किसान हर देश की प्रगति में विशेष सहायक होते हैं। एक किसान ही है जिसके बल पर देश अपने खाद्यान्नों की खुशहाली को समृद्ध कर सकता है। देश मे राष्ट्रपिता गांधी जी ने भी किसानों को ही देश का सरताज माना था। लेकिन देश की आजादी के बाद ऐसे नेता कम ही देखने में आए जिन्होंने किसानों के विकास के लिए निष्पक्ष रूप में काम किया। ऐसे नेताओं में सबसे अग़्रणी थे, देश के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह। आज उन्ही की याद में हमारे देश में किसान दिवस मनाया जाता है। किसान ही वो
है, जो हमारे देश को जीवित रखता है। लेकिन आज यह विडंबना ही है कि सबसे
ज्यादा किसान ही संघर्ष कर रहे हैं. ज्यादा तर किसान खेती छोड़ कर बाहर
शहरों की ओर जा रहे हैं। कोई भी किसान अपने बच्चों को किसान नहीं बनाना
चाहता है। आप सर्वे करवाकर देख लीजिए शायद 0.0% युवा भी अपने भविष्य को किसान के रूप में देखेंगे? अगर ऐसे ही रहा तो क्या होगा, हमारे देश का? गावों में जमीनें बच हीं नहीं रही हैं। सब शहरों के अमीर लोग खरीद रहे हैं। और उस जमीन पर उद्योग, फैक्ट्रियाँ, कारखानें, फार्महाउस आदि बना रहे हैं। मेरे गाँव में भी संघर्ष करते किसानों के बीच कानपुर के उद्योगपतियों ने उन्हें पैसे का लालच देकर जमीन खरीदनी शुरु कर दी है। सड़क के किनारे शायद ही किसी किसान की जमीन बची है। सब कहते हैं क़ि हम पैसे तो देते ही हैं, लेकिन परेशान किसान के पास और कोई चारा भी तो नहीं है। यह बात तो ज़मीदारी या गैर-समाजवादी हो गई है। हमारे देश की मीडिया भी पूरा दिन सचिन के सन्यास, सौवें शतक पर, सनी लियोन, कपिल की कमेडी या मोदी बनाम राहुल को ही दिखती रहती है। वहाँ नजर क्यों नहीं जाती है, जहाँ रोज 48 किसान आत्महत्या कर लेते हैं। उसके कारण सीधे तौर पर सरकार से जुड़े होते हैं। मेरे गाँव की ही बात है, अखिलेश सरकार ने गरीब किसान का लोन माफ किया, एक अनपढ किसान से उस 15000/- के लोन खाते को बंद करवाने में 5-6 देर हो गई। बैंक ने कह दिया क़ि तुम्हारा लोन माफ नही होगा। उसके नरेगा में किए गए कार्य के 4000/- रुपए भी काट लिए और बोल बाकी लोन भी जमा करो। विजय माल्या और सुलज्जा मोटवानी जैसे लोग बैंको का हजारों करोड़ रुपए मार जाते हैं, तो भी कुछ नहीं होता है। उस बेचारे किसान को 10-15 हजार के लिए 10 दिन की मोहलत भी नहीं पकड कर बंद किया और संपत्ती कुर्क करवा लेते हैं। मेरे शहर में रहने वाले कई दोस्त कहते हैं यार गाँव में अच्छा है, बिना दिक्कत के रहो। उन्हें क्या पता की सबसे खतरे का इन्वेस्टमेंट हम किसानों का ही होता है। किसी से पैसे उधार लेकर आलू लगाई, पाला, पानी, या बर्फ गिर गई तो सब गया। बेचारा किसान कहाँ से उधार दे? आपका शेयर बाजार कितना भी गिरेगा, पूरा पैसा नहीं डूबेगा. गेंहू और चावल जैसी फसल में क्या फायदा है? हमसे पूछों। बच्चों की फीस भी नहीं दे पाते हैं। सर्दी, गर्मी, बारिश सब मुसीबतों में बेचारा किसान अपने बिना बिजली के गाँव में सड़े, बच्चों को लगाकर खेती करे फिर भी आत्महत्या करने को