Sunday, November 10, 2013

बेकसूर मुस्लिम युवा

हमारे देश में आतंकवाद एक बड़ी समस्या है, जिसे हमारा समाज एक खास नजर से देखने का आदी हो गया है। लेकिन क्या हमारा सरकारी तंत्र भी इसे हमारी ही नजर से देखता है? क्या वो इस समस्या से निपटने के लिए पर्याप्त तरीके रखता है, या फिर खानापूर्ति के लिए ही कुछ नवजवानों को पकडकर बंद कर देता है। आज मेरा प्रयास भी कुछ इसी तरफ प्रकाश डालने का है। क्योंकि मुझे इस विषय में जानकारी कम है, और कुछ पत्रिकाओं या पुराने अखबारों (नई दुनिया, तहलका, दि हिन्दू आदि) से पढकर विचार किया है, तो हो सकता है, क़ि कुछ बातें उनसे मिली हुई होंगी। नीचे दिए गए सभी उदाहरण तहलका से लिए गए हैं
कुछ दिन पहले ही हमारे देश के गृहमंत्री ने सभी राज्यों को चिट्ठी लिखी जिसमें कहा गया क़ि, " किसी भी राज्य में कोई भी अल्पसंख्यक (अल्पसंख्यक मतलब यहाँ पर मुस्लिम समुदाय से है) को बेगुनाह नहीं फंसाया जाए। पूरे देश में भाजपा और कई अन्य पार्टियों ने बहुत हो-हल्ला किया कि गृहमंत्री मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति क्यों कर रहे हैं। आखिर उनका यह निर्देश बेकार तो नहीं था, अभी 2009- सितंबर 2013 तक 57 मुस्लिम युवा बेकसूर निचली और उपरी अदालतों (District, Higher & Supreme Court) से छोड़े गए हैं, जो आतंकवाद के आरोप में कई सालों से सजा काट रहे थे। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस विषय पर पुलिस प्रसासन और सरकार को कई बार हिदायत दी है। हम मान रहे हैं कि भारत में ज्यादातर आतंकवादी एक विशेष समुदाय से पाए गए हैं, लेकिन उसी समुदाय से गलत लोगो को फंसाया भी गया है। क्यों कुछ गलत लोगों की वजह से सब को निशाना बनाया जाए। फिर इस प्रकार से तो ग्रहमंत्री ने कई बार नक्सल प्रभावित राज्यों को चिट्ठी लिखी है कि किसी भी बेकसूर आदिवासी को नहीं फंसाया जाए, और यह भी सब को पता है क़ि माओवादी या नक्सलवादी भी आदिवासी ही होते हैं। तो इसका मतलब यह नहीं है कि आप सब बेकसूर आदिवासियों को फसा देंगे। अभी कुछ दिन पहले ही मैं उत्तर प्रदेश गया तो कई कट्टरपंथी लोग अखिलेश को अखिलेशुददीन कहने लगे हैं, वजह पूछने पर कहते हैं कि अखिलेश ने मुस्लिम आतंकवादियों को छोड़ने की बात क्यों कर दी? तो क्या उन्हें यह नहीं पता है कि 2009 में मायावती सरकार ने एक निमेश आयोग बनाया था, जिसमें गलत मुस्लिम युवाओं को फँसाए गए मामलों की जांच करने की बात कही गई थी। और यह जांच 2012 में पूरी भी हो गई थी। उसी रिपोर्ट के आधार पर अखिलेश यादव ने यह बात की थी। 
पहली उदाहरण मैं 2006 में हुए मालेगांव विस्फोट का पेश करना चाहता हूँ, जिसमें ब्लास्ट के तुरंत बाद करीब 20 मुस्लिम नवनवानों को महाराष्ट्र ए. टी. एस. (ATS) ने पकड लिया गया और बाद में राष्‍ट्रीय जांच आयोग (NIA) नें जांच में पाया कि इस ब्लास्ट में हिन्दुत्वादी संगठनों के लोग (कर्नल पुरोहित, साध्वी प्र ज्ञानी और बजरंग दल के कई कार्यकर्ता) आरोपी पाए गए। जांच के बाद कई निर्दोष मुस्लिमों को छोड़ा भी गया और कई अभी तक जेल में हैं
मई 2008 में जयपुर में बम ब्लास्ट हुआ था, एक विशेष जांच दल ने इसकी जांच शुरु की और 14 लोगो को गिरफ्तार कर लिया। दिसंबर 2012 में अदालत ने 14 लोगों को दोषमुक्त कर छोड़ दिया। अब सवाल यह उठता है कि असली गुनाहगार कौन है? और पुलिस उन्हें क्यों नहीं पकड पाई? क्या पुलिस ने अपनी गर्दन बचाने के लिए निर्दोष लोगों को पकड़ा? पुलिस के अनुसार ये सब प्रतिबंधित संगठन सिमी SIMI (Islamic Students Movement in India) के सदस्य थे। अगर वो इस संगठन के सदस्य थे भी तो उनका कौन सा गुनाह था, 2007 में मार्कण्डेय काटजू साहब ने जज रहते हुए एक फैसले में कहा था, "कि किसी भी प्रतिबंधित संगठन का सदस्य होना गुनाह नहीं है, उस पर तब तक कार्यवाही नहीं की जा सकती जब तक वह किसी गैरकानूनी गतिविधि में लिप्त नहीं पाया जाए"। सुप्रीम कोर्ट ने और भी कई बार ऐसी टिप्पणी की है, 2004 में कोर्ट ने संघ का उदाहरण देते हुए कहा था, कि क्या संघ के प्रतिबंध के समय उसके कार्यकर्ता गिरफ्तार हुए थे?
