Wednesday, November 27, 2013

"लव-जिहाद" (हिन्दुत्ववादियों की नाकामयाबी)

हमारे देश में कोई भी मुख्य विचारधारा नहीं है, फिर भी हिन्दुत्ववादी ताकते अपने को देश की प्रमुख विचारधारा मान बैठी हैं। दक्षिणपंथियों के कार्य करने का अपना एक तरीका होता है दक्षिणपंथियों की विचारधारा हमेशा से ही अल्पसंख्यक विरोधी रही है, इसका नेतृत्व राष्‍ट्रीय स्वयं सेवक संघ (R.S.S.)और विश्व हिन्दू परिषद (V.H.P.) करता हैये लोग अपने को हिन्दू धर्म का रक्षक या ठेकेदार मानते हैंइसी कड़ी में हमें सोसल मीडिया पर एक "लव-जिहाद" नाम का अभियाचलता दिखता है, जो हिन्दुत्ववादियों द्वारा मुस्लिम विरोध में होता हैइसके पक्ष में आज तक कुछ नहीं दिखा। मतलब इस अभियान को चलाने वाले तो हैं ही नहीं। मैने भी इसके इतिहास पर जाने की कोशिश की तो पता चला कि इसकी शुरुआत केरल और कर्नाटक से हुईकर्नाटक में श्रीराम सेना ने मंगलोर, कोयंबटूर और बंगलोर जैसे शहरों में एक अभियाचलाया, जिसके तहत इसके कार्यकर्ता पब्लिक प्लेस जैसे कॉलेज, सिनेमा हॉउस आदि में जाकर सभी युवाओं की गाड़ियों के नंबर लेकर वाहन पंजीकरण कार्यालय (R.T.O.)  ओफ़िस में पता करते की क्या यह गाड़ी मुस्लिम की है? फिर लड़की का पता लगाते है, अगर लड़की हिन्दू है, तो लड़के को मारते है और लड़की को उसके घर लेजाकर उसके माँ-बाप के सामने ही समझातेइनके समझाने के तर्क भी थोड़े अजीब होते हैं कि ये लोग (मुस्लिम) एक अभियां चला रहे हैं, "लव-जिहाद"। "जिसमें सिखाया जाता है, कि हिन्दू लड़कियों से शादी करो फिर धर्म परिवर्तन कराके उन्हें बच्चा पैदा करने की मशीन की तरह प्रयोग करोक्योंकि हिन्दुओ (खासकर ब्रम्हणों) की लड़कियों से पैदा होने वाले बच्चे सुन्दर और बुध्दिमान होते हैंये लोग जनसंख्या बढ़ाकर बहुसंख्यक बनना चाहते हैं।" अशोक सिंघल और कुछ भाजपा नेता तो "मुजफ़्फ़र नगर दंगो" को भी लव-जिहाद का ही परिणाम बता रहे हैं। 2010 में कर्नाटक हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर बताया गया था, कि राज्य से 30000 लड़कियां इस अभियान के चलते गायब हैं, लेकिन पुलिस जांच में यह सांख्या मात्र 400 ही थी, और उसमें से मिली 350 लड़कियों ने अपनी मर्जी से शादी की थीजिनमें 170 ने तो हिन्दू या ईसाई लड़कों के  साथ शादी की थी। तब हाईकोर्ट ने इन्हें फटकार लगाई थी। मुझे याद है, 2011 में मेरे कॉलेज के बाहर भी कई बजरंग दल के कार्यकर्ता इस तरह का अभियान करते रहते थे
लेकिन इसकी जमीनी हकीकत पर कुछ ज्यादा विश्वास नहीं किया जा सकता हैमेरा अपना अनुभव है, मेरा एक मुस्लिम दोस्त है, 12वीं कक्षा से ही मेरा सबसे खास मित्र था, जो मुझसे कुछ नहीं छिपाता थामेरी जानकारी में जैसा कि आज के शहरी युवाओं का फैशन हो गया है, तो उसकी 3-4 महिला मित्र(Girl Friends) रह चुकी हैंसंयोंग से वो सब ब्राम्हण थीकई मौकों पर तो और भी कई हिन्दू लड़के उस लड़की के पीछे दीवाने थे, लेकिन लड़की ने उसे ही पसंद कियाउसमें कुछ तो क्वालिटी होगी
