Tuesday, October 29, 2013

राजनीति में BMW की बढ़ती रफ़्तार

आप लोग सोच रहे होंगे कि राजनीति में एम्बेसडर का स्थान BMW ने कब ले लिया, तो मेरा मतलब BMW गाड़ी से नहीं बल्कि बहन मायावती से है। बसपा के लिए BMW का एक और मतलब है, ब्राम्हण+मुस्लिम+Weak Caste (दलित और पिछडे) जो इनका जनाधार भी है।

बसपा का इतिहास बेहद दिलचस्प है, पंजाब के एक दलित परिवार से निकले कांशीराम ने उत्तर भारत में एक बड़ी कोशिश की और उत्तर प्रदेश में अच्छी सफलता प्राप्त की. पहले इन्होने एक संगठन बनकर घर-घर जाकर दलितों  की परेशानियाँ पूंछी और उनकी सहायता कीसन् 1984 में पार्टी बनाई. पहले उन्हें कम सफलता मिली फिर बाद में उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी

2009 में लोकसभा चुनाव में बसपा ने 500  ( कांग्रेस ने 440 और भाजपा ने 433) सीटों पर चुनाव लड़े, कांग्रेस ने 28.55% और 11.91 करोड़ वोट के साथ 206 सीटें जीती भाजपा ने 18.8% और 7.84 करोड़ वोट के साथ 116 सीटें जीती वहीं बसपा ने 6.17% और 2.57 करोड़ वोट के साथ 21 सीटें जीती और 50 से अधिक सीटों पर दूसरे नंबर पर रही, और कई जगह उत्तर प्रदेश के बाहर भी पार्टी के प्रत्याशियों ने कड़ी टक्कर दी


2012 के उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव के दौरान बसपा को महज़ 80 सीटें ही प्राप्त हुईं, बल्कि उसका वोट शेयर प्रतिशत 27.85 था, जो सत्ताधारी समाजवादी पार्टी के 32% वोट से मात्र 4.50% कम है. अगर आने वाले 2017 के चुनाव में बसपा 6-8 प्रतिशत वोट और बढ़ा लेती है, तो उसकी सीटों की संख्या 200 पार कर जाएगी

अब हम बात करते हैं, बसपा के मूल वोट की तो वो है, दलित, जो उत्तर प्रदेश में 21% है, और उसका और कोई दावेदार नहीं है इसका अर्थ हुआ कि बसपा को और भी जातियों के वो बड़ी संख्या में मिले हैं, मुस्लिम और ब्रम्हणों की एक बड़ी ज़मात पार्टी के साथ जुड़ी है हो सकता है दोनो तथाकथित जातियों का वोट लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के साथ जुड़ जाता है इसी को ध्यान में रखकर बसपा सभी सामान्य सीटों पर ब्राम्हण प्रत्याशियों को उतारती है. ओ. बी. सी. जातियों के वोट (गैर-यादव) स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार सभी दलों को मिलतें हैं

मुजफ़्फ़र नगर दंगों के बाद से सपा के हालत काफी खराब हो रहे हैं, मुस्लिमों को डर है, कि मोदी से बचाव का विकल्प सपा नहीं है, और हिन्दू अखिलेश को मुस्लिम हितैषी मान बैठे हैं उसे बसपा में भी एक उम्मीद नजर आती है, जिसका कारण है, कि उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में मुस्लिमों की दशा दलितों के जैसी ही होती है
अगर बात गठबन्धन की करें तो बसपा अपने 2017 में लखनऊ की कुर्सी तक पहुंचाने का तथाकथित जन-आधार(मुस्लिम जो उत्तर प्रदेश में 18+% है) को मोदी या भाजपा के गठबन्धन से दूर नहीं करना चाहेगी

अब कांग्रेस भी मायावती की तरफ नजर बिछाए बैठी है, जिसका परिणाम सी. बी. आई. द्वारा केस वापस लेने में दिख चुका है अगर भविष्य में बसपा और कांग्रेस का गठबन्धन हो जाता है तो मोदी को रोकना दोनो के लिए आसन नहीं होगा यह गठबन्धन 2014 में उत्तर प्रदेश में ही अकेले 60 से अधिक सीटें जीत सकता है, और बसपा 50+ सीटों के साथ राष्‍ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका अदा कर सकती है एक बार 1995 में बसपा और कांग्रेस को हम साथ देख चुके हैं, तब तो सफलता अच्छी नहीं मिली थी, लेकिन आज की परिस्थितियाँ कुछ और हैं अगर पूरे देश को ही देखें तो कांग्रेस का भी मूल वोट मुस्लिम के अलावा दलित रहा है, और अब बसपा को भी कई राज्यों में कम ही सही लेकिन काफी वोट मिलता है क्योंकि वो देश के अकेली बड़ी दलित समर्थक पार्टी है अगर यह गठबन्धन 2013 नवंबर के चुनावों में एक साथ जाए तो भाजपा 2014 के युद्ध में 0-4 की हार के साथ उतरने को मजबूर होगी
वैसे तो BMW का मैं व्यक्तिगत रूप से बहुत सम्मान करता हूँ, क्योंकि वो  एक महिला हैं जो निचले तबके से उठकर आई हैं लेकिन कभी-कभी उनकी तानाशाही प्रव्रत्ति उनपर हावी हो जाती है जिसमें राहुल गाँधी की वह बात सत्य नजर आने लगती है, कि मायावती ने उत्तर प्रदेश में किसी दलित नेता को उभरने का मौका नहीं दियाएक हद तक यह सच्चाई भी है, कि अगर वो राष्‍ट्रीय (केन्द्रीय) राजनीतिक सड़क पर रेस करने लगी तो कौन सा दलित नेता उनकी मसाल थामेगा? फिर तो पार्टी ब्राम्हणवादी विचारधारावी लोगों के हाथ में आ जाएगी. और जब काशीराम की तरह वो नहीं रहेगी तो पार्टी का विलय भाजपा जैसी पार्टी में हो जाएगा
एक तरफ़ हम  इसपर इतना गणितकर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ बुआजी (क्योंकि मेरे पिताजी बहनजी कहते हैं) का मूड उत्तर प्रदेश को छोड़ कर कहीं दिलचस्पी नहीं ले रही हैं अभी तक एक रैली नही हुई है, अगर अभी से वे स्वयं जोरदार प्रचार करें, तो चारों राज्यों (मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ और दिल्ली) में बसपा के बिना सरकार नहीं बन पाएगीखैर ये सब बातें तो भविष्य के गर्भ में छुपी हैं कि BMW राजनीति की सड़क पर किस समय और कौन सा गियर डालेंगी. उम्मीद है कि यह रेस (कांग्रेस(राहुल) बनाम भाजपा (मोदी) से हटकर त्रिकोणीय भी हो सकेगी
 

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