बचपन से ही मैं प्रवास को लेकर परेशान रहने लगा था। जब कुछ दिन के लिए कानपुर आ गया तो गाँव के मित्र ताना देने लगे कि अब तो साहब बड़े हो गए हैं, कानपुर के लोगो को कहते सुना कि अब शहर में देहाती {प्रवासी}छात्रों की वजह से भीड़ बढ रही है। फिर 2011 मई में मुम्बई आ गया तो असली सफर शुरु हुआ। पहले आकर 8 दिन तक गाँव के ही एक मित्र के यहाँ रुककर केवल बेरोजगारी से संघर्ष करता रहा। जब जॉब मिली तो एक सीनियर ने भईया कह दिया, तो खुशी हुई कि सब समझदार हैं छोटे का भी सम्मान करते हैं। कुछ दोस्तों ने बताया कि हम उत्तर प्रदेश और बिहार वालों को भईया ही कहा जाता है। तो भी लगा कि शायद जैसे मराठी, गुजराती, मारवाड़ी, मद्रासी, उसी तरह हम भी उत्तरप्रदेशी और बिहारी भईया शब्द से संबोधित किए जाते हैं। बाद में जब इस शब्द के इतिहास पर गया तो पता चला कि इस भईया शब्द के पीछे सस्ते श्रम का अपमान छुपा है। एक ऐसे शहर में जहां एक छोटा लड़का /लड़की अपने से बड़े भाई / बहन को "तू" कहते हैं, पत्नी अपने पति को "तू" कहती है। किसी का सम्मान नहीं है वहाँ हम लोग जो अपने से छोटे को भी भईया कहते हैं, तो हमारी हर बात में भईया कहना इन लोगों को मजाक लगने लगा। तो हमे ये लोग भईया ही कहने लगे।
जब मैं ओफ़िस में रखा गया था तो सब ने समझा था कि यू. पी. का है, B.A. किया है, ये तो हमारा हेल्पर का काम अच्छा करेगा। मेरे सामने 5 सीनियर थे, आज 2 ने जॉब छोड़ दिया और 3 मेरे जूनियर हो गए, अब मैं C.A. सर का असिस्टेंट हो गया हूँ। मेरे C.A. सर ने मुझे बहुत सिखाया. आज एम. कॉम. (M.Com.) वाले मेरे जूनियर हो गए हैं।
जब इतिहास के पन्नो को पलट कर देखा तो पता चला कि हमसे ज्यादा हमारे पुरखे पूरे देश और अरब तक में भुगत चुके हैं। हम उत्तर प्रदेश और बिहार वालों को एक अभिशाप मिल चुका है। अभी हाल ही में मोदी जी ने झाँसी के भाषण में यह दिखा दिया था। उन्होने कहा कि हमने गुजरात में उत्तरप्रदेशी और बिहारी मजदूरों के लिए एक स्कीम सोची है, कि इन मजदूरों से 8 घंटे की बजाय 12 घंटे काम कराया जाए, जिससे उन्हे ज्यादा पैसा मिलेगा. उन्हें फसल के समय बारिस में 3 महीने की छुट्टी दी जाए, जब कि इस समय तो मंदी का दौर होता है, वो कहते हैं कि इन 3 महींनों की सेलरी हम देते हैं, हम सैकड़ों मजदूर दिखा सकते हैं, जिन्हे पैसा नहीं मिलता है.
अब मुद्दे की बात यह है, कि क्या अदानी पॉवर, रिलायंस, टाटा और विदेशी अनगिनत कम्पनियों में हम पढ़े-लिखे बेरोजगारों के लिए क्या कर रहे हैं? क्या किसी कम्पनी से कहा कि उ. प्र. और बिहार के युवाओं को मैनेजर या इंजीनियर बनाओ? क्या हमारे अंदर ये आत्मविश्वास या टैलेंट नहीं है? क्या हमेशा ही हम यू.पी. बिहार वालों को मजदूर की नजर से ही देखते रहोगे? क्या कभी मुम्बई में अपने गठबन्धन वालों से ये कहा कि इन बिहारी या उत्तरप्रदेशी गरीब मजदूरों को मत सताओ? उनका मतलब था कि गुजरात में केवल मजदूरो के लिए ही जगह है, जिनका खून पिया जा सके और चूँ तक ना करें।
फिर से अपनी बात पर लौटता हूँ, एक तरफ उत्तर प्रदेश और बिहार के वो अभागे इलाके जो अपने लोक गीतों में हम जैसों के लिए तरसते रहे और एक तरफ हम "चिट्ठी आई है" जैसे गानों के साथ मुम्बई के बंद कमरों मे सिसकते रहे। छठ हो या दिवाली ऐसी हूक उठती है, लगता है क़ि बस दीवार पर सर दे मारें। कहाँ और कब तक रोएँ? 6 फुट के जवान शरीर पर आंसू टपकते देखकर अजीब लगता है। दोस्तों के बाहर जाने या सोने का इंतजार रहता है, कि कहीं अकेले में रो लूँ। गाँव में जिन्हे गाली देता था आज उन्हीं की याद आती है। किसी की छत से लाउड स्पीकर से बजता आल्हा और आधार का कैसेट या फिर वो गाना क्या तुमने किसी से प्यार किया? हां मैने भी किया। आज फिर से यूट्यूब पर वो सब सुनने का मन करता है। तालाब / गंगा किनारे क्रिकेट खेलना, खेतों में जानवर चराना, गाँव के तीन-तीन हनुमान जी के मेले और सार्वजनिक कार्यों में इतनी हिस्सेदारी से गाँव से इतना प्यार हो गया कि पहली लड़की के जैसे रुलाता है। क्या करें सब छूट गया।
इस पर मुझे मुनव्वर राणा का एक शेर याद आ रहा है...
