कल
www.gualil.com पर आशीष खेतान की रिपोर्ट देखकर अनदेखा कर दिया. फिर से रात को उस
पर ध्यान गया तो भारतीय संविधान के आर्टिकल 14,15 और 25 को ध्यान से पढ़ा.
भारतीय
संविधान की परिकल्पना लोकतंत्र और मानवाधिकारों की सुरक्षा रही
है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद-14 के तहत सभी को समानता का अधिकार दिया
गया है. अनुच्छेद-15 शैक्षणिक संस्थानों में सभी नागरिकों को बराबरी का
अधिकार देता है. अनुच्छेद-16 सभी नागरिकों को सरकारी नौकरियों में समानता
का अधिकार देता है. इन तीनों अनुच्छेदों को आधार पर किसी भी नागरिक के
साथ उसके धर्म, नस्ल, लिंग, जाति, जन्म अथवा निवास स्थान के आधार पर कोई
भेदभाव नहीं किया जा सकता है. अनुच्छेद-25 के तहत सभी लोगों को अपने धर्म
और विश्वास को मानने की आजादी दी गई है. यह बेहद ही खुशी की बात है
कि संविधान के तहत कानून के अलावा भारतीय समाज सभी लोगों को बराबरी का
दर्जा देने में यकीन करता है.
बाद में आर्टिकल 341 भी पढ़ा कुछ सही
नही लगा. और जब कॉन्स्टीट्यूशन (अनुसूचित जाति) ऑर्डर, 1950 के पैरा-3 को
पढ़ा तो आँखें खुली रह गईं.
इन सबके बावजूद, भारत सरकार ने
कॉन्स्टीट्यूशन (अनुसूचित जाति) ऑर्डर, 1950 के पैरा-3 में एक शर्त रखी
है कि अनुच्छेद-341 के तहत अनुसूचित जाति को मिलने वाली सुविधाएं सिर्फ
हिंदू, सिख या नव-बौद्ध (धर्मांतरित) को ही दिया जाएगा. इस धार्मिक भेदभाव
के कारण मुस्लिम और ईसाई दलित सरकारी शिक्षण संस्थाओं, सरकारी नौकरियों और
अन्य मामलों में इस अधिकार से वंचित हैं, जबकि हिंदू, सिख या नव-बौद्ध को
मानने वाले 1950 से अभी तक इनका लाभ उठा रहे हैं.
इस पैराग्राफ का
तात्पर्य यह है कि यदि कोई हिंदू,सिख या बौद्ध आनुसूचित जाति का व्यक्ति
धर्म परिवर्तित कर इस्लाम या ईसाई धर्म कबूल करता है, तो वह अनुच्छेद 341
के तहत अनुसूचित जाति को मिलने वाले तमाम सुविधाओं से वंचित हो जाएगा.
और, अगर वही व्यक्ति दोबारा हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म में वापस आ जाता है,
तो फिर से वह पहले के अधिकारों का उपयोग करने के योग्य हो जाएगा.कोई
ब्राम्हण लड़की हिन्दू, सिख या बौध्द दलित युवक से शादी करे तो वह आरक्षण
की हकदार और अगर वह किसी ईसाई, जैन या मुस्लिम आदिवासी से शादी करे तो
उसका अधिकार समाप्त यहाँ तक की कोई दलित लड़की भी इनसे शादी करे तो उसे
इसका लाभ नहीं मिल पाएगा? आखिर आपके आरक्षण का आधार क्या है, पिछड़ापन,
नीची
जाति जो हमेशा से ब्राम्हणवाद का शिकार रही है, या फिर आदिवासी इलाके?
यह
कहना उचित नहीं होगा कि पैरा-3 के प्रावधान गरीब मुस्लिम और ईसाइयों को
धर्मांतरण कर हिंदू, सिख, बौद्ध धर्म ग्रहण करने के प्रलोभन देने के लिए
बनाए गए हैं. वहीं दूसरी ओर यह पैरा हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के तहत आने
वाले अनुसूचित जाति के लोगों को इस्लाम या ईसाई धर्म कबूल करने के लिए भी
हतोत्साहित करता है. हमारे मुताबिक, यह प्रावधान गरीब मुसलमानों को
इस्लाम छोड़ने का प्रलोभन देता है.इसका मतलब हुआ कि जो दलित हिन्दू धर्म
में घुटन महसूसू कर रहें हैं, और धर्म परिवर्तन करना चाहते हैं उन्हे
आरक्षण के प्रलोभन में वो सब सहना पड़ता है.
मुस्लिम और ईसाई दलितों
के लिए सबसे अधिक दुख की बात यह है कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में
लोकसभा अथवा विधानसभा की सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित कर दी गई हैं.
इस कारण मुस्लिम और ईसाई दलित उन क्षेत्रों में चुनाव लड़ने के अधिकार से
वंचित हैं.
