Thursday, February 27, 2014

फिर से जाति पर क्यों लौट रहे हैं?

अभी तक 2014 के चुनाओं की तैयारी को लेकर अगर हम पिछले दो साल का घटनाक्रम उठाकार देखें तो पता चलता है कि नरेन्द्र मोदी का चुनाव प्रचार पूरी तरह से जाति से उपर उठकर चल रहा था। भले ही वो हिन्दुत्व को यदाकदा हथियार बनाते रहे हैं। नरेन्द्र मोदी ने विकास पर ज्यादा ध्यान रखा। लेकिन पिछले एक-दो महीने से इस मोदीमय गुब्बारे की हवा निकलती दिख रही है। आखिर वो भी उसी पुरानी सड़क पर क्यों लौट रहे हैं, जिसपर अभी तक हिन्दुस्तान की पूरी राजनीति चलती रही है। मोदी ने अचानक से जातीय समीकरण बनाने शुरु कर दिए हैं। खासकर उत्तरप्रदेश और बिहार में जो आरोप लालू, माया और मुलायम पर लगाते थे, वो अब खुद अपनाने लगे हैं। मोदी ने उत्तर प्रदेश में अपना दल के संस्थापक सोनेलाल पटेल की बेटी अनुप्रिया पटेल से गठबंधन की बात शुरु कर दी है। पूर्वांचल के अपनी जाति के बड़े नेता जगदम्बिका पाल की भी कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाने की खबरें तेज दिख रही हैं। उत्तरप्रदेश में इन तथाकथित जातियों का प्रभाव काफी प्रभाव है। उसी तरह बिहार में भाजपा ने जातिगत समीकरण बनाने शुरु कर दिए हैं। रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा के साथ गठबंधन लगभग पक्का ही हो गया है। उसी तरह कुशवाहा समाज के बड़े नेता उपेन्द्र कुशवाहा को भी अपने साथ मिला लिया है। इसके अलावा कांशीराम के साथ काम करने वाले बड़े दलित नेता उदित राज के दल का भी भाजपा में विलय हो गया है। अगर महाराष्ट में भी देखें तो दलित नेता रामदास अठावले की पार्टी आर.पी.आई. के साथ भी गठबंधन भाजपा ने कर लिया है।
अगर हम उपर्युक्त गठबंधनों की तरफ नजर डालें तो किसी भी दल या नेता का इतना ज्यादा प्रभाव नही है। हाँ यह बात हम मानते हैं कि इनका अपने क्षेत्रों या जातियों पर काफी वर्चस्व रहा है। अगर भाजपा इनके साथ गठबंधन करती है तो निश्चित तौर पर उसे फायदा पहुचेगा। अगर बात की जाए नैतिकता की तो क्या इन दलों खासकर दलित समुदाय वालों ने भाजपा के साथ गठबंधन करके बहुत अच्छा किया है। यह बात तो उन्हें अम्बेडकर साहब को याद करने पर ही पता चलेगी। यह वही भाजपा और संघ है जो हमेशा से ब्राम्हणवाद का प्रतीक रहा है। यही संघ हमेशा से अम्बेडकरवाद और आरक्षण विरोधी रहा है। क्या सोंचकर उदित राज ने भाजपा से हाथ मिलाया होगा? क्या उनका दलित समाज भाजपा को वोट करेगा? अगर करेगा, तो इसका मतलब है अभी तक दलित समाज सामाजिक चेतना और इतिहास नहीं जान पाया है। और जिम्मेदार भी उदितराज जैसे नेता हैं। इसका मतलब है कि कि उदित राज या पासवान को पता है कि दलित समाज इतना नासमझ है कि हम अपने फायदे के लिए उसे जहां कहेगें वहीं वोट देगा। इसके लिए हम मुस्लिमों के साथ भी धोखा मान सकते हैं। क्योंकि ग्रामीण आँचलों का मुस्लिम अभी भी दलितों की स्थिति से उपर नहीं उठा है। वह हमेशा दलित नेतृत्व पसंद करता हैं। (इसमें यह अपवाद हो सकता है कि किसी पार्टी का बड़ा मुस्लिम नेता क्षत्रीय हो, तब मुस्लिम उसे वोट कर दें।) हम मानते हैं कि कांग्रेस ने आज तक दलितों को कुछ नहीं दिया है। लेकिन ऐसा भी नहीं है थोड़ा सा ही दिया हो, लेकिन छीना कुछ भी नहीं है। वहीं अगर भाजपा को मौका मिल जाए तो उसका एक बड़ा तबका आरक्षण को खत्म करना चाहता है। यहाँ तक कि उसका पित्रसत्तात्मक सोंच संघ का यह प्रमुख एजेंडा रहा है। भाजपा ने हमेशा से दलितों के साथ भी किराएदारों जैसा व्यवहार किया है। भाजपा अपने ही दलित नेताओं को आगे क्यों नहीं बढाती है। उसके जो गिने चुने नेता रहे भी हैं, वो पूरी तरह से हिन्दुत्व से डुबे हुए हैं। भाजपा के दलित मोर्चा अध्यक्ष संजय पासवान की एक किताब से हम यह समझ सकते हैं। उन्होने अपनी किताब में बाबू जगजीवन राम को हिन्दुत्ववादी नेता बता दिया। इससे बड़ा झूंठ और क्या हो सकता है। उन्होंने आज कांशीराम को भारतरत्न देने की मांग कर दी। क्या वो कांशीराम के उस बयान का समर्थन करते हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि "अयोध्या की विवादित जमींन पर राम मंदिर नहीं सौचालय बनाना चाहिए।" अगर हाँ तो सर्वजनिक करो। फिर देखो संघ और भाजपा संजय को कैसे गरियाते हैं। अगर उनकी बात से इत्तेफाक नहीं रखते हो, तो ऐसे आदमी को भारत रत्न क्यों जिसकी विचारधारा ही पसंद नही हो।
आखिर क्यों मोदी इन सभी चालों से प्रधानमंत्री पद का ख्वाब देख रहे हैं। फिर कहेंगे कि अपना एजेंडा सेट करने में गठबंधन के साथियों का दबाव आ गया था। फिर क्यों मिशन 272+ चला रखा है? बंद करो जब पता है 272 तक नहीं पहुंचेंगे। इसका मतलब क्या यह समझा जाए कि अगर 272 नहीं आए तो गठबंधन। और अगर आ जाएँ तो सबको लत मारो अकेले सरकार चलाएंगे। इससे बड़ा धोखा और क्या होगा? इसके साथ-साथ ये तत्काथित दलित नेता भी अपने समाज के सबसे बड़े गद्दार हैं। रामविलास पासवान को ही ले लो। हर चुनाव में एक अलग गठबंधन। अपनी जाति के 6-7 प्रतिशत वोटों को क्या समझ रखा है। जब चाहा लालू के साथ, जब चाहा नीतीश के साथ, फिर कांग्रेस के साथ, अब भाजपा के साथ। वो भी उस आदमी के साथ जिसके कारण 2002 में मंत्रीपद छोड़ा था। यह वही भाजपा है जिसमें रणवीर सेना के नेता आज तक हैं। रणवीर सेना के आगे भाजपा किस दलित नेता की सुनेगी। इसी रणवीर सेना के आतंक के डर से तो दलितों ने बिहार में भाजपा को बाहर का रास्ता दिखाया था।  आखिर अपनी कुर्सी के लिए और कितना गिरेंगे? और कितनी जगह अपने समाज को लेकर जाएंगे? अगर ऐसा ही करते रहे तो जिस दिन यह दलित समाज जाग गया, उस दिन इनका साथ छोड़ कोई मजबूत समाजहितैषी नेता का साथ पकड़ेगा। 

Wednesday, February 26, 2014

क्या राजनाथ सिंह की माफी काफी है?