दरअसल जब कोई इसप्रकार की बात करता है, तो क्या वो महिला अधिकारों और उसकी स्वतंत्रता पर हमला नहीं करता है? असल में ये वही कट्टरपंथी लोग हैं, जो महिलाओं को घर में कैद रखना चाहते हैंये लोग नाजीवादी सोंच रखते हैंजो औरतों को अत्याचार और भोग की वस्तु समझते हैंउन्हें महिला आन्दोलनों से कोई चिंता नहीं हैकट्टरपंथियों के मन में एक बात घर कर गई है, कि मुस्लिम अधिक बच्चे पैदा कर भारत पर राज करेंगेकहते भी हैं, " एक दिन हिन्दुस्तान भी पाकिस्तान हो जाएगा"।
मेरे अपने गाँव में एक मुस्लिम परिवार में 11 बच्चे हैं, और भी दो-चार घरों में 5-6 होते हैंलेकिन हिन्दुओं में 4-5 ऐसे परिवार होंगे जिनके 10-12 बच्चे हैंआम तौर पर 4-5 बच्चे तो होते ही हैंकई पढ़े-लिखे और बड़ी जाति के लोगों में भीइससे मैं यह साबित करना चाहता हूँ, कि जहां अशिक्षा है, वहीं पर परिवार नियोंजन की कमी हैइसका धर्म से तब लेना-देना है, जब कोई मौलाना या कट्टरपंथियों का आदेश हो। फिर भी इन्हें कोई तवज्जों नहीं देता है। हिन्दुत्वादियों की भी इसको लेकर कई अवधारणाएँ रही हैंअभी कुछ दिन पहले ही संघ के एक महासचिव या पदाधिकारी ने कहा था क़ि अब समय गया है कि हिन्दू भी 4-5 बच्चे पैदा करेंआज जो लोग अपनी रैलियों में भाड़े के बुर्का-टोपी वालों को बुलाते हैं, वो 2004 में कहते थे कि "हम दो हमारे दो, वो पांच और उनके पच्चीस"। अब इनसे कोई पूंछे कि 1950 में 12%  के आस-पास मुस्लिम जनसंख्या थी, और आज भी वो 15-16% ही हैंतो वो मैजोरीटी में कब होंगे? जो कहते हैं कि मुस्लिम 3-4 औरतों से शादी करके 20-25 बच्चे पैदा करते हैंउनका यह तर्क मूर्खतापूर्ण हैप्रकृति के हिसाब से स्त्री और पुरुष का जन्म लगभग 50-50 % पर ही होता हैअगर एक आदमी 4 औरतों से शादी करेगा, तो बाकी के तीन पुरुष तो अविवाहित ही रहेंगेमतलब जोड़े तो उतने ही बनेंगेआप सोंचेंगे कि लड़कियों की कमी को पूरा करने के लिए ही ये लोग हिन्दू लड़कियों को फंसाते हैं, तो क्या इस मंहगाई और बेरोजगारी के जमाने में 4-4 बीवियाँ और 25-25 बच्चे पालना संभव होगा? असल में इनकी तो एक प्रथा है, जिसमें एक पुरुष 4 औरतों से शादी कर सकता हैइसका इतिहास में मेरे हिसाब से यह होगा कि पुराने समय में जब लोग कबीलों में रहते थे, तब उनमें लडाईयां भी होती थीपुरुषों की संख्या कम होने की वजह से तब लोगों ने ऐसे कानून बनाए होंगेऔर वही कानून आज भी इन कट्टर मुल्लाओं ने जारी रखे हैं। आप कितने ऐसे लोगों को हिन्दुस्तान में जानते हैं, जो एक से अधिक पत्नियों को रखे है, मैं तो एक भी नहीं जानता हूँ।
हिन्दुत्वादी कहते हैं कि हिन्दुओं की तुलना में मुस्लिम आबादी अधिक तेजी से बढी हैअसल में इनके यह आकडे गलत हैंइतिहास पर नजर डालें तो जब-जब मानव संसाधनों में ब्रद्धी हुई है, तब-तब उसकी जनसंख्या में भी ब्रद्धी हुई हैचीन में इसी का परिणाम दिख चुका हैऔधोगिक (1700-1900)के समय में के बीच जनसंख्या में चार गुना ब्रद्धि हुई थीलेकिन आज आबादी लगभग स्थिर या कम हो गई है
