Friday, January 22, 2016

इतिहास नहीं मरा करते (गाँधी V/s भगत सिंह)

कल रात से ही गांधी के बारे में जानकारी लेने की जिद गई है। उनके आलोचकों पर कुछ कहना चाहता हूं जो गोडसे को हीरो बताते हैं। आप गोडसे को कैसे माफ कर सकते हैं? इसलिए कि वह विद्वान था? ऐसे तो रावण भी बहुत गुणी था शायद गोडसे से भी। परन्तु उनके कृत्यों से उन्हें क़तई माफ नहीं किया जा सकता। माना कि भगतसिंह, सुखदेव एवं राजगुरु की शहादत आजादी की लड़ाई की एक महान घटना है परन्तु हम उन सबको क्यों भूल जाते हैं जो ऑफ रिकॉर्ड थे। कुछ लोग महात्मा गाँधी की आलोचना इस तरह करते हैं जैसे क्रिकेट की कर रहे हों। जैसे उन्होने सम्पूर्ण गाँधी को समझ लिया हो । हम ये भूल जाते हैं कि जिस शख़्स ने भी आजादी की लड़ाई लड़ी है वो उन अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ी है जिनका पूरे विश्व के एक चौथाई भाग पर राज था मुझे नहीं लगता कि वर्तमान पीढ़ी में दुबारा से आज़ादी की लड़ाई लड़ने का माद्दा है। यहाँ वर्तमान आलोचकों का ये हाल है कि अंग्रेजों की तो छोड़ो शहर के भ्रष्ट विधायक या सांसद के विरुद्ध तो आवाज़ तक नहीं निकलती। और बात करते हैं महात्मा गाँधी की।
भारत की आजादी के आंदोलन में ब्रिटेन की दो पार्टियों की आपसी राजनीति और उनकी भारत के प्रति नीति का भी अच्छा खासा रोल रहा है। कंजरवेटिव पार्टी हमेशा भारत के खिलाफ रही, लेबर पार्टी भारत को अधिक अधिकार दिये जाने की पक्षधर रही। 1931 मे लेबर पार्टी की सरकार थी। इससे पहले 1890 मे लेबर पार्टी की सरकार थी और तब भी भारत के लिए उसने कई महत्वपूर्ण निर्णय किए थे। लेबर पार्टी की सरकार ने लार्ड इरविन को भारत मे चल रहे आंदोलन से बातचीत करने के लिए कहा और लार्डइरविन ही पहले वायसराय थे जिन्होंने पहली बार बाकायदा घोषणापत्र जारी करके कांग्रेस को भारत का नुमाइंदा कहा और गोल मेज सम्मेलन के लिए आमंत्रित किया जिसमे भारत को अधिक अधिकार दिये जाने की बात होनी थी। लॉर्ड इरविन ने बातचीत का माहौल तैयार करने के लिए गांधी जी की कई शर्ते भी मानी। यहाँ तक कहा जाता है कि लार्ड इरविन ने लिखित मे कांग्रेस से समझौता करके अंग्रेज़ो के ताबूत मे पहली कील ठोकी और कांग्रेस को एक अधिकृत पार्टी होने का भारत की आवाज होने का प्रमाणपत्र दे दिया। ऐसे हालात मे जब वायसराय बातचीत का इच्छुक था, सरकार अनुकूल थी, तब भी गांधी जी ने बातचीत करने से पहले रखी गयी शर्तों मे भगत सिंह एवं उनके साथियों की फांसी रोकने की मांग क्यों नहीं की इस पर अचरज होता है।
भगत सिंह की शहादत के प्रति मन में असीम सम्मान और श्रद्धा है। मुझे ऐसा लगता है कि यदि भगत सिंह को पूरी जिंदगी जीने का मौका मिलता तो वो कैसी होती ? भगत सिंह स्पष्ट रूप से मार्क्सवाद से प्रभवित थे और उनका रुझान लिबरेशन की यूटोपियन समाज व्यवस्था की तरफ था जो 1931 के आगे की दुनिया में सिर्फ़ ख़ूनी सिद्ध हुई बल्कि पूरी दुनिया को खतरे में डालने से पीछे भी हटी। भगत सिंह की आड़ लेकर तो ऐसी ताकतों (कम्युनिस्ट) का सत्तारूढ़ होना संभव भी था क्योंकि तब संभवतया इसमें राष्ट्रवाद और देशभक्ति का फ्लेवर जुड़ चुका होता लेकिन आत्मा तो वाम ही रहती। क्या 1992 के बाद भारत की दशा भी पूर्वी यूरोप के सेटेलाइट मुल्कों जैसा ना हो जाता। भगत सिंह जिस राज्य की परिकल्पना में जीते थे वो हममें से अधिकांश को डरा देने के लिए काफी है।