मुमकिन है क़ि अब हमें गाँव भी पहचान ना पाए।
बचपन में ही हम घर से कमाने निकल आए।।
ऐ रेत के जर्रे तेरा अहसान बहुत है।
आँखों को भिगोने के बहाने निकल आए।।
जब इतिहास के पन्नो को पलट कर देखा तो पता चला कि हमसे ज्यादा हमारे पुरखे पूरे देश और अरब तक में भुगत चुके हैं। हम उत्तर प्रदेश और बिहार वालों को एक अभिशाप मिल चुका है। अभी हाल ही में मोदी जी ने झाँसी के भाषण में यह दिखा दिया था। उन्होने कहा कि हमने गुजरात में उत्तरप्रदेशी और बिहारी मजदूरों के लिए एक स्कीम सोची है, कि इन मजदूरों से 8 घंटे की बजाय 12 घंटे काम कराया जाए, जिससे उन्हे ज्यादा पैसा मिलेगा. उन्हें फसल के समय बारिस में 3 महीने की छुट्टी दी जाए, जब कि इस समय तो मंदी का दौर होता है, वो कहते हैं कि इन 3 महींनों की सेलरी हम देते हैं, हम सैकड़ों मजदूर दिखा सकते हैं, जिन्हे पैसा नहीं मिलता है.
अब मुद्दे की बात यह है, कि क्या अदानी पॉवर, रिलायंस, टाटा और विदेशी अनगिनत कम्पनियों में हम पढ़े-लिखे बेरोजगारों के लिए क्या कर रहे हैं? क्या किसी कम्पनी से कहा कि उ. प्र. और बिहार के युवाओं को मैनेजर या इंजीनियर बनाओ? क्या हमारे अंदर ये आत्मविश्वास या टैलेंट नहीं है? क्या हमेशा ही हम यू.पी. बिहार वालों को मजदूर की नजर से ही देखते रहोगे? क्या कभी मुम्बई में अपने गठबन्धन वालों से ये कहा कि इन बिहारी या उत्तरप्रदेशी गरीब मजदूरों को मत सताओ? उनका मतलब था कि गुजरात में केवल मजदूरो के लिए ही जगह है, जिनका खून पिया जा सके और चूँ तक ना करें।
फिर से अपनी बात पर लौटता हूँ, एक तरफ उत्तर प्रदेश और बिहार के वो अभागे इलाके जो अपने लोक गीतों में हम जैसों के लिए तरसते रहे और एक तरफ हम "चिट्ठी आई है" जैसे गानों के साथ मुम्बई के बंद कमरों मे सिसकते रहे। छठ हो या दिवाली ऐसी हूक उठती है, लगता है क़ि बस दीवार पर सर दे मारें। कहाँ और कब तक रोएँ? 6 फुट के जवान शरीर पर आंसू टपकते देखकर अजीब लगता है। दोस्तों के बाहर जाने या सोने का इंतजार रहता है, कि कहीं अकेले में रो लूँ। गाँव में जिन्हे गाली देता था आज उन्हीं की याद आती है। किसी की छत से लाउड स्पीकर से बजता आल्हा और आधार का कैसेट या फिर वो गाना क्या तुमने किसी से प्यार किया? हां मैने भी किया। आज फिर से यूट्यूब पर वो सब सुनने का मन करता है। तालाब / गंगा किनारे क्रिकेट खेलना, खेतों में जानवर चराना, गाँव के तीन-तीन हनुमान जी के मेले और सार्वजनिक कार्यों में इतनी हिस्सेदारी से गाँव से इतना प्यार हो गया कि पहली लड़की के जैसे रुलाता है। क्या करें सब छूट गया।
इस पर मुझे मुनव्वर राणा का एक शेर याद आ रहा है...