मजबूर। जानवर पालना तो उसकी मजबूरी होती है। कोई भी सर उठा के कह देता है कि किसान खुश हैं, उनकी दिक्कतें इन शहरों में क्या पता? आज मैं आपको कुछ उदाहरण देता हूँ। बात 2003-04 की है. जब मेरे खेत में पानी लगाया (सिंचाई) जाता था, तो मैं साइकिल से डीजल लेने जाता था। तब डीजल 25 रुपए/ लीटर थी। यूरिया खाद 160 रुपए बोरी, डी. ए. पी. खाद 340-370 रुपए बोरी थी। तब गेहूँ 8 रुपए/ किलो में बिकता था। आज 2013 में डीजल 55, यूरिया 380-450 और डी. ए. पी. 1500-2000/- तक है। उसमें भी खाद तो किसान को समय पर मिलती ही नहीं है। ब्लैक करके खाद माफिया किसानों से भारी कीमतें वसूलते हैं। वहीं गेहूँ की कीमत भी 1200-1350/- प्रति क्विंटल ही रह गई है। लेकिन मुझे मुम्बई में 25/किलो आँटा मिलता है। आलू किसान से 4-5 रुपए में और शहरों में 25-30 रुपए में। अरहर, चना, मूंग, उड़द सब डालें 100-150 तक हैं, और किसान को इसका भाव 35-40 रुपए ही मिलता है। हमारे गाँव में 4-5 साल पहले लोगों ने मिर्ची की खेती शुरु की। पहले 2-3 साल तक तो काफी फायदा हुआ। बाद में तो मिर्ची को कोई 3-4 रुपए रुपए में भी नहीं पूंछता हैं। लागत एक बीघे में 25-30 हजार और सब काटकर फायदा केवल 10-15 हजार।
फिर हिसाब किया तो अगर 3 महीने नरेगा में काम करता तो ज्यादा कमाता। ऐसे में किसान कहाँ जाएगा? सब माफियाओं के बोछ तले दबे हैं। बस यही है कि बाल-बच्चे हैं तो दाल-रोटी चल रही है। उसमें भी सबसे ज्यादा गरीबी और बीमारी के मारे यही हैं। जहाँ तक इसके दोषी होने का सवाल है तो सरकार के साथ-साथ हमारा शहरी उद्योगपति भी जिम्मेदार हैं।जो गरीब किसानो की जमीन, खनिज, जंगल, पानी सब लूट रहे हैं। सरकार तो कुछ करती ही नहीं है। मुलायम सिंह यादव जैसे नेता किसान के नाम पर वोट तो ले लेते हैं. लेकिन उनके लिए करने को कुछ भी नहीं है. अभी हाल में यू. पी. में गन्ना किसानों की दशा एक छोटा सा उदाहरण है। शरद पवार जैसे लोग जो कृषि मंत्री हैं वो तो सबसे किसानों को दुश्मन समझते हैं। किसानों के नाम पर बने दल " भारतीय किसान यूनियन" सरीखे लोग तो केवल अपना काम निकालना जानते हैं। कभी किसान के असली दर्द को नहीं समझ पाए। शर्म की बात तो यह है क़ि चौधरी चरणसिंह के बेटे अजित सिंह सरकार में मंत्री हैं, और कभी किसानों का दर्द संसद में नहीं नहीं बोल पाए। देश का कोई भी नेता नहीं है, जो इस तरफ ध्यान दे। वोट लेने के लिए मोदी जी कांग्रेस पर तो हमला बोलते हैं। लेकिन गुजरात के मरते किसानों की तरफ कोई ध्यान नहीं है। आखिर यह नेता भी क्यों बोलें किसान का दूसरा नाम ही है संघर्ष? बची-खुची जान तो मौसम(सूखा, तूफान, ओले) निकाल देता है। मुंशी प्रेमचन्द की कहानियों वाली दशा आज भी 100 साल बाद किसानों पर से हटी नहीं है। देखते हैं कौन सा मसीहा (चौधरी चरण सिंह का अवतार) आएगा। इनकी दशा में कुछ सुधार करेगा?
"जब तक दुखी किसान रहेगा। धरती पर तूफान रहेगा।। "
"जब तक दुखी किसान रहेगा। धरती पर तूफान रहेगा।। "


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