Thursday, November 14, 2013

बाल दिवस (सामाजिक असमानता)

आज तो देश में बहुत सारी खुशियाँ एक साथ आ गई हैं, मुहर्रम, सचिन का अखिरी टेस्ट मैच और बाल दिवस की भी आप सब को बधाईयां। सब अपने-अपने बचपन में लौटना चाहते हैं, लेकिन कुछ ऐसे बच्चे हैं जो अपना बचपन ही नहीं जी पाते हैं
 कुछ बच्चे तो आज स्कूलों में बड़ी-बड़ी पार्टियों में शामिल होते हैं, उनके टीचर उन्हें गिफ्ट देते हैं, और कुछ हैं, जो अपने पेट के लिए संघर्ष करते हैं, जब वो बड़े हो जाते हैं तो अपना बचपन याद नहीं करना चाहते हैं।
कभी-कभी हम भी अपनी खुशियों को ही पूरे संसार की खुशी समझ लेते हैं। जब कि हकीकत में 34% बच्चे हमारे देश में कुपोषित हैं, और यह सब केवल छत्तीसगढ़ और बुंदेलखंड में ही नहीं हमारे मुम्बई-दिल्ली जैसे शहरों में भी होते हैं। आपको रोज हीं यहाँ पर सिग्नल पर, स्टेशन पर, ब्रिज पर भीख मांगते हुए मिल जाएंगे।
समाज में कुछ बच्चे ऐसे हैं जिन्हे माँ-बाप उनकी गर्मी की छुट्टियों के लिए लाखों खर्च कर देते हैं, एक-एक D.P.S. और कान्वेंट जैसे संस्थानों में एक महीने की फीस 25-25 हजार होती है, और कुछ जगहें ऐसी होती हैं जहां बच्चे सरकार  के शिक्षा के अधिकार पर ही निर्भर हैं, वो भी शिक्षा के लिए कम दोपहर के मिड-डे मील भोजन के लिए ज्यादा। मेरी बात उन लोगों को बुरी लग सकती है जिनके बच्चे महंगे स्कूलों में पढ़ते हैं, लेकिन मैं आपके बच्चे या आपसे ईर्ष्याग्रत नहीं हूँ, बस देश के सामाजिक और सरकारी तंत्र पर सवाल उठा रहा हूँ।
यूरोप और अमेरिका में बहुत से ऐसे देश हैं जहां पर चपरासी और राष्ट्रपति के लड़के एक ही जगह पर पढ़ते हैं, ट्यूशन या कोचिंग की कोई व्यवस्था ही नहीं है. लेकिन यह बात सामंतवादी विचारधरावी लोगों को खराब लग सकती है, अगर आपको भी खराब लगे तो बुरा मत मानिए, ये एक सच्चाई है। इस व्यवस्था से समाज में एक समानता आती है। सबको बराबर मौके मिलते हैं, लेकिन हमारे देश में पहले तो ब्राह्मण शिक्षकों ने दलित और पिछड़ों को पढ़ाना ही पाप समझा उसके बाद जब बाबा साहब अम्बेडकर और लोहिया साहब जैसे लोगों के प्रयास सफल हुए तो उनके साथ भेद-भाव होता रहा।
यह तो हो गई शिक्षा व्यवस्था की बात. अब हम बात करते हैं हमारे समाज में बच्चों से छिनता उनका बचपन. आपने अगर यह तस्वीरें केवल कम्प्यूटर पर ही देखी हैं तो शायद आपको इसे देखने में घिन भी लगेगा। लेकिन हमारे देश की सच्चाई यही है। मैने कोई इस विषय पर रिपोर्टिंग नहीं की है, केवल रोड से निकलते हुए देखने वाली चीजें ही बता रहा हूँ। अगर ऐसा नहीं है तो आपको किसी बच्चे को 1-2 रुपए देकर भी क्यों शान्ति या शुकून मिलता है।

