हमारे देश में दो राजनैतिक गठबन्धन हैं। एक यू.पी.ए. और दूसरा एन.डी.ए.। यू.पी.ए.सरकार में है, और एन.डी.ए. विपक्ष में। 2014 में इनके बीच में चुनाव होने हैं। ऐसे में पिछले दो वर्षों से हम लगातार नीतीश कुमार की धमकी रहे थे, कि भाजपा मोदी जी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं करे। फिर जब नहीं चली तो वो एन. डी. ए. से अलग हो चुके हैं। लेकिन उनकी चिंताएं अब भी लगातार बरकार हैं। एक तरह से देखें तो नितीश ने ही अलग होकर मोदी को मौका दे दिया, वरना 2013 विधानसभा चुनाव के तक तो बात टल ही जाती। अगर हम भाजपा के आकड़ों को देखें तो पिछले दस वर्षों में उसकी हालत लगातार कमजोर ही हुई है। उसने अटल और आडवाणी का भी प्रयोग किया, जिसमें एक सेकुलर छवि और एक हिन्दू हीरो था। अब उसके पास अखिरी तीर बचा था। अब उसे भी प्रयोग करने की ठान ली है। मेरी राय में आम जनता (मध्यवर्ग) पर सेकुलर और सम्प्रदायिक होंने का असर कम होता है, लेकिन व़हाँ की स्थानीय राजनीति और प्रत्याशी का प्रभाव ज्यादा देखा जाता है। अल्पसंख्यकों की भी अपनी-अपनी अलग-अलग समस्याएं होती हैं। यू.पी.ए. के दस वर्षों के बाद आज पूरे देश में परिवर्तन की लहर तो है, लेकिन यह कहना गलत होगा कि यह लहर भाजपा या मोदी के पक्ष में है।
कांग्रेस रूपी रावण को मारने के लिए भाजपा के पास कोई राम नहीं है। जो महारथी खड़ा भी है, उसकी तलवार प्लास्टिक की है। कई चीजों जैसे भगवान राम का भी प्रयोग ये लोग चुनाव में कर रहे है। क्या इसका असर पूरे देश पर पड़ेगा? भाजपा को तो मोदी को प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाने के लिए तो 272 सीटें चाहिए। इतनी सीटों पर तो भाजपा मजबूत प्रत्याशी भी नहीं उतार पाती है। मेरा मानना है कि भाजपा और कांग्रेस में ये टक्कर होगी कि कौन 180-200 सीटें लाकर सरकार बनाने का दावा पेश करेगा? वैसे तो कांग्रेस के खिलाफ पार्टियों का एक बड़ा गुट नजर आता है, लेकिन इनमें से कितने लोग भाजपा और खास तौर पर मोदी के साथ हैं? अभी तो एन.डी.ए. में केवल अकाली दल और शिवसेना ही हैं। अगर और भी किसी से उम्मीद है, तो जयललिता की A.I.D.M.K. और नवीन पटनायक की बी.जे.डी. से और उम्मीद दिखती है। ममता से उम्मीद तो थी, लेकिन उनकी और नीतीश कुमार की दिक़्कत एक ही है। इन दोनों के विपक्षी दल (J.D.U.V/S R.J.D. & T.M.C. V/S C.P.M.) के वोट प्रतिशत में कोई बड़ा अंतर नही है। 3-4 प्रतिशत वोट का अंतर तो मोदी के साथ आने पर तो 2015 में मुस्लिम मतों द्वारा राज्य की सत्ता से बाहर कर देगा। ऐसे में कुछ तटस्थ दल तो तीसरे मोर्च की भी संभावनाएँ खोज रहे हैं। जिसकी अगुवाई मुलायम के साथ वामपंथियों द्वारा की जा रही है। इसके लिए अभी कुछ सेकुलर और गैर-कांग्रेसी दलों की एक मीटिंग भी हो चुकी है। लेकिन इसमें देखने वाली बात यह थी कि यह सब दल गैर-कांग्रेसी, एन्टी-बीजेपी थे। लेडिन मुझे नहीं लगता है कि ऐसा कोई मोर्चा ज्यादा दिन तक चल पाएगा। अब बात करते हैं यू.पी.ए. पर तो फिलहाल उसमें वह अकेली ही नजर आ रही है। अगर ऐसे में उसे 150 से अधिक सीटें मिल गईं तो राहुल या किसी और के नेतृत्व में छोटे दलों को कोई मुश्किल नहीं होगी। हाँ यह हो सकता है कि कांग्रेस को कुछ महत्वपूर्ण पदों से समझौता करना पड सकता है। इसमें सपा, बसपा, D.M.K., बसपा, राजद, टी. एम. सी., लेफ्ट और भी कई दल जुड़ सकते हैं। इनकी एन्टी-कांग्रेस छवि समय के हिसाब से बदलती रहती है। वैसे तो समय के साथ-साथ राज्यों में गठबंधन की राजनीति लगातार खत्म होती नजर आ रही है। लेकिन केन्द्र में अभी भविष्य के 20-25 वर्षों तक इससे छुटकारे की कोई उम्मीद नहीं नजर आती है। दोस्त अक्सर पूंछते हैं, क्या मोदी प्रधानमंत्री बनेंगे? तो मेरा जवाब उनको बुरा लगता है। पूंछते हैं, तो फिर क्या राहुल गाँधी बनेगे? तो मेरा जवाब ना होता है। कभी-कभी तो बोल देते ह कि यार तुम्हें कुछ पता ही नहीं है, राजनीति के बारे में। मेरा पूर्वानुमान है कि 2014 का चुनाव मोदी बनाम सभी सेकुलर दल। और चुनाव के बाद जब पी.एम. बनाने की बात होगी तो संभावना है, कि भाजपा सरकार (एन.डी.ए.) बिना मोदी के, राजनाथ, शिवराज (अगर म.प्र. जीते) और शुषमा या आडवाणी अन्यथा तीसरा मोर्चा Supported by कांग्रेस।
