"बाजीराव मस्तानी दीपिका के सौंदर्य की भव्यता के लिए याद किया जाना चाहिए । इस फ़िल्म में दीपिका की ख़ूबसूरती कलात्मक हो जाती है और उसका अभिनय मस्तानी के किरदार को यादगार बना देता है । निर्देशक ने दीपिका को एक कैनवस की तरह ट्रीट किया है । हर तरह से उस पर कूची चलाई है लेकिन आखिर के सीन में मुग़ल ए आज़म की मधुबाला दिख जाती है । मधुबाला की बेख़ौफ़ निगाहें दीपिका की आँखों से झलक जाती है । किसे पता था जिन बेड़ियों में कभी अनारकली जकड़ी गई थी, उन्हीं बेड़ियों में मस्तानी भी जकड़ी जाएगी । दरअसल साहित्य और फ़िल्म अपने लेखन और दृश्यांकन की परंपरा से कभी आज़ाद नहीं हो सकते । वो कहीं न कहीं से आते हैं । अवतरित नहीं होते ।"
First (in "........") paragraph is taken from Ravish Kumar Blog Qasba.
कई बातों में मेरी और रवीश की राय मिलती है। यह बातें मैने अपने दोस्तों को फिल्म देखने के बाद ही कहीं थी, और 1-2 ट्वीट भी किए थे, जबकि रवीश ने बाद में पूरा ब्लॉग ही लिख दिया था
लगभग सबको पता होगा क़ि दीपिका पादुकोण मेरी फ़ेवरेट एक्ट्रेसेस में से एक रही हैं, और अक्सर लोग मज़ाक में पुंछ बैठते हैं क़ि ये शेर किस पर लिखा तो कह देता हूँ क़ि दीपिका पर। खैर यह तो हुई मज़ाक की बात लेकिन जब आप किसी को पसंद करते हैं, तो उसके कई कारण होते हैं। और किसी एक्टर या एक्ट्रेस को पसंद करने के कारण उसके अभिनय से जुड़े होते हैं। अशोका फिल्म में करीना कपूर, देवदास में ऐश्वर्या राय के भी रोल से हज़ारों मील आगे है दीपिका का मस्तानी का किरदार। थिएटर में जाकर तो नहीं देख पाया लेकिन मोबाइल में ही देखते समय, दीपिका के रोल को बार बार देख रहा था। ऐसा इसलिए नहीं क़ि वो मेरी फ़ेवरेट हीरोइन हैं। बल्कि इसलिए कि इस किरदार में उन्होने मुगल ए आज़म की मधुबाला की याद दिला दी। असल में मैने मुगल ए आज़म कल रात ही देखी थी। तब जाकर दोनो के रोल को कम्पेयर कर सका।
वैसे तो सभी हीरोइनें खूबसूरत ही दिखती हैं, लेकिन एक्टिंगवाइस दीपिका अव्वल हैं। उनका उर्दू लफ़्ज़ों को बोलना मुझे ख़ासकर भा जाता है।
पर्दे पर एक्टिंग करते हुए दीपिका के आगे प्रियंका कहीं नज़र ही नहीं आती हैं, जबकि डांस में प्रियंका ने दीपिका को मात दी है। इसी के हिसाब से देखा जाए तो हीरो के लिबास में रणवीर सिंह दिखने में तो बाजीराव पेशवा दिखते हैं, लेकिन एक्टिंग में बेकार हो जाते हैं। एक सीन में वो मुगल सेनापति से कहते हैं क़ि तुम्हारी 2000 सेना के पीछे में उससे दुगुना सैनिक खड़े हैं, और ज़ोर ज़ोर से हँसने लगते हैं, तो बड़ा जोक सा हो जाता है, क़ि ऐसे सीरियस समय में कोई नायक ऐसी बचकाना एक्टिंग भी कर सकता है क्या? स्वतंत्र रूप से देखिये तो उनका अभिनय शानदार है लेकिन जब आप एक सांस्कृतिक ऐतिहासिक किरदार निभाते हैं तो चरित्र को जीना बड़ी चुनौती हो जाती है । मुझे ऐसा लगता है कि बॉलीवुड में उनकी जगह यह रोल संजय दत्त या फिर ऋतिक रोशन कर सकते थे।
ऐसा भी नहीं है क़ि दीपिका की हर फिल्म ही मुझे पसंद हो। इसके पहले चेन्नई एक्सप्रेस ही अच्छी लगी थी। अन्यथा हैप्पी न्यू ईयर टाइप को 2 मिनट नहीं देख सकता हूँ। वैसे उनका यह सबसे अच्छा समय चल रहा है, जो एक एक्ट्रेस का होता है, इस 3-4 साल के दौरान ही वो और भी कुछ अच्छे अभिनय को दिखाना चाहेंगी, और हमें इंतजार रहेगा।
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