आज मेरे मन एक बड़ी ही व्यापक़ चर्चा में शामिल होने को कर रहा है। दो दिन पहले फ़ेसबुक पर सांकराअग्रहारम टाउनशिप (Sankara Agraharam Township) फिर उसी पर रवीश ने प्राइम टाइम भी कर दिया। इसकी वेबसाइट पर जाकर देखा तो पता चला कि इस सोसायटी (Society) में केवल ब्राम्हण लोग ही रह सकेंगे। देखकर अजीब लगा लेकिन गूगल (Google) करने पर पता चला कि भारत में यह कोई पहली बार नहीं हो रहा है। आपको दिल्ली, गुड़गाँव और नोएडा में इसी तरह से पत्रकारों के लिए मीडिया हॉउस, वकीलों और जजों के लिए विधिभवन या लॉ (Law) सोसायटी, पूर्वांचल सोसायटी या भोजपुरी सोसायटी और मुम्बई में गुजराती, मराठी और मुस्लिमों के लिए अलग-अलग सोसायटी मिल जाएंगी। गुजरात के लोग यहाँ मुम्बई आकर तो जाति को भूले लेकिन अहमदाबाद में 100 से अधिक दलितों के लिए अलग सोसायटी बनी हुई हैं। चेन्नई, हैदराबाद, और बंगलोर में भी तमिल, तेलगू और मलयालम भाषा के आधार पर सोसायटी मिल सकती हैं। यह तथाकथित सोसायटी बंगलोर में 120 एकड ट्रस्ट की जमीन पर बन रही है। इसमे ए2 ज़ेड सभी सुविधाएँ होना भी लाज़मी है। जैसा कि मैनें बताया क़ि इस सोसयटी में केवल ब्राम्हण ही रह सकेंगे, तो इसके जवाब में इस टाउनशिप के C.E.O. Dr. V.P. राव कहते हैं क़ि हमारा ब्राम्हण से तात्पर्य किसी जाति नहीं बल्कि सनातन विचारधारा से है। लेकिन मुझे लगता हैं कि उनका यह तर्क केवल सामाजिक और कानूनी बहस से बचने के लिए है। दरअसल जब हम इस प्रकार की चर्चा में शामिल होते हैं तो हमारे गाँव का एक सामाजिक स्वरूप सामने आ जाता है। सब अपनी-अपनी जातियों के साथ रहते थे, बल्कि अब भी रहते हैं. बमहनउटा, अहिराने, बढईन टोला, तिलियाने, चमरउधा या फिर मियाँ तोला आदि। और यह व्यवस्था देश के लगभग हर राज्य के गावों में होगी। अगर हम इसके गठन पर ज्यादा अधययन न भी करें और थोड़ा सा सोचें तो भी इसके कारण और उद्देश्य पता चल जाते हैं। इससे जाति प्रथा को बढ़ावा तो मिला लेकिन पिछड़ी जातियों को एकता, विकास और राजनैतिक कड भी मिला। शहरों में भी इसका असर खत्म नहीं हुआ है। मेरे अपने शहर कानपुर में ही कितने युवा छात्रों (जो किसी दलित या अति-पिछड़ी जाति के हैं) को अपनी जाति छुपाकर रहना पड़ता है, क्योंकि दलितों और पिछड़ों को कोई किराए पर कमरा या घर नहीं मिलता है। मध्यवर्गीय परिवारों में तो अब भी गाँव के जैसी ही प्रथा पर हर कार्य होता है। ऐसा ही पटना और दिल्ली में भी है। कोलकाता और चेन्नई का तो इतना आइडिया (Idea) नहीं हैं, लेकिन यहाँ भी जाति और भाषा का जबरजस्त प्रभाव देखने को मिलता है। मुम्बई में तो जाति से ज्यादा क्षेत्रियता का प्रभाव देखने को मिलता है। यहाँ मराठी, गुजराती, मारवाड़ी, उत्तर भारतीय (केवल U.P. & बिहार) और मुस्लिम समुदाय के आधार पर सोसायटी देखने को मिलेंगी। यहाँ उत्तर प्रदेश और बिहार का होने पर घर मिलना मुस्किल है, और उससे ज्यादा मुस्किल है मुस्लिम होने पर। अगर हम बात करें विदेशों की तो वहां भी BANA (Bramhin Association of North-America) और दलित समाज के संगठन, प्रवासी भारतीयों (N.R.I.) के द्वारा बनाए गए हैं। आस्ट्रिया में भी पंजाब की तरह दलितों के लिए अलग गुरुद्वारे बनाए गए हैं। और यह सभी संगठन अपने-अपने समुदायों को भारत में भी आर्थिक मदद करते हैं। कहने का अर्थ है कि आज विदेशों में जो लोग हैं, वो भारतीय शहरों से गए हैं, और जो शहरों में हैं, वो गावों के रहने वाले हैं। तो जो परम्परा और प्रथाएं हमारे समाज में हजारों साल से चली आ रही हैं, उन्हें वो भी पूरी तरह से भूल नहीं पाए हैं।
असल में इसी विचारधारा ने हमारे समाज को जाति और सम्प्रदाय का पांच भागों (ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य, सूद्र और अछूत) में बंटवारा भी किया था। यह ब्राम्हणवादी विचारधारा का ही नतीजा था। मनुस्मृति के जमाने से नियम और धर्म सब अपने हिसाब और सहूलियत से बनाए गए। उसी हिसाब से कर्मों का भी वर्गीकरण हुआ।
लेकिन यह भी मानना पड़ेगा कि शहरीकरण से इस व्यवस्था को कुछ नुकसान तो हुआ है। क्योंकि आज छोटे-छोटे शहरों में भी न जाने कितने दलितों ने होटल और दुकानें खोल ली हैं। उन सब जगहों पर बड़े-से-बड़ा ब्राम्हण खाता-पीता है, इतने बड़े बाजारीकरण में इन सब चीजों से बचना असंभव सी बात है। अगर कोई सरकारी अधिकारी दलित है, तो ठाकुर-पण्डित सब काम निकलवाने के लिए झुककर सलाम करते हैं।
आज भले ही राजनैतिक कारणों की वजह से सम्प्रदाय बचे हुए हैं, लेकिन इनमें से जाति तो कम-से-कम रह गई है। ऐसे में अगर बंगलोर जैसे बड़े शहर में जब कोई इस तरह से बात होती है तो कई तरह की आशंकाएँ और पूर्वाग्रह मन में आने लगते हैं। जैसे कि इस टाउनशिप में मल-मूत्र या सफाई का काम कौन करेगा? यहाँ पर नौकर कौन होगा? यहाँ के दफ्तरों में चपरासी का काम किस जाति का आदमी करेगा? क्या आप यह सब कार्य भी आप ब्रम्हणों से करवाएंगे? अगर नहीं तो आपकी इस सनातन धर्म की विचारधारा पर शक होता है। और अगर आप ऐसा करेंगे तो दरअसल यहाँ ब्राम्हणवाद का आर्थिक अर्थ भी निकाला जाना चाहिए। अन्यथा देश में सभी ब्राम्हण तो अरबपति नहीं हैं जो आपके फ्लैट खरीद सकेंगे? फिर तो आप के पास दिल्ली से यू. पी. वाया महाराष्ट्र, गुजरात तक लाईन लग जाएगी और आपके पास फ्लैट कम लग जाएंगे। कुछ बातें समझ पाया कुछ नहीं, मुद्दा बहुत बड़ा है इसपर व्यापक चर्चा होनी चाहिए।
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