Sunday, January 10, 2016

हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे, कहते हैं कि गालिब का है अंदाज़े बयाँ और.............


हर एक बात पर कहते हो तुम कि तू क्या है? 
तुम ही कहो कि ये अंदाज ए गुफ्तगू क्या है?
पिछले साल के अंतिम दिन Amezon.com से दीवान-ए- ग़ालिब ऑनलाइन मँगवाई थी. नए साल पर पढ़नी शुरू की तो जैसे उठाई थी, वैसे ही वापस रख दी. लेकिन तब तक उसके कुछ शेर दिलो-दिमाग़ में बस चुके थे. फिर किसी ने कहा क़ि ग़ालिब को और उनकी जिंदगी जानने के लिए मिर्ज़ा ग़ालिब फिल्म को देखो. 1.5 घंटे के चार भाग, मतलब 6 घंटे की फिल्म देखने के लिए मैने चार दिन तय किए थे. लेकिन जैसे जैसे देखी, मन नहीं माना एक ही रात में देख डाली. फिर 1954 में बनी फिल्म देखी। फिर उर्दू समझने के लिए मुगल ए आजम देखी। फिर जाकर उनकी ग़ज़लें पढ़ने लगा. बेगम अख़्तर, जगजीत सिंह, गुलाम अली ने जितनी भी उनकी ग़ज़लें गाई हैं, लगभग सब सुन डाली. अब दीवान ए ग़ालिब फिर से पढ़ रहा हूँ, उर्दू समझ में कम आती है, तो फिर translater का प्रयोग कर लेता हूँ. शेर ऐसे याद हो गए हैं कि जब भी दोस्तों से खाना खाने या और किसी काम के लिए भी बात करता हूँ तो सब्जेक्ट के हिसाब से ग़ालिब का कोई शेर कह जाता हूँ. पागल सा हो गया हूँ उस फक्खड़ इंसान के शेरो का. अब समझ आ रहा है क़ि नए शायरों के लिए ग़ालिब कितने महत्वपूर्ण और मददगार हैं. दरअसल कुमार विश्वास ने ही एकदिन कहा था क़ि ग़ालिब को पढ़ो........... लेकिन डर यह भी है क़ि कहीं क़ानून छोड़कर शायर ही ना बन जाऊ. वैसे वकालत में भी उर्दू और शायरी का काम होता है. कोई बात नहीं अब उर्दू सीखकर भाषा में मिठास आ जाएगी। लिखने में आसानी हो जाएगी। वैसे भी मेरे ब्लाग की लाइन है,........."बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी"........


 उर्दू अदब में यूँ तो बडे - बडॆ उस्तादों ने अपने अशारों से शायरी को नए मकाम तक पहुंचाया , लेकिन मिर्ज़ा असदुल्लाह खां ’गालिब’ का अंदाज़ ही निराला है । गालिब के शे’र सिर्फ़ मोहब्बत की शायरी की शिनाख्तगी ही नहीं हैं । उनका सारा फ़लसफ़ा इस दुनिया में आज भी उतना ही चलन में है , जितना शायद उनके दौर में रहा हो । गालिब की शायरी में हमें अपने आसपास के हर रंग की मौजूदगी का एहसास मिलता है । कमाल सिर्फ़ और सिर्फ़ गालिब की शायरी का है । वे एक दौर के शायर नहीं हैं । 
गालिब की गज़लें जब पहली मर्तबा ईरान से निकलकर दिल्ली की गलियों तक पहुंची और फ़िर दिल्ली से जो सफ़र शुरु हुआ , उसके करीबन सौ साल बाद फ़ैसला हुआ कि गालिब अपने दौर की सबसे अलहदा और उम्दा आवाज़ थी । तब से लेकर अब तक कई बेहतरीन सुखनवर हुए लेकिन गालिब के कद को तो छोडिए कोई अब तक उनके कंधे तक भी नहीं पहुंच पाया । मीर दुनिया से बेज़ार थे ,वहीं गालिब दुनिया के हर रंग से वाकिफ़ थे । उन्होंने अपने अल्फ़ाज़ से ज़िंदगी के सारे पहलूं को छुआ । 
पूछते हैं वो कि ‘ग़ालिब’ कौन है, 
कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या 
ये मसाइले-तसव्वुफ़, ये तेरा बयान ‘ग़ालिब’
तुझे हम वली समझते जो न बादहख़्वार होता......


मिर्ज़ा असद-उल्ला खां ‘ग़ालिब’ जो पहले ‘असद’ उपनाम से और फिर ‘ग़ालिब’ उपनाम से प्रसिद्ध हुए, 27 दिसम्बर 1797 ई. को आगरा में पैदा हुए। तेरह वर्ष के मिर्ज़ा का निकाह दिल्ली के लोहारु कुल की उमराव बेग़म के साथ पढा गया । शादी के दो-तीन साल बाद वे हमेशा के लिए दिल्ली के हो गए , जिसे एक जगह उन्होंने कुछ यूँ बयान किया है :
‘‘सात रजब 1225 (9 अगस्त, 1810) को मेरे वास्ते हुक्मे-दवामे-हब्स (स्थायी क़ैद का हुक्म) सादिर हुआ। एक बेड़ी (यानी बीवी) मेरे पाँव में डाल दी और दिल्ली शहर को ज़िंदान (क़ैदखाना) मुक़र्रर किया और मुझे उस ज़िंदान में डाल दिया।’’
यह केवल मिर्ज़ा ‘ग़ालिब’ की सादगी ही है , जो बादहख़्वार होने के कारण उन्होंने अपने ‘वली’ होने का दावा नहीं किया । जहां तक उर्दू अदब का ताल्लुक है और इससे भी ज़्यादा साहित्य और ज़िंदगी के जुडाव है, ‘ग़ालिब’ न केवल अपने ज़माने के ‘अदबी बली’ (साहित्यिक अवतार) थे, न केवल आधुनिक युग के ‘अदबी अली’ हैं, बल्कि जब तक उर्दू भाषा और उसका साहित्य मौजूद रहेगा, उनका स्थान ‘अदबी वली’ के रूप में हमेशा कायम रहेगा। 
परम्पराओं से विद्रोह करने और लीक से हटकर बात कहने के जुर्म में ज़माना जो बर्ताव हर ‘वली’ से करता रहा है , वैसा ही ‘ग़ालिब’ के साथ भी हुआ। ‘ग़ालिब’ से पहले उर्दू शायरी में भाव-भावनाएं तो मौजूद थीं, मगर भाषा और शैली के ‘चमत्कार’ ‘गुलो-बुलबुल’, ‘जुल्फ़ो-कमर’ (माशूक़ के केश और कमर) ‘मीना-ओ-जाम’ (शराब की सुराही और प्याला) की कसीदाकारी तक सिमट कर रह गए थे। बहुत हुआ तो किसी ने तसव्वुफ़ (सूफ़ीवाद) का सहारा लेकर संसार की असारता और नश्वरता पर दो-चार आँसू बहा दिए। ऐसे समय में, जबकि अधिकांश शायर :
सनम सुनते हैं तेरी भी कमर है, 
कहां है ? किस तरफ़ है ? औ’ किधर है ?


रंज से ख़ूगर हुआ इन्सां तो मिट जाता है रंज
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसां हो गईं।


ऐसे उच्चकोटि के अनुभवपूर्ण शेर निकले। यह मिर्ज़ा ‘ग़ालिब’ ही की विशेषता थी कि उन दिनों, जबकि साहित्य-समालोचना का लगभग अभाव था.

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