आज सत्याग्रह की वेबसाइट पर एक कवर स्टोरी पढ़ रहा था, जिसमें इतिहास का एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू देखने को मिला. स्टोरी के एक इंटरव्यू में भारतीय सेना के सेवानिवृत्त जवान दादासाहेब भोसले बताते हैं क़ि पुणे के पास भीमा कोरागाँव महाराष्ट्र के दलितों के लिए बहुत ही ऐतिहासिक स्थान है. ख़ासकर नए साल में तो इस समय एक बड़ी यात्रा और महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है. इसके ऐतिहासिक कारण कुछ और भी रोचक हैं. बात 1818 की है, जब साल के पहले दिन ईस्ट इंडिया कंपनी के 500 सैनिकों ने भीमा नदी को पार करके भीमा कोरेगांव में अपने से कहीं ताकतवर और सुसज्जित पेशवा की 25,000 सैनिकों की टुकड़ी को धूल चटा दी थी.ईस्ट इंडिया कंपनी के ये सैनिक अंग्रेज कर्नल एफएफ स्टॉन्टन की अगुवाई में लड़े थे. अंग्रेजों के लिए यह लड़ाई तीसरे मराठा-अंग्रेज युद्ध का आखिरी मोर्चा था जिसने पेशवाओं के साम्राज्य का अंत कर दिया. इस लड़ाई ने पश्चिमी भारत में अंग्रेजों के शासन की बुनियाद रखी थी.
पहले मराठा शासक शिवाजी महारों को अपनी सेना में पूरी उदारता के साथ भरती करते थे लेकिन, दो दशक बाद पेशवाओं के शासनकाल में यह स्थिति पूरी तरह पलट गई. पेशवा ब्राह्मण थे और उनमें रूढ़िवादिता कूट-कूटकर भरी हुई थी. कहा तो ये भी जाता है कि उनके शासनकाल में जब कोई महार नगर में प्रवेश करता था तो उसे अपने पीछे झाड़ू बांधकर चलना पड़ता था ताकि उसके कदम जहां पड़े हों वह धूल साफ होती जाए. उन्हें मुंह के नीचे गर्दन से एक कटोरी बांधकर बाहर निकलना पड़ता था ताकि उनका थूक जमीन पर न गिरे. उस दौर में जाति छिपाना सजायोग्य अपराध था.
महारों को 1893 में सेना में लेना बंद कर दिया गया था. उसके पहले 1857 तक के युद्ध में वो लड़ते रहे हैं. लेकिन 1857 के विद्रोह के बाद यह बंदी हुई थी. इस बंदी के बाद दलितों में हो रहे सुधारों के रास्ते बंद हो चुके थे. फिर प्रथम विश्व युद्ध के समय इनकी भर्ती की गई थी, और इसके बाद 1945 में एक रेजीमेंट की स्थापना की गई थी.
दलित अँग्रेज़ों के साथ क्यों हुए इसके बारे में कुछ दलित इतिहासकार कहते हैं, कि जब वो अँग्रेज़ों के साथ संपर्क कर रहे थे, तब बाजीराव पेशवा सेकंड के साथ आने का प्रस्ताव रखा था, जिसे नकार दिया गया था. इसलिए उन्होनें ऐसा किया.
कोरेगांव की लड़ाई इतिहास के पन्नों से गायब हो चुकी थी. लेकिन जब 1927 में अंबेडकर यहां आए तो इस स्थान को तीर्थ का दर्जा मिल गया. उनकी मृत्यु के बाद इस आयोजन को हिंदू संस्कृति की मुख्यधारा के विकल्प के तौर पर विकसित करने की कोशिश होने लगी. अंबेडकर की स्मृति से जुड़े जितने कार्यक्रम होते हैं भीमा कोरेगांव का आयोजन भी तकरीबन वैसा ही है.
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