Friday, October 18, 2013

हिन्दुत्वादियों का ढोंग

अभी कुछ समय से मोदी को भाजपा मुस्लिम  हितैषी पेन्ट करने में जुटी हुई है, इसके लिए भाजपा प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन और मुख़्तार अब्बास नक़वी की  अध्यक्षता मे एक दृष्टि पत्र (Vision Document) तैयार करने को कहा गया है। भाजपा की इस नीति का पूर्ण रूप से खुलासा तो तब हुआ जब दिग्विजय सिंह ने बुर्का-टोपी के बिल वाली बात कहकर इनकी पोल खोल दी थी। मीडिया और अल्पसंख्यकों को दिखाने के लिए ये लोग अपने ही कार्यकर्ताओं को बुर्का-टोपी पहनाकर ले जाएंगे। आज कल मुम्बई में भी शिव सेना और महाराष्ट्र नव निर्माण सेना की तरफ से कई जगहों पर त्योहारों या नव वर्ष पर शुभकामनाओं वाले पोस्टर और होर्डिंग्स मिल जाते हैं। इनमें अधिकतर में ईद और क्रिसमस पर मुस्लिम और ईसाई नवयुवकों के चित्र और नाम होते हैं। आश्चर्य की बात है कि छठ पूजा पर भी ये तथाकथिक दल शुभकामना संदेश किसी उत्तरभारतीय के नाम से देते हैं।
इस तरह की कोशिश कट्टर दक्षिणपंथियों के द्वारा को पहली बार नहीं हो रही है, इसके पहले भी संघ भी इस तरह के कार्य कर चुका है। अगर राष्‍ट्रीय स्वयं सेवक संघ की पिछली राजनीति या इतिहास को उठाकर देखें तो उसके हिन्दुत्ववादी विचारधारा पर ज्यादा सोंचने की जरूरत नहीं है। वैसे तो भारतीय जनता पार्टी भी संघ को अपने पित्रसत्तात्मक वरिष्ट के रूप में मानती रही है, लेकिन उसमें भी हमेशा से ही दो समूह रहे हैं। एक नरेन्द्र मोदी और कल्याण सिंह का बचाव करने वाला और  दूसरा चेहरा औपचारिक रूप से शाहनवाज़  हुसैन और मुख़्तार अब्बास नक़वी को प्रवक्ता रूपी ढाल बनाता है।
"ठीक यही चेहरा संघ में भी है, सुनने में अजीब लगेगा लेकिन यह सही है। 23.12.2012 को सी. बी. आई. ने संघ के मुख्य सचिव इंद्रेश कुमार को  मक्का मस्जिद ब्लास्ट के लिए पूंछताछ के लिए बुलाया तो देखा कि दिल्ली स्थित C.B.I. मुख्यालय के बाहर उनके समर्थन में एक बड़ी मुस्लिम भीड़ इकट्टा थी। उनके पक्ष में नारे और प्रार्थना कर रहे थे, जो स्वभाविक नहीं था। फिर उनके बोर्ड पढ कर पता चला कि ये लोग मुस्लिम राष्‍ट्रीय मंच  (संघ की साखा)  के लोग  थे। मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक मो. अफजल हैं। इसका गठन 24.12.2002 को हुआ, और इसका उद्देश्य भारतीय मुसलमानों को संघ की मुख्य धारा से जोड़ना था। मतलब लिफाफे देकर किराएदार की हैसियत से सभाओं में ले जाना हैं।" (तहलका की पुरानी रिपोर्ट के आधार पर)
इसके पहले भी संघ ने कई बार मुस्लिमों को जोड़ने का प्रयास किया है. लेकिन दिखावे के तौर पर। केवल ऐसे कुछ मुस्लिमों की तलाश करते रहे हैं, जो खुद मुस्लिम समाज के विरोध करने वाले संघ को मीडिया और सिविल सोसाइटी के सामने निर्दोष बता सकें। संघ और उसकी बजरंग दल जैसी शाखाएँ हमेशा से अल्पसंख्यकों को बर्दास्त नहीं कर पाई हैं, तो फिर उन्हें मुख्यधारा में जोड़ने की सोंच भी कैसे सकते हैं। संघ कहता है कि हमने हर मुस्लिम समस्या को गंभीरता से उठाया है। क्या संघ सारे देश को बेवकूफ समझता है? क्या आम आदमी इस मंच से बाबरी मस्जिद विध्वंस, गुजरात दंगे या मालेगांव विस्फोट भूल पाएगा ? या संघ को इससे क्लीन चिट  देगा? मेरा तो मानना है कि यह संघ का अपने बचाव में सामने रखने का साक्ष्य मात्र है, "कि हम अल्पसंख्यक विरोधी नहीं हैं।" हमेशा ही संघ द्वारा मुसलमानों को एक अलग समूह के रूप में देखा जाता रहा है। जब कि वो भी हिन्दुओं के छोटे नहीं बराबर के भाई हैं। अंततोगत्वा तो यही लगता है कि संघ का यह नाटक मंच किसी काम का नहीं है। इससे मोदी और संघ का कोई भला नहीं होगा। मुझे नहीं लगता है कि देश की जनता इतनी कमजोर याद्दास्त वाली है। आखिर संघ भी 1925 से और भाजपा 1952 (जनसंघ) से देश में कार्यरत है। आखिर क्यों अब तक ये लोग देश की नंबर एक ताकत नहीं बन पाए?

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