पिछले 7-8 महीने से सोसल मीडिया
और सिविल
सोसाइटी में
एक चर्चा
बहुत जोरो
पर है,
"अगला प्रधानमंत्री कौन होगा? क्या मोदी प्रधानमंत्री बनेगे? " अब
तो सोसल
मीडिया पर
इसके लिए
एक वार(युद्ध) भी
शुरु हो
गया है।
एक दिन
दिन फ़ेसबुक
पर मैंने
एक प्रश्न
डाला कि,"क्या आप
मोदी को
प्रधानमंत्री बनाना चाहते है"? तो
99% उत्तर "हाँ" में आ गए।
गाँव गया
था तो
कुछ मित्रों
से भी
इसी विषय
पर चर्चा
होने लगी,
मुझे छोड़
कर सब
मोदी के
प्रसंसक थे।
मुम्बई यूनीवर्सिटी
की लाइब्रेरी
में पहुच गया
तो 5-6 लोग
टेबल पर
बैठे थे,
सब में
चर्चा हो
रही थी।
सब मोदी
के पक्ष
में थे.
इस तरह
से मुझे
लगा की
उत्तर प्रदेश
से लेकर
महाराष्ट्र तक मोदी की लहर
चल रही
है। जैसा
कि आपको
बताया कि
जिस-जिससे
मैं मिला
उनमें 90% वोट मोदी के थे.
जब किसी
से टी.
वी के
सर्वे बताओ
तो कि
160-180 सीटें मिल रही हैं तो
समर्थक कहते
हैं कि
या तो
सर्वे गलत
होगा या
फिर सब
मीडिया कांग्रेस
से बिका
हुआ है।
मुझे थोड़ा
सा डर
लगा। फिर
आराम से
रात को
बहुत सोंचा
तब याद
आया कि
यार मोदी
(भाजपा) को
पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत में
तो शून्य
ही मिलता
है. मैने
यह नहीं
बताया कि
मुझे कोई
मुस्लिम नहीं
मिला, कोई
दलित नहीं
मिला, कोई
यादव नहीं
मिला, कोई
ईसाई नहीं
मिला, कोई
संघ का
शिकार अल्पसंख्यक
नहीं मिला,
कोई आदिवासी
नहीं मिला,
कोई गरीब
नहीं था,
कोई गरीब
नहीं मिला,
कोई मजदूर
नहीं मिला,
कोई किसान
नहीं मिला
और कोई
मेरे जैसा
प्रवासी नहीं
था। वो
सब पढ़े-लिखे, उच्च
जाति के
हिन्दू थे।
उनको मोदी
के रूप
में मसीहा
दिखाई देता
है। उन्हे
सोसल मीडिया
पर अर्मत्य
सेन के
खिलाफ होने वाली तानाशाही नहीं दिखती
है। उन्हें
मोदी का
शाहज़ादा और
दिल्ली की
सल्तनत का
कहने का
अर्थ(सहजादा
मतलब मोदी गाँधी परिवार को मुस्लिम मानते हैं, और दिल्ली की सल्तनत पर अब तक मुग़लों का कब्जा समझ रहे हैं) नहीं
समझ में
आता है।
उन्हें चुन-चुनकर साफ
करना है,
कहने में
लोकतंत्र को
खतरा नहीं
दिखता।
दरअसल आज
मोदी के
साथ में
कौन लोग
हैं? तो
हम उन्हे
कई वर्गों
में विभाजित
कर सकते
हैं।
1- इस श्रेणी में वो लोग आते हैं जो पूरी तरह से सम्प्रदायिक हैं. इनमें से ज्यादातर भाजपा, संघ या अन्य हिन्दुत्ववादी संगठनों के कार्यकर्ता भी हैं। इन्हे लगता है कि ईसाई और मुस्लिमों के पूर्वजों ने देश पर शासन किया है, तो अब इनसे बदला लेना है। ये लोग हमेशा से मुस्लिम विरोधी रहे हैं और इन्हें फूटी आंख भी देखना पसंद नहीं करते हैं। अब तो इन लोगों को मोदी के रूप में अपना लीडर(नरसंहारक) मिल गया है। यह वर्ग भाजपा का परंपरिक वोट बैंक है।