अभी एक दो दिन पहले ही मैने एक ब्लॉग लिखा था। जिसमें मैने मोदी पर साम्प्रदायिकता और हिन्दुत्व की ओर लौटने का आरोप लगाया था। लेकिन 2014 के चुनाव पता नहीं किस चाल से होने जा रहे हैं, कि दो दिन बाद ही राजनाथ सिंह ने दिल्ली में मुस्लिम नेताओं के साथ एक कार्यक्रम किया और उसमें मुस्लिमों से माफी मांग ली। मैं बड़ा ही भौचक्का रह गया। यह भाजपा की एक बहुत बड़ी चाल हो सकती है। अगर यह बात स्वयं मोदी कहते तो शायद विपक्षियों को हमला करने का मौका मिल जाता। इसी को देखते हुए भाजपा अध्यक्ष से यह बातकहलवाई गई कि देश का मुस्लिम इसे पूरे भाजपा की तरफ से संदेश समझे। अब सवाल यह उठता है क़ि क्या अल्पसंख्यक समुदाय खासकर मुस्लिम मोदी या भाजपा को माफ कर सकते हैं। मुझे नहीं लगता है कि इतने बुरे बर्ताव के बाद मुस्लिम समुदाय भाजपा या मोदी को माफ कर देगा। वैसे तो भारतीय समाज में माफी को बहुत अच्छा माना जाता है। और कई बार प्रयास करने पर लोगों को माफी मिल भी जाती है। आप कांग्रेस का उदाहरण ले सकते हैं। सब को पता है 1984 के दंगों में कांग्रेस का हाथ था। लेकिन कांग्रेस ने उन दंगों के बाद अपनी छवि सुधारने का प्रयास किया। सिखों को पार्टी और देश में मौके दिए। कई बार कांगेस और गाँधी परिवार ने माफी भी मांगी। यह बात और है कि दंगों के आरोपियों को सजा नहीं मिली। लेकिन दिल्ली और पंजाब में भी कुछ हद तक सिखों नें कांग्रेस की इस माफी का स्वागत किया और उसे स्वीकार किया। पार्टी ने एक सिक्ख को प्रधानमंत्री तक बना दिया। वहीं भाजपा को गुजरात के विधानसभा चुनाव में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं मिलता है। पूरे देश में लोकसभा या विधान सभाओं में नक़वी और शहनवाज जैसों को छोड़कर  न के बराबर मुस्लिमों को टिकट दिए जाते हैं। भाजपा के प्रवक्ता इस प्रश्न पर हमेशा ही गुजरात की लोकल ग्राम और नगरपंचायतों में मुस्लिमों का उदाहरण देते हैं। यह आंकड़ा देते वक्त क्या वो यह समझते हैं कि देश की जनता इतनी नासमझ है कि उसे यह भी नहीं पता कि कानून कहाँ बनाए जाते हैं। जब कानून लोकसभा और विधानसभा में बनाए जाते हैं, तो उन्हें उसमें प्रतिनिधित्व क्यों नहीं दिया जाए। आखिर मोदी ने 2002 दंगों के बाद कभी प्रयास ही नहीं किया है इस समाज को जोड़ने का। क्यों मोदी ने केन्द्र द्वारा भेजी गई अल्पसंख्यकों की स्कॉलरशिप राशि को वापस भेज दिया और हाईकोर्ट के कहने पर भी नहीं देते रहे? देश को उनका वह भाषण अभी तक याद है जब उन्होंने जनवरी 2006 कहा था " हम नर्मदा का पानी अभी लाए हैं, अगर आप होते तो रमजान में लाते। " उनका हर वो भाषण याद है जब उन्होने मुस्लिमों को मियाँ मुसर्रफ की औलादें कहा करते थे। उन्हें दंगा पीड़ितों के शिविरों पर की गई टिप्पणी," हम दो हमारे दो, वो पांच उनके पच्चीस" भी आज तक देश भुला नहीं है। क्या देश आगरा का वो मंच भूल जाएगा जिसमें उन्होने संगीत सोम और राणा (मुजफ़्फ़र नगर दंगों के आरोपियों) को सम्मानित किया था। आखिर भाजपा भी यह माफी कौन सा मुंह लेकर मांग रही है। भाजपा के बड़े नेता अरुण जेटली के ब्लॉग में मैने पढ़ा कि आखिर 2002 के बाद गुजरात में कोई दंगा नहीं हुआ। लेकिन उन्हें यह क्यों याद नहीं रहता कि 2002 में ही मुस्लिमों को इतना कुचल दिया गया कि अब उनमें  जुर्म का विरोध करने की ताकत अब उनमें बची ही नहीं है। अगर आप साम्प्रदायिकता की बात करें तो देश में एक दो को छोड़कर कोई भी दल सेकुलर नहीं बचा है। लेकिन भाजपा का पूरा का पूरा इतिहास ही साम्प्रदायिकता की स्याही से लिखा हुआ है। हम मानते हैं कि कांग्रेस के शासनकाल में भी बहुत जगह दंगे हुए हैं लेकिन उसके लिए दंगे कभी राजनैतिक फायदे का स्टंट नहीं रहे हैं। वहीं भाजपा के लिए यह नैसर्गिक हथियार है। अगर 1961 के बाद हुए सभी दंगों की जांच आयोग की रिपोर्ट आप पढेंगे तो पता चल जाता है कि हर दंगे में संघ या भाजपा से जुड़े संगठनों के के कार्यकर्ता शामिल रहे हैं।
अभी एक-दो दिन से चिराग पासवान का एक बयान बहुत चर्चा में है जो पहले भाजपा कहा करती थी कि " सुप्रीम कोर्ट की एस.आई.टी. की क्लीन चिट के बाद मोदी पर दंगों के कोई आरोप रह नहीं जाते हैं। " लेकिन क्या देश की जनता यह नहीं समझती कि दंगे या कत्ल के मामलों में डायरेक्ट भूमिका होने पर ही उन्हें सजा मिलती है। जबकि मुख्यमंत्री जैसे पद पर बैठे व्यक्ति को कहीं भी सीधे जाने की जरूरत ही नहीं होती है। वह तो केवल एक फोन पर ही काम तमाम कर सकता है। उसने ग्रह मंत्री को कह दिया कि पुलिस को कार्यवाही करने से रोक दो। फिर यह बात ग्रहमंत्री के बाद भी कई चरणो में नीचे पुलिस तक पहुंचेगी। ऐसे में मुख्यमंत्री कोई खुद दंगों में शामिल होने नही जाता है। इतना भी नहीं इनके मंत्री बाबू  बजरंगी और माया कोड़नानी को तो सजा भी मिल चुकी है। लेकिन सजा के पहले उन्हें अपने मंत्रिमण्डल में भी बनाए रखा। बात केवल मुस्लिमों के कत्ल की ही नहीं गोधरा काण्ड में भाजपा या मोदी सरकार की उतनी ही जिम्मेदारी बनती थी।
आजकल सेकुलरिज्म को लेकर एक खींचतान मची हुई है। 11 दलों ने मिलकर एक सेकुलर तीसरा मोर्चा बनाया है। कांग्रेस और भाजपा हो या आम आदमी पार्टी और ये तथाकथित सेकुलर दल सब चुनाव के समय किसी मंच पर एक-दो मुस्लिम नेताओं को बुलाकर अपने को सेकुलर होने का सर्टिफिकेट लेते रहे हैं। इसका मतलब है कि सब मुस्लिमों को केवल वोटबैंक मानते हैं। अगर ऐसा होता तो 2004 में बुखारी के कहने पर मुस्लिमों ने भाजपा को क्यों नहीं वोट दे दिया था। आखिर कोई भी सेकुलर दल बिना बहुसंख्यक सम्प्रदायवाद से लड़े कैसे अल्पसंख़्यकों को सुरक्षा की गारण्टी दे सकता है। अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक दोनों ही सम्प्रदायवाद देश के लिए घातक हैं लेकिन देश में बहुत पुराने समय से एक बात कही जाती रही है कि अल्पसंख्यक सम्प्रदायवाद अपने चरम पर भी कानून व्यवस्था की कमजोरी बताया जाता है। वहीं बहुसंख्यक सम्प्रदायवाद को राष्ट्रवाद का प्रतीक बना दिया जाता है। यह ऐसा राष्ट्रवाद है जो देश के बहुसंख्यक समाज में भी पूर्णतया स्वीकार नहीं होता है। अगर ऐसा नहीं तो क्यों वो भाजपा आज मुस्लिमों से माफी मांग रही है, जिसके नेता मोदी 2002 दंगों के बाद के चुनावों में कहते थे कि हमें उनका वोट नहीं चाहिए। क्यों अपनी किताब "ज्योतिपुंज" में संघ के विरासत और सावरकर तथा गोलवलकर को गुजरात और देश पर कर्ज़ बताने वाले मोदी उनकी जगह उस सरदार पटेल की मूर्ति बनवा रहे हैं, जिन्होंने गाँधीजी की हत्या के बाद संघ को प्रतिबंधित कर दिया था। यह वही सरदार पटेल हैं, जिनके नाम पर 1990 में अहमदाबाद एयरपोर्ट का नाम  रखने पर ही मोदी के नेतृत्व में भाजपा और संघ ने 15 दिन तक आन्दोलन किया था। आज सब भूलकर गुजराती अस्मिता के नाम पर गाँधीजी की बजाय पटेल की मूर्ति बनवा रहे हैं। क्योंकि अगर गाँधी जी की मूर्ति बनवाते तो शायद इससे बड़ा मजाक कोई हो ही नहीं सकता था। इसका अर्थ तो यही है कि मोदी और भाजपा को यह बात समझ में आ गई है कि देश में कट्टरवाद को कभी स्वीकार नहीं किया जाता है। देश के नेताओं और व्यवस्था की मानसिक यदास्त इतनी कमजोर पड गई है कि थोड़े दिन में ही सबकुछ भूलने के नाम पर जनता को बेवकूफ बनाते हैं। अगर 84 के दंगों के आरोपियों को सजा होती तो शायद 1992 और 2002 भी नहीं होते, अगर 2002 वालों को सजा होती तो मुजफ़्फ़र नगर नहीं होता। देश की सिविल सोसायटी भी इसपर कुछ ज्यादा ही विचारहीनता दिखाकर इंदिरा गाँधी की हत्या, गोधरा और छेड़छाड़ बनाम में पड जाती है। देश को जर्मनी की सरकार से सबक लेना चाहिए आज इतने सालों बाद भी हिटलर के जमाने में सामिल रहे उन  दंगाइयों को फांसी दे रही है जो आज उम्र के नब्बे वर्ष पार कर चुके हैं। पता नहीं ऐसा इंसाफ हिन्दुस्तान (हिन्दुस्थान नहीं) में कब होगा।

Sunday, February 23, 2014

2014 में "आप" का क्या होगा?