Wednesday, January 20, 2016

रोहित की आत्म"हत्या" या डॉ. अंबेडकर के विचारों की हार?

आज मुंबई यूनिवर्सिटी में कुछ काम से गया था, लेकिन जैसे ही परिसर में प्रवेश किया वैसे ही कुछ आंदोलनकारी छात्रों को देखकर उनमें शामिल हो गया। असल में सब छात्र मेरे सीनियर (रिसर्च स्कॉलर) थे। इसलिए मेरा उनसे जुड़ने का और भी एक कारण था। आंदोलन का कारण था 18 जनवरी को हैदराबाद यूनिवर्सिटी में एक दलित छात्र रोहित वामूला की आत्महत्या। रोहित की आत्महत्या मीडिया में 3 दिन से बड़ी खबर बनकर उभरी है, ऐसे में राजनीति होना भी लाजमी ही था। राहुल का वहाँ जाना, फिर अरविंद का मोदी पर हमला इसके उदाहरण थे।  अगर हम उसकी मौत के कारणों पर विमर्श करें तो काफ़ी महत्वपूर्ण बिंदु उभरकर सामने आते हैं। अगर हम उसकी मौत के कारणों पर विमर्श करें तो काफ़ी महत्वपूर्ण बिंदु उभरकर सामने आते हैं।
इसकी शुरुआत तब होती है, जब अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के छात्र नकुल सिंह साहनी की फिल्म 'मुजफ्फरनगर बाकी है' के दिखाए जाने का समर्थन कर रहे थे। यह फिल्म दिल्ली विश्वविद्यालय में दिखाई जानी थी, जहां एबीवीपी ने विरोध किया था। फिल्म दिखाने के समर्थन में अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के छात्रों ने हैदराबाद यूनिवर्सिटी में विरोध प्रदर्शन किया। इस कारण एबीवीपी के नेता ने 'फेसबुक' पर इन छात्रों को गुंडा लिख दिया। बाद में एबीवीपी के नेता ने विश्वविद्यालय के सुरक्षा अधिकारियों के सामने लिखित माफी मांग ली। मगर अगले ही दिन एबीवीपी के नेता सुशील कुमार ने आरोप लगाया कि अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के तीस छात्रों ने उन्हें मारा-पीटा है और वे अस्पताल में भर्ती हैं। यह मामला अगस्त 2015 का है। इन आरोपों की जांच के लिए प्रोक्टोरियल बोर्ड बैठा जिसने पाया कि सुशील कुमार को पीटे जाने का कोई प्रमाण नहीं मिला है। मौके पर पहुंचने वाले सुरक्षा गार्ड ने भी कहा कि मारपीट की कोई घटना नहीं हुई है, लेकिन वहां पर उन्होंने भीड़ देखी थी। सबूत नहीं मिला फिर भी अंतिम रिपोर्ट में बोर्ड ने पांच दलित छात्रों को एक सेमेस्टर के लिए निलंबित करने का फैसला किया। उसके बाद इन छात्रों ने विरोध किया तो पूर्व वाइस चांसलर ने बुलाकर बात की और सजा को नए सिरे से जांच होने तक के लिए वापस ले लिया। 12 सितंबर 2015 को सजा वापस लेने के बाद पूर्व वीसी ने कहा कि नई कमेटी जांच करेगी। इस बीच 21 सितंबर 2015 को नए वाइस चांसलर प्रो अप्पा राव आ गए, पुराने वाले बदल गए। नए वीसी ने कोई जांच कमेटी नहीं बनाई। विश्वविद्यालय की सर्वोच्च कार्यकारी समिति ने अपने स्तर पर फैसला दे दिया और यह पांच छात्र हास्टल से निलंबित कर दिए गए। उनकी फैलोशिप रोक दी गई। यह घटना 21 दिसंबर 2015 की है। 21 दिसंबर की सजा पहले की सजा से ज्यादा सख्त कर दी गई, होस्टल से निकालना, फेलोशिप रोकना। इन छात्रों ने हाई कोर्ट में याचिका भी दायर की। जांच नहीं, नई कमेटी नहीं, तो क्या राजनीतिक कारणों से वीसी ने निलंबन का फैसला बहाल किया। यह भी आरोप है कि बीजेपी की एमएलसी ने पूर्व वीसी आरपी शर्मा से मुलाकात की थी। जिसके कारण पहली बार प्रोक्टोरियल बोर्ड की अंतिम रिपोर्ट में इन्हें दोषी ठहरा दिया गया।
