Sunday, December 6, 2015

चेन्नई पर संकट के कारण


चेन्नई में हो रही मूसलाधार बारिश ने लगभग 100 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। जिसके कारण रक्षा बलों को राहत एवं बचाव कार्यों के लिए तैनात करना पड़ा है। लबालब भरी झीलों और बांधों में दरारों के कारण लोगों को अपने इलाके छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। मुदिचुर, वरदराजपुरम, पश्चिमी तांब्रम, मणिवक्कम की झीलों के कारण इलाकों में बाढ़ आ गई है और जनजीवन पूरी तरह पटरी से उतर गया है। वहीं, बारिश से अब तक 269 लोगों के मारे जाने की खबर है। 
आइए अब जानते हैं क़ि चेन्नई पर आए इस भारी संकट के कारण क्या हैं? क्या सचमुच कुदरत ही इसके लिए ज़िम्मेदार है, या फिर हम भी कुछ हद तक भविष्य में जलवायु के बारे में सोचना बंद कर चुके हैं. आपको 2008 में बिहार में कोसी नदी में आई बाढ़ का तो याद ही होगा। राष्ट्रीय मीडिया को जब तक खबर लगती तब तक कोसी बीस लाख लोगों को विस्थापित कर चुकी थी। तीन लाख घरों को तबाह कर दिया था। क्यों बाढ़ आएगी हम सब जानते हैं मगर तबाही के कुछ दिनों बाद भूल जाते हैं।  तबाही ऊपर से नहीं आती है। हम तबाही का कारण खुद से जुटा कर रखते हैं। हमारा सारा फोकस राहत और बचाव कार्य के बहादुरी के किस्सों पर ही टिक जाता है और उसी की वाहवाही के बाद हम सामान्य हो जाते हैं। सरकार को भी बचकर निकल जाने का मौका मिल जाता है। चेन्नई की बाढ़ के बाद भी हम यमुना नदी के किनारे बसे मकानों को देखने नहीं जाएंगे। आप निजामुद्दीन पुल या एक्सप्रेस वे देखियेगा तो पता चलेगा कि यमुना के बहाव क्षेत्र में कितने मंदिर और मकान बन चुके हैं। पर क्या आपको लगता है कि यह बात आप तभी जानेंगे जब मीडिया बतायेगा।
आप भी तो देखकर अनदेखा कर देते हैं। अंग्रेजों के समय तक मद्रास प्रेसिडेंसी में 53,000 तालाब थे। वहां सन 1885 में सिर्फ 14 ज़िलों में कोई 43,000 तालाबों पर काम चल रहा था। ये जानकारी मैंने अनुपम मिश्र की किताब से ली है जो उन्होंने 1993 में लिखी थी। मद्रास प्रेसिडेंसी ब्रिटिश हुकूमत की प्रशासनिक ईकाई थी। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, केरल और कर्नाटक का कुछ हिस्सा मद्रास प्रेसिडेंसी में आते थे। क्या आज ये तालाब बचे होंगे। आप जवाब जानते हैं। नेताओं ने लोगों को टीवी और मंगलसूत्र दे दिये। बिल्डरों ने इन तालाबों को भर कर प्लाट काट कर लोगों को बेच दिया। लोगों ने सपना समझ कर मकान खरीदा, मकान मौत का सामान बन गया। चेन्नई की इस अडयार नदी को देखिये। आम तौर पर किसी भी नदी की उम्र लाखों करोड़ों साल होती है। हम बीस तीस साल के अनुभव के देखकर उसके फैलाव की ज़मीन को भर देते हैं।जब बारिश हो जाती है तो हल्ला करने लगते हैं कि सौ साल में ऐसी बारिश नहीं हुई। पर क्या आप और हम या कोई भी दावा कर सकता है कि ऐसी बारिश हज़ार साल में बीस बार नहीं हुई होगी। जब होती होगी तब यह अडयार नदी कहां कहां फैलती होगी। क्या अडयार नदी के लिए फैलने की ऐसी जगह बची होगी।
गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा में जो बयान दिया है उसमें कारण तो है मगर वो कारण नहीं है जिसके कारण रिज़र्वायर बारिश के पानी को संभाल नहीं पाया। रिज़र्वायर अंग्रेज़ी का शब्द है जो अंग्रेज़ों के साथ आया। उससे पहले तमिलनाडु में जलाशयों को ऐरी कहा करते थे। गृहमंत्री ने नहीं कहा कि अडियार के दोनों तरफ के रास्तों पर भी अतिक्रमण हो चुका है।अगर तालाब, नदी के किनारे की दलदल ज़मीन बची होती तो बारिश के पानी को सोखने का रास्ता मिलता, बहने का रास्ता मिलता। chamber cum reservoir में safety से अधिक पानी होने की वजह से बाद में 25000 क्यूसेक पानी छोड़ा गया है। ये पानी अडियार नदी में आने से उसका जलस्तर और बढ गया है। पिछले 24 घंटों में चेन्नई में भी बरसात कम हुई है।
(Special Thanks to Ravish Ki Report in Prime Time for giving information.)

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