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल आज रोहतक में एक बड़ी रैली करने जा रहे है। उनके कार्यकर्ता और बड़े नेता जोश से भरे हुए एक ही नारा लगा रहे हैं "अभी तो शीला हारी हैं, अब हुड्डा की बारी है" इस्तीफे के बाद तो अब मोदी की बारी है, भी कह रहे थे। दिल्ली की सफलता के बाद लोकसभा चुनावों में जाने की जल्दी हर राजनैतिक दल को है। उसी का शिकार केजरीवाल भी हो रहे हैं। उन्होने पार्टी की तरफ से 20 लोकसभा उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं। जिसमें सभी बड़े नेताओं के खिलाफ अपने बड़े नेताओं को खड़ा किया गया है। दूसरी लिस्ट भी आने को तैयार है. इसमें लखनउ से लाल बहादुर शास्त्री के पोते आदर्श शास्त्री, ज़िम्मी शेरगिल और भी कई बड़े नाम शामिल बताए जा रहे हैं। लेकिन इनमें से कुछ प्रत्याशियों के नामों पर कार्यकर्ता सवाल भी पूंछ रहे हैं। दिल्ली से आशुतोष, मुम्बई से मीरा सान्याल जैसे लोगों के नाम की घोषणा करकर्ताओं को उनकी मेहनत से उपर दिखाई दे रहे हैं। ज़िम्मी शेरगिल तो खैर पार्टी से बहुत पहले जुड़े थे। उन्होनें पार्टी के लिए कई प्रोग्राम दिल्ली में भी किए थे। खैर यह तो हर पार्टी में होता है। सभीको खुश करना भगवान के भी वश की बात नहीं होती है।
 इस बीच अगर हम अरविन्द केजरीवाल की राजनीति को समझने की कोशिश करें तो पता चलता है, कि अंबानी ही एक मात्र तीर हैं। जिसे राहुल और मोदी दोनो पर चलाया जा सकता है। यह बात सही भी है कि आखिर अरविन्द केजारीवाल के पत्रों का जवाब किसी नेता की तरफ से क्यों नहीं आया। बीजेपी के एक प्रवक्ता टी.वी. पर कहते मिले कि ये सड़कछाप लोगों का जवाब मोदीजी नहीं दे सकते। अरे भई अगर आप केजरीवाल को जवाब नहीं दे सकते, तो हम कैसे मान लें कि आप जनता के सवालों का भी जवाब देंगे? मतलब अंबानी के मुद्दे पर दोनों ही बौखलाए तो हैं, लेकिन इस बौखलाहट में चिल्लाना उल्टा पड सकता है। आजकल मोदी और राहुल की रैलियों की तुलना हो रही है। राहुल गाँधी की रैली मोदी की तुलना में थॅकी हुई लगती है, वहीं मोदी की तुलना में केजरीवाल की शुरुआत और भी जोरदार दिख रही है। हालांकि जनता से संवाद मोदी की तुलना में राहुल गाँधी अच्छा कर रहे हैं। और राहुल की तुलना में केजरीवाल ज्यादा जमीनी नेता दिखाई दे रहे हैं। केजरीवाल को 2014 के चुनाव में यूपी और बिहार में जातिगत समीकरणों के कारण वोट तो मिलेंगे, लेकिन कितनी सीटों पर विजयी होंगे। यह कहना मुस्किल लगता है। इसी को देखते हुए मोदी भी पासवान और उदित राज से दलितों के लिए और सोनेलाल पटेल की बेटी अनुप्रिया पटेल से यूपी में गठजोड़ की कोशिशों में लगे हुए हैं। अब यह गठजोड़ हो पाएंगे या नहीं यह 4-5 दिन में साफ हो जाएगा। 
खैर केजरीवाल ने किसी से गठजोड़ करने की बात का तो खण्डन कर दिया है। लेकिन चुनाव से पहले आम आदमी से जुड़े हुए मुद्दों को जोर से उठा रहे हैं। मोदी केवल कांग्रेस पर आरोप लगाकर प्रचार करते हैं, वहीं केजरीवाल सभी विरोधियों को घेर कर जनता के मन की बात कह जाते हैं। अभी जय जवान, जय किसान का नारा भी बहुत कारगर साबित होगा। हरियाणा में उन्होंने अपने प्रचार की शुरुआत से ही बता दिया कि मोदी से बेहतर साबित होने के लिए अभी वो और कौन से दांव खेलेंगे। हरियाणवी अंदाज में किसानों का दिल जीतने वाला भाषण दिया। जो लोग मोदी को जीता हुआ मानकर चल रहे थे, उनकी जानकारी के लिए यह भी बता दिया कि 200-235 सीटें देने वाले चैनल भी मोदी और अंबानी के हाथों बिके हुए हैं। सबसे अच्छी बात तो यह रही कि मोदी की रैलियों के महाआयोजन पर भी उन्होंने भ्रष्टाचार का आरोप लगा दिया। अपनी चाय वाले की छवि का फायदा मोदी ले रहे हैं, इसी को भाँपते हुए केजरीवाल ने सवाल दाग दिया क़ि चाय वाले के पास हेलिकॉप्टर कहाँ से आ गए। यह आलोचना बहुत अच्छी थी। आने वाले दिनों में मोदी के लिए और भी कठिनाइयाँ होने वाली हैं। उन्हें केजरीवाल के कठोर सवालों से निपटना पड़ेगा। 
अगर हम जनता की एक मनोभावना को समझने की कोशिश करें तो केजरीवाल के इस्तीफे वाले एपिसोड से जनता के बीच उनकी विश्वसनीयता बढी है। उसके बीच में अंबानी पर एफ.आई.आर. दर्ज करवाने के बाद से केजरीवाल की छवि एक संघर्षशील नेता की हुई है। केजारीवाल आज हर जगह चर्चा का विषय बने हुए हैं। लेकिन अब सवाल उठता है कि क्या पार्टी को देश भर में लोकसभा चुनाव में कुछ मिल पाएगा। क्योंकि लोकसभा चुनाव में तो हर आदमी पार्टी की हैसियत को देखते हुए वोट देता है। लेकिन सच तो यही है क़ि 1989 के बाद से हर चुनाव में क्षेत्रीय दलों की हैसियत बढी है। अन्य क्षेत्रीय दलों को आप आम आदमी पार्टी के साथ नहीं जोड़ सकते हैं। क्योंकि यह एक आन्दोलन से निकली है, जिसका प्रभाव पूरे देश में खासकर शहरी क्षेत्रों में रहा है। इस पार्टी को सकारात्मक राजनीति के परिणाम स्वरूप लोकसभा में अच्छी तादाद में वोट मिलेगे। यह बात निश्चित तौर पर नहीं कही जा सकती कि ये वोट कितनी सीटों में परिवर्तित हो पाएंगे? हाँ हम यह जरूर कह सकते हैं कि जितनी भी सीटें मिलेंगी वो सरकार के खिलाफ मुख्य विपक्षी दल का काम करेंगे। और आने वाली 16वीं लोकसभा जो मिलीजुली सरकार लेकर आएगी, वो 2015-16 तक भंग भी हो जाएगी। इसके बाद होंने वाले चुनावों में आम आदमी पार्टी बहुत मजबूती के साथ दावा पेश करेगी। यह हो सकता है कि वह बहुमत पाने लायक पार्टी ना रहे लेकिन इस पार्टी के पास अगले दो-तीन साल में 150-170 सीटें पाने वाली ताकत तो आ ही जाएगी।

मोदी हिन्दुत्व पर क्यों लौट रहे हैं?

