दिल्ली में सरकार बनाने का दावा पेश करने के बाद से आम आदमी पार्टी (आप) सीधे तौर पर बीजेपी के निशाने पर है। मंगलवार को बीजेपी ने आप के संयोजक अरविंद केजरीवाल पर तीखा हमला करते हुए सत्ता के लिए अपने बच्चों की कसम तोड़ने का आरोप लगाया है। आज हमारे मन में कई सवाल उठ रहे हैं।
1). क्या केजरीवाल ने सरकार बनाकर गलत किया है?
2). क्या कांग्रेस ने आप को चापलूसी के तहत समर्थन दिया है?
3). क्या केजरीवाल की सरकार 6 महीने से अधिक चलेगी?
4). क्या दुबारा चुनाव में आप को बहुमत मिलेगा?
5). भाजपा की क्या दिक्कत है?
इन सवालों पर मैंने रातभर आत्म-मंथन किया। तब जाकर कुछ निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ। पहली बात यह कि आज केजरीवाल को बच्चों की कसम याद दिलाने वाले अपनी कसम क्यों भूल जाते हैं, जो उन्होने लाखों बार खाई होगी "कसम राम की खाते हैं, मंदिर वहीं बनाएँगे"। वो स्वयम् बड़ा दल होकर सरकार नहीं बना रहे हैं. जब दूसरा बनाने से माना करे तो भाजपा कहती है, अपने वादों से डर गए, जब सरकार बना ली तो नैतिकता सीखा रहे हैं। अगर आप पूंछे कि क्या सरकार बनाकर अरविन्द ने कुछ गलत किया है? तो मुझे नहीं लगता है क़ि यह कोई गठबंधन की सरकार है। अगर राजनीतिशास्त्र की भाषा में कहें तो यह केवल अल्पमत+बाहरी समर्थन की सरकार है। यह वह समर्थन है जो लेने वाले ने मांगा नहीं है, और देने वाला देने को तैयार है। इनके बीच ना कोई लिखित या मौखिक समझौता हुआ ना ही कोई लेन-देन की बात हुई। फिर भी समर्थन पर सरकार बन रही है। पहली बार हो रहा है, जब समर्थन देने वाले को लेने वाला गाली दे रहा है। अरविन्द ने दिल्ली के उपराज्यपाल को जो चिट्ठी दी है, उसमें यह कहीं नहीं लिखा है कि हम कांग्रेस के समर्थन से सरकार बना रहे हैं। उसमें लिखा है कि हम अल्पमत की सरकार बना रहे हैं, अगर वो हमारी सरकार को गिराएँगे तो हम दोबारा चुनाव में जा सकते हैं। असल में अब तो सब (भाजपा, आप और कांग्रेस) यही चाहते हैं कि यह सरकार जल्दी से गिर जाए।
अगर हम कांग्रेस के समर्थन की बात करें तो पार्टी में दो तरह के नज़रिए हैं। एक तो स्थानीय (दिल्ली) का नेतृत्व जो गुस्से में है, और आम आदमी पार्टी की पोल खोलना चाहता है। दूसरा केन्द्रीय नेतागण जिनका मानना है कि कांग्रेस का नुकसान जो होना था, वो तो हो चुका है. अब भाजपा को रोंकने के लिए वो केजरीवाल का साथ दे रहे हैं। उन्हें लगता है अब केजरीवाल के निशाने पर राहुल की जगह मोदी होंगे।
कांग्रेस की मंशा छ्ह महीने बाद सरकार गिरने की है। वहीं यह भी पक्का माना जा रहा है क़ि यह सरकार छ्ह महीने (आम चुनाव 2014) के बाद नहीं चलेगी। यही बात आम आदमी पार्टी को भी पता है कि अगर वो समर्थन खींच लेगे तो हम दुबारा चुनाव में जीत जाएंगे। अब अगर बात फिर से चुनाव (6 महीने बाद) की बात की जाए तो केजरीवाल भी कोई कच्चे खिलाडी नहीं हैं। पहले उन्हें लगा क़ि शायद सब बोलेंगे कि आप वादे पूरे करने से डरते हैं तो सरकार बनाने के लिए भी जनता से राय मांगी। 80% जनता नें हाँ में जवाब दिया। उन्होनें यह तय किया कि कहीं भाजपा उन्हें इस मुद्दे पर घेर ना ले, तो जनता से पूंछ कर पक्का भी कर लिया। कि अगर फिर से चुनाव हुए तो जनता उनकी सरकर बनाने की मंशा पर सवाल ना उठा सके।
केजरीवाल को डर था क़ि कहीं सरकार नहीं बनाई तो अगर चुनाव 2014 के लोकसभा के साथ दिल्ली में भी चुनाव हुए तो मोदी फैक्टर ना काम कर जाए तो क्या होगा? फिर उन्हें लगा जनता से पूछकर सरकार 6 महीने तक तो चला लेंगे फिर सरकार गिरी भी तो हम जीत जाएँगे।
अब अगर बात भाजपा की करें तो यह सॉफ पता चलता है कि भाजपा के नेताओ को छोड़कर कोई भी इसतरह से बयान नहीं कर रही है। यहाँ पर अभय दुबे जी की एक कहावत सही दिख रही है, "धरा लौट गई"। देश के सभी बड़े दल चिंता में पड गए हैं, कि यह नई शक्ति कहाँ तक जाएगी? पहली बार भाजपा भी आप के डर से जोड़-तोड करने में चूक गई। अब नुकसान की बारी भी भाजपा की ही है। केजरीवाल की यह आलोचना भाजपा की बौखलाहट दिखा रही है। इस आलोचना को भाजपा के अलावा कोई सुन भी नहीं रहा है। यह बात और है कि अरविन्द की पार्टी और समर्थकों में भी इसके प्रति एक बहस है, लेकिन वो एक अलग किस्म की रचनात्मक बहस है। भाजपा को खुद नहीं समझ में आ रहा है, कि 2014 और उसके बाद के डैमेज-कण्ट्रोल कैसे रोका जाए?
