अमित शाहनुसार अभी पाकिस्तान में दीवाली के पटाखों की गूँज कम नहीं हुई थी क़ि एक के बदले 10 सिर काटकर लाने वाली सुषमा स्वराज पाकिस्तान दौरे पर गई हैं। राष्ट्रभक्त योगी आदित्यनाथ, साक्षी महाराज, साध्वी प्राची और गिरिराज सिंह सहित लाखों भक्त अपना सिर पटक रहे हैं। आतंकवाद के खत्म होने तक के इंतज़ार में ही तीन साल से भारत का कोई विदेश मंत्री पाकिस्तान नहीं गया। दस साल तक प्रधानमंत्री रहते हुए भी मनमोहन सिंह नहीं जा सके। 2012 में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री गिलानी ने बुलाया, 2013 में नवाज़ शरीफ़ ने भी मनमोहन सिंह को बुलाया, मनमोहन सिंह का जवाब रहा कि जब तक आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान ठोस कदम नहीं उठायेगा तब तक नहीं जायेंगे। असल में मनमोहन सिंह विपक्ष के दबाव के कारण भी नहीं जा सके। किसी सनसनी से कम नहीं है विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का हार्ट ऑफ एशिया के सम्मेलन में भाग लेने के लिए इस्लामाबाद जाना ।
आखिरी वक्त तक असमंजस की स्थिति थी कि जाएंगी या नहीं जाएंगी। अचानक बैंकाक में दोनो देशों के सुरक्षा सलाहकारों की हुई मीटिंग से सबकुछ सही हो गया। रातो रात सब बदल गया। आलोचक भी स्वागत करते-करते सवाल पूछने लगे कि अचानक ऐसा क्या हो गया। क्या सीमा पर आतंकवाद बंद हो गया है। जवान और अफसर शहीद नहीं हो रहे हैं या पाकिस्तान में आतंकवाद को चलाने वाले नॉन स्टेट एक्टर सीरिया चले गए हैं। 2008 के मुंबई हमले के बाद तो यही कहा गया था कि जब तक आतंकवाद खत्म नहीं होता है, तब तक बातचीत नहीं होगी। भारत की तरफ से न तो कोई मंत्री पाकिस्तान को चेता रहा है, न कोई सांसद सख्त बयानबाज़ी कर रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि पाकिस्तान से ज्यादा भारत में हालात बदल गए हैं या फिर पाकिस्तान में भी बदल गए हैं, क्योंकि वहां भी कोई इस तरह की उग्र बातें नहीं कर रहा है। एक सर के बदले दस सर लाने का बयान देने वाली सुषमा स्वराज ने इस्लामाबाद पहुंचते ही बयान दिया कि मैं संबंधों को सुधारने आई हूं। भारत, पाकिस्तान की तरफ हाथ बढ़ाने के लिए तैयार है। हम सब की सामूहिक जिम्मेदारी है कि आतंकवाद और कट्टर ताकतों को किसी भी नाम या रूप में अपने यहां जगह न दें।यह सही है कि यहां तक पहुंचने में प्रधानमंत्री मोदी ने कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखाई। नवाज़ शरीफ को शपथ ग्रहण पर बुलाया, बाहर के मुल्कों में कई बार मिले, विदेश सचिवों से लेकर सुरक्षा सलाहकारों की बातचीत हुई तब जाकर सुषमा स्वराज का दौरा हुआ। पाकिस्तान की राजनयिक शेरी रहमान ने पाकिस्तानी चैनल एआरवाई से कहा कि ख़्वाहिशात को ख़बर बनाने की जल्दबाज़ी नहीं होनी चाहिए। ऐसा कुछ नहीं हुआ है कि कोई नया सूरज निकल आया है या बर्फ निकल आई है। ऐसे बेबी स्टेप का स्वागत होना चाहिए। सब धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं तो क्या इसलिए कि सारी कवायद सिर्फ तस्वीर के लिए है। किसी बड़ी उम्मीद से पाकिस्तान से बातचीत की पहल क्यों नहीं की जाए।
मैं रवीश कुमार के प्राइमटाइम में उनकी बात सुनकर खूब हंसा जब उन्होंने कहा क़ि, "क्या यह सोच कर रोमांच नहीं होता कि सार्क सम्मेलन के लिए पाकिस्तान जाने को तैयार प्रधानमंत्री मोदी ने अगर लाहौर के किसी स्टेडियम में मेडिसन स्कावयर या वेम्बली स्टेडियम जैसा जलवा कर दिया तब क्या होगा। क्या विरोधी टीवी बंद कर देंगे,"
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