पिछले एक साल में मोदी की ब्रांडिग गुजरात विकास को लेकर की जा रही थी। अचानक क्या हुआ कि उन्हें अपनी पुरानी छवि यानि (हिन्दुत्व) याद आने लगी। अगर हम मोदी के राजनैतिक इतिहास को उठकर देखें तो पता चलता है कि उनके अंदर संघ की कट्टर सोंच कूट-कूट कर भरी हुई है। लेकिन उनकी मैनेजमेंट टीम को इस बात का आभास था, कि देश में कोई भी नेता कट्टरता के नाम पर सफल नहीं हुआ है। तभी तो भाजपा की एक मात्र सरकार अटल जैसे उदारवादी नेता के नेतृत्व में बनी थी। मोदी की मैनेजमेंट टीम ने इसी बात को ध्यान में रखकर मोदी की छवि एक विकासपुरुष के रूप में करनी शुरु कर दी। मोदी का समर्थक वर्ग कई प्रकार का है, इस बात का जिक्र मैं कई बार कर चुका हूँ। कट्टरवादी विचारधारा का वर्ग उनकी छवि को जानता है, और उनका पक्का वोटर है। लेकिन उनकी ओर बढ़ा मध्यमवर्गीय और युवावर्ग उनकी विकासपुरुस की छवि के आधार पर ही जुड़ा है। इसको जोड़ने के लिए उनकी मैनेजमेंट टीम नें मीडिया खासकर इलेक्ट्रानिक्स मीडिया और सोसल मीडिया पर एक हवा बनाई। इस हवा में कितना दम है, यह बहस का विषय है। जिन्होनें गुजरात देखा है वो ऐसा नहीं बताते हैं, जैसे मोदी ने प्रचार किया।
मेरे कई मित्र अक्सर यह कहते दिखाई दे जाते हैं कि मोदी की लहर है। अगर मैं पूंछता हूँ कि लहर में कितनी सीटें मिलेंगी तो कहते हैं 200-225 तक। बड़ी हंसी आती है इस लहर को सुनकर। लहर तो तब मानी जाती है जब 300 से अधिक सीटें लाइए। यहाँ तो बहुमत भी हांसिल नहीं हो पा रहा है। क्यों मोदी की लहर एक हवा नजर आती है? और इस हवा में भी ब्लोअर का इस्तेमाल किया जा रहा है। कांग्रेस के पास ऐसा को नेतृत्व नहीं है जो मोदी की इस तथाकथिक लहर को चुनौती दे सके। कांग्रेस के पास इस अंतिम समय राहुल नाम का एक तीर बचा है, लेकिन यूपीए के दस सालों के काम से वो भी भोथरा हो चुका है। मोदी हर समय अपने सामने राहुल को दिखाना चाहते थे, लेकिन कांग्रेस को इस हार का अंदाजा हो चला था।
अचानक से 8 दिसंबर से देश की राजनीति में एक बदलाव आ गया। 3 राज्यों में भाजपा, 1 में कांग्रेस की सरकार बनी लेकिन पिछले 2-3 महीने से लगातार मीडिया और सिविल सोसयटी में केजरीवाल ही चर्चा का केंद्रबिंदु बने हुए हैं। मैं नहीं कहता कि इसमें केजरीवाल से कुछ गलतियाँ नहीं हुई होंगी। ऐसा कोई कार्य नहीं होगा जिसमें इंसान से गलती ना हुई हो। आपको एक बात सफल लग सकती है, वही बात मुझे गलत। लेकिन कुल मिलाकर अरविन्द की छवि पर इस्तीफे से कोई फर्क नहीं पड़ा है। उनकी छवि नायक फिल्म के अनिल कपूर जैसी हो गई है। आज अरविन्द केजरीवाल की चर्चा हर जगह हो रही है। एक बड़ा वर्ग खासकर युवा है जो पहले कांग्रेस के मुकाबले मोदी को देखना चाहता था। लेकिन अब वो अरविन्द केजरीवाल का फैन हो गया है। और यह बात मोदी या भाजपा को रास नहीं आ रही है। क्योंकि उन्हें पता है कि केजरीवाल के सामने मोदी की यह हवा धीमी पड जाएगी। तभी तो भाजपा के प्रवक्ता आम आदमी पार्टी को कांग्रेस की बी टीम बताने में जुटे हुए हैं। आखिर क्यों शहजादे को ललकारने वाले मोदी अरविन्द जैसे आम आदमी से डर रहे हैं? क्यों नाम लेकर हमला नहीं करते हैं? क्योंकि उनके सामने उनकी ब्रांडिग की हवा निकालने वाला आदमी आ गया है। जो मोदी से बेहतर वक्ता और जनता के मुद्दों को जानने वाला है। उसे मीडिया का संचालन भी मोदी से बेहतर आता है। और उसके पास मोदी से अधिक ज्ञान भी है। क्यों मोदी केजरीवाल से खुली बहस करने से कतराते हैं।
ऐसे में केजरीवाल ने भी मोदी की कमजोरियों को जान लिया है। उन्होंने गुजरात के विकास की पोल खोलनी शुरु कर दी है, जो कांग्रेस नहीं कर पाई। उसने अंबानी पर एफ आई आर करवा कर मोदी+राहुल=अंबानी का नारा देकर जनता को समझना शुरु कर दिया है। जनता को मोदी की पूंजीवादी विचारधारा बतानी शुरु कर दी है। आखिर क्यों मोदी केजरीवाल के पत्रकार का जवाब देने की बजाय बैकफुट पर आ गए हैं।
अब मोदी ने भी अपना आडवाणी और संघ द्वारा दिया गया गुरुमंत्र प्रयोग करना शुरु कर दिया है। मोदी हिन्दुत्व पर वापस आ गए हैं। उन्होंने कल ही अरुणाचल प्रदेश में चीन पर हमला बोला, वहीं असम में बांग्लादेशी प्रवासियों पर। वो भी बांग्लादेश के प्रवासियों में केवल मुस्लिम ही उनके निशाने पर थे। उन्होने क्यों कहा कि हम बांग्लादेश, नेपाल या पाकिस्तान में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार को बर्दास्त नहीं करेंगे? प्रवासियों में हिन्दू-मुस्लिम की बात कहाँ से आ गई? अब उन्हें समझ में आ गया है कि विकास के साथ-साथ अपने पुराने वोटबैंक को हिन्दुत्व के जरिए भी पक्का करना होगा। कहीं वो भी रुष्ट ना हो जाए। अभी चुनाव के 2-3 महीने बाकी हैं, तब तक मोदी की राजनीति कैसे चलेगी? इसपर सभी की नजर रहेगी। मोदी अपने हिन्दुत्व के एजेंडे को पूरे जोर से उठाने की कोशिश खुद ना करके अपने कार्यकर्ताओं या अन्य नेताओं से करवा सकते हैं। वहीं अन्य विरोधी दल कांग्रेस, सपा, बसपा, जडयू सभी मोदी (साम्प्रदायिकता) बनाम स्वयम् (धर्म-निरपेक्षता) की लड़ाई दिखाना चाहते हैं। इससे देश के बहुसंख्यक समुदाय में मोदी को कुछ हद तक फायदा भी मिल सकता है। मोदी पूरी तरह से हिन्दुत्व पर ना रहकर विकासपूरुष की छवि भी रखना चाहेंगे, लेकिन उसका काउनटर अटैक अरविन्द केजरीवाल से बेहतर शायद ही कोई कर पाएगा। आने वाले समय में क्या कुछ होगा वो तो नहीं पता। लेकिन जो भी होगा, दिलचस्प होगा।

