हमारे देश में
कोई भी
मुख्य विचारधारा
नहीं है,
फिर भी हिन्दुत्ववादी ताकते अपने को देश की प्रमुख विचारधारा मान बैठी हैं।
दक्षिणपंथियों के कार्य करने का
अपना एक
तरीका होता
है। दक्षिणपंथियों की विचारधारा हमेशा से
ही अल्पसंख्यक
विरोधी रही
है, इसका
नेतृत्व राष्ट्रीय स्वयं सेवक
संघ (R.S.S.)और
विश्व हिन्दू
परिषद (V.H.P.) करता
है। ये
लोग अपने
को हिन्दू
धर्म का
रक्षक या
ठेकेदार मानते
हैं। इसी
कड़ी में
हमें सोसल
मीडिया पर
एक "लव-जिहाद" नाम
का अभियान चलता दिखता
है, जो
हिन्दुत्ववादियों द्वारा मुस्लिम विरोध
में होता
है। इसके
पक्ष में
आज तक
कुछ नहीं
दिखा। मतलब इस अभियान को चलाने वाले तो हैं ही नहीं। मैने
भी इसके
इतिहास पर
जाने की
कोशिश की
तो पता
चला कि
इसकी शुरुआत
केरल और
कर्नाटक से
हुई। कर्नाटक
में श्रीराम सेना
ने मंगलोर,
कोयंबटूर और
बंगलोर जैसे
शहरों में
एक अभियान
चलाया, जिसके
तहत इसके
कार्यकर्ता पब्लिक प्लेस जैसे कॉलेज,
सिनेमा हॉउस
आदि में
जाकर सभी
युवाओं की
गाड़ियों के
नंबर लेकर वाहन पंजीकरण कार्यालय (R.T.O.) ओफ़िस
में पता
करते की
क्या यह
गाड़ी मुस्लिम
की है?
फिर लड़की
का पता
लगाते है, अगर
लड़की हिन्दू
है, तो
लड़के को
मारते है और
लड़की को
उसके घर
लेजाकर उसके
माँ-बाप
के सामने
ही समझाते। इनके समझाने
के तर्क
भी थोड़े
अजीब होते
हैं कि
ये लोग (मुस्लिम) एक
अभियां चला
रहे हैं,
"लव-जिहाद"।
"जिसमें सिखाया
जाता है,
कि हिन्दू
लड़कियों से
शादी करो
फिर धर्म
परिवर्तन कराके
उन्हें बच्चा
पैदा करने
की मशीन
की तरह
प्रयोग करो। क्योंकि हिन्दुओ
(खासकर ब्रम्हणों)
की लड़कियों
से पैदा
होने वाले
बच्चे सुन्दर
और बुध्दिमान
होते हैं। ये लोग
जनसंख्या बढ़ाकर
बहुसंख्यक बनना चाहते हैं।" अशोक
सिंघल और
कुछ भाजपा
नेता तो
"मुजफ़्फ़र नगर दंगो" को भी
लव-जिहाद
का ही
परिणाम बता
रहे हैं।
2010 में कर्नाटक
हाईकोर्ट में
एक याचिका
दायर कर
बताया गया
था, कि
राज्य से
30000 लड़कियां इस अभियान के चलते
गायब हैं,
लेकिन पुलिस
जांच में
यह सांख्या
मात्र 400 ही थी, और उसमें
से मिली
350 लड़कियों ने अपनी मर्जी से
शादी की
थी। जिनमें
170 ने तो
हिन्दू या
ईसाई लड़कों
के
साथ शादी की थी। तब हाईकोर्ट ने इन्हें फटकार लगाई थी। मुझे
याद है,
2011 में मेरे
कॉलेज के
बाहर भी
कई बजरंग
दल के
कार्यकर्ता इस तरह का अभियान
करते रहते
थे।
लेकिन इसकी जमीनी
हकीकत पर
कुछ ज्यादा
विश्वास नहीं
किया जा
सकता है। मेरा अपना
अनुभव है,
मेरा एक
मुस्लिम दोस्त
है, 12वीं
कक्षा से
ही मेरा
सबसे खास
मित्र था,
जो मुझसे
कुछ नहीं
छिपाता था।
मेरी जानकारी
में जैसा
कि आज
के शहरी
युवाओं का
फैशन हो
गया है,
तो उसकी
3-4 महिला मित्र(Girl Friends) रह चुकी
हैं। संयोंग
से वो
सब ब्राम्हण
थी। कई
मौकों पर
तो और
भी कई
हिन्दू लड़के
उस लड़की
के पीछे
दीवाने थे,
लेकिन लड़की
ने उसे
ही पसंद
किया। उसमें
कुछ तो
क्वालिटी होगी।
दरअसल जब कोई
इसप्रकार की
बात करता
है, तो
क्या वो
महिला अधिकारों
और उसकी
स्वतंत्रता पर हमला नहीं करता
है? असल
में ये
वही कट्टरपंथी
लोग हैं,
जो महिलाओं
को घर
में कैद
रखना चाहते
हैं। ये
लोग नाजीवादी
सोंच रखते
हैं। जो
औरतों को
अत्याचार और