मुमकिन है क़ि अब हमें गाँव भी पहचान ना पाए।
बचपन में ही हम घर से कमाने निकल आए।।
ऐ रेत के जर्रे तेरा अहसान बहुत है।
आँखों को भिगोने के बहाने निकल आए।।
मुम्बई की गलियों में हर वक्त अपनों को खोजते रहता था। किसी पान की दुकान वाले से पूंछा तो बताया गोरखपुर का हूँ तो मैं बोला अरे वहीं तो मेरे दोस्त के मामा रहते हैं। ओफ़िस के वाचमैन से पूछा तो बताया इलाहाबाद। तो कहा वहां तो मेरे पापा खूब हाईकोर्ट तक पैदल गए हैं, कई दोस्त हैं वहाँ, अपना शहर है फिर जाति पूंछकर बात लम्बी कर देना। बाल काटने वाला लखनउ का था तो मेरा नंबर जल्दी लगा देता था। कितने सब्जी वालों से व्यवहार हो गया था। इसी तरह से एक अजीब सा रिस्ता जुड़ गया था। गाँव के 4-5 लड़के साथ में या आस-पास रहते हैं फिर भी यह अकेलापन? एक दिन जुहू चौपाटी पर से वापस आनें में देर हो गई तो कोई आटोरिक्सा नहीं मिल रहा था। बहुत देर हो गई एक रिक्सेवाला चाय पी रहा था तो मैनें भांपकर कहा, " अरे भईया सांताक्रुज चलिहौ का"? तो वो तुरंत तैयार हो गया। रास्ते में बोला कि भई जाने वाला तो नहीं था लेकिन अपने आदमी हो तो चल दिया। और भी बातें होती रहीं जैसे कहाँ के हो? क्या करते हो? आदि।
उसकी बातों से मुझे भी सुकून मिल रहा था, वो भी मेरी थोड़ी सी सफलता पर काफी खुश था। अंत में बोला अरे भाई सब भईया आप के जैसे हों तो कोई कुछ नहीं कर कर पाए। सांताक्रूज आने पर मीटर देखा तो 24 रुपए हुए थे, तो मैंने 10-10 के तीन नोट (30 रुपए) दिए तो उसने 10 का एक नोट वापस कर दिया तो बो मैने कहा नही यार सब काट लो तो वो बोला क्या यार अपने ही आदमी से क्या कमा लेंगे? उसकी ये बात सुनकर बहुत गर्व महसूस हुआ। जब वो राम-राम कहकर (जब कि वो आजमगढ का मुस्लिम था) जाने लगा तो ऐसा लगा जैसे कोई अपना स्टेशन से छूट रहा हो। अब कुछ महीनों या एक साल से यह रिस्ते बनाने का सिलसिला कुछ कम हो गया है, फिर मुझे लगा कि शायद मैं एक सफेदपोस प्रवासी हो रहा हूँ। अब तो मेरे जैसे और भी बहुत इस शहर में मिल जाएंगे। जो मजदूर हैं। उन्हीं को प्रवासी बताकर धकियाया जाता है। यहाँ पर कई तरह के प्रवासी हैं। सबसे उपर गुजराती, फिर पैसे वाले मद्रासी, फिर मारवाड़ी, उसके बाद हम भईया लोगों के दो (मजदूर और कुछ पढ़े-लिखे) वर्ग. हम उ.प्र. और बिहार के प्रवासियों को तो तीसरे दर्जे का मान लिया जाता है। एलीट प्रवासी तो ठीक हैं, लेकिन दिक्कत हमी से है, राज ठाकरे कहते हैं, कि उत्तरभारतीयों की वजह से मुम्बई में सभी समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। शीला दीक्षित कहती हैं की दिल्ली प्रवासियों का बोझ नहीं सह पाएगी। मैने प्रवासी होने की कोई किताब नहीं पढी है, बस अपना दर्द लिख रहा हूँ। असल में प्रवासी होना एक आर्थिक प्रक्रिया है। जरूरत है. अगर ऐसा नहीं है कोई गुजराती या सरदार प्रवासियों से कुछ कहकर देखे फिर पता चल जाएगा, दूसरे दिन मुम्बई गरीब हो जाएगी। जरूरत हमारी भी है, वर्ना मुम्बई के अंदर और बाहर इतना रीयल स्टेट में सस्ता श्रम कैसे मिलता? फिर क्यों मराठी हमारे इंतजार में होटल, ढाबा, समोसा /वड़ा पाव और फोन (P.C.O.) लेकर खड़े रहते हैं।क्या हमारे प्रवासियों ने बोझ डाला है, और तथाकथित प्रवासी रुई के बने हुए हैं। हमारे कारण ही यहाँ का एक बड़ा बाजार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से टिका है. उसका विस्तार हुआ है। हमारे मजदूर प्रवासियों ने बोझ उठाया है, कभी किसी पर बोझ नहीं बने हैं। अगर हम नहीं होंगे तो आपको एक आदमी का लेवर (मजदूरी) खर्चा इतना देना पड़ेगा कि स्वयं ही वो कार्य करने की सोंचोगे। हमारे मजदूरों के बिना आपकी यहाँ की कोई भी टेक्नोलॉजी विकास नहीं कर सकती थी। हमारे वाचमैनों ने आपकी पुलिस के बराबर मुम्बई की सुरक्षा की है। आप यह भी नहीं कह सकते हैं कि हमें मुम्बई से प्यार नहीं है, आप गंदगी
फैलाते हो हम उसे साफ करते हैं। इस पर एक उर्दू शायर का शेर है...