1- इस श्रेणी में वो लोग आते हैं जो पूरी तरह से सम्प्रदायिक हैं. इनमें से ज्यादातर भाजपा, संघ या अन्य हिन्दुत्ववादी संगठनों के कार्यकर्ता भी हैं। इन्हे लगता है कि ईसाई और मुस्लिमों के पूर्वजों ने देश पर शासन किया है, तो अब इनसे बदला लेना है। ये लोग हमेशा से मुस्लिम विरोधी रहे हैं और इन्हें फूटी आंख भी देखना पसंद नहीं करते हैं। अब तो इन लोगों को मोदी के रूप में अपना लीडर(नरसंहारक) मिल गया है। यह वर्ग भाजपा का परंपरिक वोट बैंक है।
2- दूसरे तबके के लोग पूरी
तरह से
साम्प्रदायिक नहीं हैं लेकिन ये
सेकुलर भी
नहीं हैं।
इन्हें यह
लगता है
कि मुस्लिम
देश में
ना रहें,
लेकिन जो
लोग शान्तिप्रिय
या बड़े
कलाकार (आमिर,
सलमान या
अब्दुल कलाम)
देश में
रह सकते
हैं। कभी
यह वर्ग
कांग्रेस का
वोट बैंक
रह चुका
है, लेकिन
इसे अब
इंदिरा गाँधी
या राजीव
गाँधी के
जमाने वाली
कांग्रेस नहीं
नजर आती
है। इसे
मंहगाई, भ्रष्टाचार
के साथ
कांग्रेस का
मुस्लिम प्रेम(सेकुलरिज्म) भी
बुरा लगता
है। अब
इन्हें सत्ता
परिवर्तन की जरूरत महसूस हो रही है रही
है, जो
मोदी कर
सकते हैं।
3- तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण तबका
है, युवा
वर्ग. जिसे
राजनीति का
ज्ञान उपर्युक्त
लोगों से
कम है।
इस वर्ग
ने इतिहास
नहीं देखा
है, और
पढने के
लिए उसे
अपनी साइंस
और इंजीनियरिंग
की किताबों
से मौका
नहीं मिलता
है। इसने
ना 1977-79 तक की जनता पार्टी
की सरकार
देखी है
और ना
ही 1998-2004 तब एन. डी. ए.
की सरकार
देखी है।
उसने महंगाई
देखी है,
भ्रष्टाचार देखा है, बेरोजगारी और
चीन का
डर देखा
है। इसने
पाकिस्तान का आतंकवाद देखा है।
इसने एक
कमजोर प्रधानमंत्री
देखा है।
इस वर्ग
को सभी
समस्याओं का
रामबाण नरेन्द्र
मोदी में
नजर आता
है। इसे
सेकुलरिज्म कोई मुद्दा ही नहीं
लगता है। इन्हें
मोदी के
कुर्ते पर
2002 के दाग
नहीं दिखते
हैं।
इनमें से दूसरे और तीसरे तबके के लोग कट्टरपंथी तो नहीं हैं लेकिन मोदी को सांप्रदायिक (Communal) इसलिए नहीं मानते हैं क्योंकि किसी कोर्ट ने आज तक उन्हें सजा नहीं दी। इन्हें भारत की आदलत के बाहर सबूत मिटाने और जांच की हकीकत नहीं मालूम है। खासकर युवा वर्ग ने तो कभी इन चीजों का सामना हीं नहीं किया है। उसने दंगों में अपनों को नहीं खोया है, यह युवा वर्ग इतना कोरा है, कि फ़ेसबुक पर मोदी सेना का हर पोस्ट द्रवित कर देता है। मुजफ़्फ़र नगर दंगों में सोसल मीडिया का दुरुपयोग खासकर इसी वर्ग के साथ हुआ था। किसी ने लिख दिया दंगे के दौरान पुलिस को 15 हिन्दू शव गंगा में मिले तो ये युवा गूगल पर यह भी नहीं देखेगा की गंगा मुजफ़्फ़र नगर में हैं या नही तुरंत शेयर, लाइक, कमेन्ट कर देगा।