भोग की
वस्तु समझते
हैं। उन्हें
महिला आन्दोलनों
से कोई
चिंता नहीं
है। कट्टरपंथियों
के मन
में एक
बात घर
कर गई
है, कि
मुस्लिम अधिक
बच्चे पैदा
कर भारत
पर राज
करेंगे। कहते
भी हैं, " एक
दिन हिन्दुस्तान
भी पाकिस्तान
हो जाएगा"।
मेरे अपने गाँव
में एक
मुस्लिम परिवार
में 11 बच्चे
हैं, और
भी दो-चार घरों
में 5-6 होते
हैं। लेकिन हिन्दुओं में
4-5 ऐसे परिवार
होंगे जिनके
10-12 बच्चे हैं। आम तौर पर
4-5 बच्चे तो होते ही हैं। कई पढ़े-लिखे और
बड़ी जाति
के लोगों
में भी।
इससे मैं
यह साबित
करना चाहता
हूँ, कि
जहां अशिक्षा
है, वहीं
पर परिवार
नियोंजन की
कमी है। इसका धर्म
से तब
लेना-देना
है, जब
कोई मौलाना
या कट्टरपंथियों
का आदेश
हो। फिर भी इन्हें कोई तवज्जों नहीं देता है। हिन्दुत्वादियों की भी
इसको लेकर
कई अवधारणाएँ
रही हैं। अभी कुछ
दिन पहले
ही संघ
के एक
महासचिव या
पदाधिकारी ने कहा था क़ि
अब समय
आ गया
है कि
हिन्दू भी
4-5 बच्चे पैदा करें। आज जो
लोग अपनी
रैलियों में
भाड़े के
बुर्का-टोपी
वालों को
बुलाते हैं,
वो 2004 में
कहते थे
कि "हम
दो हमारे
दो, वो
पांच और
उनके पच्चीस"। अब इनसे
कोई पूंछे
कि 1950 में
12% के
आस-पास
मुस्लिम जनसंख्या
थी, और
आज भी
वो 15-16% ही हैं। तो वो
मैजोरीटी में
कब होंगे?
जो कहते
हैं कि
मुस्लिम 3-4 औरतों से शादी करके
20-25 बच्चे पैदा करते हैं। उनका
यह तर्क
मूर्खतापूर्ण है। प्रकृति के हिसाब
से स्त्री
और पुरुष
का जन्म
लगभग 50-50 % पर ही होता है। अगर एक
आदमी 4 औरतों
से शादी
करेगा, तो
बाकी के
तीन पुरुष
तो अविवाहित
ही रहेंगे। मतलब जोड़े
तो उतने
ही बनेंगे। आप सोंचेंगे कि लड़कियों की कमी को पूरा करने के लिए ही ये लोग हिन्दू लड़कियों को फंसाते हैं,
तो क्या
इस मंहगाई
और बेरोजगारी
के जमाने
में 4-4 बीवियाँ
और 25-25 बच्चे
पालना संभव
होगा? असल
में इनकी
तो एक
प्रथा है,
जिसमें एक
पुरुष 4 औरतों
से शादी
कर सकता
है। इसका
इतिहास में
मेरे हिसाब
से यह
होगा कि
पुराने समय
में जब
लोग कबीलों
में रहते
थे, तब
उनमें लडाईयां
भी होती
थी। पुरुषों
की संख्या
कम होने
की वजह
से तब
लोगों ने
ऐसे कानून
बनाए होंगे। और वही
कानून आज
भी इन
कट्टर मुल्लाओं
ने जारी
रखे हैं। आप कितने ऐसे लोगों को हिन्दुस्तान में जानते हैं, जो एक से अधिक पत्नियों को रखे है, मैं तो एक भी नहीं जानता हूँ।
हिन्दुत्वादी कहते हैं
कि हिन्दुओं
की तुलना
में मुस्लिम
आबादी अधिक
तेजी से
बढी है। असल में
इनके यह
आकडे गलत
हैं। इतिहास
पर नजर
डालें तो
जब-जब
मानव संसाधनों
में ब्रद्धी
हुई है,
तब-तब
उसकी जनसंख्या
में भी
ब्रद्धी हुई
है। चीन
में इसी
का परिणाम
दिख चुका
है। औधोगिक
(1700-1900)के समय में के बीच
जनसंख्या में
चार गुना
ब्रद्धि हुई
थी। लेकिन
आज आबादी
लगभग स्थिर
या कम
हो गई
है।
भारत में भी
कई राज्यों (तमिलनाडु, पंजाब,
केरल, जम्मु-कश्मीर
व गुजरात)
में जनसंख्या
स्थिर हुई
है। वहीं
उत्तरप्रदेश और बिहार जैसे राज्यों
में जनसंख्या
में और
बढ़ोत्तरी हुई है, अर्थात् इसका
प्रभाव आर्थिक
और सामाजिक
विकास पर
भी पड़ता
है। और
दुर्भाग्यवश उत्तरप्रदेश और बिहार में
मुस्लिम जनसंख्या
अधिक है। पूरे देश
में जनसंख्या
ब्रडी की
दर(T.R.F..)
