अभी तक 2014 के चुनाओं की तैयारी को लेकर अगर हम पिछले दो साल का घटनाक्रम उठाकार देखें तो पता चलता है कि नरेन्द्र मोदी का चुनाव प्रचार पूरी तरह से जाति से उपर उठकर चल रहा था। भले ही वो हिन्दुत्व को यदाकदा हथियार बनाते रहे हैं। नरेन्द्र मोदी ने विकास पर ज्यादा ध्यान रखा। लेकिन पिछले एक-दो महीने से इस मोदीमय गुब्बारे की हवा निकलती दिख रही है। आखिर वो भी उसी पुरानी सड़क पर क्यों लौट रहे हैं, जिसपर अभी तक हिन्दुस्तान की पूरी राजनीति चलती रही है। मोदी ने अचानक से जातीय समीकरण बनाने शुरु कर दिए हैं। खासकर उत्तरप्रदेश और बिहार में जो आरोप लालू, माया और मुलायम पर लगाते थे, वो अब खुद अपनाने लगे हैं। मोदी ने उत्तर प्रदेश में अपना दल के संस्थापक सोनेलाल पटेल की बेटी अनुप्रिया पटेल से गठबंधन की बात शुरु कर दी है। पूर्वांचल के अपनी जाति के बड़े नेता जगदम्बिका पाल की भी कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाने की खबरें तेज दिख रही हैं। उत्तरप्रदेश में इन तथाकथित जातियों का प्रभाव काफी प्रभाव है। उसी तरह बिहार में भाजपा ने जातिगत समीकरण बनाने शुरु कर दिए हैं। रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा के साथ गठबंधन लगभग पक्का ही हो गया है। उसी तरह कुशवाहा समाज के बड़े नेता उपेन्द्र कुशवाहा को भी अपने साथ मिला लिया है। इसके अलावा कांशीराम के साथ काम करने वाले बड़े दलित नेता उदित राज के दल का भी भाजपा में विलय हो गया है। अगर महाराष्ट में भी देखें तो दलित नेता रामदास अठावले की पार्टी आर.पी.आई. के साथ भी गठबंधन भाजपा ने कर लिया है।
अगर हम उपर्युक्त गठबंधनों की तरफ नजर डालें तो किसी भी दल या नेता का इतना ज्यादा प्रभाव नही है। हाँ यह बात हम मानते हैं कि इनका अपने क्षेत्रों या जातियों पर काफी वर्चस्व रहा है। अगर भाजपा इनके साथ गठबंधन करती है तो निश्चित तौर पर उसे फायदा पहुचेगा। अगर बात की जाए नैतिकता की तो क्या इन दलों खासकर दलित समुदाय वालों ने भाजपा के साथ गठबंधन करके बहुत अच्छा किया है। यह बात तो उन्हें अम्बेडकर साहब को याद करने पर ही पता चलेगी। यह वही भाजपा और संघ है जो हमेशा से ब्राम्हणवाद का प्रतीक रहा है। यही संघ हमेशा से अम्बेडकरवाद और आरक्षण विरोधी रहा है। क्या सोंचकर उदित राज ने भाजपा से हाथ मिलाया होगा? क्या उनका दलित समाज भाजपा को वोट करेगा? अगर करेगा, तो इसका मतलब है अभी तक दलित समाज सामाजिक चेतना और इतिहास नहीं जान पाया है। और जिम्मेदार भी उदितराज जैसे नेता हैं। इसका मतलब है कि कि उदित राज या पासवान को पता है कि दलित समाज इतना नासमझ है कि हम अपने फायदे के लिए उसे जहां कहेगें वहीं वोट देगा। इसके लिए हम मुस्लिमों के साथ भी धोखा मान सकते हैं। क्योंकि ग्रामीण आँचलों का मुस्लिम अभी भी दलितों की स्थिति से उपर नहीं उठा है। वह हमेशा दलित नेतृत्व पसंद करता हैं। (इसमें यह अपवाद हो सकता है कि किसी पार्टी का बड़ा मुस्लिम नेता क्षत्रीय हो, तब मुस्लिम उसे वोट कर दें।) हम मानते हैं कि कांग्रेस ने आज तक दलितों को कुछ नहीं दिया है। लेकिन ऐसा भी नहीं है थोड़ा सा ही दिया हो, लेकिन छीना कुछ भी नहीं है। वहीं अगर भाजपा को मौका मिल जाए तो उसका एक बड़ा तबका आरक्षण को खत्म करना चाहता है। यहाँ तक कि उसका पित्रसत्तात्मक सोंच संघ का यह प्रमुख एजेंडा रहा है। भाजपा ने हमेशा से दलितों के साथ भी किराएदारों जैसा व्यवहार किया है। भाजपा अपने ही दलित नेताओं को आगे क्यों नहीं बढाती है। उसके जो गिने चुने नेता रहे भी हैं, वो पूरी तरह से हिन्दुत्व से डुबे हुए हैं। भाजपा के दलित मोर्चा अध्यक्ष संजय पासवान की एक किताब से हम यह समझ सकते हैं। उन्होने अपनी किताब में बाबू जगजीवन राम को हिन्दुत्ववादी नेता बता दिया। इससे बड़ा झूंठ और क्या हो सकता है। उन्होंने आज कांशीराम को भारतरत्न देने की मांग कर दी। क्या वो कांशीराम के उस बयान का समर्थन करते हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि "अयोध्या की विवादित जमींन पर राम मंदिर नहीं सौचालय बनाना चाहिए।" अगर हाँ तो सर्वजनिक करो। फिर देखो संघ और भाजपा संजय को कैसे गरियाते हैं। अगर उनकी बात से इत्तेफाक नहीं रखते हो, तो ऐसे आदमी को भारत रत्न क्यों जिसकी विचारधारा ही पसंद नही हो।
आखिर क्यों मोदी इन सभी चालों से प्रधानमंत्री पद का ख्वाब देख रहे हैं। फिर कहेंगे कि अपना एजेंडा सेट करने में गठबंधन के साथियों का दबाव आ गया था। फिर क्यों मिशन 272+ चला रखा है? बंद करो जब पता है 272 तक नहीं पहुंचेंगे। इसका मतलब क्या यह समझा जाए कि अगर 272 नहीं आए तो गठबंधन। और अगर आ जाएँ तो सबको लत मारो अकेले सरकार चलाएंगे। इससे बड़ा धोखा और क्या होगा? इसके साथ-साथ ये तत्काथित दलित नेता भी अपने समाज के सबसे बड़े गद्दार हैं। रामविलास पासवान को ही ले लो। हर चुनाव में एक अलग गठबंधन। अपनी जाति के 6-7 प्रतिशत वोटों को क्या समझ रखा है। जब चाहा लालू के साथ, जब चाहा नीतीश के साथ, फिर कांग्रेस के साथ, अब भाजपा के साथ। वो भी उस आदमी के साथ जिसके कारण 2002 में मंत्रीपद छोड़ा था। यह वही भाजपा है जिसमें रणवीर सेना के नेता आज तक हैं। रणवीर सेना के आगे भाजपा किस दलित नेता की सुनेगी। इसी रणवीर सेना के आतंक के डर से तो दलितों ने बिहार में भाजपा को बाहर का रास्ता दिखाया था। आखिर अपनी कुर्सी के लिए और कितना गिरेंगे? और कितनी जगह अपने समाज को लेकर जाएंगे? अगर ऐसा ही करते रहे तो जिस दिन यह दलित समाज जाग गया, उस दिन इनका साथ छोड़ कोई मजबूत समाजहितैषी नेता का साथ पकड़ेगा।