Sunday, February 16, 2014

यूपी-बिहार की बढ़ती रिश्तेदारियाँ

राष्‍ट्रीय स्तर पर उत्तर प्रदेश और बिहार का नाम एक साथ लिया जाता है, "यूपी-बिहार" मतलब भाई-भाई जैसा ही माना जाता रहा है। हालांकि मैं अभीतक एक बार भी बिहार नहीं गया हूँ। या जहानाबाद तक ही देखा है। फिर भी मैनें पूरे बिहार को बहुत अच्छे से देखा है, पढ़ा है और सुना है। मेरे कई मित्र बिहार के रहे हैं। मैं मुम्बई में रहता हूँ और  उत्तरप्रदेश का हूँ इसलिए जब कभी भी कोई बिहार का आदमी मिल जाता है तो एक अपनापन दिखता है। हर बिहारी घर का ही या पड़ोसी लगता है।
अब मैं आता हूँ अपनी मुद्दे की बात पर तो आपको बताना चाहूंगा कि हमारे उत्तर प्रदेश के यादवों, पश्चिमी उत्तरप्रदेश और हरियाणा के जाटों में लड़कियों की कमी दिन पर दिन घटती ही  जा रही है। वैसे तो पूरे देश और हर समाज में यह समस्या है लेकिन इन तथाकथित समुदायों में यह समस्या सबसे उपर है। इसके कारण बहुत हो सकते हैं। फिलहाल मैं इस वक्त उन चीजों का जिक्र करना उचित नहीं समझता हूँ। सभी को पता है कि भगवान ने आदमी और औरत को लगभग 50-50 प्रतिशत के अनुपात में रखा है। जिससे सभी के जोड़ियाँ बनाना आसान हो। लेकिन समाज की तथाकथित बुराइयों या कुरीतियों की वजह से लोगों को समयस्याएं होती हैं। अक्सर यह अंतर गावों में और भी देखने को मिलता है। 1000 पुरुषों पर 991 स्त्रियों के अनुपात का आंकड़ा शहरों और आदिवासियों का मिलकर है, जहाँ लड़कियों की संख्या ठीक-ठाक होती है। इन हिस्सों में आप होने वाले महिलाओं के विरुध्द अपराधों (बलात्कार आदि) का एक कारण इसे भी मान सकते हैं।
उपर्युक्त कारणों की वजह से उत्तरप्रदेश की कुछ तथाकथित जातियों में आजकल शादियाँ होना बहुत मुश्किल होता जा रहा है। मेरे आपने गाँव में लगभग 50 फीसदी आबादी यादवों की है। और इनमें से लगभग 60 प्रतिशत युवक (30 वर्ष से अधिक उम्र के) होंगे जिनकी शादी अभीतक नहीं हुई है। मेरे गाँव के आस-पास (कानपुर ज़िले का मशहूर कस्बा बिठूर, लवकुश के जन्म, वाल्मीकि के रामायण लिखने के स्थान और रानीलक्ष्मी बाई के जन्म स्थान के लिए प्रसिद्ध है।) के पास किशुनपुर, पटकापुर, भाउपुर, डिंगरपुर आदि) कई सारे गाँव यादव बहुल हैं। इन सब गांवों में एक बात बहुत कॉमन हो गई है कि अगर किसी युवा की सरकारी नौकरी नहीं लगी तो शादी होना मुस्किल हो जाता है। यह बात भी है कि औसतन इस जाति के ल़ोग सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे, सरकारी नौकरी वाले, खेती वाले, पैसे वाले और ठाकुरों जैसे वर्चस्व वाले होते हैं। इस लिए इस समाज में अगर एक आम या मध्यमवर्गीय परिवार हुआ और उसकी सरकारी नौकरी नहीं है तो कोई अपनी  लड़की को देना ही नहीं  चाहता है। उपर्युक्त बातों से आप समझ सकते हैं कि इस जाति में दहेज का प्रचलन बहुत कम हो गया है। लड़के वाला लेने की कोई बात नहीं तय करता है और लड़की वाले के पास भी अच्छा खासा पैसा होता है। तो वो अपनी खुशी से ही लड़की को देता है। क्योंकि उसके अपने लड़कों पर भी वही बात लागू होती है। पिछले कुछ सालों से बहुओं की कमी को दूर करने के लिए इन लोगों ने एक नया उपाय सोंचा। एक दो दलाल होते हैं जिनका बिहार के कुछ गावों में अच्छा खासा व्यवहार और पहचान होती है। ये लोग इन दलालों से मिलकर बिहार जाते हैं और 20-25 हजार से लेकर 1-1.5 लाख में मनपसंद लड़की के साथ शादी करवा लाते हैं। ज्यादा खर्च भी नहीं होता है। जैसे दाम होगा वैसी ही लड़की मिलेगी। पहले मेरे मन में भी आप ही की तरह एक बात घूमा करती थी कि ये लड़कियां खरीद कर लाई जाती हैं। तो आप गलत भी हो सकते हैं। क्योंकि मैनें कई अपने निकट के लोगों और एक-दो उन औरतों से जो वहां से ब्याह कर आई हैं, उनसे इस विषय पर बात की तो पता चला कि केवल दलाल ही 10-15 हजार या लड़की के हिसाब से पैसे लेता है। बाकी पैसे वहीं पर शादी की रशमों में खर्च हो जाते हैं। मतलब लड़के की तरफ से केवल 4-5 लोग ही जाते हैं और लड़की की तरफ़ से पूरे गाँव और रिश्तेदारों को निमंत्रण देकर पूरे रीति-रिवाज के साथ शादी करवाई जाती है। उन लड़कियों के घर वाले बहुत गरीब होते हैं। आप बिहार के सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर इसका अंदाजा लगा सकते हैं। ऐसा भी नहीं है कि लड़कियों के माँ-बाप शादी के बाद लड़की को भूल जाते हैं। वो दूरी और अपनी आर्थिक स्थिति को देखते हुए साल-छह महीने में अपनी बेटी से मिलने या बड़े त्योहारों पर मिलने आते रहते हैं। वो अपनी आर्थिक स्थिति के हिसाब से बेटियों की शादी करते हैं। मैं निश्चित रूप से नहीं कह सकता लेकिन इनमें से ज्यादतर लोग गरीब होने के साथ-साथ दलित या पिछड़ी जातियों के होते हैं। मैं यह भी मानता हूँ कि यूपी के इन यादवों को बिहार के यादवों की लड़कियां भी मिल जाती होंगी क्योंकि बिहार के यादवों और उत्तरप्रदेश के यादवों में आर्थिक और सामजिक विकास का बहुत अंतर है। उत्तरप्रदेश के यादव तो केवल संविधान में मिले आरक्षण के आधार पर ही पिछड़े हैं। लेकिन बिहार के यादवों की स्थिति अभी भी बहुत कमजोर है। पश्चिमी यूपी और हरियाणा के जाटों की भी लगभग यही हालत है। यह सब भी बिहार या झारखण्ड से ही लड़कियां लाकर शादी कर रहे हैं।
इस सब में कुछ सामाजिक पहलू भी अहम होते हैं। जैसे पुराने रीति-रिवाज (अंतरजातीय विवाह) आदि खत्म से होते दिख रहे हैं। भले ही अब तक सबसे कट्टर समाज इन्हीं का रहा हो लेकिन खाप पंचायतों ने भी इन शादियों को माना है। मानेंगे नहीं तो क्या करेंगे वंश तो आगे बढाना ही है। आज मैं देखता हूँ बड़े समाज और रीतियों की दुहाई देने वाले तथाकथित समाजों ने अब इन शादियों के बाद दी जाने वाली रिसेप्शन पार्टियों को स्वीकार किया है। मैनें उन लोगों को भी देखा है जो लोग दलितों को कीडे-मकोडे के समान मानते थे, आज उन्हीं के घर में बिहार से बहू आई है। पता भी नहीं है, कौन सी जाति की होगी? आज पूरा का पूरा समाज इसे स्वीकार कर रहा है। मेरे गाँव में एक दलित की औरत की मृत्यु हो गई थी। दो-तीन साल बाद बिहार से ही उसने शादी कर ली। अब पता चलता है कि उसकी यह बीवी बढई जाति की है। जो मेरे गाँव में उस दलित जाति की परछाई भी नहीं बर्दास्त करते थे। आज उन सबकी सोंच में बदलाव आया है।  इस पूरी प्रक्रिया में हमें और भी कुछ सामाजिक सुधारों का ज्ञान होता है। जैसे यह तथाकथिक जातियाँ लड़की बचाओ आन्दोलन का एक मजबूत और अभिन्न हिस्सा बन गए हैं। इन्हें उस बिहार के आगे हाथ फैलाते और ताकते शर्म आती होगी, जिसे ये लोग ना जाने कैसी-कैसी बातें कहते रहे हैं? इन्हें बिहार के उस साहस की दाद देनी चाहिए, जो गरीब और पिछड़ा होते हुए भी लड़कियों को जिंदा रखता है। ऐसा भी नहीं है कि केवल जिंदा रखता है, इनमें से कई बहुएँ पढी-लिखी भी होती हैं। आज वह उत्तर प्रदेश अपने छोटे भाई काहे जाने वाले बिहार से सबक लेने को तैयार दिखता है।
अगर हम पूरे समाज और बदलाव की समीक्षा करें तो पाते हैं कि उत्तर प्रदेश जैसे कट्टर और सामाजिक कुरीतियों से बंधे प्रदेश में एक नई सोंच आई है। वो किसी भी जाति की शादियों को मंजूर कर रहे हैं। आज जाति-पाति भूल रहे हैं। पिछले दशक में हुए पापों (अपनी बेटियों की हत्याओ) का पश्चाताप कर रहे हैं। अब लड़कियों को समाज का हिस्सा मानकर उन्हें पाल रहे हैं। उन्हें भी किसी ना किसी नजर से अपने बराबर का हिस्सा मान रहे हैं। उन्हें पता चल रहा है कि अगर यह आधी आबादी भी नहीं रहेगी तो बाकी आधी आबादी (मर्द) भी जल्द ही समाप्त हो जाएंगे। एक बार फिर से मैं बिहार के इस जज्बे और प्रयास को सलाल करता हूँ। इसमें एक बात उत्तरप्रदेशियों की भी दाद देने लायक है कि ये लोग इन बहुओं के साथ दहेज-हत्या या महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा जैसे जघन्य अपराध नहीं करते हैं। बहुत प्यार से परिवार संग शामिल कर लेते हैं। आप इसे एक आधुनिक बाजारीकरण या प्रवासीकरण के दौर में एक नए कदम की तरह देख या प्रस्तुत कर सकते हैंइसमें एक बात उत्तरप्रदेशियों की भी दाद देने लायक है कि ये लोग इन बहुओं के साथ दहेज-हत्या या महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा जैसे जघन्य अपराध नहीं करते हैं। बहुत प्यार से परिवार संग शामिल कर लेते हैं।