भारत में भी कई राज्यों (तमिलनाडु, पंजाब, केरल, जम्मु-कश्मीर गुजरात) में जनसंख्या स्थिर हुई हैवहीं उत्तरप्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में जनसंख्या में और बढ़ोत्तरी हुई है, अर्थात् इसका प्रभाव आर्थिक और सामाजिक विकास पर भी पड़ता हैऔर दुर्भाग्यवश उत्तरप्रदेश और बिहार में मुस्लिम जनसंख्या अधिक हैपूरे देश में जनसंख्या ब्रडी की दर(T.R.F..) 1991 के अनुसार हिन्दुओं में 3.02 से घटकर 2.78 और मुस्लिमों में 4.41 से घटकर 3.59 हुई हैअर्थात् हिन्दुओं में 0.52 और मुस्लिमों में 0.82. और 2001 की जनगणना के अनुसार मुसलमानों में प्रजनन दर 3.6 (देहातों में .52 शहरों में 2.29) वहीं हिन्दुओं में 2.47(देहातों में 2.77 और शहरों में 1.72) रही है
उपर्युक्त आकड़ों में दो-तीन बातें हमारे सामने आती हैं, जो ध्यान देंने योग्य हैं
(1)- मुस्लिमों की दर हिन्दुओं से अधिक है
(2)- लेकिन घटने की दर का अंतर मुस्लिमों में अधिक हुआ हैजिसका अर्थ है, कि उन्होंने परिवार नियोंजन को अधिक अपनाया है
(3)- मुस्लिमों की शहरी आबादी की दर हिन्दुओं की ग्रामीण आबादी से कम हैअर्थात् स्वास्थ्य और आर्थिक सुविधाओं के हिसाब से परिवार नियोजन लागू हो पाता है
इंडोनेशिया , ईरान जैसे देशों में यह दर 2.5 तक रह गई है, और बांग्लादेश पाकिस्तान में यह दर 3.0 से भी अधिक हैमतलब कट्टरपंथियों के प्रभाव और आर्थिक हालत के हिसाब से यह होता है
भारत में एक वर्ष तक के बच्चों की मृत्युदर मुस्लिमों में 59 और हिन्दुओं में 77 हैवहीं पांच वर्ष तक के बच्चों की मृत्युदर मुस्लिमों में 83 और हिन्दुओं में 107 हैमुस्लिमों में मृत्युदर कम होने के कई कारण हैंपहला तो हिन्दुओं में लड़कियों की अपेक्षा और कुछ जगहों पर उन्हें मार देना या देख-रेख में कमी करनादूसरा कारण है मुस्लिमों में मांसाहार का प्रचलन। (हालांकि मैं मांसाहार विरोधी हूँ। )
भारत में 2% ही लोग हैं, जो धर्म के चलते परिवार नियोजन नहीं अपनाते हैंऔर 22% लोग ऐसे हैं जिनके पास ये सुविधाएँ और जानकारियाँ नहीं उपलब्ध होती हैं
आकडें देखन अब हम फिर से अपनी मूल बात (लव-जिहाद) पर लौटते हैं, तो इनकी बातों पर हंसी आती हैआखिर धर्म का जनसंख्या ब्रद्धि से क्या लेना-देना हैअगर कोई धर्म परिवर्तन करता है तो वो आपके ब्राम्हणवाद से पीड़ित होकरफिर क्यों इसतरह से संविधान विरोधी बातें करते हो? अगर कोई हिदू-बालिग लड़की या अभिनेत्री किसी मुस्लिम नवयुवक या अभिनेता से शादी करती है, तो हमें इनकी तारीफ करनी चाहिए, क्योंकि आखिर इससे तो हमारे समाज से साम्प्रदायिकता और असमानता खतम होगीलेकिन हमारे ये हिन्दूधर्म के ठेकेदार इसमें हिंदूसमाज का अपमान देखते हैंअगर सैफअली ख़ान से करीना कपूर से शादी की है, तो अपनी बहन सोहा अली ख़ान की शादी कुणाल खेमू से करवाई हैलेकिन ये लोग अपनी नाकामयाबी और ईर्ष्या की वजह से इसे स्वीकार नहीं कर सकते हैंजिसके चलते इनका राजनीतिक हित भी पूरा होता हैऔर हम इनसे उम्मीद भी क्या कर सकते हैं? सिवाय झूंठ, तुष्टिकरण और नफरत के
(नोट: सभी आकडे भारत सरकार के सर्वे की वेबसाइट से  लिए गए हैं।)



