आजकल सारे न्यूज चैनल दो-दो घंटे तक ब्रेक-फ्री मोदी जी के भाषण दिखाते रहते हैं. कल मोदी जी ने बुंदेलखंड में कहा कि हमने गुजरात में उत्तरप्रदेशी और बिहारी मजदूरों के लिए एक स्कीम सोची है, कि इन मजदूरों से 8 घंटे की बजाय 12 घंटे काम कराया जाए, जिससे उन्हे ज्यादा पैसा मिलेगा. उन्हें फसल के समय बारिस में 3 महीने की छुट्टी दी जाए, जब कि इस समय तो मंदी का दौर होता है, वो कहते हैं कि इन 3 महींनों की सेलरी हम देते हैं, हम सैकड़ों मजदूर दिखा सकते हैं, जिन्हे छुट्टी का पैसा नहीं मिलता है.
अब मुद्दे की बात यह है, कि मोदी जी अदानी पॉवर, रिलायंस, टाटा और विदेशी अनगिनत कम्पनियों में हम पढ़े-लिखे बेरोजगारों के लिए क्या कर रहे हैं? क्या किसी कम्पनी से कहा कि उ. प्र. और बिहार के युवाओं को मैनेजर या इंजीनियर बनाओ? क्या हमारे अंदर ये आत्मविश्वास या टैलेंट नहीं है? क्या हमेशा ही हम यू.पी. बिहार वालों को मजदूर की नजर से ही देखते रहोगे? क्या कभी मुम्बई में अपने गठबन्धन वालों से ये कहा कि इन बिहारी या उत्तरप्रदेशी गरीब मजदूरों को मत सताओ?
आप पाकिस्तान और ISI के बारे में एक नहीं पचासो बार बोले हैं, कि मियाँ मुशर्रफ की औलादें और बच्चा पैदा करने की फैक्ट्रियाँ या मुसलमान आतंकवादियों से मिल रहे हैं. उसी की एजेंट बता कर बेचारी निर्दोष बिहार की बेटी इशरत जहां को मार दिया था. इस बात से याद आया कि जब से इनके 31 आई. ए. एस. ओफ़ीसार (टीम बंजारा) जेल गए हैं, तब से इनके उपर कोई आतंकवादी की साजिस नहीं हुई है.
आप कहते हैं YES WE CAN तो फिर ओबामा की तरह खुली बहस कर अर्थनीति तो बताओ, ABP News के एक प्रोग्राम में राजनाथ सिंह जी थे, तो मैने अभय कुमार दुबे जी को मैसेज किया कि इनसे अर्थनीति के बारे में पूछो, तो दुबे जी ने पूंछा कि क्या आप कोई वैकल्पिक अर्थनीति रखते हैं, जैसे स्वदेशी आदि. तो सिंह बोले कि इसे हम अपने द्रष्टि पत्र में सामिल कर रहे हैं, तो दुबे जी ने कहा कि घोषणा पत्र में सामिल करो द्रष्टि पत्र तो 20 साल बाद भी लागू हो सकता है. तो राजनाथ बोले ये तो हम चुनाव जीतने पर ही बताएंगे. रही बात विदेशनीति की तो अब तक वो केवल एक गंवार की तरह ही बोलते रहे हैं, कि पाकिस्तान पर चढ बैठो, चीन से युद्ध कर दो, अमेरिका पर दबाव बना दो. अगर यही सब कुछ है, तो क्या बाजपाई जी बेवकूफ थे, जो बार बार पाकिस्तान से बात करते थे? कहते हैं, कि मैं चाय बेंचने बेंचने वाला हूँ, आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि मनमोहन सिंह के पिता भी एक मजदूर किसान थे, लालू प्रसाद भी गरीब थे, मायावती से बेहतर कौन होगा, गरीब, दलित महिला. आपको रास्ते में कितने इंजीनियर मिल जाएंगे जो नदी पार करके 20 किलोमीटर साईकिल चला कर स्कूल जाते थे. जब आंसू नही बहाने गए थे, तो अपनी गरीबी क्यों बता डाली? गरीब वो है, जो गरीब को याद रखे गुजरात में दलित और गरीब की क्या हालत है, किसी से छुपा नहीं है? इनकी घड़ी, जूते, कुर्ते पर आज लाखों रुपए खर्च हो रहे हैं. एक-एक रैली में 100-200 करोड़ जो कार्पोरेट काला धन खर्च कर रहा है, उसे भी तो कुछ लालच होगा?