अब आते हैं अपनी मूल बात पर इसी प्रकरण में 28 वर्षीय अनमुल्ला ने अपनी जवानी के 3 साल जेल में बीता दिए, हालांकि बाद में उसे न्याय मिला लेकिन जेल में रहने के दौरान उसकी सजा और प्रताडना का जिम्मेदार कौन होगा? आतंकवादी होने का धब्बा उसके उपर लगा है, वो समाज में कैसे रह रहा होगा, सोचा है किसी ने? उस समय राजस्थान में भाजपा की सरकार थी
। वो कहती है कि जांच के समय तो कांग्रेस की सरकार थी, और केन्द्र में भी कांग्रेस का शासन था, तो जिम्मेदारी उसी की है। कांग्रेस कहती है कि हमने भाजपा की गलती पर न्याय दिलाया है। आखिर न्याय में इतनी देर क्यों हुई? इतने सालों की सजा की जिम्मेदारी कौन लेगा? इसके कई गवाह कहते हैं कि उन्हें पुलिस ने जबरजस्ती बयान दिलाया था। एक गवाह गिरिराज कहता है कि मैने 20-25 लोगो की बैठक में सिमी की आतंकी गतिविधि की बाते सुनी थी। पुलिस ने सबूत के रूप में 4 सी. डी. भी पेश की थी, जबकि पुलिस आयुक्त से जज ने पूछा कि इस सी. डी. में क्या है, तो उसका जवाब था, क़ि मैनें कभी सी. डी. चलकर नहीं देखी। इसी तरह कुछ उर्दू पत्रिकाएँ भी पेश की गईं जब कि जांच अधिकारी को उर्दू पढ़ना नहीं आता था। अदालत में चार्जसीट गलत पाई गई और सबूतों मे कुछ गलत नहीं पाया गया। सब गवाह पलट गए। और वो बरी हो गए
हमारे समाज में इतनी नफरत फैल चुकी है कि कोई वकील इनका केश लड़ने को भी तैयार नहीं होता है, इसी तरह की एक और घटना अहमदाबाद (गुजरात) की है
। वहां की एक स्थानीय मस्जिद में मौलाना हकीम ने 25 जुलाई 2008 (शुक्रवार) को नमाज़ पढ़ाई और ख़ुतबा (धर्मोपदेश) में पढ़ा कि" अगर तुम्हारा पड़ोसी भूखा है तो तुम अपना पेट नहीं भर सकते हो, वह किसी भी धर्म का हो, वह भी हमारी तरह इंसान है"। लगभग 24 घंटे बाद 53 लोगों की मौत का कारण बने अहमदाबाद धमाकों के कुछ मिनट बाद ही पुलिस ने हलीम को गिरफ्तार किया और जनता के बीच जमकर पीटा। उसकी दाढी तक उखड ली। उन्हें 8 दिन की पुलिस हिरासत में भेजा गया। गुजरात की मोदी सरकार के वकील ने मजिस्ट्रेट को बताया कि हलीम सिमी का सदस्य है, और पिछले कई सालों से फरार चल रहा है। यह 2002 के दंगों का बदला लेने के लिए गुजरात से मुस्लिम लड़कों को आतंकी ट्रेनिंग के लिए उत्तर प्रदेश के आजमगढ भेजता है. इनके निशाने पर मोदी और आडवाणी सहित कई बड़े नेता हैं
जबकि यह भी पता चला क़ि हलीम फरार नहीं था और कई वर्षों से अपने घर में ही रहता था
। उसके परिवार ने अदालत को गुजराती में लिखी हुई हलीम के नाम लिखी एक चिट्ठी दिखाई जो उसके घर से एक किलोमीटर दूर स्थित थाने से आई थी उसमें लिखा था, "मरकज अहले-हदीस (इस्लामी पंथ) ट्रस्ट का दफ्तर खुला है, जिसके आप सदस्य हैं। आपको निर्देश है कि सभी सदस्यों के दस्तावेज थाने में जमा करा दिए जाएँ। 28 जून 2008 को Unity & Peace Forum (जिसके सदस्य हिन्दू और मुस्लिम दोनो समुदाय के लोग हैं) नाम के एक संगठन ने बैठक के लिए लाउडस्पीकर प्रयोग की इजाजत के लिए पत्र लिखा था, जिसके मुख्य वक्ता हलीम होंगे। 27 वर्षीय एहसान-उल-हक तो अपना "निकाहनामा" भी दिखते हैं जिसपर मौलाना हलीम के हस्ताक्षर मौजूद हैं। तो अब आप ही सोचिए क़ि वो गायब कैसे चल रहे थे। 