बीजेपी सांसद और केंद्रीय श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने 17 अगस्त 2015 को मानव संसाधन मंत्री को पत्र लिखा था। विश्वविद्यालय की घटना पर केंद्रीय मंत्री ने जो लिखा है उसका सार इस तरह है-  'पिछले कुछ दिनों से हैदराबाद यूनिवर्सिटी जातिवादी, अतिवादी और राष्ट्रविरोधी राजनीति का गढ़ बन गया है। जब याकूब मेनन को फांसी दी गई थी तो एक प्रमुख छात्र संगठन अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन ने फांसी के खिलाफ मार्च निकाला था। जब एबीवीपी के नेता ने इसका विरोध किया तो उनके साथ मारपीट हुई और नतीजे में उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। दुखद बात है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ऐसी चीजों को चुपचाप देखता रहा। मेरे लिखने का उद्देश्य यह है कि हैदराबाद यूनिवर्सिटी में जो हो रहा है उससे अवगत कराया जाए। मुझे पूरी उम्मीद है कि आपके नेतृत्व में कैंपस में चीजें बेहतरी के लिए बदलेंगी।' 
28 साल उम्र थी रोहित वेमुला की। रोहित उन पांच छात्रों में से एक था जिन्हें होस्टल से निलंबित किया गया था। उसकी फैलोशिप सात महीने से रोक दी गई थी। रोहित की मां दर्जी का काम करती है और उसका परिवार गुंटूर के एक गांव का रहने वाला है। बेहद गरीब परिवार से आने वाला छात्र रोहित पढ़ने लिखने में काफी अच्छा था। रोहित ने रविवार को आत्महत्या कर ली। उसने हमारे, आपके लिए एक पत्र लिखा है। इस पत्र को हम और आप कई तरह से पढ़ सकते हैं, पढ़ेंगे ही। लेकिन जरा सोचिए अगस्त 2015 का मामला क्या 18 जनवरी 2016 तक नहीं सुलझाया जा सकता था। जाहिर है इस मामले में राजनीति तो हुई है। अगर विश्वविद्यालय ईमानदार प्रयास करता तो दोनों गुटों में सुलह करा सकता था। जिस विश्वविद्यालय से ऐसे मामले नहीं सुलझ सकते, रोहित की खुदकुशी उसकी प्रशासनिक क्षमता और नीयत पर भी सवाल करती है। अब अगर पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक स्तर से ऊपर उठकर देखें तो कुछ महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान देने की ज़रूरत है। सबसे पहले सभी सवाल केंद्रीय मंत्री के पत्र से उठते हैं, जिसमें उन्होने एएसए के छात्रों को देश विरोधी गतिविधियों में शामिल बताया था। देशविरोधी गतिविधियों में शामिल होने का पैमाना एक सांसद या मंत्री कैसे तय कर सकता है, वो भी बिना किसी सबूत के एबीवीपी की सिफारिस पर। क्या याक़ूब मेनन की फाँसी का विरोध देशविरोधी था, मेरे जैसे बहुत से लोग हैं जो हमेशा से हर तरह की फाँसी का विरोध करते रहे हैं। भाजपा सांसद वरुण गाँधी तक ऐसे कई लेख लिख चुके हैं। इसके बाद अगर एएसए मुज़फ्फरनगर के दंगों की असलियत को सबके सामने लाता है, तो क्या इसे देशद्रोह की नज़र से देखा जाएगा? और कौन नहीं जानता है क़ि मुज़फ़्फ़रनगर में किसने किस तरह से दंगे करवाए थे?  