आज जिस नेहरू जी का जन्मदिन है, उन्ही के फालोवर इन बच्चों की अनदेखी कर रहे हैं। सभी माँ-बाप आपके जैसे पैसेवाले और शिक्षित या समझदार नहीं होते और सब बच्चे आपके बच्चों की तरह भाग्यशाली नहीं। उन बच्चों से पूछों जो दिनभर अपने माँ-बाप के साथ खेतों में मजदूरी करते हैं, किसी के बाप नहीं है, किसी का है तो नासेबाज है, उसे अपने उसके लिए भी कमाना पड़ता है। उन बच्चों से जाकर पूछों जो बुंदेलखण्ड और छत्तीसगढ जैसी जगहों पर रहते हैं, उन्हें अगर एक बार का भोजन ही मिल जाए तो बड़ी बात होती है। कानून बनने के इतने साल बाद भी इनके माँ-बाप मजबूर हैं इनसे मजदूरी कराने के लिए। उन प्रवासियों से पूछों जो आपके जैसे फ्लैट और बिल्डिंग में काम करते हैं, वो चार दिन यहाँ-तो चार दिन व़हाँ। कैसे सुविधाएँ दें वो अपने बच्चों को जब खुद ही मर रहे हैं. किस स्कूल में भेजे। और अब तो इंगलिस मीडियम वालों से भी डर गए हैं। सरकारी शिक्षक यह सोंचते हैं कि अगर बच्चों को ज्यादा पढ़ा दिया तो इनमें और मेरे अपने बच्चों में क्या अंतर रहेगा जो मंहगे स्कूलों में जाते हैं. इसी डर से गरीब अभिभावक और अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते हैं।

आज आप सफर करने घर से निकलेंगे नहीं कि कितने बच्चे आपको रास्ते में कोई ट्रॅन में चाय-गुटका बेचते या भीख मांगते हुए मिल जाएंगे। आपको यह सब देखकर कभी-कभी बुरा भी लगता है लेकिन यह सोचकर चुप बैठ जाते हैं कि मेरे करने से ही कितना हो जाएगा। यह सब एक सामाजिक संरचना है। लेकिन अगर यही बात मदर टेरेसा ने सोची होती तो क्या उन्हें नोबल पुरस्कार मिलता। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि आपके 100-200 रुपए देने से कुछ हो जाएगा। लेकिन आपको अपने घर-आफिस-कारखानों-दुकानों और खेतों में उनसे काम नहीं कराना चाहिए।


 उन्हें या उनके माँ-बाप को समझा कर ही मदद कर देनी चाहिए। कहीं भी उन्हें काम करते देखें तो उसपर आवाज उठाने की कोशिश करिए, लेकिन आप सोंचते होंगे कि इतना समय किसके पास है तो, अगर सिकायत की भी तो पुलिस या अधिकारी पैसे ले-देकर सब खत्म कर देंगे, लेकिन आप यह भी सोचिए कि अगर आप अपने ये छोटे-छोटे कर्तव्य पूरे नहीं कर पाए तो आपके अंदर एक समाजवाद (किसी पार्टी का नाम नहीं) विरोधी मानसिकता बैठी हुई है। भले ही समाज धीरे-धीरे बदलना शुरु हो गया है, आज गरीबों और मजदूरों के बच्चे भी I.A.S., P.C.S. I.I.T. &UPSC पास कर रहे हैं।
चर्चा बहुत व्यापक है, हम जैसे लोग नहीं उठाएंगे तो कौन उठाएगा? लेकिन हमारे समाज की एक और सच्चाई है कि हम जैसों को इसी गरीबी से निकला और निम्न स्तर का समझ लेते हैं। जबकिं अपनी सोच पर शर्म नहीं आती है। आखिर वो भी बच्चे हैं उन्हें अगर माँ-बाप का प्यार नहीं मिला तो क्या हुआ, हम प्यार नही मदद तो दे ही सकते हैं। क्यों कि इससे हमारे देश की बहुत सारी समस्याएं (गरीबी, कुपोषण, बेरोजगारी और अपराध) हल हो जाती हैं।
बकौल राजेश रेड्डी..
"यहाँ हर शख्स, हर पल हादसा होने से डरता है ,
खिलौना है जो मिटटी का फ़ना होने से डरता है ,
मेरे दिल के किसी कोने में, एक मासूम सा बच्चा ,
बड़ों की देख कर दुनिया, बड़ा होने से डरता है.......!


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