Monday, February 10, 2014

हमारे समाज की एक हकीकत यह भी है।

आजकल हम लोग जिधर भी सड़क पर निकलते हैं, तो हर चौराहे, ब्रिज, स्कैईवाक आदि पर कोई ना कोई अपंग बैठा या पड़ा हुआ भीख मांगते हुए दिखाई देता है। भीख देने के मामले में मैं बहुत कट्टर हूँ। इसपर मैने तहलका में प्रियंका दुबे की रिपोर्ट पढी थी। उसमें हमारी आंखे खुल जाती हैं। इस क्राइम को लेकर। लेकिन आज छोटे बच्चे और बूढ़े लोग जो अपंग हैं, उन्हे भी ये गिरोह के लोग खरीद लेते हैं। मैने ऐसे ही एक बच्चे से बात की। वो सान्ताक्रुज में एक ब्रिज पर बैठता है। उसके हाथ कटे हुए थे, या जन्म से नहीं हैं। यह समझ में कम आया। मैने उसे पूछा," बेटा तुम कहाँ रहते हो? तुम्हारे मम्मी-पापा कहाँ हैं? तुम्हारा नाम क्या है?" उसने कुछ भी जवाब नहीं दिया। बहुत प्रयास करने पर भी नहीं बोला. मैं रोज वहाँ से निकलते समय एक-दो रुपए देनें लगा। एक दिन रविवार की दोपहर को जब रास्ता खाली था, तब उसे 5  रुपए देकर वही बाते पूंछी तो वो गुस्सा होकर बोला," मेरे मम्मी-पापा नहीं हैं." मैने पूछा तो कहाँ रहते हो? उसने जवाब दिया," "जावेद भाई के पास" मैंने नाम पूछा तो बताया,"छोटे" मैने पूछा कब से रहते हो यहाँ तो बोला," जब से ध्यान है, तब से" पूछने पर बताया कि वाकोला में एक रूम में हम सब बच्चे लोग रहते हैं। जावेद भाई वहाँ नहीं रुकते हैं। " तब तक एक आदमी आया और उसे देखकर वो बच्चा बोला," आप जाओ यहाँ से" मैं चल दिया। मुड़कर देखा तो उस आदमी ने बच्चे को बहुत डांटा। मैं कुछ नहीं बोला वहाँ से चला आया। कई दिन तक वो बच्चा नहीं दिखा। जब दो-तीन महीने बाद दूसरे ब्रिज से निकला तो वो मिल गया। मैने पूछा," कैसे हो?" बच्चा बोला," आप जाओ उस दिन आपकी वजह से मैनें बहुत मार खाया था। " मैं वहां से चला गया।
पूरा दिन सोंचता रहा क़ि वो कौन होगा? कैसे आया होगा? फिर अपने थोड़े से दिमाग का प्रयोग कर सोंचा क़ि शायद यह जन्म से ऐसा होगा या कुछ दिन बाद हो गया होगा। तभी इसके मां-बाप ने इसे फेंक दिया होगा। कोई नहीं मानेगा क़ि कोई माँ-बाप अपने बच्चे को कैसे फेंक सकते हैं? लेकिन हकीकत हो सकती है। कौन ऐसे बेकार या बोझ बच्चे को रखना चाहेगा? शायद उन्होंने यही सोंचा होगा। तभी यह बच्चा इस गिरोह को मिल गया होगा। अब यही लोग इस बच्चे की मजबूरी से पैसा कमाते हैं। और भी कई तरह के विचार आए, जैसे किडनैप हुआ होगा या खो गया होगा। कुछ क्लियर नहीं हो सका। मैं रात को भी यही सोंचकर काफी चिंतित रहा। आज हमारे सभ्य समाज को इस बात पर हंसी आ सकती है। कोई घिन भी लग सकता है। लेकिन अगर चिंतन करके देखा जाए तो क्या हमारे महान देश की यह हकीकत नहीं है। आपके बच्चे कितने ही बड़े स्कूल में पढ़ते हों. लेकिन देश में यह भी एक हकीकत है। अपने साथ या अपने बच्चों के साथ ऐसा होने का सोचते हो रोएँ खड़े हो जाते हैं। समझ में नहीं आता है. क्या होता या क्या होगा?
हमारा समाज किताबों, मैसेज, वाट्सएप, फ़ेसबुक पर हमेशा ही माँ-बाप की इज्जत बातें करता रहता है। स्कूलों में भी बच्चों को इसपर बहुत कुछ सिखाया जाता है। हम अपने बच्चों को माँ-बाप की इज्जत करने की बात करते हैं। लेकिन अपने बुजुर्गों के साथ क्या करते हैं? अगर कोई ध्यान भी दिला दे तो गुस्सा आ जाता है। एक औरत अपने माँ-बाप से हर महीने मायके जाने की बात करेगी। लेकिन अपने पति के माँ-बाप को भिखारी की तरह व्यवहारित करने लगती है। किसी भी बुजुर्ग की इज्जत तभी तक होती है जब तक उसके हाथ से कुछ लेने का लालच होता है। आप अपना उदाहरण सोंच सकते हैं कि मैं ऐसा नहीं करता हूँ। लेकिन अपने व्यवहार को दूसरे की नजर से देखो तो पता चलेगा? इस मुद्दे पर हाल ही का मेरे साथ हुआ एक उदाहरण पेश करना चाहूंगा।
मेरे घर और ओफ़िस के बीच में में एक चौराहे पर एक 70-80 साल का बुढ्ढा ब्रिज की सीढियों के नीचे सोता हुआ या बैठा हुआ मिलता था। मैं उसे रोज देखता ना वो किसी से पैसे माँगता और ना ही कोई उसे कुछ देता। धीरे-धीरे उसकी स्थिति का अंदाजा मुझे होने लगा था. लेकिन पता नहीं किसी डर से मैं उसकी मदद नही करता था। एक दिन मेरे आगे एक चल रही थी. उसने उसने उस बुढ्ढे को 10 रुपए दे दिए। मैंने भी उस दिन के बाद उसे रोजाना 10-20 रुपए देने शुरु कर दिए। वो पैसे देकर मुझे कुछ खुशी मिलती। एक बार बारिश हो रही थी। वो ब्रिज पर जाना चाहता था। लेकिन सीढियाँ नहीं चढ पारहा था। उस दिन मैने उसकी मदद की और उपर तक उसे सहारा देकर चढ़ा दिया। उसके पास कुछ सामान नहीं था. मैने उसकी जानकारी के लिए कुछ पूछा तो उसने बताया कि वो पूना का रहने वाला है। उसका एक बेटा है. रोते हुए बताने लगा कि मेरी पत्नी बहुत पहले गुजर गई थी। बेटे को मजदूरी करके पढ़ाया था। बैंक में नौकरी लग गई. बैंक में ही काम करने वाली एक लड़की से लव-मैरिज कर ली थी। मैं भी इमोशनल हो गया. आगे उसने बताया कि बहू मुझे कुत्ते की तरह डाँटती थी। बाथरूम जानें नहीं देती थी। खाना नहीं मिलता था तो दवाइयों की क्या बात। कई बार उसके ही कहने पर बेटे ने मारा। तो मैं भाग आया. आगे बताया कि सामने एक छोटा सा रेस्टोरेन्ट वाला ही कुछ खाने को दे देता है। फिर तो एक सिलसिला चालू हो गया। मैने हर दिन 10-20 के अलावा कभी कभी 100-200 देने भी शुरु कर दिए। एक दिन सेलरी वाले दिन 500 दिए. तो अगले दिन देखा तो थोड़े से अच्छे कपड़े और चप्पल कहीं से लाकर पहने हुए था। सच बताउ तो उसके पास 2-4 मिनट से ज्यादा रुकने में शर्म आती थी कि कोई पहचान वाला देख न ले। कुछ ही दिन हुए होंगे. मैं 4-5 दिन के लिए गाँव चला गया। लौटकर आया तो वो मुझे नहीं दिखा। दो-तीन दिन बाद सामने रेस्टोरेन्ट वाले से पूंछा जो उसे खाना देता था। तो उसने बताया अरे वो बुढ्ढा तो एक दिन बीमार हुआ। वहीं पर टट्टी-पेशाब करके पड़ा रहा। मैंने बी.एम.सी. वालों को बोला तो वो लोग अस्पताल ले गए। बाद में वहीं से एक आदमी उसका पता या कोई पहचान वाला पूछने आया था। मैंने कहा नहीं पता तो बताया कि वो मर गया था। फिर बी.एम.सी. वालों ने ही जला दिया होगा। सुनकर मैं बहुत चिंतित हो गया। ओफ़िस तो गया लेकिन मन नहीं लगा तो दोपहर से वापस आ गया। पूरा दिन सोंचता रहा। रात को बहुत कोशिश की तब जाकर 3 बजे नींद आई। दो-तीन दिन वहाँ से निकलते हुए सब सुना लगा। फिर धीरे-धीरे मन से उसकी तस्वीर भी ओझल हो गई। आखिर वो कौन था मेरा. बाकी घिसी-पिटी पुरानी बातें और प्रवचन देकर क्या फायदा?

Thursday, February 6, 2014

क्या आरक्षण पर हो रही बहस सार्थक है?