" जाने क्या बात है तुझमें ऐ मुम्बई सलीस्तां
कि शामे अवध, सुबहो बनारस छोड़ आए"
" जाने क्या बात है तुझमें ऐ मुम्बई सलीस्तां
कि शामे अवध, सुबहो बनारस छोड़ आए"
उदारीकरण एक बेईमान आर्थिक अवधारणा है, पूरे देश में शहरों के आस-पास कंपनियाँ लगाई गईं लेकिन उत्तरप्रदेश और बिहार को कमजोर कानून व्यवस्था का बहाना बताकर अपेक्षित कर दिया, क्योंकि यहाँ से मोती रकम नहीं मिल पाई। आज भी प्लंबर के रूप में सूरत से लेकर पुणे तक उड़िया मजदूरों का कोई जवाब नहीं मिलेगा। ऐसे ही दिल्ली को भी बनाने में उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तराखंड के मजदूरों से पहले पंजाबियों ने सस्ते श्रम, पसीने और अकूत मेहनत का बलिदान दिया है। दिल्ली को हमारे मजदूरों ने ही एक सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान दिलाई है, लेकिन भजनपुरा, संगम विहार और अली गाँव की गालियों की सडन देखकर जी घिना जाता है। गैर-कानूनी प्रवासी के ठप्पे के साथ वोटर कार्ड तो बना लेकिन रासनकार्ड नहीं। हमारे प्रधानमंत्री पंजाब के होकर असम से सांसद हैं, जाने कितने मंत्री और अभिनेता हमारे उत्तर प्रदेश से लोकसभा गए लेकिन कभी रोते उत्तर प्रदेश के आंसू नहीं पोंछे. तो क्या वो सब प्रवासी नही हैं।
लेकिन प्रवासी शब्द को तो केवल मजदूर का ही पर्यायवाची बना दिया गया है। मुम्बई में बॉलीवुड से उत्तर भारतीय और बंगाली फिल्मी हस्तियाँ निकाल दो तो राखी सावंत और नाना पाटेकर के सिवाय बचेगा कौन? लेकिन याद नहीं क्या? वो सब सफेद कॉलर के प्रवासी हैं. प्रवासी का अर्थ मजदूर से क्यों लगाया जाता है। ग्लोब्ल प्रवास से क्यों नहीं. लोग दिल्ली / मुम्बई से जाकर बंगलोर और कानपुर में भी इंजीनियर बनते हैं. जब गुजरात और पंजाब से लोग नैरोबी और कनाडा में बसें तो एन. आर. आई. और जब हम अरब या मॉरिसस चले जाएँ तो मजदूर प्रवासी। प्रवासीकरण बाजार में क्यों नहीं हो सकता है, एक जगह की कार दूसरी जगह, पूरी टेक्नोलॉजी की दुनिया ही प्रवासी है। प्रवास रुकने पर एयरलाइंस का कारोबार ठप हो जाएगा। टेक्नोलॉजी के साथ-साथ श्रम का हस्तान्तरण भी हो सकता है, नहीं तो माजदूर के साथ-साथ टेक्नोलॉजी, हीरो-हीरोइन और बाजार उद्योग भी लौटा दो। हिन्दी से नफरत करते हो तो चेन्नई एक्सप्रेस स्थानीय भाषा में बनाकर 300 करोड़ कमा के दिखा दो?अगर हमारी हिन्दी नहीं होगी तो आप दूसरे प्रदेश के आदमी से कैसे बात करेंगे? क्या सबको अंग्रेज़ी आती है, और अगर आती है, तो आप राष्ट्र भाषा को इतना बेकार समझ रहे हैं कि वो एक विदेशी भाषा से बेकार है? अगर उत्तरप्रदेश /बिहार से नफरत है तो विदेशियों से कहना बंद करो कि ताजमहल हमारा है और अगर हमसे नफरत है तो भगवान राम और कृष्ण भी तो भईया थे, उन्हें पूजना बंद करो। श्री क्रष्ण से बड़ा प्रवासी कौन है? यू. पी. से जाकर द्वारिका (गुजरात) में बसे थे। जे. पी. लोहिया का नाम इतिहास से मिटा सकते हो?
