान होगा। सभी दलों को राजनीति से ऊपर उठकर इसमें सार्थक बहस करके पास करवाना चाहिए। जो चीज़े भी ग़लत हों सरकार को सुझाव दें, जैसे सरकार ने कुछ माँगे मानी है, वो भी मानने लायक होंगी तो मानना पड़ेगा। यही लोकतंत्र है, अच्छे क़ानून ही इसको मजबूत बनाते हैं।
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