एक विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में किसी मंत्री का सीधे मानव संसाधन मंत्री को 1 नहीं 5-5 बार पत्र लिखना कहाँ तक जायज़ था? इसके बाद मानवसंसाधन मंत्रालय से बार बार यूनिवर्सिटी के वीसी को कार्यवाही के लिए पत्र लिखा जाना कितना सही था? एबीवीपी के छात्रों का उन दलित छात्रों को गुंडा कहना कहाँ तक सही था, फिर उनसे लिखित माफी क्यों माँगी अगर ग़लत नहीं थे तो? न्यूज़ मिनट ने 22 दिसंबर को भी इस मामले पर रिपोर्ट छापी है जिसके अंदर सुशील कुमार का माफीनामा छपा है। चार अगस्त की तारीख लिखी है और समय लिखा है रात के दो बजे।न्यूज़ मिनट ने 22 दिसंबर को भी इस मामले पर रिपोर्ट छापी है जिसके अंदर सुशील कुमार का माफीनामा छपा है। चार अगस्त की तारीख लिखी है और समय लिखा है रात के दो बजे। लेकिन रवीश कुमार के ब्लॉग में मैने पढ़ा क़ि किसी ने उनको जानकारी दी थी क़ि मेडिकल रिपोर्ट में 4 अगस्त को सुशील रात के साढ़े चार बजे भर्ती हुआ। अर्चना अस्पताल की डिस्चार्ज समरी में कहा गया है कि सुशील को पेट में ब्लड ट्रामा और तीव्र अपेंडिसाइटिस के लिए भर्ती किया गया है। उसमें तत्काल बीमारी के कालम में चार अगस्त के रात के ढाई बजे की मारपीट की घटना का जिक्र किया है। रात के दो बजे सुशील माफीनामे पर दस्तखत करता है, मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार ढाई घंटे के बाद भर्ती होता है जिसमें लिखा है कि ढाई बजे मारपीट हुई। तो क्या माफीनामे के आधे घंटे के भीतर मारपीट की कोई घटना हुई थी। सुशील को दो घंटे क्यों लगे अस्पताल तक पहुंचने में। इस मौत पर सवाल कई सारे उभरकर आते हैं। पहला है देश में चल रहे कुछ तथाकथित हिंदू राष्ट्रवादियों का। आप देख सकते हैं किस तरह से सभी दक्षिणपंथी संगठन इस तरह की विचारधाराओं को कुचलने की कोशिशें कर रहे हैं। दूसरा सवाल यह कि दलित राजनीति और अंबेडकर के नाम पर बने संगठन वैचारिक और सांगठनिक रूप से इतने कमजोर हैं। अबतक क़ि उनको आत्महत्या तक करनी पड़ती है, फिर कहाँ चले जाते हैं वो डिक्की के सभी संगठन और उनके दलितों के लिए बनाए गए फंड? वो छात्र मरा इसलिए क्योंकि उसकी फ़ेलोशिप कई महीनों से बंद थी, उन्हें यूनिवर्सिटी के हर सार्वजनिक स्थल पर जाना मना कर दिया गया था। उसके पास पढ़ने के लिए पैसे तक नहीं रह गए थे। विचारधारात्मक रूप से विरोधी लोग उसको काफ़ी परेशान करने लगे थे। इसबारे में सरकार को जाँच करवाकर कठोर कार्यवाही करनी चाहिए। अन्यथा यह हार अंबेडकर के ही विचारों की नहीं पूरे देश की होगी। 