केवल जोर से बोलना ही सब कुछ नहीं होता है. दोस्तों अब हमें ही यह तय करना है, कि हम किसी लफ्फाज़ के चक्कर मे तो नहीं आ रहे हैं?
अब मुद्दे की बात यह है, कि मोदी जी अदानी पॉवर, रिलायंस, टाटा और विदेशी अनगिनत कम्पनियों में हम पढ़े-लिखे बेरोजगारों के लिए क्या कर रहे हैं? क्या किसी कम्पनी से कहा कि उ. प्र. और बिहार के युवाओं को मैनेजर या इंजीनियर बनाओ? क्या हमारे अंदर ये आत्मविश्वास या टैलेंट नहीं है? क्या हमेशा ही हम यू.पी. बिहार वालों को मजदूर की नजर से ही देखते रहोगे? क्या कभी मुम्बई में अपने गठबन्धन वालों से ये कहा कि इन बिहारी या उत्तरप्रदेशी गरीब मजदूरों को मत सताओ?
आप पाकिस्तान और ISI के बारे में एक नहीं पचासो बार बोले हैं, कि मियाँ मुशर्रफ की औलादें और बच्चा पैदा करने की फैक्ट्रियाँ या मुसलमान आतंकवादियों से मिल रहे हैं. उसी की एजेंट बता कर बेचारी निर्दोष बिहार की बेटी इशरत जहां को मार दिया था. इस बात से याद आया कि जब से इनके 31 आई. ए. एस. ओफ़ीसार (टीम बंजारा) जेल गए हैं, तब से इनके उपर कोई आतंकवादी की साजिस नहीं हुई है. आप कहते हैं YES WE CAN तो फिर ओबामा की तरह खुली बहस कर अर्थनीति तो बताओ, ABP News के एक प्रोग्राम में राजनाथ सिंह जी थे, तो मैने अभय कुमार दुबे जी को मैसेज किया कि इनसे अर्थनीति के बारे में पूछो, तो दुबे जी ने पूंछा कि क्या आप कोई वैकल्पिक अर्थनीति रखते हैं, जैसे स्वदेशी आदि. तो सिंह बोले कि इसे हम अपने द्रष्टि पत्र में सामिल कर रहे हैं, तो दुबे जी ने कहा कि घोषणा पत्र में सामिल करो द्रष्टि पत्र तो 20 साल बाद भी लागू हो सकता है. तो राजनाथ बोले ये तो हम चुनाव जीतने पर ही बताएंगे. रही बात विदेशनीति की तो अब तक वो केवल एक गंवार की तरह ही बोलते रहे हैं, कि पाकिस्तान पर चढ बैठो, चीन से युद्ध कर दो, अमेरिका पर दबाव बना दो. अगर यही सब कुछ है, तो क्या बाजपाई जी बेवकूफ थे, जो बार बार पाकिस्तान से बात करते थे? कहते हैं, कि मैं चाय बेंचने बेंचने वाला हूँ, आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि मनमोहन सिंह के पिता भी एक मजदूर किसान थे, लालू प्रसाद भी गरीब थे, मायावती से बेहतर कौन होगा, गरीब, दलित महिला. आपको रास्ते में कितने इंजीनियर मिल जाएंगे जो नदी पार करके 20 किलोमीटर साईकिल चला कर स्कूल जाते थे. जब आंसू नही बहाने गए थे, तो अपनी गरीबी क्यों बता डाली? गरीब वो है, जो गरीब को याद रखे गुजरात में दलित और गरीब की क्या हालत है, किसी से छुपा नहीं है? इनकी घड़ी, जूते, कुर्ते पर आज लाखों रुपए खर्च हो रहे हैं. एक-एक रैली में 100-200 करोड़ जो कार्पोरेट काला धन खर्च कर रहा है, उसे भी तो कुछ लालच होगा?
केवल जोर से बोलना ही सब कुछ नहीं होता है. दोस्तों अब हमें ही यह तय करना है, कि हम किसी लफ्फाज़ के चक्कर मे तो नहीं आ रहे हैं?

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