जब हमें मुम्बई में सस्ता श्रमिक मानते हो तो इन्हीं सेठों के लड़के आई. आई. एम. (IIM)अहमदाबाद और मुम्बई आई. आई. टी. (IIT) से निकल कर अमेरिका और लन्दन की कम्पनियों में क्या समझे जाते हैं? तब नहीं मानोगे लेकिन वो भी वहां सस्ते श्रमिक ही हैं। बेजरूरत का प्रवास है यह, जहां ज्यादा पैसे वहीं चल दिए। कुल मिलकर हम प्रवासियों की वजह से ग्लोबल अर्थव्यवस्था में जान आई है, वर्ना कौन लेता ये महंगे फ्लैट जब यह बनते ही नहीं? झारखण्ड जैसे राज्य उजड़े हैं तब जाकर यहाँ उजाला हुआ है। हमें स्वीकार करना पड़ेगा। तब किसी ने भईया कहा था तो अच्छा लगा था, तो अब कोई कहता है तो बुरा और राजनैतिक लगता है। सब के सब प्रवासी हैं, नहीं हैं तो उनके बच्चे हो जाएंगे. क्यों नहीं कानून में हमें प्रवासी होने का भी मौलिक अधिकार मिलना चाहिए. ताकि किसी को भी प्रवासी होनें में शर्म ना आए। और जो कहे कि वह देखो मलेरिया लेकर आया है, तो उसे जेल में ठूँसा जा सके। जब से वे स्वयं कहीं और से आकर यहाँ जगह बना सकते हैं तो और कोई क्यों नहीं? दिल्ली गैंग रेप हुआ, जिसमें एक-दो आरोपी उ.प्र. और बिहार के थे, तुरंत कह दिया कि ये घटनाएँ बिहारियों की वजह से होती हैं. जबकि वो लड़की (निर्भया) भी उत्तरप्रदेश की थी, किसी ने नहीं कहा कि उत्तर प्रदेश की लड़कियों के साथ दिल्ली में गलत हो रहा है या वो दरिंदगी का शिकार बनाई जा रही हैं। इन्हें तो हर बात में राजनीति करनी है।
अतः किसी को भी प्रवासी होने में शर्म नहीं करनी चाहिए क्योंकि यह एक व्यापक जाल है, जब आदमी एक ज़िले से निकलकर दूसरी जगह जाता है तो भी प्रवासी होता है। और जो इसे रोके वो ग्लोबलाइजेसन को रोक दे। क्या मुम्बई और दिल्ली के लोग दूसरे शहरों में नहीं जा रहे हैं। प्रवासी होना एक आर्थिक, सामाजिक और निरंतर प्रक्रिया है। इसे कोई नहीं रोक सकता है, और जो प्रयास भी करे वो आसमान से धुंआ हटा रहा है। और ऐसा कार्य कोई स्वछ दिमाग वाला इंसान तो कर नहीं सकता है.
अतः किसी को भी प्रवासी होने में शर्म नहीं करनी चाहिए क्योंकि यह एक व्यापक जाल है, जब आदमी एक ज़िले से निकलकर दूसरी जगह जाता है तो भी प्रवासी होता है। और जो इसे रोके वो ग्लोबलाइजेसन को रोक दे। क्या मुम्बई और दिल्ली के लोग दूसरे शहरों में नहीं जा रहे हैं। प्रवासी होना एक आर्थिक, सामाजिक और निरंतर प्रक्रिया है। इसे कोई नहीं रोक सकता है, और जो प्रयास भी करे वो आसमान से धुंआ हटा रहा है। और ऐसा कार्य कोई स्वछ दिमाग वाला इंसान तो कर नहीं सकता है.
(Special Thanks to Ravish Kumar's Report on "दिल्ली में प्रवासी")
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