वर्ष 1950 से अभी तक लोकसभा के लिए 15 बार चुनाव हो चुके
हैं, लगभग 540 सीट मुस्लिम बहुल इलाकों में आरक्षित रखे गए और इन पर
मुस्लिम या ईसाई दलित जीत हासिल कर सकते थे. इस नुकसान का अंदाजा इससे
लगाया जा सकता है कि अबी तक 450 मुस्लिम सदस्य लोकसभा के लिए चुने गए और
उन्हें 540 सीटों से वंचित रखा गया. ठीक इसी तरह, जो अधिकार अनुसूचित
जाति को दिए गए हैं, अगर उन सबसे मुस्लिम और ईसाई दलितों को वंचित नहीं
रखा गया होता, तो मुस्लिम वर्ष 1952 से अभी तक 3000 और अधिक विधानसभा
सीटें जीत सकते थे. लोकसभा और विधानसभा में इतनी बड़ी संख्या में
मुस्लिम और ईसाई दलितों के प्रतिनिधित्व पर पाबंदी लगाने से मुस्लिमों
को विकास के विभिन्न क्षेत्रों से वंचित रखा गया. राजनीतिक
संस्थाओं में मुस्लिमों ईसाइयों का कम प्रतिनिधित्व होने के कारण अन्य
क्षेत्रों में भी उनके साथ भेदभाव को बढ़ावा मिला.
Google करने
पर पता चला कि सुप्रीम कोर्ट में पैरा-3 के खिलाफ वर्ष 2004 में एक रिट
याचिका दाखिल की गई. इसमें कहा गया कि यह पैरा अनुच्छेद, 14, 15, 16 और 25
के तहत मुस्लिम और ईसाई दलितों को दिए गए अधिकार का उल्लंघन करता है. इस
याचिका के जवाब में हलफनामा दायर करते हुए केंद्र सरकार ने वर्ष 2005 में
रंगनाथ मिश्रा आयोग का गठन किया.वर्ष 2007 में आयोग ने केंद्र सरकार को
पैरा-3 को समाप्त करने की सलाह दी, क्योंकि ये पैरा न सिर्फ संविधान के
अनुच्छेद 14, 15, 16 और 25 का उल्लंघन करते हैं, बल्कि यह उचित भी नहीं
हैं.
हाल में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने अपने हलफनामा में
पैरा-3 को खत्म करने की मांग की. अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए
राष्ट्रीय आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपने हलफनामा में कहा कि मुसलमान
एवं ईसाई दलितों को भी अनुसूचित जाति का दर्जा देने की मांग की. उनका यह
भी कहना था कि इस प्रावधान से हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म से ताल्लुक रखने
वाले अनुसूचित जाति वर्ग पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्देश दिए जाने के बावजूद केंद्र सरकार ने अभी अपना
विचार अदालत में नहीं रखा है. यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में
कोई फैसला देने की स्थिति में नहीं है.
यह ध्यान देने वाली बात है
कि लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में
पैरा-3 को खत्म करने के लिए विधानसभा में प्रस्ताव पास किया और उसे भारत
सरकार को भेजा. बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने दो
सितंबर, 2005 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को 3 पत्र लिखे और मांग की कि
किसी भी धार्मिक अल्पसंख्यक को धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दी गई है,
इसलिए कॉन्स्टीट्यूशनल (अनुसूचित जाति) ऑर्डर, 1950 के तहत जोड़ा गया
पैराग्राफ सही नहीं है. इससे सिर्फ हिंदू धर्म के मानने वाले अनुसूचित जाति
के लोगों को ही फायदा हो रहा है. पैरा-3 को खत्म करने की सिफारिश करते
हुए उन्होंने लिखा कि इससे हिंदू धर्म के तहत आने वाले अनुसूचित जाति के
लोगों को भी अपनी मर्जी का धर्म चुनने की आजादी होगी.
हम इसे
असंवैधानिक और भारतीय संविधान में दिए गए मौलिक अधिकार के खिलाफ
अनुचित कानून मानते हैं. यह बिल्कुल भी सेकुलर छवि के विरुद्द है, देश
की दोनो बड़ी पार्टियाँ इसपर ध्यान नही दे रहीं हैं, भाजपा तो आर्टिकल 341
ही समाप्त करना चाहती हैं और कांग्रेस इसे अनुसूचित जाति आयोग का मामला
बताकर टाल देती है. सेकुलरिज्म केवल आर.एस.एस.+भाजपा और मोदी का विरोध
करना ही नही होता है. तभी तो कांग्रेस भी कभी माननीय राजेंदर सच्चर कमेटी
की रिपोर्ट कर कुछ मजबूत कदम नहीं उठा पाई हैं.
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