दिल्ली में राजनीतिक परिवर्तन तो नहीं हुआ क्योंकि आप के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है मगर आप के प्रभाव से राजनीतिक परिवर्तन ज़रूर हुआ। चंदों की पारदर्शिता की बात हुई। बीजेपी को अपना उम्मीदवार बदलना पड़ा और तोड़ फोड़ से तौबा करना पड़ा। अब बीजेपी नैतिक होने का दावा कर रही है। इस चुनाव से एक बात तो सॉफ हो गई है, कि अब राजनीति बदल रही है। पहली बार हुआ जब किसी दल ने जनता से सरकार बनाने की बात पूंछी। पहली बार किसी मुख्यमंत्री ने सुरक्षा लेने से इंकार कर दिया। पहली बार किसी दल के नेता वी. आई. पी. कल्चर से बाहर होंगे। पहली बार कोई दल ईमानदारी से चुनाव लड़ा। अब इन्ही की नैतिकता के डर से बाकी दलों के ए.सी. में बैठे नेताओं की नींद उड़ रही है, कि कहीं जनता उन्हें नकार ना दे? हार के बाद पहली बार किसी पार्टी ने कहा कि हमे विरोधी दल से सीखने की जरूरत है। इसी के डर से दागी नेताओं को बचाने का बिल, लोकपाल बिल जैसे बदलाव राहुल को करने पड़े। पहली बार राहुल गाँधी मेंहनत करते हुए (मुज़फ़्फरनगर दौरा, फिक्की में भाषण, घोषणा पत्र पर जनता की राय) दिखाई दिए। अब सभी नेताओं को इस तरह के डर सताने लगे हैं। बाकी सब तो होगा ही लोकतंत्र है। अगर रवीश कुमार की भाषा में कहें तो और जो है सो हइये है।
1). क्या केजरीवाल ने सरकार बनाकर गलत किया है?
2). क्या कांग्रेस ने आप को चापलूसी के तहत समर्थन दिया है?
3). क्या केजरीवाल की सरकार 6 महीने से अधिक चलेगी?
4). क्या दुबारा चुनाव में आप को बहुमत मिलेगा?
5). भाजपा की क्या दिक्कत है?
इन सवालों पर मैंने रातभर आत्म-मंथन किया। तब जाकर कुछ निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ। पहली बात यह कि आज केजरीवाल को बच्चों की कसम याद दिलाने वाले अपनी कसम क्यों भूल जाते हैं, जो उन्होने लाखों बार खाई होगी "कसम राम की खाते हैं, मंदिर वहीं बनाएँगे"। वो स्वयम् बड़ा दल होकर सरकार नहीं बना रहे हैं. जब दूसरा बनाने से माना करे तो भाजपा कहती है, अपने वादों से डर गए, जब सरकार बना ली तो नैतिकता सीखा रहे हैं। अगर आप पूंछे कि क्या सरकार बनाकर अरविन्द ने कुछ गलत किया है? तो मुझे नहीं लगता है क़ि यह कोई गठबंधन की सरकार है। अगर राजनीतिशास्त्र की भाषा में कहें तो यह केवल अल्पमत+बाहरी समर्थन की सरकार है। यह वह समर्थन है जो लेने वाले ने मांगा नहीं है, और देने वाला देने को तैयार है। इनके बीच ना कोई लिखित या मौखिक समझौता हुआ ना ही कोई लेन-देन की बात हुई। फिर भी समर्थन पर सरकार बन रही है। पहली बार हो रहा है, जब समर्थन देने वाले को लेने वाला गाली दे रहा है। अरविन्द ने दिल्ली के उपराज्यपाल को जो चिट्ठी दी है, उसमें यह कहीं नहीं लिखा है कि हम कांग्रेस के समर्थन से सरकार बना रहे हैं। उसमें लिखा है कि हम अल्पमत की सरकार बना रहे हैं, अगर वो हमारी सरकार को गिराएँगे तो हम दोबारा चुनाव में जा सकते हैं। असल में अब तो सब (भाजपा, आप और कांग्रेस) यही चाहते हैं कि यह सरकार जल्दी से गिर जाए।
अगर हम कांग्रेस के समर्थन की बात करें तो पार्टी में दो तरह के नज़रिए हैं। एक तो स्थानीय (दिल्ली) का नेतृत्व जो गुस्से में है, और आम आदमी पार्टी की पोल खोलना चाहता है। दूसरा केन्द्रीय नेतागण जिनका मानना है कि कांग्रेस का नुकसान जो होना था, वो तो हो चुका है. अब भाजपा को रोंकने के लिए वो केजरीवाल का साथ दे रहे हैं। उन्हें लगता है अब केजरीवाल के निशाने पर राहुल की जगह मोदी होंगे।