इनमें से दूसरे और तीसरे तबके के लोग कट्टरपंथी तो नहीं हैं लेकिन मोदी को सांप्रदायिक (Communal) इसलिए नहीं मानते हैं क्योंकि किसी कोर्ट ने आज तक उन्हें सजा नहीं दी। इन्हें भारत की आदलत के बाहर सबूत मिटाने और जांच की हकीकत नहीं मालूम है। खासकर युवा वर्ग ने तो कभी इन चीजों का सामना हीं नहीं किया है। उसने दंगों में अपनों को नहीं खोया है, यह युवा वर्ग इतना कोरा है, कि फ़ेसबुक पर मोदी सेना का हर पोस्ट द्रवित कर देता है। मुजफ़्फ़र नगर दंगों में सोसल मीडिया का दुरुपयोग खासकर इसी वर्ग के साथ हुआ था। किसी ने लिख दिया दंगे के दौरान पुलिस को 15 हिन्दू शव गंगा में मिले तो ये युवा गूगल पर यह भी नहीं देखेगा की गंगा मुजफ़्फ़र नगर में हैं या नही तुरंत शेयर, लाइक, कमेन्ट कर देगा।
इन्हें लगता है, कि अगर
मोदी हिन्दू
हित में
सोंच रहे
हैं तो
अच्छा ही
होगा, उन्हें
लगता है
दंगे होंगे
तो मैं
सुरक्षित रहूँगा। सेकुलर होना एक मुस्किल कार्य है, लोगो के बीच टेक्निकल रूप से तो सेकुलर हो सकते हो, लेकिन उनके हिन्दू पक्ष वाली बात का जवाब देना कठिन होता है।
अब बात करते हैं राजनैतिक हालात की तो इसे हम सबसे बड़े राजनैतिक खेत उत्तर प्रदेश में दो वर्ग मान सकते हैं, जिनपर मुलायम सिंह और मायावती की पैठ है। आदिवासी छत्तीसगढ और मध्यप्रदेश के अलावा वामपंथियों का अधिकार है। पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत में मोदी को मैं दस से अधिक सीटें नहीं दूंगा। जहां इनकी लहर है, व़हाँ उत्तर और पश्चिम में भी भाजपा 170-200 सीटों पर ही मजबूती से लड़ने लायक है। क्योंकि व़हाँ भी हिन्दुओं का एक सेकुलर और बुद्धिजीवी तबका है, जो छोटे-छोटे अल्पसंख्यक समुदायों से मिलकर बना है। भाजपा ने प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी को उम्मीदवार बनाकर एक बात तो तय कर दी है, कि अब वो ठंडे बस्ते में रखे अपने हिन्दुत्व के एजेंडे को और नहीं रोक सकती है। अगर यह बात है तो भाजपा को यह याद रखना होगा कि आज की लहर से ज्यादा तो 90 के दशक में लौह पुरुष(आडवाणी) की लहर थी।
अब बात करते हैं राजनैतिक हालात की तो इसे हम सबसे बड़े राजनैतिक खेत उत्तर प्रदेश में दो वर्ग मान सकते हैं, जिनपर मुलायम सिंह और मायावती की पैठ है। आदिवासी छत्तीसगढ और मध्यप्रदेश के अलावा वामपंथियों का अधिकार है। पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत में मोदी को मैं दस से अधिक सीटें नहीं दूंगा। जहां इनकी लहर है, व़हाँ उत्तर और पश्चिम में भी भाजपा 170-200 सीटों पर ही मजबूती से लड़ने लायक है। क्योंकि व़हाँ भी हिन्दुओं का एक सेकुलर और बुद्धिजीवी तबका है, जो छोटे-छोटे अल्पसंख्यक समुदायों से मिलकर बना है। भाजपा ने प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी को उम्मीदवार बनाकर एक बात तो तय कर दी है, कि अब वो ठंडे बस्ते में रखे अपने हिन्दुत्व के एजेंडे को और नहीं रोक सकती है। अगर यह बात है तो भाजपा को यह याद रखना होगा कि आज की लहर से ज्यादा तो 90 के दशक में लौह पुरुष(आडवाणी) की लहर थी।
