Sunday, October 27, 2013

मुंशीजी से साहित्यिक प्रेम

आज से 1 महीने पहले मैने मुंशी प्रेम चंद्र के दो महान ग्रंथ गबन और गोदान पढने शुरु किए थे, कल रात को 3.50 पर दोनो को खतम कर पाया! मैने सुन रखा था, कि आज तक उनकी आलोचना कमलेश्वर और मानवर सिंह जैसे आलोचक भी नहीं कर पाए! गोदान के अंतिम 39वें भाग में 382वें पेज में मुझे लगा कि अब मैं उनकी आलोचना कर दूंगा! क्योंकि तीसरे भाग में होरी का भाई हीरा जो उसकी गाय को जहर देकर भाग गया था, वो अभी तक नहीं लौटा था! मैं अंतिम पेज की 2 लाइन ही पढ पाया था कि वो वापस आ गया! सच में महान लेखक वही होता है, जो किसी को आलोचना का एक छोटा सा मौका भी ना दे! अब मैं गोदान को अपने गांव की भाषा (हिन्दी और अवधी मिली-जुली, जो कानपुर के पास के गावों में बोली जाती है) में लिखने की कोशिश करूंगा.
और वही हाल हुआ गबन का 50वें भाग तक कहानी बिल्कुल अंतहीन लग रही थी, सब कुछ बिखरा पड़ा था, मुझे अचम्भा तो तब हुआ जब अंतिम भाग 52 में सब कुछ अच्छी प्रेम कहानी फिल्म की तरह समाप्त हुआ? कहीं से भी आलोचना की गुंजाइस नही रह गई.
मैंने बहुत साहित्य पढ़ा है, लेकिन मुंशी जी के जितना दिलकश लेखक् नही मिल पाया! सवा सेर गेंहू, पूस की रात, बड़े घर की बहू, कोई मुसीबत ना हो तो बकरी पाल लो, ठाकुर का कुंआँ और ना जाने कितनी अनगिनत कहानियाँ मैंने पढी हैं. हर कहानी में यही लगता है, कि मानो ये कथा मेरी या मेरे ही किसी परिचित आदमी की है, हर बार घर, गाँव, गरीबी, प्यार, भक्ति से दिल रोमांचित हो जाता है.
उनकी भाषा में कुछ अपनापन सा है! असली भारत के दर्शन हो जाते हैं, हमेशा हर बुराई का विरोध किया, चाहे वो सामंतवाद हो, जातिवाद हो, ब्रम्हनवाद हो, पूंजीवाद हो और सच्चे मार्क्सवादी की तरह समाजवाद को बढ़ावा दिया!
अगर विलीयम सेक्सपियर हिन्दी के लेखक होते या मुंशी जी अंग्रेज़ी के तो उनके आगे सेक्सपियर कहीं नहीं टिकते? फिर भी हमारे (साहित्य प्रेमियों के) लिए वो ईश्वर हैं, अगर सचिन क्रिकेटप्रेमियों के हैं तो, हर बात का जबाब हर कहानी में ही देकर चले गए.

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