पिछले दो-तीन दिन में कांग्रेस के महासचिव जनार्दन द्विवेदी जी टी. वी. की बहसों में छाए हुए हैं। कारण है उनका जातिगत आरक्षण का विरोध करना। यह बहस कोई पहली बार नहीं शुरु हुई है। इसके पहले भी कई तरह के आन्दोलन इस बात के पक्ष में होते रहे हैं। कई तरह के आरक्षण विरोधी संगठन (यूथ फॉर इक्वालिटी, आरक्षण खत्म करो, Ant-Reservation) जन्‍तर-मन्‍तर और रामलीला में दिखाई देते रहे हैं। लेकिन आरक्षण को लेकर पिछले दो-तीन दशक में आरक्षण पर इतनी बहस तो केवल मंडल कमीशन के समय ही हुई थी। इस बहस में एक बात अक्सर सामने आ रही है जो द्विवदी जी ने खुद कही थी कि बाबा साहब अम्बेडकर ने ही संविधान में लिखा था कि दस साल बाद आरक्षण खत्म कर दिया जाना चाहिए। लेकिन वो लोग बिना संविधान पढ़े ही बोल रहे हैं। क्योंकि बाबा साहब ने अनुच्छेद 334 में यह लिखा था कि अगर दस वर्ष में अनसूचित जातियों-जनजातियों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिल जाए तो राजनैतिक आरक्षण को खत्म कर दिया जाएगा। अब सवाल है क़ि क्या राजनीति में इन जातियों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया गया है? बिल्कुल नहीं। आज लोकसभा की 121 सीटों में कितने ऐसे सांसद हैं जो अपने समाज की आवाज को संसद में उठा सके हैं। अगर मायावती, जगजीवन राम जैसे कुछ उदाहरण छोड़ दिए जाएँ। जब तक उनके आका कुछ नहीं बोलते तब तक उनके मुंह से आवाज तक नहीं निकलती है। प्रमोशन में आरक्षण बिल में ही समाज वादी पार्टी के दलित सांसद ने ही बिल को फाड़ दिया था। अब आप ही बताइए क्या यह काम उसने अपने दिल से किया होगा? क्या सपा के मुखिया के कहने पर यह नहीं हुआ होगा। (हालांकि मैं व्यक्तिगत तौर पर प्रमोशन में आरक्षण पर एक स्टैंड नहीं ले पाया हूँ। मुझे सही तरह से इसपर और ज्यादा  पढ़ने और बहस करने की जरूरत है।)
अब अगर हम इस आरक्षण पर होने वाली बहस के दूसरे पहलू पर जाएँ तो, ज्यादातर लोंगों का मानना है कि देश में आर्थिक आधार पर आरक्षण होना चाहिए। आप इतने नासमझ कैसे हो सकते हैं कि गरीबी उन्मूलन को आरक्षण से जोड़ रहे हैं। आरक्षण देने का मकसद इन जातियों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने का नहीं था। आरक्षण तो उनको  इस लिए दिया गया क्यों कि उनको जातिवाद के आधार पर हजारों हजार वषों से जीवन के अनेको आयामों से यथा - सत्ता, शिक्षा, उत्पादन, न्याय, संचार वयवसाय, स्व्यंसेवी संघटनों में प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया जिसेस कि वह राष्ट्र निर्माण कि प्रक्रिया में हिस्सा ले सके। ये तथाकथित लोग (जनार्दन द्विवेदी और बाबा राम देव) मनु के जमाने से, शम्भूख और एकलव्य का इतिहास क्यों भूल रहे हैंआर्थिक रूप से गरीबी 10-20 या 50 वर्ष की हो सकती हैपरन्तु दलितों कि वंचना, तिरष्कार, अनादर, अस्पृष्यता, बहिष्कार  हजारों  साल पुराना है। अब आप ही फैसला कीजिये कि आरक्षण का असली हक़दार कौन है? अगर आपको कुछ और जातियाँ इस तरह की कष्टों को झेले हुए दिखती हैं तो कृपा करके उन्हें भी आरक्षण का लाभ दीजिए। अगर आपको यह कार्यक्रम चलाना है कि किसी भी जाति के गरीब की मदद की जाए, तो आप ब्राम्हण, क्षत्रिय या किसी भी उच्च या निम्न वर्ग के लिए एक दो नहीं 10 कार्यक्रम चलाइए। किसने रोका था आपको? आप ही बताइए कि आज भी गावों में कितने प्रतिशत ब्राम्हण, क्षत्रिय, बनिए या उत्तर प्रदेश के यादव और पश्चिमी यूपी-हरियाणा के जाट गरीब होते हैंआप देखेंगे कि ज्यादातर गरीबों की संख्या भी पिछड़ी जातियों में ही होती है. फिर जो लोग असली भारतीय समाज या गाँवों को जानते हैं, उन्हें पता है कि कोई भी दलित कितना भी पैसे वाला क्यों ना हो। उसके घर में कितने भी लोग आई.ए.एस. हो गए हों, लेकिन उनकी सामाजिक स्थिति में कुछ विशेष बदलाव नहीं हुआ है। कोई भी गरीब ब्राम्हण भी उन अमीर दलितों को उसी गिरी हुई नजर से देखता है.जिस वाक्य "भारतीय संविधान के आधार किसी के साथ जाति-धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा" के आधार पर बाबा साहब ने आरक्षण दिया था। आज विरोधी लोग इसी लाइन को आधार बनाकर विरोध कर रहे हैं। क्या यह कुतर्क सही है इस वाक्य को नकारात्मक रूप से देखा जा रहा है। अब अगर हम सरकारी नौकरियों में आरक्षण की बात करें तो क्या इन जातियों की जनसंख्या के अनुपात में उनको प्रतिनिधित्व मिल सका है? क्या अल्पसंख्यक कही जाने वाली जातियों को सामाजिक परिकल्प में वो जगह मिली है, जो बाबा साहब अम्बेडकर ने आरक्षण के उद्देश्य के रूप में देखी थी? अगर सही उत्तर देंगे तो नहीं। आज अगर आपको आरक्षण पर ही बहस करनी है तो  मंडल कमीशन के बाद ओ.बी.सी. में सामिल हुई कुछ जातियों की बात की जाए मैं खुद ओबीसी से आता हूँ, और इस आरक्षण का विरोंध नहीं कर रहा हूँलेकिन सामाजिक स्थिति पर मिलने वाले इस आरक्षण पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए आप देश में एक शोध करवा कर पता कर सकते हैं कि किन ओबीसी जातियों की स्थिति उपर हुई है ओबीसी में मिलने वाला आरक्षण पूरा का पूरा यादव और कुछ तथाकथित जातियों को ही मिल जाता है जो यह बात कहते हैं कि जिसको एक बार आरक्षण मिल जाए तो उसे दोबारा ना मिले इसका प्रावधान तो संविधान में भी है कि किसी की भी तीसरी पीढी को आरक्षण नहीं मिलेगाहालांकि इसपर सही ढंग से अबतक अमल नहीं हो पाया है मेरी इस बात पर सहमति है कि जिन जातियों में या जिन परिवारों में पर्याप्त आरक्षण मिल चुका है, उन्हें कम आरक्षण देकर अन्य उसी श्रेणी की जातियों को अधिक मौके दिए जाने चाहिए लेकिन मेरी बात के जवाब में जे. एन. यू. के प्रोफेसर विवेक कुमार एक जवाब देते हैं उनकी रिसर्च में उन्होनें 60 आई.ए.एस. की लिस्ट बनाई जिनमें से केवल 2 के बच्चे ही आई.ए.एस. बन पाएऔर 60 प्रोफेसरों की लिस्ट में केवल 1 ऐसे थे, जिनके बाप हाईस्कूल में मास्टर और बाकी केवल तीन के ही 10वीं तक पढ़े थे इस तरह से आप पूरे विश्वास के साथ आप यह भी नहीं कह सकते हैं कि जो आदमी आरक्षण से नौकरी पाया है, तो उसका बेटा या बेटी भी आरक्षण पाकर नौकरी पा जाएंगे
इस चल रही बहस को लोग अलग-अलग ढंग से देख रहे हैं मुझे नहीं लगता है कि जनार्दन द्विवेदी जैसा परिपक्व नेता इस तरह के बयान देगायह कांग्रेस पार्टी की एक चाल हो सकती है जनार्दन द्विवेदी वर्तमान समय में कांग्रेस के चाणक्य माने जाते हैं सोनिया और राहुल से उनकी करीबी जगजाहिर है उन्होनें ऐसा कहा फिर सोनिया गाँधी ने इस बात का खण्डन किया अब मोदी या भाजपा को भी इस बात पर अपनी प्रतिक्रिया देनी ही पड़ेगी अगर भाजपा कोई भी स्पष्ट स्टैंड लेती है, तो वह फंस सकती है भाजपा को तो यह बात समझ में आ गई लेकिन मोदी को पी.एम. बनाने के लिए हरिद्वार छोड़ चुके बाबा राम देव इस चाल में फंस गए कांग्रेस को पता था कि मोदी को पसंद करने वाला तबका अपर-कास्ट ही है इसलिए अपर-कास्ट (मोदी समर्थकों) और पिछड़ा+दलित (जो कांग्रेस से नाखुश हो चुके हैं) में एक लकीर खींच दी जाए
अगर मोदी जी कहेंगे कि जातिगत आरक्षण खत्म हो तो पिछड़ी और दलित जातियाँ जिनका अपने साथ आने का मोदी और उनके समर्थक दावा कर रहे हैं, वो उनके खिलाफ हो जाएंगीअगर उन्होने जनार्दन द्विवेदी के बयान को सोनिया की तरह बकवास बता दिया तो शायद सवर्ण युवा जो उनसे 21वीं सदी के भारत के नवनिर्माण की आस लगाए बैठा है, वो अपना बोरिया बिस्तर कहीं और टिका देगा इसीलिए हार के कगार पर खड़ी कांग्रेस के द्विवेदी का यह बयान मास्टर स्ट्रोक है । दुधारी तलवार की तरह । वैसे कांग्रेस का स्टॅंड भी मुझे समझ में नहीं आ रहा है यह वही कांग्रेस है, जिसके नेता राजीव गाँधी नें मंडल के समय हो रही हिंसा पर संसद में बोलते हुए कहा था कि "कांग्रेस पार्टी जातिगत आरक्षण की जगह आर्थिक आरक्षण का समर्थन करती है" बल्कि एक प्रस्ताव भी पास हुआ थाआज उसी कांग्रेस ने इसे बकवास टाइप बता दिया हैभाजपा को अंदेशा था कि इसपर राहुल गाँधी का बयान आ सकता है, तभी वो इसे भी मोदी को रोंकने की चाल बता रही है 
अगर बाबा रामदेव मोदी से इस बात को कहेंगे, तो मुझे नहीं लगता है कि मोदी में इतना साहस है कि वो सार्वजनिक मंच पर आकर इस बात का स्पष्टीकरण दे  सकते हैं वो बाबा को इस बार भी पिछले टैक्स वाले मुद्दे के जैसे ही "विचार करने" का झुनझुना थमा देंगेबाबा रामदेव ने भाजपा और मोदी को एक गहरे संकट में डाल दिया है अब देखना होगा कि इस पर भाजपा या मोदी किस तरह से स्पष्टीकरण देंगे देंगे या भी नहीं
आरक्षण राष्ट्र निर्माण कि प्रक्रिया है जिसके माध्यम से  सामाजिक असमानता और अस्थिरता को दूर किया जा सके मैं तो कहता हूँ कि आप ओ.बी.सी. से कुछ जातियाँ कम करके आरक्षण का प्रतिशत भी कम कर दीजिए ताकि सामान्य लोगों के कम्पटीशन को और जगह मिल सकेअल्प-संख्यकों को भी आरक्षण मिलना चाहिए लेकिन एक रिषर्च के आधार पर अगर मुस्लिम ओ.बी.सी. में आरक्षण पा रहे हैं, तो उनको इससे हटाकर अन्य अल्पसंख्यकों को मिलना चाहिए आप आर्थिक आरक्षण की बात तो कर रहे हैं, अगर मान लिया जाए कि यह हो गया तो जिस तरह से देश में जाति-प्रमाणपत्रों का फर्जीवाड़ा और बिक्री सामने आ रही है उससे कैसे मान लिया जाए कि गरीबों के साथ न्याय होगा कितने असली पात्रों को सरकार बी.पी.एल. कार्ड दे पाती है क्या यह सवर्णों और अमीरों को नहीं मिल रहे हैं कितने गरीब और दलित इस प्रक्रिया से वंचित रखे जाते हैं। मैनें एक व्यापक मुद्दे पर अपनी चोटी सी राय रख दी है अब आप भी बहस करते रहिए, लेकिन जिन्दबाद! मुर्दाबाद टाइप नहीं! बाकी जउन है, वो तो चलिबे करी

