Tuesday, December 10, 2013

यादों के झरोखे से...

आज मेरे गाँव का हनुमान जी का वार्षिक महोत्सव मेला है। आज तीसरा साल है, जब मैं इसे मिस कर रहा हूँ। बचपन में बहुत इंतजार रहता था, पहले से ही नए कपड़े खरीदवा लेता था। बहुत शर्दी होने पर भी स्वेटर नहीं पहनता था, कि मेरे नए कपडें नहीं दिखेंगे। पहले माँ से पैसे माँगता, तो वो 10-15 रुपए देतीं, फिर पिताजी से 15-20 मिल जाते। दोपहर में जब पैसे खत्म हो जाते तो, कानपुर से भईया के आने का इंतजार रहता था। फिर उनसे भी 100-50 मिल जाते तो बहुत खुशी होती। घर में भी मिठाइयां और पकवान बनते थे, फिर भी बाहर का खाने में ज्यादा मजा आता था। प्लास्टिक का ट्रैक्टर-ट्रॉली, ट्रक, गाडियाँ, छोटा सा रेडिओ, डमरू, तस्वीरें, और ना जाने क्या-क्या खरीद लेता था। फिर सब चार-पांच दिन में टूट भी जाता था। पहले तो अकेले जाने को नहीं मिलता था, फिर जब 12-15 साल का हुआ तो अकेले जाने का ओर्डर मिल गया। एक बार गाँव के बाहर कई लड़के गोली(कंचे) खेलते रहते थे। मैं भी खेल बैठा, 20 रुपए हार गया. पूरा दिन सोचता रहा। कुछ हाँथ नहीं लगा। गाँव में आज के जितना कोई भी होली-दिवाली त्योंहार भी नहीं मनाया जाता है। कई रिस्तेदार बुआ-फूफा, मामा, मौसी सब आ जाते थे। सच पूछिए तो बचपन में मुझे उन सबसे बहुत ईर्ष्या  होती थी।  वीडियो लगता था, तो पहली बार मिथुन दा की "चांडाल" फिल्म देखी थी। कई दोस्त तो पूरा दिन फिल्में ही देखते थे। झूले पर तो डर के मारे आज तक नहीं बैठ पाया। फिर जब 10+ कक्षा में आ गया, तो फिर बगल के गाँव भाउपुर के कई मित्रों के साथ मेला घूमने लगा, उस समय मेरे पास 100-150 रुपए ही होते थे, बहुत डर लगता कि कहीं कोई ज्यादा खर्च करने को ना बोल दे। लेकिन सबके पास उतने ही होते थे, बड़े-बड़े पैसे वाले मित्रों के पास तो उतना  भी नहीं होता था। हर जगह 10-15 लड़कों का झुंड जाता था, स्थानीय होने का फायदा उठाने के लिए किसी को भी हडका (डांट) देते थे। खिलौने लेना भूल गए, पिछली बार (2010) के मेले में एक बड़ा सा भोंपू ले लिया केवल लोफरी करने के लिए, जब गाँव में बजा दिया तो कई बूढ़े लोग गाली देते थे। मेरे घर में दो छोटे-छोटे बच्चे भी हो गए, उन्हें लेकर मेला गया, तो उन्हें जो भी दिखाई देता वो मांग बैठे, मारे बड़प्पन के जो भी दो-तीन सौ रुपए थे, सब खत्म हो गए। फिर उन्हें घर छोड़ कर अकेले मेला देखने गया। जब कुछ जवान हो गया तो झगड़े का बहुत डर रहने लगा। फिर मई 2011 में गाँव छोड़ दिया, कभी मेला नहीं देखने को मिला। हर बार कहता हूँ, इस बार जाना है, लेकिन ऐसे काम पड जाते हैं, कि जा ही नहीं पाता हूँ। बच्चों से फोन पर पूछता हूँ, क्या खरीदा तो वही बताते है, जो तथाकथिक चीजें मैं खरीदता था। बहुत याद आती है। क्या करें सब छूट गया. आज तो लिखते वक्त ऐसी हूँक उठी कि सर दीवार पर दे मारू, लेकिन इतने बड़े शरीर पर आंसू अच्छे नहीं लगते हैं। ऐसा लगा कि फ्लाइट मिल जाती तो अभी चला जाता।

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