कांग्रेस की मंशा छ्ह महीने बाद सरकार गिरने की है। वहीं यह भी पक्का माना जा रहा है क़ि यह सरकार छ्ह महीने (आम चुनाव 2014) के बाद नहीं चलेगी। यही बात आम आदमी पार्टी को भी पता है कि अगर वो समर्थन खींच लेगे तो हम दुबारा चुनाव में जीत जाएंगे। अब अगर बात फिर से चुनाव (6 महीने बाद) की बात की जाए तो केजरीवाल भी कोई कच्चे खिलाडी नहीं हैं। पहले उन्हें लगा क़ि शायद सब बोलेंगे कि आप वादे पूरे करने से डरते हैं तो सरकार बनाने के लिए भी जनता से राय मांगी। 80% जनता नें हाँ में जवाब दिया। उन्होनें यह तय किया कि कहीं भाजपा उन्हें इस मुद्दे पर घेर ना ले, तो जनता से पूंछ कर पक्का भी कर लिया। कि अगर फिर से चुनाव हुए तो जनता उनकी सरकर बनाने की मंशा पर सवाल ना उठा सके।
केजरीवाल को डर था क़ि कहीं सरकार नहीं बनाई तो अगर चुनाव 2014 के लोकसभा के साथ दिल्ली में भी चुनाव हुए तो मोदी फैक्टर ना काम कर जाए तो क्या होगा? फिर उन्हें लगा जनता से पूछकर सरकार 6 महीने तक तो चला लेंगे फिर सरकार गिरी भी तो हम जीत जाएँगे।
अब अगर बात भाजपा की करें तो यह सॉफ पता चलता है कि भाजपा के नेताओ को छोड़कर कोई भी इसतरह से बयान नहीं कर रही है। यहाँ पर अभय दुबे जी की एक कहावत सही दिख रही है, "धरा लौट गई"। देश के सभी बड़े दल चिंता में पड गए हैं, कि यह नई शक्ति कहाँ तक जाएगी? पहली बार भाजपा भी आप के डर से जोड़-तोड करने में चूक गई। अब नुकसान की बारी भी भाजपा की ही है। केजरीवाल की यह आलोचना भाजपा की बौखलाहट दिखा रही है। इस आलोचना को भाजपा के अलावा कोई सुन भी नहीं रहा है। यह बात और है कि अरविन्द की पार्टी और समर्थकों में भी इसके प्रति एक बहस है, लेकिन वो एक अलग किस्म की रचनात्मक बहस है। भाजपा को खुद नहीं समझ में आ रहा है, कि 2014 और उसके बाद के डैमेज-कण्ट्रोल कैसे रोका जाए?
दिल्ली में राजनीतिक परिवर्तन तो नहीं हुआ क्योंकि आप के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है मगर आप के प्रभाव से राजनीतिक परिवर्तन ज़रूर हुआ। चंदों की पारदर्शिता की बात हुई। बीजेपी को अपना उम्मीदवार बदलना पड़ा और तोड़ फोड़ से तौबा करना पड़ा। अब बीजेपी नैतिक होने का दावा कर रही है। इस चुनाव से एक बात तो सॉफ हो गई है, कि अब राजनीति बदल रही है। पहली बार हुआ जब किसी दल ने जनता से सरकार बनाने की बात पूंछी। पहली बार किसी मुख्यमंत्री ने सुरक्षा लेने से इंकार कर दिया। पहली बार किसी दल के नेता वी. आई. पी. कल्चर से बाहर होंगे। पहली बार कोई दल ईमानदारी से चुनाव लड़ा। अब इन्ही की नैतिकता के डर से बाकी दलों के ए.सी. में बैठे नेताओं की नींद उड़ रही है, कि कहीं जनता उन्हें नकार ना दे? हार के बाद पहली बार किसी पार्टी ने कहा कि हमे विरोधी दल से सीखने की जरूरत है। इसी के डर से दागी नेताओं को बचाने का बिल, लोकपाल बिल जैसे बदलाव राहुल को करने पड़े। पहली बार राहुल गाँधी मेंहनत करते हुए (मुज़फ़्फरनगर दौरा, फिक्की में भाषण, घोषणा पत्र पर जनता की राय) दिखाई दिए। अब सभी नेताओं को इस तरह के डर सताने लगे हैं। बाकी सब तो होगा ही लोकतंत्र है। अगर रवीश कुमार की भाषा में कहें तो और जो है सो हइये है।
No comments:
Post a Comment