Friday, January 22, 2016

इतिहास नहीं मरा करते (गाँधी V/s भगत सिंह)

कल रात से ही गांधी के बारे में जानकारी लेने की जिद गई है। उनके आलोचकों पर कुछ कहना चाहता हूं जो गोडसे को हीरो बताते हैं। आप गोडसे को कैसे माफ कर सकते हैं? इसलिए कि वह विद्वान था? ऐसे तो रावण भी बहुत गुणी था शायद गोडसे से भी। परन्तु उनके कृत्यों से उन्हें क़तई माफ नहीं किया जा सकता। माना कि भगतसिंह, सुखदेव एवं राजगुरु की शहादत आजादी की लड़ाई की एक महान घटना है परन्तु हम उन सबको क्यों भूल जाते हैं जो ऑफ रिकॉर्ड थे। कुछ लोग महात्मा गाँधी की आलोचना इस तरह करते हैं जैसे क्रिकेट की कर रहे हों। जैसे उन्होने सम्पूर्ण गाँधी को समझ लिया हो । हम ये भूल जाते हैं कि जिस शख़्स ने भी आजादी की लड़ाई लड़ी है वो उन अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ी है जिनका पूरे विश्व के एक चौथाई भाग पर राज था मुझे नहीं लगता कि वर्तमान पीढ़ी में दुबारा से आज़ादी की लड़ाई लड़ने का माद्दा है। यहाँ वर्तमान आलोचकों का ये हाल है कि अंग्रेजों की तो छोड़ो शहर के भ्रष्ट विधायक या सांसद के विरुद्ध तो आवाज़ तक नहीं निकलती। और बात करते हैं महात्मा गाँधी की।
भारत की आजादी के आंदोलन में ब्रिटेन की दो पार्टियों की आपसी राजनीति और उनकी भारत के प्रति नीति का भी अच्छा खासा रोल रहा है। कंजरवेटिव पार्टी हमेशा भारत के खिलाफ रही, लेबर पार्टी भारत को अधिक अधिकार दिये जाने की पक्षधर रही। 1931 मे लेबर पार्टी की सरकार थी। इससे पहले 1890 मे लेबर पार्टी की सरकार थी और तब भी भारत के लिए उसने कई महत्वपूर्ण निर्णय किए थे। लेबर पार्टी की सरकार ने लार्ड इरविन को भारत मे चल रहे आंदोलन से बातचीत करने के लिए कहा और लार्डइरविन ही पहले वायसराय थे जिन्होंने पहली बार बाकायदा घोषणापत्र जारी करके कांग्रेस को भारत का नुमाइंदा कहा और गोल मेज सम्मेलन के लिए आमंत्रित किया जिसमे भारत को अधिक अधिकार दिये जाने की बात होनी थी। लॉर्ड इरविन ने बातचीत का माहौल तैयार करने के लिए गांधी जी की कई शर्ते भी मानी। यहाँ तक कहा जाता है कि लार्ड इरविन ने लिखित मे कांग्रेस से समझौता करके अंग्रेज़ो के ताबूत मे पहली कील ठोकी और कांग्रेस को एक अधिकृत पार्टी होने का भारत की आवाज होने का प्रमाणपत्र दे दिया। ऐसे हालात मे जब वायसराय बातचीत का इच्छुक था, सरकार अनुकूल थी, तब भी गांधी जी ने बातचीत करने से पहले रखी गयी शर्तों मे भगत सिंह एवं उनके साथियों की फांसी रोकने की मांग क्यों नहीं की इस पर अचरज होता है।
भगत सिंह की शहादत के प्रति मन में असीम सम्मान और श्रद्धा है। मुझे ऐसा लगता है कि यदि भगत सिंह को पूरी जिंदगी जीने का मौका मिलता तो वो कैसी होती ? भगत सिंह स्पष्ट रूप से मार्क्सवाद से प्रभवित थे और उनका रुझान लिबरेशन की यूटोपियन समाज व्यवस्था की तरफ था जो 1931 के आगे की दुनिया में सिर्फ़ ख़ूनी सिद्ध हुई बल्कि पूरी दुनिया को खतरे में डालने से पीछे भी हटी। भगत सिंह की आड़ लेकर तो ऐसी ताकतों (कम्युनिस्ट) का सत्तारूढ़ होना संभव भी था क्योंकि तब संभवतया इसमें राष्ट्रवाद और देशभक्ति का फ्लेवर जुड़ चुका होता लेकिन आत्मा तो वाम ही रहती। क्या 1992 के बाद भारत की दशा भी पूर्वी यूरोप के सेटेलाइट मुल्कों जैसा ना हो जाता। भगत सिंह जिस राज्य की परिकल्पना में जीते थे वो हममें से अधिकांश को डरा देने के लिए काफी है।


No comments:

Post a Comment

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...