आज मुंबई यूनिवर्सिटी में कुछ काम से गया था, लेकिन जैसे ही परिसर में प्रवेश किया वैसे ही कुछ आंदोलनकारी छात्रों को देखकर उनमें शामिल हो गया। असल में सब छात्र मेरे सीनियर (रिसर्च स्कॉलर) थे। इसलिए मेरा उनसे जुड़ने का और भी एक कारण था। आंदोलन का कारण था 18 जनवरी को हैदराबाद यूनिवर्सिटी में एक दलित छात्र रोहित वामूला की आत्महत्या। रोहित की आत्महत्या मीडिया में 3 दिन से बड़ी खबर बनकर उभरी है, ऐसे में राजनीति होना भी लाजमी ही था। राहुल का वहाँ जाना, फिर अरविंद का मोदी पर हमला इसके उदाहरण थे। अगर हम उसकी मौत के कारणों पर विमर्श करें तो काफ़ी महत्वपूर्ण बिंदु उभरकर सामने आते हैं। अगर हम उसकी मौत के कारणों पर विमर्श करें तो काफ़ी महत्वपूर्ण बिंदु उभरकर सामने आते हैं।
इसकी शुरुआत तब होती है, जब अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के छात्र नकुल सिंह साहनी की फिल्म 'मुजफ्फरनगर बाकी है' के दिखाए जाने का समर्थन कर रहे थे। यह फिल्म दिल्ली विश्वविद्यालय में दिखाई जानी थी, जहां एबीवीपी ने विरोध किया था। फिल्म दिखाने के समर्थन में अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के छात्रों ने हैदराबाद यूनिवर्सिटी में विरोध प्रदर्शन किया। इस कारण एबीवीपी के नेता ने 'फेसबुक' पर इन छात्रों को गुंडा लिख दिया। बाद में एबीवीपी के नेता ने विश्वविद्यालय के सुरक्षा अधिकारियों के सामने लिखित माफी मांग ली। मगर अगले ही दिन एबीवीपी के नेता सुशील कुमार ने आरोप लगाया कि अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के तीस छात्रों ने उन्हें मारा-पीटा है और वे अस्पताल में भर्ती हैं। यह मामला अगस्त 2015 का है। इन आरोपों की जांच के लिए प्रोक्टोरियल बोर्ड बैठा जिसने पाया कि सुशील कुमार को पीटे जाने का कोई प्रमाण नहीं मिला है। मौके पर पहुंचने वाले सुरक्षा गार्ड ने भी कहा कि मारपीट की कोई घटना नहीं हुई है, लेकिन वहां पर उन्होंने भीड़ देखी थी। सबूत नहीं मिला फिर भी अंतिम रिपोर्ट में बोर्ड ने पांच दलित छात्रों को एक सेमेस्टर के लिए निलंबित करने का फैसला किया। उसके बाद इन छात्रों ने विरोध किया तो पूर्व वाइस चांसलर ने बुलाकर बात की और सजा को नए सिरे से जांच होने तक के लिए वापस ले लिया। 12 सितंबर 2015 को सजा वापस लेने के बाद पूर्व वीसी ने कहा कि नई कमेटी जांच करेगी। इस बीच 21 सितंबर 2015 को नए वाइस चांसलर प्रो अप्पा राव आ गए, पुराने वाले बदल गए। नए वीसी ने कोई जांच कमेटी नहीं बनाई। विश्वविद्यालय की सर्वोच्च कार्यकारी समिति ने अपने स्तर पर फैसला दे दिया और यह पांच छात्र हास्टल से निलंबित कर दिए गए। उनकी फैलोशिप रोक दी गई। यह घटना 21 दिसंबर 2015 की है। 21 दिसंबर की सजा पहले की सजा से ज्यादा सख्त कर दी गई, होस्टल से निकालना, फेलोशिप रोकना। इन छात्रों ने हाई कोर्ट में याचिका भी दायर की। जांच नहीं, नई कमेटी नहीं, तो क्या राजनीतिक कारणों से वीसी ने निलंबन का फैसला बहाल किया। यह भी आरोप है कि बीजेपी की एमएलसी ने पूर्व वीसी आरपी शर्मा से मुलाकात की थी। जिसके कारण पहली बार प्रोक्टोरियल बोर्ड की अंतिम रिपोर्ट में इन्हें दोषी ठहरा दिया गया।
बीजेपी सांसद और केंद्रीय श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने 17 अगस्त 2015 को मानव संसाधन मंत्री को पत्र लिखा था। विश्वविद्यालय की घटना पर केंद्रीय मंत्री ने जो लिखा है उसका सार इस तरह है- 'पिछले कुछ दिनों से हैदराबाद यूनिवर्सिटी जातिवादी, अतिवादी और राष्ट्रविरोधी राजनीति का गढ़ बन गया है। जब याकूब मेनन को फांसी दी गई थी तो एक प्रमुख छात्र संगठन अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन ने फांसी के खिलाफ मार्च निकाला था। जब एबीवीपी के नेता ने इसका विरोध किया तो उनके साथ मारपीट हुई और नतीजे में उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। दुखद बात है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ऐसी चीजों को चुपचाप देखता रहा। मेरे लिखने का उद्देश्य यह है कि हैदराबाद यूनिवर्सिटी में जो हो रहा है उससे अवगत कराया जाए। मुझे पूरी उम्मीद है कि आपके नेतृत्व में कैंपस में चीजें बेहतरी के लिए बदलेंगी।'