कांग्रेस रूपी रावण को मारने के लिए भाजपा के पास कोई राम नहीं है। जो महारथी खड़ा भी है, उसकी तलवार प्लास्टिक की है। कई चीजों जैसे भगवान राम का भी प्रयोग ये लोग चुनाव में कर रहे है। क्या इसका असर पूरे देश पर पड़ेगा? भाजपा को तो मोदी को प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाने के लिए तो 272 सीटें चाहिए। इतनी सीटों पर तो भाजपा मजबूत प्रत्याशी भी नहीं उतार पाती है। मेरा मानना है कि भाजपा और कांग्रेस में ये टक्कर होगी कि कौन 180-200 सीटें लाकर सरकार बनाने का दावा पेश करेगा? वैसे तो कांग्रेस के खिलाफ पार्टियों का एक बड़ा गुट नजर आता है, लेकिन इनमें से कितने लोग भाजपा और खास तौर पर मोदी के साथ हैं? अभी तो एन.डी.ए. में केवल अकाली दल और शिवसेना ही हैं। अगर और भी किसी से उम्मीद है, तो जयललिता की A.I.D.M.K. और नवीन पटनायक की बी.जे.डी. से और उम्मीद दिखती है। ममता से उम्मीद तो थी, लेकिन उनकी और नीतीश कुमार की दिक़्कत एक ही है। इन दोनों के विपक्षी दल (J.D.U.V/S R.J.D. & T.M.C. V/S C.P.M.) के वोट प्रतिशत में कोई बड़ा अंतर नही है। 3-4 प्रतिशत वोट का अंतर तो मोदी के साथ आने पर तो 2015 में मुस्लिम मतों द्वारा राज्य की सत्ता से बाहर कर देगा। ऐसे में कुछ तटस्थ दल तो तीसरे मोर्च की भी संभावनाएँ खोज रहे हैं। जिसकी अगुवाई मुलायम के साथ वामपंथियों द्वारा की जा रही है। इसके लिए अभी कुछ सेकुलर और गैर-कांग्रेसी दलों की एक मीटिंग भी हो चुकी है। लेकिन इसमें देखने वाली बात यह थी कि यह सब दल गैर-कांग्रेसी, एन्टी-बीजेपी थे। लेडिन मुझे नहीं लगता है कि ऐसा कोई मोर्चा ज्यादा दिन तक चल पाएगा। अब बात करते हैं यू.पी.ए. पर तो फिलहाल उसमें वह अकेली ही नजर आ रही है। अगर ऐसे में उसे 150 से अधिक सीटें मिल गईं तो राहुल या किसी और के नेतृत्व में छोटे दलों को कोई मुश्किल नहीं होगी। हाँ यह हो सकता है कि कांग्रेस को कुछ महत्वपूर्ण पदों से समझौता करना पड सकता है। इसमें सपा, बसपा, D.M.K., बसपा, राजद, टी. एम. सी., लेफ्ट और भी कई दल जुड़ सकते हैं। इनकी एन्टी-कांग्रेस छवि समय के हिसाब से बदलती रहती है। वैसे तो समय के साथ-साथ राज्यों में गठबंधन की राजनीति लगातार खत्म होती नजर आ रही है। लेकिन केन्द्र में अभी भविष्य के 20-25 वर्षों तक इससे छुटकारे की कोई उम्मीद नहीं नजर आती है। दोस्त अक्सर पूंछते हैं, क्या मोदी प्रधानमंत्री बनेंगे? तो मेरा जवाब उनको बुरा लगता है। पूंछते हैं, तो फिर क्या राहुल गाँधी बनेगे? तो मेरा जवाब ना होता है। कभी-कभी तो बोल देते ह कि यार तुम्हें कुछ पता ही नहीं है, राजनीति के बारे में। मेरा पूर्वानुमान है कि 2014 का चुनाव मोदी बनाम सभी सेकुलर दल। और चुनाव के बाद जब पी.एम. बनाने की बात होगी तो संभावना है, कि भाजपा सरकार (एन.डी.ए.) बिना मोदी के, राजनाथ, शिवराज (अगर म.प्र. जीते) और शुषमा या आडवाणी अन्यथा तीसरा मोर्चा Supported by कांग्रेस।
खैर जो भी हो लेकिन अगर सर्वे में ही देखा जाए तो भाजपा को 180 के आसपास और कांग्रेस को 125-140 तक ही सीटें मिल रही हैं, ऐसे में अन्य दलों को 250 तक सीटें मिल रही हैं। यह भी नहीं माना जा सकता है कि यह 250 सीटों वाले अन्य दल भी एक साथ नहीं रह सकते हैं। इनमें एक साँप और दो बिल वाली बात भी आ जाती है, जब ममता और लेफ्ट, माया और मुलायम, लालू और मुलायम, चंद्रबाबू नायडू और जगनमोहन जैसे मजबूत क्षेत्रीय दल हैं। फिर तो इनका किसी एक गठबन्धन में रुकना असंभव है। लेकिन उपर्युक्त सभी दलों की खासियत यह है, कि ये सब मोदी के साथ जाने से डरते हैं। सब को चिंता है, अपने राज्य की सात्ता पाने के लिए परिवर्तन वाले मुस्लिम वोट की। हम तो केवल अनुमान ही लगा सकते हैं, लेकिन जो होना है वो तो भविष्य के गर्भ में छुपा है।
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