Sunday, October 27, 2013

मेरी पहली बरेली यात्रा

बात 2011 फरवरी की है, मेरे बी. ए. फाइनल के पेपर होने ही वाले थे, तभी पता चला कि बरेली में इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस फोर्स की रैली भर्ती है, उसमें केवल 700 पद थे. मैंने भी सेना में जाने के लिए अच्छी खासी तैयारी कर रखी थी. कई दोस्त तैयार हुए, एक फरवरी को मैं भी गया. माँ ने बहुत तैयारी के साथ भेजा. कासगंज पहुचते ही, पता चला कि भीड़ बहुत हो गई है, फिर भी हम लोग गए, वहां जाकर पता चला कि 11 प्रदेशों से 4.5 लाख लड़के आ गए हैं. रहने के लिए भी जगह नहीं थी, पूरे शहर में कुछ भी खाने को नहीं मिल रहा था, गन्ने की भरी ट्राली जा रही थी, तभी कुछ लड़कों ने हरकते शुरु कर दी, तभी सेना के जवान आ गए और लाठी चार्ज कर दिया. रात भर में पूरा शहर श्मशान बन गया. कुछ नहीं बचा. हमारे सब दोस्त बिछड़ गए. मैं चार अन्य दोस्तो (सोनू, अमर, छोटे और जगरूप) के साथ एक स्थानीय बाबा के सत्संग आश्रम में चला गया और रात भर उनका सत्संग चला एक तरफ हम सोते रहे, फिर सुबह कैम्प की ओर चले तो फिर से ग्रामीण और छात्रों के बीच में हिंसा सुरु हो चुकी थी. सैकड़ों गाडियाँ जलाई जा चुकी थी, पेट्रोल पम्प जल चुके थे, कई छात्र मर चुके थे, हम भी राम गंगा नदी के किनारे भुँखे-प्यासे पड़े थे. हमने भी कई जगह मार खाई. साम को पांच बजे तक हालत बेकाबू ही थे. मोबाइल की बैट्री खतम होने से घर के लोगों से बात नहीं हो पा रही थी.



तभी हमने सोचा कि चलो अब स्टेशन की ओर चलते हैं, पहले रोड पर गए तो पुलिस ने मार कर भगा दिया. फिर हम रेलवे पुल पर गए, जहां से ट्रेन निकलती थी, उसी जगह से हमने जाने का तय किया. चलने के लिए एक फिट चौड़ी पट्टी थी.
जिसपर चलना आसान नहीं था, क्योंकि 40-50 फीट नीचे पानी की ओर देखो तो डर लगे और अगर ध्यान हटाया तो पता नहीं पैर अलग पड जाए तो मरे, जब ध्यान से चले तो नजर एक जगह रुकने का डर. सब एक पंक्ति में जा रहे थे, कि ट्रेन का सिग्नल आ गया, मेरे दो मित्र (अमर और छोटे) तो 500 मीटर लंबे पुल को पार कर चुके थे, हमे बीच में फंस गए, जल्दी से डिवाइडर के स्थान पर खड़े हो गए, कुछ मित्र तो ऐसे ही किनारे होकर खड़े हो गए. ट्रेन निकली मुझे लगा की आज 3-4 मित्र तो गए, लेकिन भगवान की दया से सब ठीक थे, हम जल्दी से गए. पहले तो राम गंगा स्टेशन से कई ट्रेन छोड़ी जो बहुत भरी थी, उन्हे देखकर वो फेविकोल वाला विग्यापन की याद आती थी जो एक ट्रक पर भूसे के ढेर की तरह लोगो को भर कर ले जाता है.
वही जो ट्रॅन हमने छोड़ी उसी ट्रेन में मेरठ रूट पर आग लग गई सैकडो छात्र मर गए, हम अपने को  पता नही कितना खुशकिस्मत मान रहे थे. फिर एक ट्रेन पर चढ़े, इंजन पर मैं भी खड़ा हो गया बरेली से कासगंज तक लगभग तीन  घंटे का सफर हमने उस फरवरी की शर्दी में कटा. कासगंज में स्टेशन पर लाठी चार्ज हो गया हम दो लोग (मैं और सोनू शर्मा) एक बूढ़े जोड़े के पास बैठ गए तो उस बूढ़े ने मुझे डंडा मार के भगा दिया. उस संघर्ष में मेरे तत्कालीन प्रिय मित्र मा. श्री जगरूप सिंह के पैर में बहुत चोंट आ गई वो चल भी नहीं पा रहे थे. हम रात एक बजे एक ट्रेन में चढ़ने में फिर सफल हुए और सुबह आठ बजे    जबरजस्त भीड़ में चौबेपुर स्टेशन पर उतरे. ऐसा लगा जैसे यमराज के घर से वापस आ गया हूँ.
फिर हमने अखबार खरीदे और गाँव तक तीन किलो मीटर तक पैदल चलकर आए. जैसे ही घर पहुचे हमारे घर वालों को मानो जान मिल गई हो. पता नही कितनी प्रार्थनाएँ हम पर की गई थी. सब के सब बहुत खुश हो रहे थे.
तभी से हम दोस्तों में से कितनों ने तो अपना सेना  में जाने का सपना भी भुला दिया, उन्हीं मे से मैं भी एक हूँ. सरकार और आई. टी. बी. पी. के बीच में आरोप- प्रत्यारोप चल रहा था. सबसे बड़े मुद्दे  "बेरोजगारी" पर आज 
 भी किसी का ध्यान नहीं है.
देखो  कब तक हमारे जैसे नवजवान  हार कर  बैठते रहेंगे? और कब तक निर्दोष युवा सेना में जाने से पहले शहीद होते रहेंगे?

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