Sunday, January 10, 2016

दीपिका का बेहतरीन अभिनय


 "बाजीराव मस्तानी दीपिका के सौंदर्य की भव्यता के लिए याद किया जाना चाहिए । इस फ़िल्म में दीपिका की ख़ूबसूरती कलात्मक हो जाती है और उसका अभिनय मस्तानी के किरदार को  यादगार बना देता है । निर्देशक ने दीपिका को एक कैनवस की तरह ट्रीट किया है । हर तरह से उस पर कूची चलाई है लेकिन आखिर के सीन में मुग़ल ए आज़म की मधुबाला दिख जाती है । मधुबाला की बेख़ौफ़ निगाहें दीपिका की आँखों से झलक जाती है । किसे पता था जिन बेड़ियों में कभी अनारकली जकड़ी गई थी, उन्हीं बेड़ियों में मस्तानी भी जकड़ी जाएगी । दरअसल साहित्य और फ़िल्म अपने लेखन और दृश्यांकन की परंपरा से कभी आज़ाद नहीं हो सकते । वो कहीं न कहीं से आते हैं । अवतरित नहीं होते ।"
First (in "........") paragraph is taken from Ravish Kumar Blog Qasba.

कई बातों में मेरी और रवीश की राय मिलती है।  यह बातें मैने अपने दोस्तों को फिल्म देखने के बाद ही कहीं थी, और 1-2 ट्वीट भी किए थे, जबकि रवीश ने बाद में पूरा ब्लॉग ही लिख दिया था
लगभग सबको पता होगा क़ि दीपिका पादुकोण मेरी फ़ेवरेट एक्ट्रेसेस में से एक रही हैं, और अक्सर लोग मज़ाक में पुंछ बैठते हैं क़ि ये शेर किस पर लिखा तो कह देता हूँ क़ि दीपिका पर।  खैर यह तो हुई मज़ाक की बात लेकिन जब आप किसी को पसंद करते हैं, तो उसके कई कारण होते हैं।  और किसी एक्टर या एक्ट्रेस को पसंद करने के कारण उसके अभिनय से जुड़े होते हैं।  अशोका फिल्म में करीना कपूर, देवदास में ऐश्वर्या राय के भी रोल से हज़ारों मील आगे है दीपिका का  मस्तानी का किरदार।  थिएटर में जाकर तो नहीं देख पाया लेकिन मोबाइल में ही देखते समय, दीपिका के रोल को बार बार देख रहा था।  ऐसा इसलिए नहीं क़ि वो मेरी फ़ेवरेट हीरोइन हैं।  बल्कि इसलिए कि इस किरदार में उन्होने मुगल ए आज़म की मधुबाला की याद दिला दी।  असल में मैने मुगल ए आज़म कल रात ही देखी थी।  तब जाकर दोनो के रोल को कम्पेयर कर सका।  
वैसे तो सभी हीरोइनें खूबसूरत ही दिखती हैं, लेकिन एक्टिंगवाइस दीपिका अव्वल हैं।  उनका उर्दू लफ़्ज़ों को बोलना मुझे ख़ासकर भा जाता है।
पर्दे पर एक्टिंग करते हुए दीपिका के आगे प्रियंका कहीं नज़र ही नहीं आती हैं, जबकि डांस में प्रियंका ने दीपिका को मात दी है।  इसी के हिसाब से देखा जाए तो हीरो के लिबास में रणवीर सिंह दिखने में तो बाजीराव पेशवा दिखते हैं, लेकिन एक्टिंग में बेकार हो जाते हैं।  एक सीन में वो मुगल सेनापति से कहते हैं क़ि तुम्हारी 2000 सेना के पीछे में उससे दुगुना सैनिक खड़े हैं, और ज़ोर ज़ोर से हँसने लगते हैं, तो बड़ा जोक सा हो जाता है, क़ि ऐसे सीरियस समय में कोई नायक ऐसी बचकाना एक्टिंग भी कर सकता है क्या? स्वतंत्र रूप से देखिये तो उनका अभिनय शानदार है लेकिन जब आप एक सांस्कृतिक ऐतिहासिक किरदार निभाते हैं तो चरित्र को जीना बड़ी चुनौती हो जाती है । मुझे ऐसा लगता है कि बॉलीवुड में उनकी जगह यह रोल संजय दत्त या फिर ऋतिक रोशन कर सकते थे।  
ऐसा भी नहीं है क़ि दीपिका की हर फिल्म ही मुझे पसंद हो।  इसके पहले चेन्नई एक्सप्रेस ही अच्छी लगी थी।  अन्यथा हैप्पी न्यू ईयर टाइप को 2 मिनट नहीं देख सकता हूँ।  वैसे उनका यह सबसे अच्छा समय चल रहा है, जो एक एक्ट्रेस का होता है, इस 3-4 साल के दौरान ही वो और भी कुछ अच्छे अभिनय को दिखाना चाहेंगी, और हमें इंतजार रहेगा।  