Tuesday, November 19, 2013

2014 में गठबंधन की संभावनाएँ

हमारे देश में दो राजनैतिक गठबन्धन हैं। एक यू.पी.ए. और दूसरा एन.डी.ए.। यू.पी.ए.सरकार में है, और एन.डी.ए. विपक्ष में। 2014 में इनके बीच में चुनाव होने हैं। ऐसे में पिछले दो वर्षों से हम लगातार नीतीश कुमार की धमकी रहे थे, कि भाजपा मोदी जी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं करे। फिर जब नहीं चली तो वो एन. डी. ए. से अलग हो चुके हैं। लेकिन उनकी चिंताएं अब भी लगातार बरकार हैं। एक तरह से देखें तो नितीश ने ही अलग होकर मोदी को मौका दे दिया, वरना 2013 विधानसभा चुनाव के तक तो बात टल ही जाती। अगर हम भाजपा के आकड़ों को देखें तो पिछले दस वर्षों में उसकी हालत लगातार कमजोर ही हुई है। उसने अटल और आडवाणी का भी प्रयोग किया, जिसमें एक सेकुलर छवि और एक हिन्दू हीरो था। अब उसके पास अखिरी तीर बचा था। अब उसे भी प्रयोग करने की ठान ली है। मेरी राय में आम जनता (मध्यवर्ग) पर सेकुलर और सम्प्रदायिक होंने का असर कम होता है, लेकिन व़हाँ की स्थानीय राजनीति और प्रत्याशी का प्रभाव ज्यादा देखा जाता है। अल्पसंख्यकों की भी अपनी-अपनी अलग-अलग समस्याएं होती हैं। यू.पी.ए. के दस वर्षों के बाद आज पूरे देश में परिवर्तन की लहर तो है, लेकिन यह कहना गलत होगा कि यह लहर भाजपा या मोदी के पक्ष में है।
कांग्रेस रूपी रावण को मारने के लिए भाजपा के पास कोई राम नहीं है। जो महारथी खड़ा भी है, उसकी तलवार प्लास्टिक की है। कई चीजों जैसे भगवान राम का भी प्रयोग ये लोग चुनाव में कर रहे है। क्या इसका असर पूरे देश पर पड़ेगा? भाजपा को तो मोदी को प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाने के लिए तो 272 सीटें चाहिए। इतनी सीटों पर तो भाजपा मजबूत प्रत्याशी भी नहीं उतार पाती है। मेरा मानना है कि भाजपा और कांग्रेस में ये टक्कर होगी कि कौन 180-200 सीटें लाकर सरकार बनाने का दावा पेश करेगा? वैसे तो कांग्रेस के खिलाफ पार्टियों का एक बड़ा गुट नजर आता है, लेकिन इनमें से कितने लोग भाजपा और खास तौर पर मोदी के साथ हैं? अभी तो एन.डी.ए. में केवल अकाली दल और शिवसेना ही हैं। अगर और भी किसी से उम्मीद है, तो जयललिता की A.I.D.M.K. और नवीन पटनायक की बी.जे.डी. से और उम्मीद दिखती है। ममता से उम्मीद तो थी, लेकिन उनकी और नीतीश कुमार की दिक़्कत एक ही है। इन दोनों के विपक्षी दल (J.D.U.V/S R.J.D. & T.M.C. V/S C.P.M.) के वोट प्रतिशत में कोई बड़ा अंतर नही है। 3-4 प्रतिशत वोट का अंतर तो मोदी के साथ आने पर तो 2015 में मुस्लिम मतों द्वारा राज्य की सत्ता से बाहर कर देगा। ऐसे में कुछ तटस्थ दल तो तीसरे मोर्च की भी संभावनाएँ खोज रहे हैं। जिसकी अगुवाई मुलायम के साथ वामपंथियों द्वारा की जा रही है। इसके लिए अभी कुछ सेकुलर और गैर-कांग्रेसी दलों की एक मीटिंग भी हो चुकी है। लेकिन इसमें देखने वाली बात यह थी कि यह सब दल गैर-कांग्रेसी, एन्टी-बीजेपी थे। लेडिन मुझे नहीं लगता है कि ऐसा कोई मोर्चा ज्यादा दिन तक चल पाएगा। अब बात करते हैं यू.पी.ए. पर तो फिलहाल उसमें वह अकेली ही नजर आ रही है। अगर ऐसे में उसे 150 से अधिक सीटें मिल गईं तो राहुल या किसी और के नेतृत्व में छोटे दलों को कोई मुश्किल नहीं होगी। हाँ यह हो सकता है कि कांग्रेस को कुछ महत्वपूर्ण पदों से समझौता करना पड सकता है। इसमें सपा, बसपा, D.M.K., बसपा, राजद, टी. एम. सी., लेफ्ट और भी कई दल जुड़ सकते हैं। इनकी एन्टी-कांग्रेस छवि समय के हिसाब से बदलती रहती है। वैसे तो समय के साथ-साथ राज्यों में गठबंधन की राजनीति लगातार खत्म होती नजर आ रही है। लेकिन केन्द्र में अभी भविष्य के 20-25 वर्षों तक इससे छुटकारे की कोई उम्मीद नहीं नजर आती है। दोस्त अक्सर पूंछते हैं, क्या मोदी प्रधानमंत्री बनेंगे? तो मेरा जवाब उनको बुरा लगता है। पूंछते हैं, तो फिर क्या राहुल गाँधी बनेगे? तो मेरा जवाब ना होता है। कभी-कभी तो बोल देते ह कि यार तुम्हें कुछ पता ही नहीं है, राजनीति के बारे में। मेरा पूर्वानुमान है कि 2014 का चुनाव मोदी बनाम सभी सेकुलर दल। और चुनाव के बाद जब पी.एम. बनाने की बात होगी तो संभावना है, कि भाजपा सरकार (एन.डी.ए.) बिना मोदी के, राजनाथ, शिवराज (अगर म.प्र. जीते) और शुषमा या आडवाणी अन्यथा तीसरा मोर्चा Supported by कांग्रेस।
खैर जो भी हो लेकिन अगर सर्वे में ही देखा जाए तो भाजपा को 180 के आसपास और कांग्रेस को 125-140 तक ही सीटें मिल रही हैं, ऐसे में अन्य दलों को 250 तक सीटें मिल रही हैं। यह भी नहीं माना जा सकता है कि यह 250 सीटों वाले अन्य दल भी एक साथ नहीं रह सकते हैं। इनमें एक साँप और दो बिल वाली बात भी आ जाती है, जब ममता और लेफ्ट, माया और मुलायम, लालू और मुलायम, चंद्रबाबू नायडू और जगनमोहन जैसे मजबूत क्षेत्रीय दल हैं। फिर तो इनका किसी एक गठबन्धन में रुकना असंभव है। लेकिन उपर्युक्त सभी दलों की खासियत यह है, कि ये सब मोदी के साथ जाने से डरते हैं। सब को चिंता है, अपने राज्य की सात्ता पाने के लिए परिवर्तन वाले मुस्लिम वोट की। हम तो केवल अनुमान ही लगा सकते हैं, लेकिन जो होना है वो तो भविष्य के गर्भ में छुपा है।

मोदी जी के नाम कमलेश कुमार का पत्र

 