1991 के अनुसार
हिन्दुओं में
3.02 से घटकर
2.78 और मुस्लिमों
में 4.41 से
घटकर 3.59 हुई है। अर्थात् हिन्दुओं
में 0.52 और
मुस्लिमों में 0.82. और 2001 की जनगणना
के अनुसार
मुसलमानों में प्रजनन दर 3.6 (देहातों
में .52 व
शहरों में
2.29) वहीं हिन्दुओं में 2.47(देहातों में
2.77 और शहरों
में 1.72) रही है।
उपर्युक्त आकड़ों में
दो-तीन
बातें हमारे
सामने आती
हैं, जो
ध्यान देंने
योग्य हैं।
(1)- मुस्लिमों की दर
हिन्दुओं से
अधिक है।
(2)- लेकिन घटने की
दर का
अंतर मुस्लिमों
में अधिक
हुआ है। जिसका अर्थ
है, कि
उन्होंने परिवार
नियोंजन को
अधिक अपनाया
है।
(3)- मुस्लिमों की शहरी
आबादी की
दर हिन्दुओं
की ग्रामीण
आबादी से
कम है। अर्थात् स्वास्थ्य
और आर्थिक
सुविधाओं के
हिसाब से
परिवार नियोजन
लागू हो
पाता है।
इंडोनेशिया , ईरान जैसे
देशों में
यह दर
2.5 तक रह
गई है,
और बांग्लादेश
व पाकिस्तान
में यह
दर 3.0 से
भी अधिक
है। मतलब
कट्टरपंथियों के प्रभाव और आर्थिक हालत के
हिसाब से
यह होता
है।
भारत में एक
वर्ष तक
के बच्चों
की मृत्युदर
मुस्लिमों में 59 और हिन्दुओं में
77 है। वहीं
पांच वर्ष
तक के
बच्चों की
मृत्युदर मुस्लिमों
में 83 और
हिन्दुओं में
107 है। मुस्लिमों
में मृत्युदर
कम होने
के कई
कारण हैं। पहला तो
हिन्दुओं में
लड़कियों की
अपेक्षा और
कुछ जगहों
पर उन्हें
मार देना
या देख-रेख में
कमी करना। दूसरा कारण
है मुस्लिमों
में मांसाहार
का प्रचलन। (हालांकि मैं
मांसाहार विरोधी
हूँ। )
भारत में 2% ही
लोग हैं,
जो धर्म
के चलते
परिवार नियोजन
नहीं अपनाते
हैं। और
22% लोग ऐसे
हैं जिनके
पास ये
सुविधाएँ और
जानकारियाँ नहीं उपलब्ध होती हैं।
आकडें देखन अब
हम फिर
से अपनी
मूल बात
(लव-जिहाद)
पर लौटते
हैं, तो
इनकी बातों
पर हंसी
आती है। आखिर धर्म
का जनसंख्या
ब्रद्धि से
क्या लेना-देना है।
अगर कोई
धर्म परिवर्तन
करता है
तो वो
आपके ब्राम्हणवाद
से पीड़ित
होकर। फिर
क्यों इसतरह
से संविधान
विरोधी बातें
करते हो?
अगर कोई
हिदू-बालिग
लड़की या
अभिनेत्री किसी मुस्लिम नवयुवक या
अभिनेता से
शादी करती
है, तो
हमें इनकी
तारीफ करनी
चाहिए, क्योंकि
आखिर इससे
तो हमारे
समाज से
साम्प्रदायिकता और असमानता खतम होगी। लेकिन हमारे
ये हिन्दूधर्म
के ठेकेदार
इसमें हिंदूसमाज
का अपमान
देखते हैं। अगर सैफअली
ख़ान से
करीना कपूर
से शादी
की है,
तो अपनी
बहन सोहा
अली ख़ान
की शादी
कुणाल खेमू
से करवाई
है। लेकिन
ये लोग
अपनी नाकामयाबी
और ईर्ष्या
की वजह
से इसे
स्वीकार नहीं
कर सकते
हैं। जिसके
चलते इनका
राजनीतिक हित
भी पूरा
होता है। और हम
इनसे उम्मीद
भी क्या
कर सकते
हैं? सिवाय
झूंठ, तुष्टिकरण
और नफरत
के।
(नोट: सभी आकडे भारत सरकार के सर्वे की वेबसाइट से लिए गए हैं।)