महाराष्ट्र के इतिहास का एक और पन्ना

आज सत्याग्रह की वेबसाइट पर एक कवर स्टोरी पढ़ रहा था, जिसमें इतिहास का एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू देखने को मिला. स्टोरी के एक इंटरव्यू में भारतीय सेना के सेवानिवृत्त जवान  दादासाहेब भोसले बताते हैं क़ि पुणे के पास भीमा कोरागाँव महाराष्ट्र के दलितों के लिए बहुत ही ऐतिहासिक स्थान है. ख़ासकर नए साल में तो इस समय एक बड़ी यात्रा और महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है. इसके ऐतिहासिक कारण कुछ और भी रोचक हैं. बात 1818 की है, जब साल के पहले दिन ईस्ट इंडिया कंपनी के 500 सैनिकों ने भीमा नदी को पार करके भीमा कोरेगांव में अपने से कहीं ताकतवर और सुसज्जित पेशवा की 25,000 सैनिकों की टुकड़ी को धूल चटा दी थी.ईस्ट इंडिया कंपनी के ये सैनिक अंग्रेज कर्नल एफएफ स्टॉन्टन की अगुवाई में लड़े थे. अंग्रेजों के लिए यह लड़ाई तीसरे मराठा-अंग्रेज युद्ध का आखिरी मोर्चा था जिसने पेशवाओं के साम्राज्य का अंत कर दिया. इस लड़ाई ने पश्चिमी भारत में अंग्रेजों के शासन की बुनियाद रखी थी.
पहले मराठा शासक शिवाजी महारों को अपनी सेना में पूरी उदारता के साथ भरती करते थे लेकिन, दो दशक बाद पेशवाओं के शासनकाल में यह स्थिति पूरी तरह पलट गई. पेशवा ब्राह्मण थे और उनमें रूढ़िवादिता कूट-कूटकर भरी हुई थी. कहा तो ये भी जाता है कि उनके शासनकाल में जब कोई महार नगर में प्रवेश करता था तो उसे अपने पीछे झाड़ू बांधकर चलना पड़ता था ताकि उसके कदम जहां पड़े हों वह धूल साफ होती जाए. उन्हें मुंह के नीचे गर्दन से एक कटोरी बांधकर बाहर निकलना पड़ता था ताकि उनका थूक जमीन पर न गिरे. उस दौर में जाति छिपाना सजायोग्य अपराध था.

महारों को 1893 में सेना में लेना बंद कर दिया गया था. उसके पहले 1857 तक के युद्ध में वो लड़ते रहे हैं. लेकिन 1857 के विद्रोह के बाद यह बंदी हुई थी. इस बंदी के बाद दलितों में हो रहे सुधारों के रास्ते बंद हो चुके थे. फिर प्रथम विश्व युद्ध के समय इनकी भर्ती की गई थी, और इसके बाद 1945 में एक रेजीमेंट की स्थापना की गई थी. 
दलित अँग्रेज़ों के साथ क्यों हुए इसके बारे में कुछ दलित इतिहासकार कहते हैं, कि जब वो अँग्रेज़ों के साथ संपर्क कर रहे थे, तब बाजीराव पेशवा सेकंड के साथ आने का प्रस्ताव रखा था, जिसे नकार दिया गया था. इसलिए उन्होनें ऐसा किया. 
कोरेगांव की लड़ाई इतिहास के पन्नों से गायब हो चुकी थी. लेकिन जब 1927 में अंबेडकर यहां आए तो इस स्थान को तीर्थ का दर्जा मिल गया. उनकी मृत्यु के बाद इस आयोजन को हिंदू संस्कृति की मुख्यधारा के विकल्प के तौर पर विकसित करने की कोशिश होने लगी. अंबेडकर की स्मृति से जुड़े जितने कार्यक्रम होते हैं भीमा कोरेगांव का आयोजन भी तकरीबन वैसा ही है.

हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे, कहते हैं कि गालिब का है अंदाज़े बयाँ और.............


हर एक बात पर कहते हो तुम कि तू क्या है? 
तुम ही कहो कि ये अंदाज ए गुफ्तगू क्या है?
पिछले साल के अंतिम दिन Amezon.com से दीवान-ए- ग़ालिब ऑनलाइन मँगवाई थी. नए साल पर पढ़नी शुरू की तो जैसे उठाई थी, वैसे ही वापस रख दी. लेकिन तब तक उसके कुछ शेर दिलो-दिमाग़ में बस चुके थे. फिर किसी ने कहा क़ि ग़ालिब को और उनकी जिंदगी जानने के लिए मिर्ज़ा ग़ालिब फिल्म को देखो. 1.5 घंटे के चार भाग, मतलब 6 घंटे की फिल्म देखने के लिए मैने चार दिन तय किए थे. लेकिन जैसे जैसे देखी, मन नहीं माना एक ही रात में देख डाली. फिर 1954 में बनी फिल्म देखी। फिर उर्दू समझने के लिए मुगल ए आजम देखी। फिर जाकर उनकी ग़ज़लें पढ़ने लगा. बेगम अख़्तर, जगजीत सिंह, गुलाम अली ने जितनी भी उनकी ग़ज़लें गाई हैं, लगभग सब सुन डाली. अब दीवान ए ग़ालिब फिर से पढ़ रहा हूँ, उर्दू समझ में कम आती है, तो फिर translater का प्रयोग कर लेता हूँ. शेर ऐसे याद हो गए हैं कि जब भी दोस्तों से खाना खाने या और किसी काम के लिए भी बात करता हूँ तो सब्जेक्ट के हिसाब से ग़ालिब का कोई शेर कह जाता हूँ. पागल सा हो गया हूँ उस फक्खड़ इंसान के शेरो का. अब समझ आ रहा है क़ि नए शायरों के लिए ग़ालिब कितने महत्वपूर्ण और मददगार हैं. दरअसल कुमार विश्वास ने ही एकदिन कहा था क़ि ग़ालिब को पढ़ो........... लेकिन डर यह भी है क़ि कहीं क़ानून छोड़कर शायर ही ना बन जाऊ. वैसे वकालत में भी उर्दू और शायरी का काम होता है. कोई बात नहीं अब उर्दू सीखकर भाषा में मिठास आ जाएगी। लिखने में आसानी हो जाएगी। वैसे भी मेरे ब्लाग की लाइन है,........."बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी"........


 उर्दू अदब में यूँ तो बडे - बडॆ उस्तादों ने अपने अशारों से शायरी को नए मकाम तक पहुंचाया , लेकिन मिर्ज़ा असदुल्लाह खां ’गालिब’ का अंदाज़ ही निराला है । गालिब के शे’र सिर्फ़ मोहब्बत की शायरी की शिनाख्तगी ही नहीं हैं । उनका सारा फ़लसफ़ा इस दुनिया में आज भी उतना ही चलन में है , जितना शायद उनके दौर में रहा हो । गालिब की शायरी में हमें अपने आसपास के हर रंग की मौजूदगी का एहसास मिलता है । कमाल सिर्फ़ और सिर्फ़ गालिब की शायरी का है । वे एक दौर के शायर नहीं हैं । 
गालिब की गज़लें जब पहली मर्तबा ईरान से निकलकर दिल्ली की गलियों तक पहुंची और फ़िर दिल्ली से जो सफ़र शुरु हुआ , उसके करीबन सौ साल बाद फ़ैसला हुआ कि गालिब अपने दौर की सबसे अलहदा और उम्दा आवाज़ थी । तब से लेकर अब तक कई बेहतरीन सुखनवर हुए लेकिन गालिब के कद को तो छोडिए कोई अब तक उनके कंधे तक भी नहीं पहुंच पाया । मीर दुनिया से बेज़ार थे ,वहीं गालिब दुनिया के हर रंग से वाकिफ़ थे । उन्होंने अपने अल्फ़ाज़ से ज़िंदगी के सारे पहलूं को छुआ । 
पूछते हैं वो कि ‘ग़ालिब’ कौन है, 
कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या 
ये मसाइले-तसव्वुफ़, ये तेरा बयान ‘ग़ालिब’
तुझे हम वली समझते जो न बादहख़्वार होता......