प्रिय नरेन्द्र भाई मोदी जी,
माननीय मुख्यमंत्री जी (गुजरात सरकार) मैं भी अभी-अभी आपका नया शुभचिंतक बना हूँ। सुनकर बड़ा दुख हुआ कि आपकी रैली के दौरान कुछ भद्र जनों, माफ करिए अभद्र जनों ने बम ब्लास्ट कर आपको मारने की कोशिश की। अल्लाह नें आपको आपके अच्छे कर्मों की वजह से बचा लिया। भगवान करे आपकी उम्र 100 साल हो भले ही आप प्रधानमंत्री ना बनें।
आपको हार्दिक बधाई कि आपकी चर्चा इस समय पूरे विश्व में हो रही है, सोसल मीडिया और कुछ चैनलों पर तो आप छाए हुए हैं। आपके सामने राहुल गाधी जैसा बच्चा तो कहीं ठहरता ही नहीं है। उसकी जगह अगर कोई नितीश जैसा इतिहास का छात्र होता तो मजा आता। आपको सलाह है, कि आप अब इतिहासकारों की एक टीम बनाइए, जो आपको ज्ञान दे। फिर भी आप हर जुबान पर हैं। लेकिन मुझे लगता है, कि आपको बेवकूफ बनाया जा रहा है। आप वंचित समुदाय से आते हैं, जिसे अपने आका की चापलूसी की वजह से कुछ नहीं मिला। क्योंकि मैं भी यह दर्द झेल रहा हूँ। हम और आप उस विचारधारा से कुछ पाने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं, जिसके लिए ये बड़े पद रिजर्व रखे गए हैं। हम और आप ना तो ब्राम्हण हैं, ना ही क्षत्रिय और बनिया. हम और आप ना तो किसी साही परिवार से आते हैं, जिसे जन्म के साथ ही बिना मेहनत के राज-पाठ मिल जाता है। हम तो उस जाति से आते हैं, जिसका उदाहरण राजा भोज के साथ तुलना (compete) करके दिया जाता है। इस लिए आपकी यह कुर्सी की मांग बच्चे की उस ओछी हरकत की तरह लगती है, जब वह अपनी माँ से चंदा मामा को माँगता है। 2014 में कांग्रसे का बेड़ा गर्क होना तो तय है, लेकिन क्या आपको इस हालात में प्रधानमंत्री बनने का मौका मिलेगा? यह बड़ा सवाल है। क्या संघ ने आपको कोई Agreement लिखकर दिया है। क्योंकि संघ तो संगठन में विश्वाश करता है, जो पिछले 10 वर्षों में गुजरात में कमजोर हुआ है। आपके राज में कई मंदिर तोड़े गए हैं, तो तोगाडिया भी आपका विरोध करते हैं। उन्हें नहीं उम्मीद है, कि आप राम मंदिर बनाएँगे। मुझे लगता है, कि आपके सच्चे मित्र राजनाथ सिंह नहीं आडवाणी जी थे। आपको क्या लगता है, कि संघ, विहिप और भाजपा का शीर्ष नेतृत्व कच्ची गोलियाँ खेल रहा है? आपके राजनाथ तो अब अटल जी की भी बहुत नकल करने लगे हैं। शायद 1998 दोहराने की कोशिश में हैं। आप भूल गए जब 1998 में 02 से 180+ सीटों पर जीताकर लाने वाले आडवानी जी की मेहनत पर अटल जी ने गठबन्धन रूपी पानी फेरा था। तो भईया नरेन्द्र भाई मोदी जी ना ये टाटा, अंबानी आपके काम आएंगे और ना ही ये इंडिया टुडे ग्रुप के संपादक गण। ये सब आपको उछाल रहे हैं। काहे को अपनी उर्जा खराब कर रह हैं। अंत में अपने को भगवान राम के रघुकुल का बताने वाले ठाकुर राजनाथ ही आपको हटाकर पी. एम. ना बन बन जाएँ? फिर तो आपकी यह कुंठा जीवन भर के लिए आडवाणी जी की तरह बनी रहेगी। और वैसे ही आपको भी एक दिन OLX.COM पर बेंच दिया जाएगा। वैसे भी आपको देश का मुसलमान, पढ़ा-लिखा, सभ्य हिन्दू समाज फूटी आँखों नहीं पसंद करता है। उपर से आपके कुछ मित्र नेतागण भी आपको पीछे से वार करने पर बैठे हैं। और ऐसे में आपने एक और बड़ा कदम उठा लिया है, सरदार पटेल की मूर्ति बनवाने का। आप देश के तीसरे लौह पुरुष बनना चाहते हैं। लौहपुरूष हमारे देश में उप (Deputy) का पर्यायवाची होता है।
पहले लौह पुरुष के समय जवाहर नाम का मित्र आ गया था, और स्वयं आगे हो गया, फिर दूसरे लौहपुरूष लाल कृष्ण आडवाणी जी के समय दूसरा जवाहर (अटल) आ गया और मित्रता निभा गया। और अब आप???
इसलिए दिल्ली का सपना छोड़िये और गुजरात पर ही मजे से राज करिए। लोग एक-न-एक दिन आपके साथ ही 2002 को भी भूल ही जाएंगे।
आपका शुभचिंतक:
युवा छात्र कमलेश कुमार राठोर