आडवाणी वो हीरो थे, जो भाजपा को 02 से 180+ सीटों तक लेकर गए थे, फिर भी इस देश की जनता ने दिखा दिया कि गरीब को रोटी, कपड़ा और मकान पहले चाहिए, बाद में मंदिर-मस्जिद।
हर जगह अलग-अलग सामाजिक, आर्थिक और स्थानीय परिस्थितियाँ होती हैं। मेरे गाँव के आस-पास ही 2-3 लोकसभा सीटों पर यादव (मुलायम), दलित(मायावती) और अन्य पिछड़ा वर्ग गैर-यादव दोनो में जाते हैं, भाजपा के लिए केवल ब्राम्हण वोट ही बचता है, उसमें मे भी बसपा ने हर सामान्य सीट से ब्राम्हण प्रत्याशी उतार दिया है. मोदी को 70% लोग जानते ही नहीं हैं, एक दिन नरेगा के मजदूर कार्य करने जा रहे थे, मैं अखबार पढ रहा था, तो एक ने पूछा क्या खबर है, तो मैंने बताया 19 को कानपुर में मोदी आ रहे हैं, क्योंकि मैं क्रिकेट का सौकीन हूँ इस लिएतो बोला यो कउन आए, का मैच ख्यालती रहाय?
जब 1998 में भाजपा को 180 के आस-पास सीटें मिली थी तो आडवाणी ने स्वयं अटल बिहारी बाजपेई जी का नाम आगे किया था। आज जब भाजपा अपने हिन्दुत्व कार्ड को जिस तरह से उत्तरप्रदेश और बिहार में शुरु कर चुकी है, उससे लग रहा है, कि उसने साईनिंग गुजरात का नारा कैग और रघुराम रजन कमेटी की रिपोर्ट के बाद भुला दिया है। जबकि उसके पास इस समय कोई अटल जैसे कद्दावर सर्वसम्मानित नेता भी मौजूद नहीं है. मोदी या भाजपा के लिए सबसे बड़ी तो चुनौती सेकुलर क्षेत्रीय दल हैं, जो मोदी को रोंकने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। अभी दिल्ली में गैर-कांग्रेस एन्टी-भाजपा दलों की बैठक हुई, सबके बीच में सिर्फ यही चर्चा मुख्य रही। इन 17 दलों में से कई तो पहले भाजपा के साथ रह चुके हैं, लेकिन आप को याद नहीं तब अटल जी थे। आज मोदी रैलियों भीड़ भले ही कितनी इकट्ठा कर लें, लेकिन वो एक मंच से पूरे देश को संबोधित नहीं कर सकते हैं, जैसा उस गैर-सोसल मीडिया के जमाने में इंदिरा, जेपी या नेहरू करते थे। उनकी आवाज केवल नागपुर और दिल्ली के बीच रह जाती है।
हर जगह अलग-अलग सामाजिक, आर्थिक और स्थानीय परिस्थितियाँ होती हैं। मेरे गाँव के आस-पास ही 2-3 लोकसभा सीटों पर यादव (मुलायम), दलित(मायावती) और अन्य पिछड़ा वर्ग गैर-यादव दोनो में जाते हैं, भाजपा के लिए केवल ब्राम्हण वोट ही बचता है, उसमें मे भी बसपा ने हर सामान्य सीट से ब्राम्हण प्रत्याशी उतार दिया है. मोदी को 70% लोग जानते ही नहीं हैं, एक दिन नरेगा के मजदूर कार्य करने जा रहे थे, मैं अखबार पढ रहा था, तो एक ने पूछा क्या खबर है, तो मैंने बताया 19 को कानपुर में मोदी आ रहे हैं, क्योंकि मैं क्रिकेट का सौकीन हूँ इस लिएतो बोला यो कउन आए, का मैच ख्यालती रहाय?