मिर्ज़ा असद-उल्ला खां ‘ग़ालिब’ जो पहले ‘असद’ उपनाम से और फिर ‘ग़ालिब’ उपनाम से प्रसिद्ध हुए, 27 दिसम्बर 1797 ई. को आगरा में पैदा हुए। तेरह वर्ष के मिर्ज़ा का निकाह दिल्ली के लोहारु कुल की उमराव बेग़म के साथ पढा गया । शादी के दो-तीन साल बाद वे हमेशा के लिए दिल्ली के हो गए , जिसे एक जगह उन्होंने कुछ यूँ बयान किया है :
‘‘सात रजब 1225 (9 अगस्त, 1810) को मेरे वास्ते हुक्मे-दवामे-हब्स (स्थायी क़ैद का हुक्म) सादिर हुआ। एक बेड़ी (यानी बीवी) मेरे पाँव में डाल दी और दिल्ली शहर को ज़िंदान (क़ैदखाना) मुक़र्रर किया और मुझे उस ज़िंदान में डाल दिया।’’
यह केवल मिर्ज़ा ‘ग़ालिब’ की सादगी ही है , जो बादहख़्वार होने के कारण उन्होंने अपने ‘वली’ होने का दावा नहीं किया । जहां तक उर्दू अदब का ताल्लुक है और इससे भी ज़्यादा साहित्य और ज़िंदगी के जुडाव है, ‘ग़ालिब’ न केवल अपने ज़माने के ‘अदबी बली’ (साहित्यिक अवतार) थे, न केवल आधुनिक युग के ‘अदबी अली’ हैं, बल्कि जब तक उर्दू भाषा और उसका साहित्य मौजूद रहेगा, उनका स्थान ‘अदबी वली’ के रूप में हमेशा कायम रहेगा। 
परम्पराओं से विद्रोह करने और लीक से हटकर बात कहने के जुर्म में ज़माना जो बर्ताव हर ‘वली’ से करता रहा है , वैसा ही ‘ग़ालिब’ के साथ भी हुआ। ‘ग़ालिब’ से पहले उर्दू शायरी में भाव-भावनाएं तो मौजूद थीं, मगर भाषा और शैली के ‘चमत्कार’ ‘गुलो-बुलबुल’, ‘जुल्फ़ो-कमर’ (माशूक़ के केश और कमर) ‘मीना-ओ-जाम’ (शराब की सुराही और प्याला) की कसीदाकारी तक सिमट कर रह गए थे। बहुत हुआ तो किसी ने तसव्वुफ़ (सूफ़ीवाद) का सहारा लेकर संसार की असारता और नश्वरता पर दो-चार आँसू बहा दिए। ऐसे समय में, जबकि अधिकांश शायर :
सनम सुनते हैं तेरी भी कमर है, 
कहां है ? किस तरफ़ है ? औ’ किधर है ?


रंज से ख़ूगर हुआ इन्सां तो मिट जाता है रंज
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसां हो गईं।


ऐसे उच्चकोटि के अनुभवपूर्ण शेर निकले। यह मिर्ज़ा ‘ग़ालिब’ ही की विशेषता थी कि उन दिनों, जबकि साहित्य-समालोचना का लगभग अभाव था.

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...