43 वर्षीय हलीम उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखते हैं और अहले-हदीस (पैगंबर मोहम्मद का इस्लामी पंथ, जिसे सुन्नी समुदाय विरोधी मानता है.) के प्रचारक हैं. पुलिस तो अहले-हदीस को भी लस्कर की साखा बता रही थी। जबकि इसकी एक गोष्ठी में दिल्ली में गृहमंत्री शिवराज सिंह पाटिल भी सामिल हुए थे।  हालांकि हलीम को 24 घंटे बाद ही मजिस्ट्रेट ने छोड़ने का आदेश भी दे दिया
अब यह बात किसी को गिरफ्तार कर छोड़ने की नहीं है आखिर क्यों हमारी पुलिस एक घंटे के भीतर ही मुस्लिम समुदाय के कुछ निर्दोष लोगों को पकडकर बंद कर देती है? क्यों सही अपराधी को पकड़ नहीं पाते है? क्या यह मानवाधिकार का हनन नहीं है? हमारा इलेक्ट्रानिक मीडिया तो इस पर बहुत संवेदनहीन हो गया है एक घंटे के भीतर ही एक समुदाय विशेष को निशाना बनाने लगता है। 15.05.2013 को बंगलोर में भाजपा दफ्तर के बाहर ब्लास्ट हुआ तो सब टी. वी. चैनलों ने इंडियन मुजाहिद्दीन को लेकर एक डाक्यूमेंट्री दिखानी शुरुकर दी। बाद में जांच में पता चला कि धमाके के आरोपी का प्रयोग किया हुआ सिम कार्ड 2 महीने पहले तक  RSS के एक कार्यकर्ता के पास था, और उसके खोने की रिपोर्ट लिखाई गई थी। उसके आरोपियों मे एक अरोपी  तो कर्नाटक के हिन्दू वादी संगठन श्री राम संगठन का सदस्य था. अब क्या ये टी. वी. वाले मुस्लिम समुदाय से माफी मांगेगे? मैं कहता हूँ कि आप भटकल को पकड़ कर फांसी दे दो? किसी भी आतंकवादी को पकड़ो और उसकी न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर सजा दो, फिर उसे जो सजा मिले सब को मंजूर है. किसी भी समुदाय का हो हमें मंजूर होगा, लेकिन बेगुनाहों को पकडना आप कब बंद करेंगे?
हमारा समाज आतंकवाद को किसी धर्म से जोड़कर देखना कब बंद करेगा? कब तक आप यह सवाल करते रहेंगे "हर एक मुस्लिम आतंकवादी नहीं होता है लेकिन हर एक आतांकवादी मुस्लिम क्यों होता है?" आपको नहीं पता क्या कि भारत में सबसे पहले आतंकवाद की शुरुआत खालिस्तान (पंजाब) में किसने की थी? क्या आपको नहीं पता कि इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी की हत्या किस आतंकवाद से हुई थी? क्या आपने कभी लिट्टे संगठन का नाम सुना है? क्या आपको पता है कि माओवादी मुस्लिम नहीं होते हैं? क्या आपको पता है कि मालेगांव, समझौता एक्सप्रेस, मक्का मस्जिद ब्लास्ट किसने किए थे? सब बातों पर जानकारी और चर्चा करो बाद में सब मुस्लिमों पर अंगुली उठाओ, फिर भी यह याद रखना कि आपकी अपनी तीन अंगुलियाँ आपकी ओर उठी होंगी। और जिस दिन से आप यह काम बंद कर देंगे उसी दिन से कोई भी मुस्लिम युवा किसी विदेशी ताकत के प्रभाव या बहकावे में आना बंद कर देगा। 
इस बात पर देश के युवा शायर इमरान प्रतापगाढ़ी का एक शेर अर्ज़ किया है...
मेरे हिस्से में दुनिया का गम लिख दिया
 नाम पर मेरे सारे सितम लिख दिया। 
चाहने वालों पर इस कदर ज्यादती। 
इक पटाका भी फोड़ा तो बम लिख दिया। 
तुमको जितनी मुहब्बत है इस मुल्क से। 
उससे ज्यादा कहीं मैं वफादार हूँ। 
तुम कहते हो मैं गद्दार हूँ। ।

 

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