Friday, November 15, 2013

शहरों में भी जातीय टोले

आज मेरे मन एक बड़ी ही व्यापक़ चर्चा में शामिल होने को कर रहा है। दो दिन पहले फ़ेसबुक पर सांकराअग्रहारम टाउनशिप (Sankara Agraharam Township) फिर उसी पर रवीश ने प्राइम टाइम भी कर दिया। इसकी वेबसाइट पर जाकर देखा तो पता चला कि इस सोसायटी (Society) में केवल ब्राम्हण लोग ही रह सकेंगे। देखकर अजीब लगा लेकिन गूगल (Google) करने पर पता चला कि भारत में यह कोई पहली बार नहीं हो रहा है। आपको दिल्ली, गुड़गाँव और नोएडा में इसी तरह से पत्रकारों के लिए मीडिया हॉउस, वकीलों और जजों के लिए विधिभवन या लॉ (Law) सोसायटी, पूर्वांचल सोसायटी या भोजपुरी सोसायटी और मुम्बई में गुजराती, मराठी और मुस्लिमों के लिए अलग-अलग सोसायटी मिल जाएंगी। गुजरात के लोग यहाँ मुम्बई आकर तो जाति को भूले लेकिन अहमदाबाद में 100 से अधिक दलितों के लिए अलग सोसायटी बनी हुई हैं। चेन्नई, हैदराबाद, और बंगलोर में भी तमिल, तेलगू और मलयालम भाषा के आधार पर सोसायटी मिल सकती हैं। यह  तथाकथित सोसायटी बंगलोर में 120 एकड ट्रस्ट की जमीन पर बन रही है। इसमे ए2 ज़ेड सभी सुविधाएँ होना भी लाज़मी है। जैसा कि मैनें बताया क़ि इस सोसयटी में केवल ब्राम्हण ही रह सकेंगे, तो इसके जवाब में इस टाउनशिप के C.E.O. Dr. V.P. राव कहते हैं क़ि हमारा ब्राम्हण से तात्पर्य किसी जाति नहीं बल्कि सनातन विचारधारा से है। लेकिन मुझे लगता हैं कि उनका यह तर्क केवल सामाजिक और कानूनी बहस से बचने के लिए है।
दरअसल जब हम इस प्रकार की चर्चा में शामिल होते हैं तो हमारे गाँव का एक सामाजिक स्वरूप सामने आ जाता है। सब अपनी-अपनी जातियों के साथ रहते थे, बल्कि अब भी रहते हैं. बमहनउटा, अहिराने, बढईन टोला, तिलियाने, चमरउधा या फिर मियाँ तोला आदि। और यह व्यवस्था देश के लगभग हर राज्य के गावों में होगी। अगर हम इसके गठन पर ज्यादा अधययन न भी करें और थोड़ा सा सोचें तो भी इसके कारण और उद्देश्य पता चल जाते हैं। इससे जाति प्रथा को बढ़ावा तो मिला लेकिन पिछड़ी जातियों को एकता, विकास और राजनैतिक कड भी मिला। शहरों में भी इसका असर खत्म नहीं हुआ है। मेरे अपने शहर कानपुर में ही कितने युवा छात्रों (जो किसी दलित या अति-पिछड़ी जाति के हैं) को अपनी जाति छुपाकर रहना पड़ता है, क्योंकि दलितों और पिछड़ों को कोई किराए पर कमरा या घर नहीं मिलता है। मध्यवर्गीय परिवारों में तो अब भी गाँव के जैसी ही प्रथा पर हर कार्य होता है। ऐसा ही पटना और दिल्ली में भी है। कोलकाता और चेन्नई का तो इतना आइडिया (Idea) नहीं हैं, लेकिन यहाँ भी जाति और भाषा का जबरजस्त प्रभाव देखने को मिलता है। मुम्बई में तो जाति से ज्यादा क्षेत्रियता का प्रभाव देखने को मिलता है। यहाँ मराठी, गुजराती, मारवाड़ी, उत्तर भारतीय (केवल U.P. & बिहार) और मुस्लिम समुदाय के आधार पर सोसायटी देखने को मिलेंगी। यहाँ उत्तर प्रदेश और बिहार का होने पर घर मिलना मुस्किल है, और उससे ज्यादा मुस्किल है मुस्लिम होने पर। अगर हम बात करें विदेशों की तो वहां भी BANA (Bramhin Association of North-America) और दलित समाज के संगठन, प्रवासी भारतीयों (N.R.I.) के द्वारा बनाए गए हैं। आस्ट्रिया में भी पंजाब की तरह दलितों के लिए अलग गुरुद्वारे बनाए गए हैं। और यह सभी संगठन अपने-अपने समुदायों को भारत में भी आर्थिक मदद करते हैं। कहने का अर्थ है कि आज विदेशों में जो लोग हैं, वो भारतीय शहरों से गए हैं, और जो शहरों में हैं, वो गावों के रहने वाले हैं। तो जो परम्परा और प्रथाएं हमारे समाज में हजारों साल से चली आ रही हैं, उन्हें वो भी पूरी तरह से भूल नहीं पाए हैं।
असल में इसी विचारधारा ने हमारे समाज को जाति और सम्प्रदाय का पांच भागों (ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य, सूद्र और अछूत) में बंटवारा भी किया था। यह ब्राम्हणवादी विचारधारा का ही नतीजा था। मनुस्मृति के जमाने से नियम और धर्म सब अपने हिसाब और सहूलियत से बनाए गए। उसी हिसाब से कर्मों का भी वर्गीकरण हुआ।
लेकिन यह भी मानना पड़ेगा कि शहरीकरण से इस व्यवस्था को कुछ नुकसान तो हुआ है। क्योंकि आज छोटे-छोटे शहरों में भी न जाने कितने दलितों ने होटल और दुकानें खोल ली हैं। उन सब जगहों पर बड़े-से-बड़ा ब्राम्हण खाता-पीता है, इतने बड़े बाजारीकरण में इन सब चीजों से बचना असंभव सी बात है। अगर कोई सरकारी अधिकारी दलित है, तो ठाकुर-पण्डित सब काम निकलवाने के लिए  झुककर सलाम करते हैं।
आज भले ही राजनैतिक कारणों की वजह से सम्प्रदाय बचे हुए हैं, लेकिन इनमें से जाति तो कम-से-कम रह गई है। ऐसे में अगर बंगलोर जैसे बड़े शहर में जब कोई इस तरह से बात होती है तो कई तरह की आशंकाएँ और पूर्वाग्रह मन में आने लगते हैं। जैसे कि इस टाउनशिप में मल-मूत्र या सफाई का काम कौन करेगा? यहाँ पर नौकर कौन होगा? यहाँ के दफ्तरों में चपरासी का काम किस जाति का आदमी करेगा? क्या आप यह सब कार्य भी आप ब्रम्हणों से करवाएंगे? अगर नहीं तो आपकी इस सनातन धर्म की विचारधारा पर शक होता है। और अगर आप ऐसा करेंगे तो दरअसल यहाँ ब्राम्हणवाद का आर्थिक अर्थ भी निकाला जाना चाहिए। अन्यथा देश में सभी ब्राम्हण तो अरबपति नहीं हैं जो आपके फ्लैट खरीद सकेंगे? फिर तो आप के पास दिल्ली से यू. पी. वाया महाराष्ट्र, गुजरात तक लाईन लग जाएगी और आपके पास फ्लैट कम लग जाएंगे। कुछ बातें समझ पाया कुछ नहीं, मुद्दा बहुत बड़ा है इसपर व्यापक चर्चा होनी चाहिए।