Sunday, February 2, 2014

क्या बॉलीवुड को राजनीति पर बोलना चाहिए?

हमारा हिन्दुस्तान बहुत सारी संस्कृतियों और विचारधाराओं का देश हैफिर भी यहाँ पर कुछ क्रिकेट या बॉलीवुड को धर्म से कम नहीं माना जाता हैबॉलीवुड ने अपने 100 साल में बहुत सारे महानायक और महानाइकायें दी हैंइसमें दिलीप कुमार से लेकर अमिताभ बच्चन और आमिर ख़ान तक और मधुबाल और रेखा से लेकर दीपिका या ऐश्वर्या राय तक कलाकार दिए हैंइनका एक मात्र काम माना जाता रहा है, मनोरंजन करनाउन्होंने हमेशा बदलते वक्त में देश के हर मुद्दे पर अच्छी फिल्में और गाने दिए हैंयह एक बहस का विषय हो सकता है क़ि फिल्मों में सबकुछ सही ही नहीं होता हैलेकिन अगर नकारात्मक पहलू को छोड़ दिया जाए तो फिल्मों ने हर पीढी की सोंच को बदलने का काम किया हैगाँव-गाँव तक फैशन पहुँचालोगों में अंग्रेज़ी जानने की इच्छा आई और इसी का प्रभाव था कि अनपढ लोगों को भी देश के इतिहास और कल्चर के बारे में ज्ञान हुआइसमें सबसे अच्छी बात यह थी कि आज पूरे देश में सबसे ज्यादा हिन्दी का प्रचार-प्रसार हुआआज बंगाली और मद्रासी लोग भी फिल्में देखकर हिन्दी सीख रहे हैंदेश का युवा जागरूक हुआ
देश में 1947 के बाद से सबसे अधिक सम्प्रदायिक सौहार्द खराब हो रहा थालेकिन फिल्मों ने इसे जोड़ने का एक बड़ा प्रयास कियाबॉलीवुड ने ही कितने कट्टरपंथियों की सोंच बदल दीदिलीप (यूसुफ़) साहब, तलत महमूद, रफी साहब, गुलजार और जावेद साहब, सलीम ख़ान, शाहरुख ख़ान, आमिर ख़ान और सैकड़ों गायक, लेखक, और कलाकारों की यह पंक्ति पूरे हिन्दू बहुल देश के दिलों पर छा गईपुरानी कुप्रथाओं के अंत में भी फिल्मों ने एक बड़ी भूमिका अदा कीआज कितने ही युवा प्रेम-विवाह करते हैं, उनके मन से समाज, जाति, धर्म, और क्षेत्र का डर खत्म हो चुका हैआप मुम्बई में ही देखेंगे कि कितने ही यूपी और बिहार के लड़के महाराष्ट्रियन लड़कियों से शादी करते हैंमराठी, बंगाली, मद्रासी, पंजाबी, गुजराती सब एक-दूसरे से प्रेम-विवाह कर रहे हैंकहने का मतलब समाज को एक सकारात्मक सोच दी है इस बॉलीवुड नेपिछले कुछ वर्षों में ख़ान की तिकड़ी (सलमान, आमिर, शाहरुख) के आगे कोई टिक नहीं पाया हैतीनों में से किसी की भी फिल्म आती हैतो यह रिकार्ड टूटने की बात होती है क़ि दबंग से धूम3 ने कितने 100 करोड़ ज्यादा कमाएपूरे देश में लोगों को 15-15 दिन तक टिकट के लिए संघर्ष करना पड़ता हैजब कोई फिल्म इतनी हिट होती है, तो जाहिर सी बात है क़ि ये फिल्में पूरे देश के हिन्दू, मुस्लिम, सिख और ईसाई भी देखते होंगे? केवल मुसलमानों के ही थियेटर जाने से तो कोई फिल्म 500 करोड़ नहीं कमा सकती हैमेरा मतलब है, इस देश का 90% तबका सेकुलर विचारधारा का हैसब इन फिल्मी सितारों को आँखों पर बिठाकर रखते हैं
जब ऐसे में कोई अभिनेता कोई राजनैतिक या देश के गंभीर मुद्दे जिनपर उन्हें नहीं बोलना चाहिए, बोल देता है, तो पूरे देश को ठेस पहुंचती हैकोई भी इसे पसंद नहीं करता है. जैसे 2-3 साल पहले ही शाहरुख ख़ान ने पाकिस्तान के खिलाडियों को भारत में खेलने की अनुमति को लेकर एक ऐसा ही बयान दे दिया थातब पूरा देश 26/11 के दर्द उबर भी नहीं पाया थातब उनका पूरे देश में बहुत विरोध हुआ थाजो किसी हद तक जायज भी थाहालांकि कुछ राष्ट्रवादियों के विरोध के तरीके को मैं सही नहीं मानता हूँमैं पूरे देश में लता मंगेशकर के गीतों को लोग दिल से सुनते हैंयहाँ तक कि भारत में जितने मशहूर ग़ुलाम अली हुए, उतनी ही लताजी पाकिस्तान मेंमैं भी अभी तक उनके गीतों को बहुत पसंद करता था. कुछ दिन पहले ही वो अपनी मोदी भक्ति को पूरे देश के सामने दिखा चुकी हैं। 15-31 जनवरी तक तहलका में 5 साल की बेस्ट कवर स्टोरी दी गई हैंउसमें ही लता जी पर भी एक स्टोरी हैपता नहीं क्यों कल मेरे बहुत प्रयास के बाद भी उसे मैं दिल से पढ नहीं सकाअभी 14 जनवरी से एक बहुत बड़ी चर्चा हो रही थी, सलमान ख़ान के मोदी के लिए "जय हो" के नारे लगानामैंने सलमान की 3-4 साल में कोई फिल्म नहीं छोड़ी थीइसे देखने का मन ही नहीं हुआइंटरनेट पर देखी लेकिन अच्छी फिल्म के बाद भी दिल से प्रसन्सा नहीं कर पायाअगर यह फिल्म फ्लॉप हुई है, तो केवल मुस्लिमों के नाराज होने से ही नहीं बल्कि हम जैसे सेकुलर हिन्दुओं की वजह सेएक हफ्ता भी नहीं हुआ पूरे के पूरे हॉल खाली पड़े हैंसलमान ने यह सब फिल्म को हिट करने के लिए किया था, लेकिन दांव उल्टा पड गया
कहने का मतलब यही है, क़ि जो जिसका काम है वही करे तो ज्यादा अच्छा रहता हैचाहे वो नेता हो, संत हो, अभिनेता या गायक हो सबको अपने-अपने काम करने चाहिएहो सकता है, आपकी निजी राय में कोई व्यक्ति विशेष अच्छा हो, लेकिन सर्वजनिक तौर पर आपकी प्रभाव का असर पड़ता हैक्योंकि आप "आम आदमी" नहीं हो। आपकी बात का असर पूरे समाज पर पड़ता है और आपकी यह विचारधारा उन प्रशंसकों के दिलों को ठेस पहुंचती है, जिनकी सँख्या करोड़ो में है भले ही यह प्रसंसा राहुल गाँधी या अरविन्द केजरीवाल की हो सभी को बोलने का मौलिक अधिकार हैअगर आपको बोलना ही है तो फिल्मी कैरियर छोड़कर राजनीति में कूद जाओ

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...