28 साल उम्र थी रोहित वेमुला की। रोहित उन पांच छात्रों में से एक था जिन्हें होस्टल से निलंबित किया गया था। उसकी फैलोशिप सात महीने से रोक दी गई थी। रोहित की मां दर्जी का काम करती है और उसका परिवार गुंटूर के एक गांव का रहने वाला है। बेहद गरीब परिवार से आने वाला छात्र रोहित पढ़ने लिखने में काफी अच्छा था। रोहित ने रविवार को आत्महत्या कर ली। उसने हमारे, आपके लिए एक पत्र लिखा है। इस पत्र को हम और आप कई तरह से पढ़ सकते हैं, पढ़ेंगे ही। लेकिन जरा सोचिए अगस्त 2015 का मामला क्या 18 जनवरी 2016 तक नहीं सुलझाया जा सकता था। जाहिर है इस मामले में राजनीति तो हुई है। अगर विश्वविद्यालय ईमानदार प्रयास करता तो दोनों गुटों में सुलह करा सकता था। जिस विश्वविद्यालय से ऐसे मामले नहीं सुलझ सकते, रोहित की खुदकुशी उसकी प्रशासनिक क्षमता और नीयत पर भी सवाल करती है। अब अगर पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक स्तर से ऊपर उठकर देखें तो कुछ महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान देने की ज़रूरत है। सबसे पहले सभी सवाल केंद्रीय मंत्री के पत्र से उठते हैं, जिसमें उन्होने एएसए के छात्रों को देश विरोधी गतिविधियों में शामिल बताया था। देशविरोधी गतिविधियों में शामिल होने का पैमाना एक सांसद या मंत्री कैसे तय कर सकता है, वो भी बिना किसी सबूत के एबीवीपी की सिफारिस पर। क्या याक़ूब मेनन की फाँसी का विरोध देशविरोधी था, मेरे जैसे बहुत से लोग हैं जो हमेशा से हर तरह की फाँसी का विरोध करते रहे हैं। भाजपा सांसद वरुण गाँधी तक ऐसे कई लेख लिख चुके हैं। इसके बाद अगर एएसए मुज़फ्फरनगर के दंगों की असलियत को सबके सामने लाता है, तो क्या इसे देशद्रोह की नज़र से देखा जाएगा? और कौन नहीं जानता है क़ि मुज़फ़्फ़रनगर में किसने किस तरह से दंगे करवाए थे? एक विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में किसी मंत्री का सीधे मानव संसाधन मंत्री को 1 नहीं 5-5 बार पत्र लिखना कहाँ तक जायज़ था? इसके बाद मानवसंसाधन मंत्रालय से बार बार यूनिवर्सिटी के वीसी को कार्यवाही के लिए पत्र लिखा जाना कितना सही था? एबीवीपी के छात्रों का उन दलित छात्रों को गुंडा कहना कहाँ तक सही था, फिर उनसे लिखित माफी क्यों माँगी अगर ग़लत नहीं थे तो? न्यूज़ मिनट ने 22 दिसंबर को भी इस मामले पर रिपोर्ट छापी है जिसके अंदर सुशील कुमार का माफीनामा छपा है। चार अगस्त की तारीख लिखी है और समय लिखा है रात के दो बजे।न्यूज़ मिनट ने 22 दिसंबर को भी इस मामले पर रिपोर्ट छापी है जिसके अंदर सुशील कुमार का माफीनामा छपा है। चार अगस्त की तारीख लिखी है और समय लिखा है रात के दो बजे। लेकिन रवीश कुमार के ब्लॉग में मैने पढ़ा क़ि किसी ने उनको जानकारी दी थी क़ि मेडिकल रिपोर्ट में 4 अगस्त को सुशील रात के साढ़े चार बजे भर्ती हुआ। अर्चना अस्पताल की डिस्चार्ज समरी में कहा गया है कि सुशील को पेट में ब्लड ट्रामा और तीव्र अपेंडिसाइटिस के लिए भर्ती किया गया है। उसमें तत्काल बीमारी के कालम में चार अगस्त के रात के ढाई बजे की मारपीट की घटना का जिक्र किया है। रात के दो बजे सुशील माफीनामे पर दस्तखत करता है, मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार ढाई घंटे के बाद भर्ती होता है जिसमें लिखा है कि ढाई बजे मारपीट हुई। तो क्या माफीनामे के आधे घंटे के भीतर मारपीट की कोई घटना हुई थी। सुशील को दो घंटे क्यों लगे अस्पताल तक पहुंचने में। इस मौत पर सवाल कई सारे उभरकर आते हैं। पहला है देश में चल रहे कुछ तथाकथित हिंदू राष्ट्रवादियों का। आप देख सकते हैं किस तरह से सभी दक्षिणपंथी संगठन इस तरह की विचारधाराओं को कुचलने की कोशिशें कर रहे हैं। दूसरा सवाल यह कि दलित राजनीति और अंबेडकर के नाम पर बने संगठन वैचारिक और सांगठनिक रूप से इतने कमजोर हैं। अबतक क़ि उनको आत्महत्या तक करनी पड़ती है, फिर कहाँ चले जाते हैं वो डिक्की के सभी संगठन और उनके दलितों के लिए बनाए गए फंड? वो छात्र मरा इसलिए क्योंकि उसकी फ़ेलोशिप कई महीनों से बंद थी, उन्हें यूनिवर्सिटी के हर सार्वजनिक स्थल पर जाना मना कर दिया गया था। उसके पास पढ़ने के लिए पैसे तक नहीं रह गए थे। विचारधारात्मक रूप से विरोधी लोग उसको काफ़ी परेशान करने लगे थे। इसबारे में सरकार को जाँच करवाकर कठोर कार्यवाही करनी चाहिए। अन्यथा यह हार अंबेडकर के ही विचारों की नहीं पूरे देश की होगी।
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