Thursday, November 14, 2013

बाल दिवस (सामाजिक असमानता)

आज तो देश में बहुत सारी खुशियाँ एक साथ आ गई हैं, मुहर्रम, सचिन का अखिरी टेस्ट मैच और बाल दिवस की भी आप सब को बधाईयां। सब अपने-अपने बचपन में लौटना चाहते हैं, लेकिन कुछ ऐसे बच्चे हैं जो अपना बचपन ही नहीं जी पाते हैं
 कुछ बच्चे तो आज स्कूलों में बड़ी-बड़ी पार्टियों में शामिल होते हैं, उनके टीचर उन्हें गिफ्ट देते हैं, और कुछ हैं, जो अपने पेट के लिए संघर्ष करते हैं, जब वो बड़े हो जाते हैं तो अपना बचपन याद नहीं करना चाहते हैं।
कभी-कभी हम भी अपनी खुशियों को ही पूरे संसार की खुशी समझ लेते हैं। जब कि हकीकत में 34% बच्चे हमारे देश में कुपोषित हैं, और यह सब केवल छत्तीसगढ़ और बुंदेलखंड में ही नहीं हमारे मुम्बई-दिल्ली जैसे शहरों में भी होते हैं। आपको रोज हीं यहाँ पर सिग्नल पर, स्टेशन पर, ब्रिज पर भीख मांगते हुए मिल जाएंगे।
समाज में कुछ बच्चे ऐसे हैं जिन्हे माँ-बाप उनकी गर्मी की छुट्टियों के लिए लाखों खर्च कर देते हैं, एक-एक D.P.S. और कान्वेंट जैसे संस्थानों में एक महीने की फीस 25-25 हजार होती है, और कुछ जगहें ऐसी होती हैं जहां बच्चे सरकार  के शिक्षा के अधिकार पर ही निर्भर हैं, वो भी शिक्षा के लिए कम दोपहर के मिड-डे मील भोजन के लिए ज्यादा। मेरी बात उन लोगों को बुरी लग सकती है जिनके बच्चे महंगे स्कूलों में पढ़ते हैं, लेकिन मैं आपके बच्चे या आपसे ईर्ष्याग्रत नहीं हूँ, बस देश के सामाजिक और सरकारी तंत्र पर सवाल उठा रहा हूँ।
यूरोप और अमेरिका में बहुत से ऐसे देश हैं जहां पर चपरासी और राष्ट्रपति के लड़के एक ही जगह पर पढ़ते हैं, ट्यूशन या कोचिंग की कोई व्यवस्था ही नहीं है. लेकिन यह बात सामंतवादी विचारधरावी लोगों को खराब लग सकती है, अगर आपको भी खराब लगे तो बुरा मत मानिए, ये एक सच्चाई है। इस व्यवस्था से समाज में एक समानता आती है। सबको बराबर मौके मिलते हैं, लेकिन हमारे देश में पहले तो ब्राह्मण शिक्षकों ने दलित और पिछड़ों को पढ़ाना ही पाप समझा उसके बाद जब बाबा साहब अम्बेडकर और लोहिया साहब जैसे लोगों के प्रयास सफल हुए तो उनके साथ भेद-भाव होता रहा।
यह तो हो गई शिक्षा व्यवस्था की बात. अब हम बात करते हैं हमारे समाज में बच्चों से छिनता उनका बचपन. आपने अगर यह तस्वीरें केवल कम्प्यूटर पर ही देखी हैं तो शायद आपको इसे देखने में घिन भी लगेगा। लेकिन हमारे देश की सच्चाई यही है। मैने कोई इस विषय पर रिपोर्टिंग नहीं की है, केवल रोड से निकलते हुए देखने वाली चीजें ही बता रहा हूँ। अगर ऐसा नहीं है तो आपको किसी बच्चे को 1-2 रुपए देकर भी क्यों शान्ति या शुकून मिलता है।