जब 1998 में भाजपा को 180 के आस-पास सीटें मिली थी तो आडवाणी ने स्वयं अटल बिहारी बाजपेई जी का नाम आगे किया था। आज जब भाजपा अपने हिन्दुत्व कार्ड को जिस तरह से उत्तरप्रदेश और बिहार में शुरु कर चुकी है, उससे लग रहा है, कि उसने साईनिंग गुजरात का नारा कैग और रघुराम रजन कमेटी की रिपोर्ट के बाद भुला दिया है। जबकि उसके पास इस समय कोई अटल जैसे कद्दावर सर्वसम्मानित नेता भी मौजूद नहीं है. मोदी या भाजपा के लिए सबसे बड़ी तो चुनौती सेकुलर क्षेत्रीय दल हैं, जो मोदी को रोंकने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। अभी दिल्ली में गैर-कांग्रेस एन्टी-भाजपा दलों की बैठक हुई, सबके बीच में सिर्फ यही चर्चा मुख्य रही। इन 17 दलों में से कई तो पहले भाजपा के साथ रह चुके हैं, लेकिन आप को याद नहीं तब अटल जी थे। आज मोदी रैलियों भीड़ भले ही कितनी इकट्ठा कर लें, लेकिन वो एक मंच से पूरे देश को संबोधित नहीं कर सकते हैं, जैसा उस गैर-सोसल मीडिया के जमाने में इंदिरा, जेपी या नेहरू करते थे। उनकी आवाज केवल नागपुर और दिल्ली के बीच रह जाती है।
अतः यह प्रश्न ही बेईमानी है, कि मोदी 272+ का सपना पूरा कर रहे हैं, क्योंकि आप ट्विटर और फ़ेसबुक पर तो 100 एकाउन्ट्स चला सकते हैं, लेकिन वोट केवल एक ही डाल सकते हैं, फिर क्या पता सोसल मीडिया वालों मे कितनों का वोट है, कोई हार्वर्ड से तो कोई 18 साल से कम है। जैसा कि सब ने सुना होगा कि 31 अक्टूबर को उन्होंने सरदार पटेल की मूर्ति का उद्घाटन किया है, उसमें उनका भाषण गौर से सुनो तो पटेल की इज्जत कम वोट की राजनीति ज्यादा नजर आती है, एक बार तो वो जन्मदिन की जगह पुण्यतिथि भी बोल गए। उन्होने पटेल को गुजराती अस्मिता से जोड़ा है, अगर और कोई भगत सिंह या सुभाष चंद्र बोस भी गुजरात के होते और पटेल बाहर के तो बोस या भगत सिंह की मूर्ति बनवाते।
लेकिन वो भूल गए कि लौहपुरुष का अर्थ त्याग होता है, जो पटेल ने जवाहर और अडवानी ने अटल के लिए दिया। अब वो स्वयं को भी लौह पुरुष के रूप में पेश कर रहे हैं, तो हम क्या समझें कि 2014 में क्यौं होगा जो जवाहर या अटल की भूमिका अदा करेगा। फिर तो मोदी जी को आडवाणी पार्ट-टू मतलब पी. एम. इन वेटिंग बनने के लिए तैयार रहना होगा।
लेकिन वो भूल गए कि लौहपुरुष का अर्थ त्याग होता है, जो पटेल ने जवाहर और अडवानी ने अटल के लिए दिया। अब वो स्वयं को भी लौह पुरुष के रूप में पेश कर रहे हैं, तो हम क्या समझें कि 2014 में क्यौं होगा जो जवाहर या अटल की भूमिका अदा करेगा। फिर तो मोदी जी को आडवाणी पार्ट-टू मतलब पी. एम. इन वेटिंग बनने के लिए तैयार रहना होगा।
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