आज जिस नेहरू जी का जन्मदिन है, उन्ही के फालोवर इन बच्चों की अनदेखी कर रहे हैं। सभी माँ-बाप आपके जैसे पैसेवाले और शिक्षित या समझदार नहीं होते और सब बच्चे आपके बच्चों की तरह भाग्यशाली नहीं। उन बच्चों से पूछों जो दिनभर अपने माँ-बाप के साथ खेतों में मजदूरी करते हैं, किसी के बाप नहीं है, किसी का है तो नासेबाज है, उसे अपने उसके लिए भी कमाना पड़ता है। उन बच्चों से जाकर पूछों जो बुंदेलखण्ड और छत्तीसगढ जैसी जगहों पर रहते हैं, उन्हें अगर एक बार का भोजन ही मिल जाए तो बड़ी बात होती है। कानून बनने के इतने साल बाद भी इनके माँ-बाप मजबूर हैं इनसे मजदूरी कराने के लिए। उन प्रवासियों से पूछों जो आपके जैसे फ्लैट और बिल्डिंग में काम करते हैं, वो चार दिन यहाँ-तो चार दिन व़हाँ। कैसे सुविधाएँ दें वो अपने बच्चों को जब खुद ही मर रहे हैं. किस स्कूल में भेजे। और अब तो इंगलिस मीडियम वालों से भी डर गए हैं। सरकारी शिक्षक यह सोंचते हैं कि अगर बच्चों को ज्यादा पढ़ा दिया तो इनमें और मेरे अपने बच्चों में क्या अंतर रहेगा जो मंहगे स्कूलों में जाते हैं. इसी डर से गरीब अभिभावक और अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते हैं।

आज आप सफर करने घर से निकलेंगे नहीं कि कितने बच्चे आपको रास्ते में कोई ट्रॅन में चाय-गुटका बेचते या भीख मांगते हुए मिल जाएंगे। आपको यह सब देखकर कभी-कभी बुरा भी लगता है लेकिन यह सोचकर चुप बैठ जाते हैं कि मेरे करने से ही कितना हो जाएगा। यह सब एक सामाजिक संरचना है। लेकिन अगर यही बात मदर टेरेसा ने सोची होती तो क्या उन्हें नोबल पुरस्कार मिलता। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि आपके 100-200 रुपए देने से कुछ हो जाएगा। लेकिन आपको अपने घर-आफिस-कारखानों-दुकानों और खेतों में उनसे काम नहीं कराना चाहिए।


 उन्हें या उनके माँ-बाप को समझा कर ही मदद कर देनी चाहिए। कहीं भी उन्हें काम करते देखें तो उसपर आवाज उठाने की कोशिश करिए, लेकिन आप सोंचते होंगे कि इतना समय किसके पास है तो, अगर सिकायत की भी तो पुलिस या अधिकारी पैसे ले-देकर सब खत्म कर देंगे, लेकिन आप यह भी सोचिए कि अगर आप अपने ये छोटे-छोटे कर्तव्य पूरे नहीं कर पाए तो आपके अंदर एक समाजवाद (किसी पार्टी का नाम नहीं) विरोधी मानसिकता बैठी हुई है। भले ही समाज धीरे-धीरे बदलना शुरु हो गया है, आज गरीबों और मजदूरों के बच्चे भी I.A.S., P.C.S. I.I.T. &UPSC पास कर रहे हैं।
चर्चा बहुत व्यापक है, हम जैसे लोग नहीं उठाएंगे तो कौन उठाएगा? लेकिन हमारे समाज की एक और सच्चाई है कि हम जैसों को इसी गरीबी से निकला और निम्न स्तर का समझ लेते हैं। जबकिं अपनी सोच पर शर्म नहीं आती है। आखिर वो भी बच्चे हैं उन्हें अगर माँ-बाप का प्यार नहीं मिला तो क्या हुआ, हम प्यार नही मदद तो दे ही सकते हैं। क्यों कि इससे हमारे देश की बहुत सारी समस्याएं (गरीबी, कुपोषण, बेरोजगारी और अपराध) हल हो जाती हैं।
बकौल राजेश रेड्डी..
"यहाँ हर शख्स, हर पल हादसा होने से डरता है ,
खिलौना है जो मिटटी का फ़ना होने से डरता है ,
मेरे दिल के किसी कोने में, एक मासूम सा बच्चा ,
बड़ों की देख कर दुनिया, बड़ा होने से डरता है.......!


राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

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